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रोजगार गारंटी के जरिये सामंती व्यवस्था को चुनौती

Author: 
सचिन कुमार जैन
Source: 
मीडिया फॉर राइट्स

अक्टूबर और नवम्बर 2007 के दो महीनों में एक गांव के इन मजदूरों ने अपने रोजगार-आजीविका के अधिकार के लिये आवाज उठाई, जो सीधे जाकर सामंती व्यवस्था से टकराई और इसकी प्रतिध्वनि अब पूरे राज्य में सुनी जा सकती है।

जीवन की अस्मिता के लिये संघर्ष करने वाले हरदुआ के 600 मजदूरों में से ही एक मजदूर हैं रामभरण साकेत; जिन्होनें बुदेलखण्ड में सदियों से पनपते रहे सामंतवाद के खिलाफ मोर्चा खोला। वह बिल्कुल निरक्षर है किन्तु संघर्ष के ज्ञान से भरपूर भी हैं। अक्टूबर और नवम्बर 2007 के दो महीनों में एक गांव के इन मजदूरों ने अपने रोजगार-आजीविका के अधिकार के लिये आवाज उठाई, जो सीधे जाकर सामंती व्यवस्था से टकराई और इसकी प्रतिध्वनि अब पूरे राज्य में सुनी जा सकती है। परन्तु संघर्ष की रामभरण साकेत ने बड़ी ही दर्दनाक कीमत चुकाई है। इस दलित आदमी की बेटी जो कुछ हद तक मानसिक रोग की शिकार भी थी, एक दिन संघर्ष के केन्द्र बने शितालाब से मजदूरी करके लौट रही थी किन्तु वह घर नहीं पहुंची। कुछ इंतजार करने के बाद चर्मकार समुदाय के लोगों ने सिमरिया तहसील थाने में रिपोर्ट दर्ज कराना चाही किन्तु दलित आदमी की बेटी के अस्तित्व को नकारते हुये रामभरण को वहां से रवाना कर दिया गया। उससे यह भी कहा गया कि तेरी बेटी कौन सी परी है, गई होगी किसी लड़के के साथ, अब तुम भी लड़की की इज्जत की बात करने लगे। रामभरण सहित दलित-आदिवासी रामरति साकेत की तालश करते रहे पर एक माह बाद सूचना मिली कि गांव से 6 किलोमीटर दूर चचाई में रामरति की लाष मिली है, क्षत-विक्षत और जानवरों की खाई हुई। रामभरण को ही अपनी बेटी का शव पोस्टमार्टम के लिये पहले सिरमौर और फिर रीवा ले जाने को कहा गया। एक बोरे में बेटी का शव पोस्टमार्टम के लिये पहले सिरमौर और फिर रीवा ले जाने को कहा गया। एक बोरे में बेटी का शव रखकर साईकिल से वह कुल 120 किलोमीटर चला। अंतत: रामभरण को अपनी धार्मिक आस्था को त्याग देना पड़ा और रीवा में ही उसने दाह संस्कार के बजाये रामरति को दफना दिया; क्योंकि उसके पास पहने हुये कपड़ों के अलावा कुछ न था। अब भी पुलिस उसे परेशान करती है, वह यह भी न समझ पाया कि रामरति की मौत क्यों और कैसे हुई क्योंकि उसे जानने का अधिकार नहीं था। रामरति के लापता होने की शिकायत ही दर्ज न करके सरकार तो दलित रामभरण के प्रति अपने दायित्व से मुक्त हो गई थी।

राम अवतार चर्मकार पारम्परिक रूप से सुअर पालन करते हैं। और श्रम आधारित मजदूरी उनके जीवनयापन का अहम् साधन है। राम अवतार भी रोजगार और समानता के संघर्ष के एक हिस्से हैं। जब वे शिव तालाब की मजदूरी के लिये संघर्ष कर रहे थे तब एक दिन उनका एक सुअर पटेल के खेत में प्रवेश कर गया। बस फिर क्या था पटेलों ने रागोली मोड़ पर उसे सरेराह अधमरा कर दिया। गुड़िया साकेत घूंघट के पीछे से कहती है कि और तो और हमें तो अपनी दैनिक दिनचर्या पूरी करने का भी एक नहीं है। पीने का पानी भरने दो किलोमीटर और शौच के लिये हर रोज तीन किलोमीटर की यात्रा करनी पड़ती है। अब चूंकि हमने अधिकार की आवाज उठाई है इसलिये कुर्मी पटेल, ब्राम्हण और ठाकुर मिलकर हमें इस अपराध की सजा देते हैं। सरकार ने गांव में जो हैण्डपम्प लगाये थे वे हरिजन बस्ती में नहीं लगे बल्कि कुर्मी पटेलों की बस्ती में लगाये गये और उनकी बस्ती में चमड़े का काम करने वाली जाति की संज्ञा के साथ जीने वाले चर्मकार (साकेत) समुदाय को प्रवेश करने की भी इजाजत नहीं है।

यहीं पर चुनकी कोल आदिवासी भी है। जब उसने लक्ष्मी और कमलेश पाण्डे के खेत पर 20 रूपये रोज की मजदूरी पर सोयाबीन काटने से इंकार कर दिया तो उससे कहा गया कि तुम जंगली जाति के लोगों को हम शिवतालाब में ही दफना देंगे। अब तो बिना सूंड के हाथी भी चिंघाड़ने लगे हैं। चुनकी आदिवासी कहती है कि हमें पैसे की कमी गरीब नहीं बनाती है। हमारी गरीबी तो जाति की कोख से पैदा होती है, जब जाति की पहचान से मुक्ति कैसे मिले। यहां के कोल आदिवासी कुर्मी पटेलों और ब्राम्हणों के खेतों में निंदाई, जुताई, गुड़ाई और कटाई के साथ-साथ जानवरों की देखभाल और चौकीदारी का काम करते रहे हैं। उनका जीवन बंधुआ की परिभाषा पर खरा उतरता है। उन्होंने कई सालों से भरपेट खाना नहीं खाया क्योंकि जाति व्यवस्था मानती है कि जब दलित-आदिवासी का पेट भर जायेगा तो वह गर्दन उठाकर आस-पास देखने लगेगा।

शिवमंगल साकेत बहुत दिनों तक बिना भुगतान के मजदूरी नहीं कर सके और उनकी मौत हो गई। उसके घर खाने का दाना उस दिन नहीं बचा था परन्तु उनका नाम गरीबी की रेखा की सूची में नहीं था; बहरहाल विडम्बना यह है कि 60 एकड़ सिंचित जमीन, ट्रेक्टर और बोलेरो गाड़ी के मालिक हरीसिंह का नाम गरीबी की रेखा की सूची में बदस्तूर शामिल था।

भूमिका


हममें से ज्यादातर लोगों ने कभी हरदुआ गांव का नाम न सुना होगा। स्वाभाविक है कि हरदुआ न तो कोई धार्मिक स्थल है और न ही किसी महापुरूष की जन्म स्थली; परन्तु पिछले दो महीनों में यह गांव मध्यप्रदेश में सामंतवादी सामाजिक व्यवस्था के खिलाफ दलित-आदिवासी मजदूरों के संयुक्त संघर्ष के कारण सुर्खियों में आया। फिर सामाजिक संघर्ष और सम्मान की लड़ाई के संदर्भ में एक उल्लेखनीय उदाहरण बन गया। भारत में 2 फरवरी 2006 से गांव में रहने वाले हर परिवार को रोजगार का कानूनी हक देने वाले रोजगार गारण्टी कानून ने यहां एक चिंगाई का काम किया है। रीवा जिले में इसी साल (अप्रैल 2007 से) यह कानून लागू हुआ परन्तु छह महीने गुजर जाने तक भी कहीं किसी कोने में रोजगार का अधिकार अंकुरित होता नजर नहीं आया। ऐसी स्थिति में 15 सितम्बर 2007 को हरदुआ पंचायत के 341 दलित-आदिवासी मजदूरों ने पंचायत से काम की मांग की परन्तु हरिहर सिंह पटैल (कुर्मी) ने इस मांग को सामाजिक और आर्थिक व्यवस्था के विपरीत माना। वह जानते थे कि यदि मजदूरों को काम मिला तो वे जल्दी ही शुरू होने वाली फसल की कटाई का काम नहीं करेंगे और ज्यादा मजदूरी मांगेगे। गांव के बच्चों ने रोजगार गारंटी के पर्चे और पोस्टर में पढ़कर मजदूरों को यह बताया था कि अब वे जनपद पंचायत के मुख्य कार्यपालन अधिकारी से काम की मांग कर सकते हैं। उन्होंने यही किया और जनपद ने सरपंच को काम शुरू करवाने के निर्देश दिये। अंतत: कोई मंजूरी न होने के बावजूद सरपंच को पंचायत की पंचवर्षीय कार्ययोजना के अनुसार दस्तावेज में पहले स्थान पर दर्ज शिवतालाब की सफाई और गहरीकरण का काम शुरू करना पड़ा। एक सप्ताह श्रम करने के बाद मजदूरों ने कानूनन मजदूरी के भुगतान की मांग की। इस मांग के एवज में सरपंच ने काम बंद करने के निर्देष दे दिये परन्तु दलित-अदिवासी मजदूर यह तो अब जान ही रहे थे कि कानून उन्हें कम से कम 14 दिन का लगातार काम मिलेगा और जब काम पूरा नहीं हुआ तो उसे बंद नहीं किया जा सकता है। अब हरदुआ के दलित और आदिवासी समुदाय हर रोज एक साथ बैठने-मिलने लगे थे क्योंकि उन्होंने समझ लिया था कि बड़े सामंतों से अकेले नहीं लड़ा जा सकता है। अब इन मजदूरों की एक दिन बैठक दलित बस्ती में होती थी तो दूसरे दिन आदिवासी बस्ती में। इसके दूसरी ओर हरदुआ के सरपंच ने कुछ मजूदरों को बड़ागांव - हरदुआ के बीच बन रही सड़क पर काम करने को कहा परन्तु भेद करने वाली इस राजनीति से बचते हुये मजदूरों के समूह ने एक साथ काम करते रहने का निर्णय लिया। इस दौरान उन्होंने रोजगार गारंटी कानून के कार्यक्रम अधिकारी, जिला कलेक्टर, संभागायुक्त सहित हर स्तर के अफसरान से मजदूरी के भुगतान की मांग की; परन्तु उनकी मांग की कोई सुनवाई नहीं हुई। तब 28 सितम्बर 2007 से हरदुआ के मजदूरों ने सिमरिया तहसील कार्यालय के प्रांगण में क्रमिक भूखहड़ताल शुरू कर दी।

उल्लेखनीय तथ्य यह है कि लड़ाई को रूप देने में किसी संरचनात्मक संगठन, संस्था या समूह, यहां तक कि राजनीतिक दल ने भी कोई भूमिका नहीं निभाई थी। दलित-आदिवासी मजदूरों ने वस्तुत: यह निर्णय ले लिया था कि अब मजदूरी की इस लड़ाई के जरिये वे सामंतवाद को चुनौती देंगे। वे यूं भी शोषण के फंदे में फंसकर मौत से बदतर जिन्दगी जी रहे हैं; तो उन्होंने माना था कि अब जिन्दगी को पूरी तरह से दांव पर लगा कर ही यह लड़ाई लड़ ली जाये। इन्होंने 60 दिन तक भूखे रहकर बिना मजदूरी श्रम किया और अंतत: 10000 मानव दिवस की मजदूरी हासिल करके हकों की लड़ाई का पहला परचम लहराया। राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारण्टी योजना अपने आप में भूमिहीन और असुरक्षित आजीविका के जाल में फंसे मजदूरों के लिये अत्यंत महत्वपूर्ण है। अब तक कानूनी संरक्षण के अभाव में कोई विकल्प न होने के कारण बहिष्कृत समुदाय अत्यंत कम मजदूरी पर श्रम का सौदा करते रहे हैं। ऐसे में रोजगार का कानूनी अधिकार उन्हें अहम् विकल्प प्रदान कर सकता है। रीवा का संदर्भ रोजगार गारण्टी योजना पर राजनैतिक सवाल खड़े करता है। जब हरदुआ के मजदूरों ने संघर्ष शुरू किया जब 20 नवम्बर 07 को सिरमौर विकासखण्ड की सभी पंचायतों की तरफ से पहली बार सरकार से राशि की मांग की गई; इसके पहले छह माह तक यहां मजदूरों को काम न दिया जा सका। अब चूंकि सत्ता पर सवर्णों का प्रभाव है और सरकारी मजदूरी से उनकी सत्ता पर गहरा प्रभाव पड़ता है इसीलिये रोजगार कानून का यहां अप्रभावी क्रियान्वयन हो रहा है।

सामाजिक संदर्भ


व्यापक सामाजिक व्यवस्था में दलित (मनु के अनुसार शूद्र) को जगत सेवक माना जाता है और वर्ण व्यवस्था में वह सबसे आखिरी स्थान पर आते हैं। चर्मकारों के लिए सुअर पालने, मरे हुये जानवरों का चमड़ा उतारने का काम तय किया गया है। इन्हें सार्वजनिक स्थानों पर जाने, मंदिर में प्रवेश, जल स्रोत छूने और ऊंची जातियों के इलाकों से दूर रहने के निर्देश हैं। जो इन्हें छू देता है वह अपवित्र हो जाता है, जबकि आदिवासियों को उनके पारम्परिक रहवास यानी प्राकृतिक संसाधन बहुल क्षेत्र, जंगल और एकांत छोड़कर जाति और वर्णव्यवस्था आधारित गांव समाज में आने के लिये मजबूर कर दिया गया। जहां वे वर्ण व्यवस्था के खांचे में तो समायोजित नहीं हुये किन्तु गांव में स्थान बनाने की गरज से श्रम आधारित आजीविका को अपनाते हुये सवर्ण समाज को उच्च समाज मानते रहे। इन पर हिंदूवादी मान्यताओं का गहरा प्रभव पड़ता नजर आता है। कोल आदिवासी पारम्परिक रूप से जंगल में रहते आये हैं। वहां भी वे घुमंतु ही रहे। पिछले चार-पांच दशकों में इन्हे जंगल से विस्थापित होना पड़ा। कोल आदिवासी समुदाय खुद को अन्य आदिवासियों से ऊंचा मानते हैं किन्तु गांव की व्यवस्था ने इनकी इस भावना की सघनता को कम किया है। कोल आदिवासी स्वभाव से गरम मिजाज होते हैं और समुदाय की जाति पंचायत में किसी मुद्दे पर एक निर्णय हो जाने पर उसको अंत तक निभाते हैं। यह आदिवासी समुदाय मुण्डारी भाषा समूह और प्रोटो-आस्ट्रोलायड समूह से सम्बन्ध रखते हैं। मध्यप्रदेश के 23 जिलों में इनकी कुल जनसंख्या 9.55 लाख है। इनके वंचितपन का अनुमान इस तथ्य से लगाया जा सककता है कि सभी आदिवासियों में सबसे कम 12 प्रतिशत काष्तकार कोल हैं जबकि सबसे ज्यादा कोल (70.4 प्रतिशत) कृषि मजदूरी करते हैं। बुंदेलखण्ड में दलित और आदिवासी पूरी तरह से भूमिहीन हैं।

संघर्ष की इस कहानी में कुर्मी (पटेल) की अहम् भूमिका है। एक समय ब्राम्हणों और ठाकुरों के द्वारा शोषण के षिकार रहे बुंदेलखण्ड के कुर्मियों ने बाहुबल को विद्रोह का आधार बनाया। लूटपाट और आतंक के हथियार से उन्होंने सामाजिक समीकरणों को बदला है। कुर्मी भी एक समय में भूमिहीन और अभावों से ग्रस्त रहे हैं किन्तु गयाप्रसाद कुर्मी अब से 50 साल पहले बंदूक उठाकर दस्यु बना। इसके बाद शिवकुमार कुर्मी (ददुआ), राधे कुर्मी और अम्बिका प्रसाद पटेल (ठोकिया) ने इस समुदाय को एक अलग आतंक के पर्याय के रूप में स्थापित किया। अब एक हद तक तो कुर्मी सवर्ण सत्ता के प्रभाव से मुक्त हुये हैं किन्तु फिर भी ब्राम्हणों और ठाकुरों की राजनीति और अफसरशाही पर गहरी पकड़ होने के कारण वे व्यवस्था को पूरी तरह से बदल नहीं पाये हैं। आज की स्थिति यह है कि कुर्मी बुंदेलखण्ड में नवसामंतवाद के प्रतीक बन कर उभरे हैं और दलित - आदिवासी समुदाय पर शासन के अवसरों का उपयोग कर रहे हैं। अब इस क्षेत्र में तेंदूपत्ता, जंगल के संसाधन और लोक निर्माण विभाग के ज्यादातर काम यह पिछड़ी हुई जाति हथिया रही है जिससे इनकी आर्थिक स्थिति में जबरदस्त बदलाव आया है।

इस परिप्रेक्ष्य में हरदुआ के दलित-आदिवासियों का संघर्ष बहुत खास मायने रखता है। तमाम दबावों के बीच इन्होंने दासता की परम्परा को नकारने का साहस दिखाया। इस प्रक्रिया में अहम मोड़ तब आया जब सरकार नें यह कह दिया कि जिस साढे छह एकड़ के शिव तालाब के गहरीकरण और सफाई का काम कर रहे हैं, उसमें से साढ़े तीन एकड़ से ज्यादा जमीन सरकारी नहीं बल्कि निजी है और वह एक अन्य पंचायत, ग्राम पंचायत कोटा के अन्तर्गत आती है। हरदुआ संघर्ष मोर्चा के साथ संघर्ष में साथ आये भोजन का अधिकार अभियान के मध्यप्रदेश समूह के द्वारा भेजे गये संयुक्त जांच दल जब जिलों कलेक्टर डीपीआहूजा से मिला तो उनका कहना था हरदुआ के स्थानीय वकील राजकुमार पाण्डे दलित-आदिवासी मजदूरों को भड़का रहे हैं। यह उनकी निजी जमीन है, जिस पर मजदूरों से काम करवाकर वे इस कोशिश में हैं कि सरकार उनके श्रम की कीमत अदा करे। सरकार ऐसा होने नहीं देगी। वास्तव में जिला कलेक्टर ने बेहद उदासीन भूमिका यहां निभाई है। वास्तव में शिवतालाब 300 साल पहले सार्वजनिक निस्तार के लिये ही बनाया गया था। यह सही था कि इसका एक हिस्सा निजी जमीन पर आता था परन्तु भू-स्वामियों ने कभी इस पर दावा नहीं किया था। और भू-राजस्व अधिनियम के अनुसार सार्वजनिक निस्तार, मंदिर और शुल्क के भुगतान के मानकों के आधार पर यह शासकीय सम्पत्ति‍ ही माना जायेगा।

संघर्ष


60 दिनों तक चले इस संघर्ष में कोई भी वरिष्ठ सरकारी अधिकारी कार्यस्थल या मजदूरों की बस्ती तक नहीं गया। सिरमौर के अनुविभागीय दण्डाधिकारी और जनपद पंचायत के मुख्य कार्यपालन अधिकारी की यात्रायें हरदुआ के सरपंच के निवास पर खत्म होती रही और यही अफसर मिथ्या सूचनायें सरकार को भेजते रहे; जिससे यह माना जाने लगा कि आदिवासी और दलित सरकार के खिलाफ संगठित होकर कानून और व्यवस्था को चुनौती दे रहे हैं। यही मानकर तीन श्रमिक नेताओं पर पुलिस केस भी दर्ज कर दिये गये। इसी दौरान मजदूरों के इस समूह ने तय किया कि वे किसी भी राजनैतिक दल के षडयंत्र यहां नहीं चलने देंगे। यहां तक कि स्थानीय विधायक, जो माक्सवार्दी कम्युनिस्ट पार्टी से सम्बन्ध रखते हैं, रामलखन शर्मा ने भी मजदूर विरोधी पक्ष ही उठाया और मजदूरों से कहा कि वे गैर-कानूनी काम करके दबाव डालकर सरपंच से मजदूरी ऐंठना चाहते हैं। यह वक्तव्य उन्हें नागवार गुजरा और स्थानीय विधायक की विरोध के साथ विदाई की गई। तब मजदूरों समूह ने तय किया कि वे अब आस-पास के गांव के मजूदरों, दलितों और आदिवासियों को इस संघर्ष के साथ जोड़ेंगे। और इसके लिये तीन-चार मजदूरों के दल आस-पास के गांव भेजे गये।

इसके बाद 12 नवम्बर 2007 को हरदुआ में एक बड़ी सभा हुई जिसमें हरदुआ के मजदूरों के समर्थन में 25 गांवों के डेढ़ हजार लोग शामिल हुये। 19 नवम्बर को तहसील कार्यालय को घेरने का लक्ष्य तय किया गया। इन सात दिनों में 14 प्रादेशिक और राष्ट्रीय संगठन हरदुआ के मजदूरों के साथ आये। 19 नवम्बर की जनसभा के बाद प्रषासन की भूमिका का विरोध करते हुये तहसीलदार को बेशरम् का फूल देकर बड़े संघर्ष का संदेष प्रसारित किया गया। हालांकि 50 दिन के इस संघर्ष के दौरान दो मजदूरों सुखवंती और शिवमंगल साकेत की मृत्यु हो गई, कई मजदूरों के घरों में भी खाद्यान्न इतना कम हो चुका था कि एक समय का चूल्हा भी नहीं जल रहा था पर उस दिन मजदूरों के इस समूह ने हरदुआ संघर्ष मोर्चा के रूप में अपना नामकरण किया और तय किया कि परिस्थितियाँ कितनी ही विकट क्यों न हो जायें, और मजदूर भूख से ही क्यों न मरने लगें, परन्तु हम पंचायत और सरकार द्वारा संपादित किसी भी परियोजना में रोजगार के लिये नहीं जायेंगे और तालाब पर काम करना जारी रखेंगे क्योंकि वह हमारी आस्था का केन्द्र भी है। रामकलेश साकेत कहते हैं कि दीवाली की रात हमारे आंगन में गहरा अंधेरा था और हमने प्रशासन को भी आमंत्रित किया था कि वे आकर हमारी काली दीवाली देखें। यह तो प्रण था कि उत्सव के दिये संघर्ष के परिणाम के बाद ही जलेंगे। दयावती साकेत कहती हैं कि हमने तय कर लिया था कि किसी भी बड़े किसान के खेत पर कटाई करने नहीं जायेंगे। तब कमलेष पाण्डे ने आकर हमें धमकाया था कि यदि तुम सोयाबीन काटने नहीं आओगे तो इसी तालाब में तुम्हारी भूख से मौत होगी। गांव में लोग मजाक उड़ा रहे थे कि ये अधिकार की लड़ाई लड़ रहे हैं जिनकी जिन्दगी अपनी खुद की नहीं है। यह निर्णय बहुत कठोर था कि बिना कोई विकल्प अपनाये मजदूर संघर्ष करते रहेंगे क्योंकि अब शोषणकारी समाज के साथ-साथ प्रशासन भी इनके साथ हिंसात्मक कार्यवाहियाँ करने लगा था। परन्तु जब ताकत बढ़ने लगी तो उम्मीद की किरण कुछ रोशन हुई। 19 नवम्बर के आंदोलन के बाद हरिजन-आदिवासी बस्ती में इनके नाम गरीबी की रेखा की सूची में शामिल करने के लिये आवेदन लिये गये। उल्लेखनीय है कि विसंगतिपूर्ण चयन प्रक्रिया के कारण 360 भूमिहीन मजदूर परिवारों के नाम यहां गरीबी के मापदण्ड पर खरे नहीं उतरे थे। उनका संघर्ष बुंदेलखण्ड की सामंती व्यवस्था को कतई रास नहीं आया है। प्रशासनिक लापरवाही का खामियाजा मजदूरों ने भुगता है। जिला कलेक्टर ने अंतत: ही कहा कि यदि निजी जमीन के भू-स्वामी उस हिस्से को सरकार को सौंप दें तो तालाब को सरकारी माना जा सकता है। और आगे की मजदूरी का भुगतान किया जा सकेगा। परन्तु भूस्वामी शिवप्रसन्न से जब संघर्षरत मजदूरों के समूह ने इस संदर्भ में चर्चा की तो उन्होंने जातिसूचक अपमानजनक शब्दों का प्रयोग करते हुये यही कहा - तुमने तो अपना राज समझ लिया था, काम शुरू करने से पहले मेरे दरवाजे आते तो मैं काम करने की अनुमति दे भी देता पर अब तो मैं मेरी जमीन पर कब्जा करने की कोशिश का मामला तुम (जाति सूचक शब्द) पर चलाऊंगा। आश्चर्यजनक है कि प्रशासन इस बात के लिये भी कभी सहमत नहीं रहा कि कम से कम तालाब की सरकारी जमीन पर किये गये काम की ही मजदूरी उन्हें दे दी जाये और 300 साल पुराने सार्वजनिक तालाब की उपयोगिता को देखते हुये उसका अधिग्रहण कर ले; यहां जनहित की परिभाषा की राजनीति स्पष्ट रूप से सामने आ जाती है।

अंतत:


इस वातावरण में हरदुआ के मजदूरों के पक्ष में जनमाध्यम (मीडिया), जनसंगठनों का साथ और न्यायपालिका द्वारा स्थापित की गई व्यवस्था की सक्रियता ने देर-सबेर प्रभाव दिखाना शुरू किया और सर्वोच्च न्यायालय के आयुक्त के सलाहकार ने जिला प्रशासन को निर्देश दिये कि वह 30 नवम्बर 2007 तक मजदूरों की मजदूरी का भुगतान करे और महिलाओं-बच्चों को तत्काल संरक्षण प्रदान करे, क्योंकि यहां के 40 बच्चे गंभीर रूप से कुपोषित थे। इसी समय राज्य और देख के मीडिया ने भी सरकार से सवाल पूछने शुरू किये। इस दबाव के बीच संघर्ष के 59वें दिन पूरा जिला प्रशासन हरदुआ के मजदूरों के बीच पहुंचा और उनके कानूनी अधिकार को स्वीकार किया लेकिन लापरवाही और गैर-जवाबदेहिता की पूरी जिम्मेदारी सरपंच के मत्थे मढ़ दी गई और भ्रष्ट-प्रशासन स्वच्छता के साथ एक किनारे खड़ा हो गया। इसके बाद मजदूरों को मूल्यांकन के जाल में फंसा दिया गया। सरकार नें अंतत: उन्हें बताया कि मजदूरों नें 10-10 रूपये रोज की मजदूरी भर की है पर गांववालों ने इसे स्वीकार करने से मना कर दिया। अब भी उनका संघर्ष जारी है।

फिर भी संघर्ष का परिणाम अंतत: आया और सकारात्मक आया। लाला साकेत (चर्मकार) कहते हैं कि ''अब जाकर हरदुआ में सूरज उगा है। हमने एक रोटी खाकर यह लड़ाई लड़ी है ताकि गरिमा के साथ जीवन जी सके। हालांकि जिन्दगी तो अब और भी कठिन होगी क्योंकि सामंतवाद का मौन तो अभी टूटना बाकी है।'' जब सरकार ने मजदूरों के संघर्ष की सफलता की घोषणा की तो वहां मौजूद 600 से ज्यादा दलित-आदिवासी मजदूरों के चेहरों के भावों की अभिव्यक्ति करना नामुमकिन है। बहुत से तो विश्वास ही नहीं कर पा रहे थे कि उनकी लड़ाई का यह परिणाम आया है और जब हरदुआ से सिमरिया तहसील तक हरदुआ संघर्ष मोर्चा की विजय यात्रा निकली तब यह महसूस किया जा सकता था कि उनके नारे गले की नसों ने नहीं बल्कि नाभि केन्द्र की गहराइयों से उभर कर आ रहे थे। लाल चेहरे, तनी हुई गले की नसें, भींच कर बंद की गई मुट्ठियाँ और तना हुआ सीना, ऐसे थे सामंतवादी अन्याय के खिलाफ पहली लड़ाई जीतने वाले उस दिन के दलित-आदिवासी।

- सचिन कुमार जैन, रोली शिवहरे और प्रशांत दुबे (हरदुआ, जिला रीवा, मध्यप्रदेश से)
इस खबर के स्रोत का लिंक: 
http://www.mediaforrights.org/

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