Bharadsar tal lake in Hindi

HIndi Title: 

भराड़सर ताल झील


हिमाचल व गढ़वाल की सीमारेखा के बीच स्थित भराड़सर ताल एक विशाल झील है, जो 16,500 फुट की ऊंचाई पर नीलाग बौंधार की गोद में एक स्वर्गिक पावन स्थल है। इस पवित्र झील में गढ़वाल व किन्नौर जनपद की सीमावर्ती आबादी के देवी-देवताओं की प्रतिमाओं को स्नानार्थ लाकर प्रतिवर्ष मेला आयोजित किया जाता है। नैटवाड़ से लगभग 17 कि.मी. पर भीतरी गांव से एक रास्ता इस झील तक है जबकि सांकरी-जखोंल-लिकड़ी दूसरा रास्ता है। हालांकि दोनों रास्तों से चढ़ाई है पर नैसर्गिक सौन्दर्य के प्रभाव से थकान महसूस नहीं होती। पगौड़ा शैली के कलात्मक भवन व छत्रशैली से विभूषित भव्य मंदिरों की विलक्षण वास्तुकला के अतिरिक्त यहां की क्षेत्रीय मदमत्त संस्कृति भी विस्मित कर देती है। समुद्रतल से 16,200 फुट ऊंचाई पर वर्गाकार में डेढ़ कि.मी. के व्यास में पसरी इस झील के चारों किनारों पर करीने के साथ तराशी गई, खूबसूरत ढंग से बिछी स्लेटों को देखकर तो प्रकृति की अद्भुत संरचना पर कुतुहल हो उठता है। जनश्रुति है कि भराड़ नामक एक कुख्यात राक्षस का यहीं पर देवी के हाथों संहार हुआ था। ऐसी अनूठी व महकती झील को अभी पर्यटन मानचित्र में स्थान नहीं मिला है। आशा है पर्यटकों को आकर्षित करने के लिए पर्यटन विकास विभाग यथाशीघ्र ध्यान देगा।

अन्य स्रोतों से: 

भराड़सर ताल से निकली नदियों के बारे में एक कहानी


उत्तरकाशी जनपद में दो नदियाँ रुपीन और सुपीन देवाक्यारा के भराड़सर नामक स्थान से निकलती हुई अलग-अलग दिशाओं में प्रवाहित होती हैं. रुपीन फते पट्टी के १४ गाँवों से गुजरती है जबकि पंचगाई, अडोर व भडासू पट्टियों के २८ गाँवों से जाती है. लेकिन इन गाँवों के लोग न तो इन नदियों का पानी पीते हैं और न ही इनसे सिंचाई की जाती है. नैटवाड़ में इन नदियों का संगम होता है और यहीं से इसे टौंस पुकारा जाता है. लोकमान्यताओं के अनुसार रुपीन, सुपीन और टौंस नदियों का पानी छूना तक प्रतिबंधित किया गया है. वजह धार्मिक मान्यताएं भी हैं. कहते हैं कि त्रेता युग में दरथ हनोल के पास किरमिरी नामक राक्षस एक ताल में रहता था. उसके आतंक से स्थानीय जन बेहद परेशान थे. लोगों के आवाहन पर कश्मीर से महासू देवता यहाँ आये और किरमिरी को युद्ध के लिए ललकारा. भयंकर युद्ध के बाद महासू देव ने आराकोट के समीप सनेल नामक स्थान पर किरमिरी का वध कर दिया. उसका सर नैटवाड़ के पास स्थानीय न्यायदेवता शिव के गण पोखू महाराज के मंदिर के बगल में गिरा जबकि धड़ नदी के किनारे. इससे टौंस नदी के पानी में राक्षस का रक्त घुल गया. तभी से इस नदी को अपवित्र तथा तामसी गुण वाला माना गया है.

एक अन्य मान्यता के अनुसार द्वापर युग में नैटवाड़ के समीप देवरा गाँव में कौरवों व पांडवों के बीच हुए युद्ध के दौरान कौरवों ने भीम के पुत्र घटोत्कच का सिर काट कर इस नदी में फेंक दिया था. इसके चलते भी इस नदी को अछूत माना गया है. मान्यता है कि इस नदी का पानी तामसी होने के कारण शरीर में कई विकार उत्पन्न कर देता है यहाँ तक कि अगर कोई लगातार दस साल तक टौंस का पानी पी ले तो उसे कुष्ठ रोग हो जाएगा!

सामाजिक कार्यकर्त्ता मोहन रावत, सीवी बिजल्वाण, टीकाराम उनियाल और सूरत राणा कहते हैं कि नदी के बारे में उक्त मान्यता सदियों पुरानी है और पौराणिक आख्यानों पर आधारित है. वे कहते हैं कि हालांकि इस नदी के पानी के सम्बन्ध में किसी तरह का वैज्ञानिक शोध नहीं है लेकिन स्थानीय जनता की लोक परम्पराओं में यह मान्यता इस कदर रची बसी हुई है कि कोई भूलकर भी इसका उल्लंघन नहीं करता.

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