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Bhopal lakes in Hindi ( भोपाल की झीलें )

HIndi Title: 

भोपाल की झीलें


भोपाल की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यहां की दो झीलों का विस्तार शहर के मध्य में है। बड़ी झील का विस्तार तो छः वर्ग कि.मी. तक है और दूसरी बाग बगीचों से घिरी छोटी झील भी दो वर्ग कि.मी. में फैली हुई है। बेतवा और कालिया, सोत नदियों से मिली होने के कारण झील में सदा विपुल जल राशि रहती है। छोटी और बड़ी झीलों को अलग करते हुए एक मुख्य मार्ग नहीं होता तो दोनों झीलों का मिलन हो जाता। वह मुख्य मार्ग पुल की तरह दोनों के बीच निर्मित किया गया है। दोनों झीलों के किनारों से देखा जाये तो भोपाल नगर ऊंचा उठता दिखाई देता है।

संध्या काल में इस नगर का झिलमिलाता प्रतिबिम्ब झील के स्फटिक जल में अद्भुत और मनोरमकारी दृश्य बनाता है। अंधकार में झील के किनारे के भवनों की रोशनियां झील में दीप मालिकाओं जैसी झिलमिलाती हैं। शामला अथवा ईदगाह हिल से इस नगर का विहंगम दृश्य बड़ा मनोरम लगता है। छोटी झील की अरेरा हिल से भोपाल की प्रसिद्ध मस्जिद व अन्य विशाल इमारतों का दृश्य भी लुभावना बन पड़ता है। इसी पर्वत पर आधुनिक लक्ष्मी नारायण का मंदिर व संग्रहालय भी देखने योग्य है। टैगोर भवन के पास पुरातत्व संग्रहालय भी दर्शनीय है। बड़ी झील के दक्षिण किनारे-किनारे दौड़ती सड़क के दूसरी तरफ फैले चिड़ियाघर में खुले विचरण करते बाघ, भालू जैसे हिंसक पशुओं का आकर्षण भी कम रोमांचक नहीं है। यहां बोटिंग की भी सुविधा है।

विकिपीडिया से (From Wikipedia): 

भोपाल का बड़ा तालाब


ताल भोपालताल भोपालभोपाल में एक कहावत है “तालों में ताल भोपाल का ताल बाकी सब तलैया”, अर्थात यदि सही अर्थों में तालाब कोई है तो वह है भोपाल का तालाब। भोपाल की यह विशालकाय जल संरचना अंग्रेजी में “अपर लेक” (Upper Lake) कहते हैं इसी को हिन्दी में “बड़ा तालाब” कहा जाता है। यह एशिया की सबसे बड़ी कृत्रिम झील भी कहा जाता है। मध्यप्रदेश की राजधानी भोपाल के पश्चिमी हिस्से में स्थित यह तालाब भोपाल के निवासियों के पीने के पानी का सबसे मुख्य स्रोत है। भोपाल की लगभग 40% जनसंख्या को यह झील लगभग तीस मिलियन गैलन पानी रोज देती है। इस बड़े तालाब के साथ ही एक छोटा तालाब (Small Lake) भी यहाँ मौजूद है और यह दोनों जलक्षेत्र मिलकर एक विशाल “भोज वेटलैण्ड” का निर्माण करते हैं, जो कि अन्तर्राष्ट्रीय रामसर सम्मेलन के घोषणापत्र में संरक्षण की संकल्पना हेतु शामिल है।

भौगोलिक स्थिति –


बड़ा तालाब के पूर्वी छोर पर भोपाल शहर बसा हुआ है, जबकि इसके दक्षिण में “वन विहार नेशनल पार्क” है, इसके पश्चिमी और उत्तरी छोर पर कुछ मानवीय बसाहट है जिसमें से अधिकतर इलाका खेतों वाला है। इस झील का कुल क्षेत्रफ़ल 31 वर्ग किलोमीटर है और इसमें लगभग 361 वर्ग किमी इलाके से पानी एकत्रित किया जाता है। इस तालाब से लगने वाला अधिकतर हिस्सा ग्रामीण क्षेत्र है, लेकिन अब समय के साथ कुछ शहरी इलाके भी इसके नज़दीक बस चुके हैं। कोलास नदी जो कि पहले हलाली नदी की एक सहायक नदी थी, लेकिन एक बाँध तथा एक नहर के जरिये कोलास नदी और बड़े तालाब का अतिरिक्त पानी अब कलियासोत नदी में चला जाता है।

सामाजिक और सांस्कृतिक महत्व –


11वीं शताब्दी में इस विशाल तालाब का निर्माण किया गया और भोपाल शहर इसके आसपास विकसित होना शुरु हुआ। इन दोनों बड़ी-छोटी झीलों को केन्द्र में रखकर भोपाल का निर्माण हुआ। भोपाल शहर के बाशिंदे धार्मिक और सांस्कृतिक रूप से इन दोनों से झीलों से दिल से गहराई तक जुड़े हैं। रोज़मर्रा की आम जरूरतों का पानी उन्हें इन्हीं झीलों से मिलता है, इसके अलावा आसपास के गाँवों में रहने वाले लोग इसमें कपड़े भी धोते हैं (हालांकि यह इन झीलों की सेहत के लिये खतरनाक है), सिंघाड़े की खेती भी इस तालाब में की जाती है। स्थानीय प्रशासन की रोक और मना करने के बावजूद विभिन्न त्यौहारों पर देवी-देवताओं की मूर्तियाँ इन तालाबों में विसर्जित की जाती हैं। बड़े तालाब के बीच में तकिया द्वीप है जिसमें शाह अली शाह रहमतुल्लाह का मकबरा भी बना हुआ है, जो कि अभी भी धार्मिक और पुरातात्विक महत्व रखता है।

मनोरंजन और व्यवसाय –


बड़े तालाब में मछलियाँ पकड़ने हेतु भोपाल नगर निगम ने मछुआरों की सहकारी समिति को लम्बे समय तक एक इलाका लीज़ पर दिया हुआ है। इस सहकारी समिति में लगभग 500 मछुआरे हैं जो कि इस तालाब के दक्षिण-पूर्वी हिस्से में मछलियाँ पकड़कर जीवनयापन करते हैं। इस झील से बड़ी मात्रा में सिंचाई भी की जाती है। इस झील के आसपास लगे हुए 87 गाँव और सीहोर जिले के भी कुछ गाँव इसके पानी से खेतों में सिंचाई करते हैं। इस इलाके में रहने वाले ग्रामीणों का मुख्य काम खेती और पशुपालन ही है। इनमें कुछ बड़े और कुछ बहुत ही छोटे-छोटे किसान भी हैं। भोपाल का यह बड़ा तालाब स्थानीय और बाहरी पर्यटकों को भी बहुत आकर्षित करता है। यहाँ “बोट क्लब” पर भारत का पहला राष्ट्रीय सेलिंग क्लब भी स्थापित किया जा चुका है। इस क्लब की सदस्यता हासिल करके पर्यटक कायाकिंग, कैनोइंग, राफ़्टिंग, वाटर स्कीइंग और पैरासेलिंग आदि का मजा उठा सकते हैं। विभिन्न निजी और सरकारी बोटों से पर्यटकों को बड़ी झील में भ्रमण करवाया जाता है। इस झील के दक्षिणी हिस्से में स्थापित वन विहार राष्ट्रीय उद्यान भी पर्यटकों के आकर्षण का एक और केन्द्र है। चौड़ी सड़क के एक तरफ़ प्राकृतिक वातावरण में पलते जंगली पशु-पक्षी और सड़क के दूसरी तरफ़ प्राकृतिक सुन्दरता मन मोह लेती है।

जैव-विविधता (Biodiversity) –


इन दोनों तालाबों में जैव-विविधता के कई रंग देखने को मिलते हैं। वनस्पति और विभिन्न जल आधारित प्राणियों के जीवन और वृद्धि के लिये यह जल संरचना एक आदर्श मानी जा सकती है। प्रकृति आधारित वातावरण और जल के चरित्र की वजह से एक उन्नत किस्म की जैव-विविधता का विकास हो चुका है। प्रतिवर्ष यहाँ पक्षियों की लगभग 20,000 प्रजातियाँ देखी जा सकती हैं, जिनमें मुख्य हैं व्हाईट स्टॉर्क, काले गले वाले सारस, हंस आदि। कुछ प्रजातियाँ तो लगभग विलुप्त हो चुकी थीं, लेकिन आहिस्ता-आहिस्ता अब वे पुनः दिखाई देने लगी हैं। हाल ही में यहाँ भारत का विशालतम पक्षी सारस क्रेन (Grusantigone) भी देखा गया, जो कि अपने आकार और उड़ान के लिये प्रसिद्ध है।

वनस्पति और प्राणीजाति (Flora & Fauna) –


मैक्रोफ़ाइट्स (Macrophytes) की 106 प्रजातियाँ, जिसमें 14 दुर्लभ प्रजातियाँ शामिल हैं, फ़ाइटोप्लेंक्टॉन (Phytoplanktons) की 208 प्रजातियाँ, क्लोरोफ़ाइसी (Chlorophyceae) की 106 प्रजातियाँ, साइनोफ़ाइसी (Cyanophyceae) की 37 प्रजातियाँ, युग्लीनोफ़ाइसी (Euglenophyceae) की 34 प्रजातियाँ, बेसिलेरियोफ़ाइसी (Bacilariophyceae) की 27 प्रजातियाँ और डिनोफ़ाइसी (Dinophyceae) की 4 प्रजातियाँ मौजूद हैं।

जबकि इसी प्रकार यदि प्राणी जाति (Fauna) को देखा जाये तो जूप्लेन्क्टॉन (Zooplankton) की 105 प्रजातियाँ, जबकि मछली के विभिन्न प्रकारों की 43 प्रजातियाँ, तथा कछुए समेत अन्य जीव-जन्तुओं की कई प्रजातियाँ इन झीलों को समृद्ध किये हुए हैं।

हाल ही में विभिन्न स्वयंसेवी संगठनों ने प्रदूषण से बचाने के लिये इन दोनों झीलों के गहरीकरण और सफ़ाई का महती काम हाथ में लिया है, जिसे सरकार का भी पूरा समर्थन और आर्थिक मदद हासिल है, आखिर यही तालाब तो भोपाल की पहचान और उसकी जीवनरेखा हैं।

स्रोत – विकीपीडिया / अनुवाद – सुरेश चिपलूनकर

गुगल मैप: 
अन्य स्रोतों से: 

भोपाल ताल (“बूंदों की संस्कृति” से साभार)


तटबंध: भोपाल में अभी तक मौजूद 11वीं सदी के तटबंध का कुछ भाग, मध्यकालीन कौशल का अद्भुत उदाहरण राजा भोज द्वारा बनवाया ताल दो पहाड़ियों के बीच तटबंध से बना था। इसमें 365 स्रोतों से पानी आता था।भोपाल ताल का निर्माण राजा भोज ने करवाया था। परमार वंश के इस राजा ने 1010 से 1055 ई. तक राज किया। राजा भोज ने जो ताल बनवाया था वह काफी विशाल रहा होगा। आज भी यह छोटे आकार में मौजूद है। इसका महत्व कितना है यह इस दोहे से प्रकट होता हैः

“ताल तो भोपाल ताल, और सब तलैया।
रानी तो कमलावति, और सब रानैया।
गढ़ तो चित्तौड़गढ़, और सब गड़हिया।
राजा तो रामचंद्र, और सब रजैया।’’


पुरातात्विक और ऐतिहासिक प्रमाण बताते हैं कि भोपाल ताल वास्तव में विशाल था। पारंपरिक कथा के अनुसार, राजा भोज ने दो पहाड़ियों के बीच बांध बनवाकर भोजपाल नामक विशाल ताल बनवाया था। इस ताल के निर्माण को लेकर जो किंवदंतियां हैं वे काफी दिलचस्प हैं। इतिहासविद् और पुरातत्वविद् डब्ल्यू. किनकैड ने ताल के इतिहास का सर्वेक्षण करने के बाद इस किंवदंती का जिक्र किया है कि राजा भोज एक बार बहुत बुरी तरह बीमार पड़ गए और दरबारी वैद्य-चिकित्सक भी उनका इलाज न कर पाए। एक साधु ने भविष्यवाणी की कि अगर राजा भारतवर्ष में सबसे बड़ा ताल, जिसमें 365 झरनों का पानी आकर जमा होता हो, नहीं बनवाएंगे तो इस गंभीर बीमारी से उनकी मृत्यु हो जाएगी।

कुशल कारीगरों को विंध्य क्षेत्र की घाटियों का सर्वेक्षण करने और ऐसा ताल बनाने की संभावना तलाशने को कहा गया। अंततः बेतवा नदी के इर्दगिर्द के पहाड़ी क्षेत्र का पता लगा, लेकिन पाया गया कि केवल 356 झरनों का पानी इस घाटी में बहता था। इस मुश्किल का समाधान गोंड सरदार कालिया ने खोजा। उन्होंने बताया कि एक लुप्त नदी है जिसकी सहायक नदियां अपेक्षित संख्या को पूरा करती है उस नदी का नाम कालियासोत रख दिया गया और आज तक वह इसी नाम से जानी जाती है।

किनकैड के मुताबिक, यह किंवदंती दो महत्वपूर्ण तथ्यों की ओर इशारा करती है- बेतवा के स्रोतों का अपवहन क्षेत्र ताल को भरने के लिए अपर्याप्त था, ताल बेहिसाब बड़े आकार का बना। किनकैड के विश्लेषण के मुताबिक, स्थानीय क्षेत्र और निर्माणों के अवशेषों के अध्ययन से साफ होता है कि उस समय के इंजीनियरों ने 32 किमी. दूर पश्चिम में दूसरी नदी के पानी को बेतवा में मोड़ दिया था। ऐसा भोपाल में दैत्याकार बांध बनाकर किया। इस तरह बने जलाशय से एक नदी पुराने बहाव से नब्बे डिग्री पर बहाई गई जो पहाड़ियों से होते हुए बेतवा घाटी में पहुंची। यह एक महत्वपूर्ण पूरक नदी बन गई। कालियासोत नदी इसके अतिरिक्त पानी को बरसात खत्म होने के तीन महीने बाद तक बड़े ताल में पहुंचाती थी।

किनकैड ने पता लगाया कि उन्होंने जिस बंधारा का पता लगाया था उससे लेकर भोपाल रेलवे लाइन की ऊंचाई तक बांध जैसा बना था। जब भोपाल-मालवा क्षेत्र सर्वेक्षण नक्शे को देखा गया तो पाया गया कि पुराना ताल 65,000 हेक्टेयर में फैला था। तब यह भारतीय प्रायद्वीप में सबसे बड़ा कृत्रिम ताल था-विशाल जल सतह के बीच छोटे-छोटे द्वीप इसकी सुंदरता में चार चांद लगाते थे। कहीं-कहीं यह 30 मीटर तक गहरा था और चारों तरफ से पहाड़ियों से घिरा था।

बंधारा निचली पहाड़ियों के चट्टान से होकर भी गुजरा है। यह तिकोनी घाटी के शीर्ष पर बना है और बड़े बांध से करीब 3 किमी. दूर है। किनकैड के मुताबिक, बांध से इसकी इतनी दूरी उस समय के इंजीनियरों के कौशल का प्रमाण है। सतह चुनने में थोड़ी-सी चूक से बांध टूट सकता था जो दोनों तरफ से चट्टान की बाहरी सतह से बना था मगर उसके अंदर मिट्टी भरी थी और यह पानी के भारी बहाव को ज्यादा दिनों तक बर्दाश्त नहीं कर सकता था। दूसरा बांध घाटी के दूसरे एकमात्र निकास पर बना था और यह कालियासोत को 90 अंश पर मोड़कर बेतवा की ओर बहा देता था।

इस ताल को 1434 ई. में कभी होशंग शाह (1405-1435 ई.) ने तुड़वाया। इसका जिक्र उस समय के इतिहासविद् साहिब हकीम ने माअसिर-ए-महमूद शाही में किया है। भोजपुर में शिव मंदिर के पास मेंडुआ में इस तोड़फोड़ के निशान देखे जा सकते हैं। होशंग शाह के सैनिकों ने बेतवा पर बने बांध को भी तोड़ा। भोपाल में तटबंध अभी भी बचा हुआ है और दोनों ताल भी अपने वर्तमान छोटे आकारों में हैं। दरअसल, भोपाल में ऊपरी ताल और निचली ताल कोटिल्य के अर्थशास्त्र में वर्णित ऊपर और नीचे के स्तरों पर बने तालाबों की याद दिलाते हैं। कहा जाता है कि तटबंध तोड़े जाने और ताल के सूखने के बाद मालवा की जलवायु में परिवर्तन आ गया और विदिशा शहर पर बाढ़ का खतरा और बढ़ गया।

संदर्भ: 

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