खाद्यों के बारे में उलझन

Submitted by Hindi on Wed, 06/29/2011 - 10:31
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मासानोबू फुकूओका पर लिखी गई पुस्तक 'द वन स्ट्रा रेवोल्यूशन'

वैज्ञानिक ज्ञान के द्वारा जिस प्रकृति को हम पकड़ते हैं वह नष्ट हो चुकी प्रकृति है, कंकाल में निवास करता उसका प्रेत है। उसमें से आत्मा जा चुकी होती है। दार्शनिकों के ज्ञान से जानी गई प्रकृति मानव के अनुमानों से बने सिद्धांत हैं, जिनमें प्रेत की आत्मा तो है लेकिन कोई आकार नहीं।

वहां उस पहाड़ी पर बनी झोपडि़यों में आकर तीन साल तक रहे एक युवक ने एक मरतबा मुझसे कहा था, ‘आपको पता है, जब लोग प्राकृतिक खाद्यों की बात करते हैं तो मैं नहीं जानता कि, तब उससे उनका मतलब क्या होता है।’ जरा सोचने पर पता लगता है कि, ‘प्राकृतिक खाद्य’ शब्दों से तो हर कोई परिचित है, लेकिन वह वास्तव में क्या होता है, इसे बहुत कम लोग समझ पाते हैं। ऐसे कई लोग हैं जो मानते हैं कि, प्राकृतिक आहार ऐसी चीजें खाना है, जिनमें कोई कृत्रिम रसायन या अतिरिक्त चीज न मिली हो। कुछ अन्य का कुछ ऐसा अस्पष्ट सा सोच होता है कि खाद्यों को वैसा खा लेना जैसा कि वे प्रकृति में मिलते हैं, यही प्राकृतिक आहार होता है। यदि आप किसी से पूछें कि, खाना पकाने में नमक और आग का प्रयोग प्राकृतिक है या अप्राकृतिक तो, इसका जवाब दोनों रूप में प्राप्त हो सकता है।

यदि आदिम मानव की खुराक, जिसमें जंगलों में रहने वाले प्राणी तथा पौधे ही होते थे, ही प्राकृतिक हैं तो नमक और आग के प्रयोग पर आधारित आहार को प्राकृतिक नहीं कहा जा सकता। मगर यह दलील दी जाती है कि अग्नि और नमक के उपयोग की जिस जानकारी को मानव ने आदि काल में ही प्राप्त कर लिया था वह उसकी कुदरती नियती ही थी तो उस ढंग से तैयार भोजन पूरी तरह से प्राकृतिक ही माना जाएगा। अच्छा खाना कौन सा है? वे जंगली पदार्थ जो प्रकृति में जैसे हैं वैसे के वैसे ही खाए जाएं या वह भोजन किया जाए जिसे तैयार करने में मानवी तकनीकों का उपयोग किया गया हो? क्या जुताई करके उगाई हुई फसलों को प्राकृतिक कहा जा सकता है? आखिर प्राकृतिक और अप्राकृतिक के बीच सीमा-रेखा आप कहां खींचते हैं।

हम कह सकते हैं कि जापान में ‘प्राकृतिक आहार’ शब्दों की उद्गम मेईजी युग में सागेन इशिजूका के उपदेशों में हुआ। उनके सिद्धांत को ही बाद में श्री साकुराजावा (जार्ज ओसावा) और श्रीनीकी ने परिष्कृत कर व्याख्यायित किया, जिसे पश्चिम के देशों में मैक्रो-बायोटिक्स (जीव वैज्ञानिकी) कहा जाता है। वह ‘पोषण का पथ’ आई चिंग के अद्वैत तथा चिंग-योग अवधारणा पर आधारित है। चूंकि इसका मतलब आमतौर से लाल (भूरे) चावल से लिया जाता है, प्राकृतिक खाद्य का सामान्य अर्थ साबुत अनाज और सब्जियां होती हैं, लेकिन प्राकृतिक खाद्य को हम सिर्फ भूरे चावल पर आधारित शाकाहार के रूप मेंपरिभाषित नहीं कर सकते।

तो फिर आखिर वह है क्या?


इस सारे घपले का कारण यह है कि, मानव ज्ञान के दो रास्ते हैं - विभेदक (डिस्क्रिमनेटिंग) तथा अ-विभेदक (नॉन-डिस्क्रिमनेटिंग)। लोगों को आमतौर से विश्वास यह है कि, दुनिया की सही पहचान विभेदकता के माध्यम से ही संभव हैं। इसलिए प्रकृति शब्द का आमतौर से जब उच्चारण किया जाता है, तो यह उसी प्रकृति की ओर संकेत करता है, जिसे विभेदकारी बुद्धि (ज्ञानेन्द्रियों) द्वारा अनुभूत किया जा सकता है। मैं प्रकृति से उस खाली चित्र को स्वीकार करने से इंकार करता हूं, जो केवल मानव की बुद्धि से ही बनता है। तथा इसे उस असली प्रकृति से भिन्न मानता हूं जिसे अ-विभेदकारी समझ कर केवल महसूस किया जाता है। यदि हम प्रकृति के बारे में लोगों की इस भ्रांत धारणा को समाप्त कर दें, तो दुनिया की सारी अव्यवस्थाओं को ही समूल नष्ट किया जा सकता है।

पश्चिम में प्रकृति-विज्ञान तथा पूरब में यिन-यांग तथा आईचिंग का दर्शन विभेदकारी ज्ञान से ही विकसित हुए लेकिन वैज्ञानिक सत्य की मार्फत कभी भी संपूर्ण सत्य तक नहीं पहुंचा जा सकता है और दर्शनशास्त्र तो दुनिया की विभिन्न व्याख्याओं के अतिरिक्त और कुछ नहीं है। वैज्ञानिक ज्ञान के द्वारा जिस प्रकृति को हम पकड़ते हैं वह नष्ट हो चुकी प्रकृति है, कंकाल में निवास करता उसका प्रेत है। उसमें से आत्मा जा चुकी होती है। दार्शनिकों के ज्ञान से जानी गई प्रकृति मानव के अनुमानों से बने सिद्धांत हैं, जिनमें प्रेत की आत्मा तो है लेकिन कोई आकार नहीं।

अ-विभेदकारी (नॉन-डिस्क्रिमनेटिंग) ज्ञान प्राप्त करने का तरीका, सिर्फ सीधे-सीधे अंतर्दृष्टि पा जाना है लेकिन लोग उसे ‘सहज बोध’ कहते हुए पिटे पिटाए वैचारिक ढांचे में फिट कर देते हैं। वास्तव में वह एक अनामस्रोत से प्राप्त ज्ञान होता है। यदि आप प्रकृति की सच्ची मूरत को देखना चाहते हैं तो उसके लिए आपको विभेदकारी (डिस्क्रिमनेटिंग) सोच को त्याग कर सापेक्षता की दुनिया से परे झांकना होगा। सृष्टि के आरंभ से ही न तो कोई पूरब है न पश्चिम, न चार मौसम है न कोई यिन या यांग है। जब मैं यहां तक कह चुका तो उस युवक ने मुझसे पूछा, ‘यानी आप न केवल प्रकृति-विज्ञान, बल्कि यिनयांग तथा आई-चिंग पर आधारित प्राचीन दर्शनों को भी नहीं मानते?’

मैंने कहा कि ये दोनों अस्थायी, काम चलाऊ मार्गदर्शक संकेत चिन्हों की दृष्टि से उपयोगी हैं लेकिन उन्हें सर्वोच्च उपलब्धियां नहीं कहा जा सकता। वैज्ञानिक सत्य तथा दार्शनिक सिद्धांत इस सापेक्ष दुनिया की अवधारणाएं हैं और उसके बारे में वे सच हैं तथा वहीं तक उपयोगी भी हैं। मसलन, इस सापेक्ष विश्व में रहने वाले उस आधुनिक मानव के लिए जिसने प्रकृति के क्रम को भंग कर अपनी आत्मा और शरीर को ध्वस्त कर लिया है, यिन-यांग प्रणाली व्यवस्था को फिर से बहाल करने के लिए एक प्रभावी तथा उपयुक्त संकेत चिन्ह मात्रा हो सकती है।

ये सारे रास्ते लोगों को उस सीमा तक ही उपयोगी हैं कि वे एक प्राकृतिक खुराक हासिल करने केलिए उपयोगी सिद्धांतों तक उसे ले जाते हैं वास्तविक अर्थ में प्राकृतिक भोजन तक, वे उसे नहीं पहुंचाते यदि आप मानते हैं कि मानव का अंतिम लक्ष्य सापेक्ष विश्व से परे जाकर स्वतंत्रता के देश में विचरण करना है, तो उसका विभिन्न सिद्धांतों से बंधकर घिसटते रहना बहुत ही दुर्भाग्यपूर्ण है। जब व्यक्ति उस इलाके में पहुंचने के योग्य हो जाता है जहां यिन और यान के दोनों पहलू अपनी मूल एकात्मता प्राप्त कर लेते हैं, तो इन प्रतीकों का उद्देश्य ही समाप्त हो जाता है।

अभी कुछ दिनों पहले, यहां आए उस युवक के मुंह से निकल पड़ा, ‘यानी यदि आप वाकई एक प्रकृति-मानव बन गए हैं तो क्या आप जो चाहें वह खा सकते हैं?’ यदि आप सोचते हैं कि सुरंग के उस पार उजाला ही उजाला है, तो सुरंग का अंधेरा आपको अधिक समय तक परेशान करेगा। जो कुछ आप खा रहे हैं, उसका वास्तविक स्वाद आपको तभी मिलता है जब आपके मन से कोई स्वादिष्ट चीज खाने की चाह ही खत्म हो जाए। आपके खाने की मेज पर प्राकृतिक आहार का सादा खाना परोसना तो बहुत सरल है, लेकिन ऐसी दावत का रस सचमुच ले सकें, ऐसे लोग कम ही हैं।

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