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टाट की प्याऊ में पानी से भरे लाल घड़े

Author: 
डॉ. महेश परिमल
Source: 
दैनिक भास्कर, 24 मई 2011

पहले गांव, कस्बों और शहरों में अनेक प्याऊ देखने को मिल जाती थीं, जहां टाट से घिरे एक कमरे में रेत के ऊपर रखे पानी से भरे लाल रंग के घड़े होते थे।

पानी आज हमारे बीच एक बहुत महत्वपूर्ण मुद्दा है। इस द्रव्य के बारे में यह सच है कि कोई कितनी भी ताकत लगा ले, इसे तैयार नहीं कर सकता। न कोई वैज्ञानिक, न कोई योगी। यह प्रकृति-प्रदत्त एक उपहार है हम सबके लिए, पर हम इसे उपहार न मानकर इसे बर्बाद ही कर रहे हैं। मुंबई में रोज 50 लाख गैलन पानी केवल कार धोने में बर्बाद हो जाता है। वैभवशाली लोगों के लिए यह भले ही एक शगल हो, पर जो जरूरतमंद हैं, वे ही जानते हैं कि पानी की कीमत क्या होती है? ऐसे में कैसे सोच सकते हैं कि पानी को बचाना एक धर्म है। पानी की बर्बादी को रोकने का ऐसा कोई अभियान अभी तक किसी अन्ना हजारे ने नहीं चलाया। जो बोतलबंद पानी खरीदकर पी रहे हैं, वे तो कभी समझ ही नहीं सकते कि पानी बचाना यानी तरल सोना बचाना है।

समाज में प्रचलित कुछ परंपराएं ऐसी होती हैं, जिनका टूटना मन को दुखी कर जाता है। और जो अच्छी परंपराएं हमारे देखते ही देखते समाप्त हो जाती हैं, उसे परंपरा की मौत कहा जा सकता है। कुछ ऐसा ही अनुभव तब हुआ, जब पाऊच और बोतल संस्कृति के बीच प्याऊ की परंपरा दम तोड़ गई। पहले गांव, कस्बों और शहरों में अनेक प्याऊ देखने को मिल जाती थीं। जहां टाट से घिरे एक कमरे में रेत के ऊपर रखे पानी से भरे लाल रंग के घड़े होते थे। बाहर एक टीन की चादर को मोड़कर पाइपनुमा बना लिया जाता था। पानी कहते ही भीतर कुछ हलचल होती और उस पाइपनुमा यंत्र से ठंडा पानी बाहर आना शुरू हो जाता था। प्यास खत्म होने पर केवल अपना सिर हिलाने की जरूरत पड़ती और पानी आना बंद हो जाता।

जरा अपने बचपन को टटोलें, इस तरह के अनुभवों का पिटारा ही खुल जाएगा। अब यदि आपको उस पानी पिलाने वाली बाई का चेहरा याद आ रहा हो, तो यह भी याद कर लें कि कितना सुकून मिलता था, पानी पीकर। पानी देने वाली बाई के चेहरे पर एक अजीब-सी शांति होती थी। इसी शांति और सुकून को कई बार मैंने उन मांओं के चेहरे पर देखा है, जो अपने मासूम को दूध पिलाती हैं। पहले रेलवे स्टेशनों पर गर्मियों में पानी पिलाने का पुण्य कार्य किया जाता। पानी पिलाने वालों की केवल यही प्रार्थना होती, जितना चाहे पानी पीएं, चाहे तो सुराही में भर लें, पर पानी बर्बाद न करें।

उनकी यह प्रार्थना उस समय लोगों को भले ही प्रभावित न करती हो, पर आज जब उन्हीं रेलवे स्टेशनों में दो रुपए में पानी का छोटा-सा पाऊच खरीदना पड़ता है, तब समझ में आता है कि सचमुच उनकी प्रार्थना का कोई अर्थ था। क्या हम सब मिलकर ऐसे मुहावरे नहीं गढ़ सकते कि जो पानी आप बर्बाद कर रहे हैं, वह आपकी संतानों के रक्त जितना महत्वपूर्ण है। पानी बर्बाद करने वाला दंड का भागी है। पानी की बर्बादी धन की बर्बादी है। पानी तरल सोना है, इसे बचाएं। पानी बर्बाद करने वाले कभी सुखी नहीं रह पाएंगे। जो पानी बर्बाद करते हैं, ईश्वर उनसे दूर ही रहता है। सोचो पानी रूठ गया, तो क्या होगा?

देखते ही देखते पानी बेचना एक व्यवसाय बन गया। यह हमारे द्वारा की गई पानी की बर्बादी का ही परिणाम है। आज भले ही हम पानी बर्बाद करना अपनी शान समझते हों, पर सच तो यह है कि यही पानी एक दिन हम सबको पानी-पानी कर देगा, तब भी हम शायद समझ नहीं पाएंगे, एक-एक बूंद पानी का महत्व। पानी टूट रहा है, हम देख रहे हैं, जिस दिन हम टूटेंगे, देखने वाला कोई नहीं होगा!

इस खबर के स्रोत का लिंक: 
http://www.bhaskar.com

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