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National Rural Employment Guarantee scheme in Hindi


भारत का राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी कानून मानव इतिहास के सबसे बड़े रोजगार कार्यक्रम का वादा करता है। वर्ष 2008-09 में भारत सरकार ने इस कार्यक्रम के लिए 26,500 करोड़ रुपया मुहैया करायें है और इस कार्यक्रम का विस्तार अब पूरे देश में हो चुका है जिसमें सबसे पिछड़े और उपेक्षित क्षेत्र शामिल हैं। सबसे गरीब परिवारों को काम उपलब्ध कराते हुए यह कार्यक्रम गांव में स्थायी परिसम्पत्तियों के सृजन की सम्भावना उज्ज्वल करता है। इस कार्यक्रम का शंखनाद ग्रामीण बदहाली और दुर्गति के साये में हुआ है। विकास के नक्शे पर देश के करोड़ो लोगों का चेहरा आज भी धूमिल है।

पूरी दूनिया में खून की कमी से पीड़ित गर्भवती महिलाओं का प्रतिशत भारत में सबसे अधिक है यह देखते हुए कोई आश्चर्य नहीं कि हमारे 50% बच्चे कुपोषण ग्रस्त हैं।
सबसे ज्यादा उत्पीड़ित है आदिवासी सूखे क्षेत्र, जो विकास के सभी मानको पर सबसे पीछे हैं।

पिछले 10 वर्षो में भारत के एक लाख से ज्यादा किसानों ने आत्म हत्या की। देश के एक चौथाई जिलों में कुण्ठा और हताशा अब उग्र रूप धारण करने लगी हैं।

रोजगार गारंटी के विचार को समझने के लिए हमें मानव इतिहास के एक और दुर्गति के दौर की ओर जाना होगा।...

1920 के दशक तक अर्द्धशास्त्री की मुख्य धारा ये मानने को तैयार ही नही थी कि पूँजीवाद में बेरोजगारी सम्भव है। लेकिन आर्थिक महामंदी ने इस भ्रम को हमेशा के लिए तोड़ दिया... खेत और कारखाने ठप्प पड़ गए, चारो ओर तबाही की चपेट में लोग किसी भी तरह के काम की तलाश में भटकते हुए नजर आने लगे। पर, काम मिले तो कैसे... पहली बार लाखों लोगों ने गरीबी की बेरहम टीस को अनुभव किया और सड़को पर अशांति का सैलाब सा उमड़ने लगा।

उस वक्त अंग्रेजी अर्थशास्त्री जॉन मेनाड कीन्स ने यह दिखाया कि ऐसी भीषण बेरोजगारी दूर करने के लिए सरकारी हस्तक्षेप जरूरी है। यह भी स्पष्ट हुआ कि सरकारी कोष का सबसे बेहतर उपयोग है उत्पादक सम्पत्तियों का निर्माण।
अमेरिका में राष्ट्रपति रुजवेल्ट ने न्यू डील के नये दौर की घोषणा की। पूरी दुनियां में कल्याणकारी राज्य की कल्पना और मजबूत होती गई।
1980 के दशक तक 30 देशों के संविधानों में काम के अधिकार को स्वर्ण अक्षरों में नवाजा गया । इनमें 18 विकाशशील देश भी शामिल है। 25 देशों में इस अधिकार का उल्लेख रोजगार की गारंटी के रुप में भी है।

प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के गरीबी हटाओं के नारे से प्रेरित उपेक्षित क्षेत्रों के लिए बहुत सारी विशेष योजनाओं ने इस दर्द की सरकारी दवा का रूप लिया।

प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की जुबानीः-

“गरीबी तो एक भयंकर स्थिति है जो किसी भी देश को कमजोर करती है। इसीलिए हमारा प्रथम काम है... इस गरीबी को दूर करें।“

लेकिन इन कार्यकर्मों के बावजूद या यूं कहें कि शायद इनके अनेकों कमजोरियों के कारण ही लोगों का गांव से पलायन जारी रहा।
और ये लोग अपने लिए एक टुकड़ा आसमान ढूंढते-ढूंढते आ पहुंचे शहरों की गंदी बस्तियों में, जहां इनका अस्तित्व महज एक आंकड़ा बनके रह गया।
बेरोजगारों की लंबी कतार में खड़े अनगिनत लोगों के पीछे दिन प्रतिदिन काम की तलाश में परेशान बस एक और....

परेशान लोग विनती करते हुएः-

“काम मिल जायेगा तो करेंगे नहीं तो फिर वापिस चले जाएंगें, तीन दिन से खड़े हैं कोई काम मिलता है कोई दिन नहीं मिलता, महीने में 10 दिन या 15 दिन काम मिलता है। रोटी कैसे खाएंगे।“

शहरों की इन बस्तियों में गंदगी, बीमारी के बीच अमानवीय हालातों में जीते ये लोग शायर अली सरदार जाफरी की उस गजल की याद ताजा करते हैं
कौन आजाद हुआ
किसके माथे से स्याही छूटी
मेरे सीने में अभी दर्द है महभूमि का
मादरे हिन्द के चेहरे पर उदासी है।

60 सालों की दुर्गति और लंबे चले संघर्ष का नतीजा है... राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी कानून।

ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना 2005

पर क्या रोजगार गारंटी भी सरकारी योजनाओं में ताश की गड्डी में एक और पत्ता है, या नई बोतल में वही पुरानी घिसी पिटी शराब।
बहुत से आलोचकों का यही मानना है और इसे वे दोहराते नहीं थकते।
लेकिन वे अपनी मूल अवधारणा में रोजगार गारंटी आजादी के बाद रची सभी सरकारी योजनाओं से एकदम अलग है।

पहली बार कानून बना है। जिसके तहत सरकार को गांव के सभी बेरोजगार को काम देना ही पड़ेगा। अब ये लोगों का कानूनी हक है। सरकारी उदारता का दान नहीं है। न ही सरकारी रोजगार गारंटी का कोई समय सीमा। यह तो हमेशा-हमेशा के लिए लोगों का संवैधानिक अधिकार बन गया है।

हर पंजीकृत मजदूर को जॉब कार्ड मिलता है। इन कार्डों पर साफ लिखा रहता है कि प्रत्येक परिवार को कितने दिन की मजदूरी मिली और उसके एवज में कितने पैसे। जॉब कार्ड एक और जहाँ काम के अधिकार का सबूत है वहीं दूसरी ओर कार्यक्रम में पारदर्शिता सुनिश्चित करने का तरीका भी।

हर कोई जो शारिरिक श्रम करने के लिये तैयार है उसे 15 दिनों के अन्दर-अन्दर सरकार को काम देना ही पड़ेगा यदि काम नहीं मिलेगा तो सरकार को बेरोजगारी भत्ता देना होगा।

रोजगार गारंटी अधिनियम उस ठेकेदारी को पूरी तरह से प्रतिबंधित करता है जो पिछले 60 सालों से ग्रामीण विकास की सरकारी योजनाओं पर हावी थी। इन ठेकेदारों ने हमेशा मजदूरों का शोषण किया है और मानव अधिकारों का बेरहमी से हनन।

दूसरी ओर रोजगार गारंटी अधिनियम न्यूनतम मजदूरी दर और कार्यस्थल पर मजदूरों के लिए अनेक सुविधाएं उपलब्ध कराता हैं। असंगठित क्षेत्र के मजदूरों के लिए ऐसी सुविधाओं के बारे में खासतौर से ग्रामीण क्षेत्रों में कभी ऐसा सोचा ही नहीं गया। अधिनियम के अन्तर्गत मशीनों का उपयोग वर्जित हैं। ताकि अधिक से अधिक रोजगार का सृजन हो सके।

संभवतः रोजगार गारंटी का सबसे शक्तिशाली प्रावधान ग्राम पंचायतों को मुख्य कार्यपालक एजन्सी का दर्जा देना है। जिन क्षेत्रों में पंचायतें सक्रिय है। और जहां जमीन से जुड़े कार्यकर्ताओं ने ग्राम पंचायत को इस मुद्दे पर सम्बल दिया है। वहां साफ प्रभाव नजर आते हैं। ऐसी ही ग्राम पंचायत है चिरचारीकला, जो भारत के एक सबसे पिछडे जिले में स्थित है। यहां पंचायत और स्थानीय लोक संगठनों ने कंधे से कंधा मिलाकर रोजगार गारंटी में उल्लेखनीय कार्य किया है।

ग्रामीण सरपंच सुरेश शर्मा ने कहाः-

रोजगार गारंटी योजना चालू होने के पहले, कुल पांच साल में सरपंच ज्यादा से ज्यादा 8 से 10 लाख ही खर्च कर पाते थे और 10 लाख के अंतर्गत में ही आय-व्यय निपट जाता था। लेकिन जबसे रोजगार गारंटी योजना चालू हुआ है। प्रत्येक वित्तीय वर्ष में 40 से 45 लाख का काम यहां लोगों और पंचायत को मिलता है।

अधिनियम पारित होने के बाद जिस तरह के वित्तीय संसाधन पंचायतों को प्राप्त हो रहे हैं। वे स्वाधीन भारत के इतिहास में पहले कभी नहीं हुए।

सुरेश शर्मा ने कहाः- “लगभग यहां 400 परिवार हैं, ग्राम सभा ने 5 साल का रोजगार योजना तैयार किया है। उसी योजना के आधार पर यहां काम चल रहा है।“
शर्मिलाबाई पंच ने कहाः- “महिला ने कहा यहां गड्ढा था, बड़े पत्थर था पानी भर जाता था जिससे मुझे उठने-बैठने में दिक्कत का सामना करना पड़ रहा था इसिलिए यहां मैदान का संमतलीकरण हुआ है।“
अमरीबाई पंच ने कहाः- “पहले काम नहीं था तो आदमी इधर उधर काम की तलाश में जाता था अब काम है तो लोग खाने कमाने लगे है। अब इधर-उधर लोग क्यों जाये।“

किशन कुमार ने कहाः- ये लोग बोलते हैं कि जब ग्राम पंचायत में ही रोजगार गारंटी योजना के तहत काम मिल जाता है तो बाहर काम करने के लिए क्यों जायें।

मुकेश यादव की जुबानीः- हम लोग शूरू से 12-15 साल से नागपुर में ही काम करते आये है। अब यहां काम खुल रहा है तो अब यहीं काम कर रहे हैं। (पंचायत चिरचारीकला)

घनश्याम मजदूर ने कहाः- 90 हाजरी के आस-पास हो गया यानि 1-2 महीना के करीब 5000-6000 रूपया हो गया है।

कौशल्याबाई जुगनबाई, जानकीबाईः- इस योजना में हमारे बेटे, बहु-बेटी काम करते हैं ।

पदमाबाई ने कहाः- अभी तो काम लगातार ही मिल रहा है। रोजगार गारंटी योजना के कारण ज्यादा काम मिल रहा है। पिछले साल तो काम ही नहीं मिला।

चतरॉव पंच काम करीब 25 से 30 लाख के करीब हो गया है अभी और बाकी है काम कराने के लिए।

ज्ञानकुमारी चंद्रवंशी पंच अभी बारद्वार रोड और ठाकुरबाधवा रोड पर अभी काम करना बाकी है।

सुशील कुमार सरपंच सिंचाई की यहां व्यवस्था 0% थी लेकिन अब धीरे-धीरे काम चालू होने से थोड़ा-थोड़ा सिंचाई बढ़ जायेगी यहाँ और इधर 1-2 किलोमीटर पूरा प्लाट है जो कि कृषि भूमि है और यहाँ पानी पहुँचने का कोई साधन नहीं था साहब अगले साल अकाल पड़ गया था यहां वर्षा नहीं हुई थी तो यहां पानी नहीं था तो खेती भी सहीं ढ़ंग से नहीं हो पाई ग्राम पंचायत में बैठकर सभी बातचीत किये कि इसमें पाइप डालने से इधर 2-4 बीघा प्लाट पट जायेंगे। (ग्राम चिरचारीकला मार्च 2008)

(ये सारे पंचायत चिरचारीकला, जिला राजनांदगांव, छत्तीसगढ़ से हैं।)

ग्राम चिरचारीकला जून 2008 रोजगार गारंटी योजना के बादः-
चिरचारीकला पंचायत ने जो कर दिखाया है वे भारत के कई ग्रामों में नजर आ रहा है। रोजगार गारंटी के तहत जलागम विकास पर बल दिये जाने से कार्यक्रम और भी प्रबल बना है ऐसे कार्यों से केवल रोजगार ही नहीं मिलता, इनसे ग्रामीण अर्थव्यवस्था के आगे बढने का मार्ग भी प्रशस्त होता है ताकि गांव प्रगति के केंद्र बिंदु बन सके।

कार्यक्रम के अंतर्गत दिया गया सरकारी निर्देश सबसे गरीब किसानों को अपने खेतों में अपनी पूंजी लगाने के लिये भी प्रोत्साहित करता है। लेकिन हमें ये मानना होगा कि देश में अब भी ऐसी सफलता की कहानियाँ कम ही सुनने को मिलती है।

अधिनियम और उसके प्रावधान कितने ही प्रभावशाली क्यों न हो, उनकी जमीनी क्रियान्वयन में अभी भी कमजोरियां हैं। ये सार्वजनिक कार्यों से किसानों के निजी पूंजी निवेश को प्रोत्साहन मिलता है। इसमें ऐसे किसान भी शामिल हैं जो आज खेती में दिलचस्पी खो बैठे हैं और घर-बार से कोसो दूर काम की तलाश में निकल जाते हैं। शासकीय बजट का घाटा कम करने की हौड़ में हमें ऐसे आवश्यक सरकारी खर्च को भूलना नही चाहिए जिससे आर्थिक वृद्धि का मार्ग भी प्रशस्त होता हो और पर्यावरण में सुधार भी।

बोदरसिंह, सीमांत किसान, गांव बाग्ली “बदलाव इसलिये आया कि डैम बनने से नदी, नाला में हमारे पानी आया, पैदावार बढ़ी, अभी 50-6- कुंतल गैहूं हो जाता है। पहले पानी नहीं था तो पैदावार कैसे हो।“

रोजगार गारंटी की सम्भावनायें तो अपार है लेकिन इन सम्भावनाओं को साकार करने के लिए हमें इस कार्यक्रम के अम्लीय ढांचे में क्रांतिकारी परिवर्तन करने होंगे..इन परिवर्तनों के बिना ये कार्यक्रम हमेशा की तरह असफल होते रहेंगे और रोजगार गारंटी कार्यक्रम की असफलता भारत में कल्याणकारी और विकासोन्मुख राज्य के लिए घातक सिद्ध हो सकती हैं।

रोजगार गारणटी में वांछित सुधार
सभी स्तरों पर प्रोफेशनल अमले की नियुक्ति
ग्रामीण कार्यकर्ताओं की क्षमता वृद्धि
कार्य योजना बनाने और क्रियान्वयन में ग्रामीण समुदाय का नेतृत्व
कार्य दर अनुसूची में अमूलचूल परिवर्तन
सूचना प्रौद्येगिकी का सभी स्तरों पर उपयोग
सोशल ऑडिट के लिए सशक्त व्यवस्था

सच बात तो ये है कि एक देश के नाते हमारे पास कोई विकल्प ही नहीं है। यदि हम अपने गांव की ओर ध्यान नहीं देंगे तो क्या हमारे शहरों पर मंडराते संकट के बादल कभी छट पायेंगे।

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