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Earth Charter in Hindi / अर्थ चार्टर

HIndi Title: 

अर्थ चार्टर


भूमिका (introduction)


वर्तमान समय हमारी पृथ्वी के लिए एक असुरक्षित समय है। एक ऐसा समय जब पृथ्वी को हमारी आवश्यकता है। यदि हम पृथ्वी का इस अंतरिक्ष में और अपना इस पृथ्वी पर एक सुरक्षित भविष्य चाहते हैं तो समय आ चुका है कि हम इस बारे में मिलकर कुछ सोचें और उस सोच पर अमल करें, उसे व्यवहार में लाएँ।

जैसे-जैसे यह दुनिया अन्योन्याश्रितता (interdependence) की ओर बढ़ रही है वैसे-वैसे हमारा भविष्य मज़बूत और साथ ही ज़ोखिम भरा भी होता जा रहा है। यह सही है कि हम सब इस दुनिया में मिलकर काम कर रहे हैं पर यह भी सही है कि साथ-साथ हम पर्यावरण के लिए खतरे भी पैदा कर रहे हैं। हमें खुद को आगे बढ़ाते हुए इन खतरों को पैदा होने से रोकना है और समाज को एक मानव परिवार बनाकर चलना है। हमें अपने इस विकास-क्रम में आत्मनिर्भर समाज (Self dependent society), प्रकृति के प्रति सम्मान (Respect for nature), मानव अधिकारों की रक्षा, आर्थिक न्याय (Economic justice) शांति जैसे महत्वपूर्ण मुद्दों का भी ध्यान रखना होगा। यह भी ज़रूरी है कि हम समाज तथा आने वाली पीढ़ियों के प्रति अपने उत्तरदायित्वों को समझे।

पृथ्वी: हमारा घर


पृथ्वी मनुष्य जाति का निवास स्थान है। यह एक मात्र ऐसा ग्रह है जहाँ जीवन है। यह जीवन यहाँ प्रकृति की वज़ह से है। प्रकृति ही मनुष्य जाति के लिए जीने के साधन जुटाती रही है। प्रकृति मनुष्य जाति का पालन करने के लिए पृथ्वी पर साफ पानी, साफ हवा और वनस्पति (Vegetation) उपलब्ध कराती है। किंतु आज वही प्रकृति और पर्यावरण खतरे में है। मनुष्य जाति का सदस्य होने के नाते हमारा यह कर्तव्य है कि हम मिट्टी की उपजाऊ शक्ति (Fertility) की रक्षा करें और पृथ्वी की सुन्दरता को बनाए रखें।

वर्तमान दुनिया:


वस्तुओं के उपभोग (Use) और उत्पादन (Production) के हमारे तौर-तरीकों से पर्यावरण नष्ट हो रहा है, जीव लुप्त होते जा रहे हैं। मनुष्य जाति में आपस में बहस छिड़ गई है। उनके अलग-अलग गुट बन गए हैं। इन गुटों में शक्तिशाली गुट शक्तिहीन गुटों को नष्ट करने पर तुले हुए हैं। अमीर गुट गरीब गुटों के दुश्मन हो गए हैं। अमीरी और गरीबी की दूरी बढ़ती जा रही है। गरीब विकास का हिस्सा नहीं बन पा रहे हैं। अमीरी और गरीबी के इस टकराव में सारे अधिकार (Rights) अमीरों के पास सुरक्षित हो गए हैं। गरीब अधिकारहीन हैं। इससे जो सामाजिक बुराइयाँ पैदा हुईं हैं वे पर्यावरण तथा मनुष्य जाति के लिए खतरा बन गईं हैं। ये बुराइयाँ हैं: अन्याय (Injustice), गरीबी, अशिक्षा तथा हिंसा। आज इन बुराइयों को समाज से निकालने की आवश्यकता है।

सामने खड़ी चुनौतियाँ (Challenges):


पृथ्वी की रक्षा द्वारा एक-दूसरे की रक्षा करने का निर्णय लेना अब हमारे लिए बहुत आवश्यक हो गया है। यदि हमने अभी यह निर्णय नहीं लिया तो पृथ्वी पर हम तो नष्ट होंगे हीं, साथ ही अपने साथ अन्य जीवों, पशु-पक्षियों के नष्ट होने का खतरा भी बढ़ा जाएँगे। इस खतरे को टालने के लिए हमें अपने रहन-सहन में बदलाव लाना होगा और अपनी आवश्यकताओं को सीमित करना होगा। भौतिक सामग्री (Luxuries) में कमी लानी होगी और विकास का अर्थ हमें सम्पूर्ण (Complete) मानव जाति की मौलिक (Original) आवश्यकताओं से लेना होगा। आज हमारा विज्ञान इतनी तरक्की कर चुका है कि यह पृथ्वी को नष्ट करने वाली शक्तियों पर रोकथाम लगाने के साथ हम सबकी आवश्यकताओं को भी पूरा कर सकता है। अत: हमें अपनी योजनाओं को लोकोन्मुखी (In favor of people) और लोकतांत्रिक (Democratic) बनाना होगा। हमारे सभी कार्यक्रम लोकोन्मुखी होने चाहिए। हम सभी की चुनौतियाँ आपस में एक-दूसरे से जुड़ी हुई हैं, जैसे – पर्यावरणिक, आर्थिक, राजनीतिक, आध्यात्मिक और सामाजिक चुनौती। चूँकि ये अलग-अलग नहीं हैं इसलिए हम सबको मिलकर इसका हल निकालना होगा।

वैश्विक उत्तरदायित्व (Universal Responsibility):


इन अपेक्षाओं को पूरा करने के लिए सार्वजनिक उत्तरदायित्व की भावना विकसित करनी होगी। स्थानीय समाज के साथ-साथ वैश्विक समाज के साथ के अपने रिश्ते को पहचानना होगा। एक राष्ट्र के साथ-साथ हम लोग एक विश्व के भी नागरिक हैं तथा विश्व और इस विश्व के विशाल जीव-जगत के प्रति हर व्यक्ति का अपना उतरदायित्व है। ब्रह्मांड के रहस्य और प्रकृति द्वारा दिए जीवन के प्रति सम्मान तथा मानवता और प्रकृति में मानव की गौरवपूर्ण उपस्थिति के प्रति कृतज्ञता का भाव रखने पर आपसी भाईचारा और बन्धुत्व की भावना और मज़बूत होती है। यह बहुत आवश्यक है कि मौलिक सिद्धांतों में आपसी तालमेल हो जिससे आने वाले समाज को एक नैतिक आधार मिले। हम सभी को एक ऐसे सिद्धांत पर केन्द्रित होना होगा जो जीवन स्तर में समानता लाए, साथ ही उससे व्यक्तिगत, व्यावसायिक, सरकारी एवं अंतर्राष्ट्रीय संस्थानों को दिशा निर्देश मिले और उनका आंकलन हो सके।

PRINCIPLES

II सजीव जगत (Living World) के प्रति सम्मान की भावना:


1. पृथ्वी और सजीव जगत की विविधताओं (Varieties) का सम्मान करना।
a. हमें स्वीकार करना होगा कि पृथ्वी पर रहने वाले सभी जीवधारियों का जीवन एक-दूसरे से जुड़ा है और हम एक दूसरे के बिना नहीं जी सकते। यहाँ रहने वाले छोटे-बड़े सभी जीव महत्वपूर्ण हैं। किसी की भी उपेक्षा नहीं की जा सकती।
b. हमें हर मनुष्य के स्वाभिमान की रक्षा करनी होगी। उनकी बौद्धिक (Intellectual), कलात्मक (Artistic), सांस्कृतिक (Cultural) और आध्यात्मिक शक्तियों (Spiritual Powers) पर विश्वास करना होगा।

2. विवेक, दया और प्रेम के साथ सजीव जगत की रक्षा करना।
a. प्राकृतिक संसाधनों (Natural Resources) के स्वामित्व प्रबन्धन (to administer) तथा प्रयोग के अधिकारों को हाथ में लेने से पहले हमें यह तय कर लेना होगा कि हम पर्यावरण (Environment) को कोई नुकसान नहीं पहुँचाएँगे और लोगों के अधिकारों की रक्षा करेंगे।
b. अपनी आज़ादी, गौरव और शक्ति का विकास करते हुए हम सबकी भलाई का ध्यान रखेंगे।

3. लोकतांत्रिक समाज की स्थापना करना जो सबको सहयोग और शांति प्रदान करे।
a. प्रत्येक समाज में मानव अधिकारों की रक्षा होनी चाहिए। हर व्यक्ति को विकास का अवसर प्राप्त होना चाहिए।
b. सामाजिक तथा आर्थिक न्याय को बढ़ावा मिले तथा हर किसी के पास स्थाई (Stable) और सार्थक जीविका का ऐसा आधार हो जो पर्यावरण को नुकसान ना पहुँचाए।

4. अपने लिए और आने वाली पीढ़ियों के लिए भी पृथ्वी की सुन्दरता और उसके संसाधनों को बनाए रखना।
a. हमारा हर कार्य आने वाली पीढ़ी की आवश्यकताओं को ध्यान में रखते हुए होना चाहिए।
b. आने वाली पीढ़ी को उन मूल्यों (Values), परम्पराओं (Traditions) और संस्थाओं (Institutions) के बारे में जानकारी देनी होगी जिससे मानव और प्रकृति के बीच सामंजस्य (Balance) स्थापित हो सके।

II. ECOLOGICAL INTEGRITY


5. हर स्थिति में प्रकृति की रक्षा तथा उसकी आवश्यकताओं की भरपाई, ताकि पृथ्वी पर रह रहे जीवों तथा प्रकृति में व्याप्त विविधता के बीच सामंजस्य बना रहे।
a. हमें चिरस्थाई विकास की उन सभी योजनाओं और नियमों को अपना लेना चाहिए जो हमारे विकास में सहायक हैं तथा जिनसे पर्यावरण की रक्षा होती है।
b. पृथ्वी के सभी जीवों की रक्षा करना हमारा कर्तव्य है। साथ ही वन्य व समुद्री जीवों की रक्षा भी आवश्यक है ताकि पृथ्वी की जीवनदायिनी शक्तियों की रक्षा हो सके।
c. पशुओं की समाप्त हो चुकी प्रजातियों के अवशेषों की खोज को हमें बढ़ावा देना है।
d. प्राकृतिक प्रजातियों तथा वातावरण को नुकसान पहुँचाने वाले कृत्रिम परिवर्तन (Artificial Change) तथा कृत्रिम प्रजातियों के विकास पर रोक लगनी चाहिए।
e. जल, मिट्टी, वन्य संपदा, समुद्री प्राणी ये सब ऐसे संसाधन (Resource) हैं जिन्हें कई बार प्रयोग में लाया जा सकता है, फिर भी इन्हें सोच समझकर प्रयोग में लाया जाना चाहिए जिससे ना तो ये नष्ट हों और ना ही पर्यावरण को कोई नुकसान पहुँचे।
f. हमें खनिज पदार्थों (Mineral Resources) तथा खनिज तेल का उत्पादन (Production) भी सोच समझकर करना होगा। ये पदार्थ धरती के अन्दर सीमित मात्रा में हैं और इनका समाप्त होना भी मानव जाति के लिए खतरनाक है।

6. समुचित तरीकों से पर्यावरण की रक्षा करना।
a. वैज्ञानिक पद्धतियों की जानकारी के अभाव के बावज़ूद पर्यावरण को किसी भी प्रकार की हानि से बचाना बहुत आवश्यक है।
b. यदि आपका कार्य पर्यावरण के लिए हानिकारक नहीं है तो इसके लिए आपके पास ठोस सबूत होने चाहिए और यदि आप द्वारा किया जा रहे कार्य ने पर्यावरण को नुकसान पहुँचाया तो इसकी ज़िम्मेवारी आपकी होगी।
c. हमें इस बात का भी ध्यान रखना होगा कि हमारे द्वारा लिए गए निर्णयों का सम्बन्ध मनुष्य द्वारा किए गए कार्यों से हो। इन निर्णयों का प्रभाव लम्बे समय तक के लिए लाभकारी होना चाहिए।
d. पर्यावरण को दूषित करने वाले साधनों पर रोक लगनी चाहिए तथा विषैले पदार्थ, विकिरण और प्रकृति के लिए हानिकारक तत्वों (Toxic, Radio Active and Hazardous) व कार्यों के निर्माण पर भी पाबन्दी लगनी चाहिए।
e. ऐसी सैनिक कार्यवाही पर भी रोक लगानी होगी जो पर्यावरण को नुकसान पहुँचाते हैं।

7. उत्पादन, उपभोग और पुनरुत्पादन (Reproduction) की ऐसी पद्धति अपनाना जिससे पृथ्वी की उपजाऊ शक्ति बनी रहे, मानवीय अधिकारों की रक्षा हो सके और सार्वजनिक हित को भी नुकसान ना पहुँचे।
a. उत्पादन (Production), उपभोग (Consumption) के दौरान काम आने वाले सभी साधनों का उपयोग हो सके और इस दौरान जो अवशेष निकले वह प्रकृति के लिए नुकसान पहुँचाने वाला सिद्ध ना हो।
b. ऊर्जा के प्रयोग में हमें सावधानी बरतनी होगी। हमें सूर्य और वायु जैसे ऊर्जा के साधनों के महत्व को जानना होगा। ये ऐसे साधन हैं जिनका उपयोग बार-बार किया जा सकता है।
c. हमें उन तकनीकों के विकास, प्रयोग और प्रचार को महत्व देना होगा जो पर्यावरण की रक्षा में उपयोगी हो सके।
d. वस्तुओं और सेवाओं की कीमतों में उनके सामाजिक तथा पर्यावरणिक सुरक्षा से जुड़े खर्चों को भी शामिल करना होगा जिससे उपभोक्ताओं (Consumers) को इस बात का अहसास हो सके कि इन वस्तुओं और सेवाओं की उपलब्धता (Availability) में पर्यावरणीय (Environmental) और सामाजिक कीमतें (Social Cost) चुकानी पड़ती हैं।
e. स्वास्थ्य कल्याण (Health Care) और सुरक्षा से सम्बन्धित सेवा सबके लिए उपलब्ध होनी चाहिए।
f. हमें ऐसी जीवन पद्धति (Life Style) को चुनना होगा जो हमारे जीवन स्तर को बेहतर बनाए और प्रकृति की भी रक्षा करे।

8. हर किसी के लाभ के लिए पारिस्थिकी स्थिरता (Ecological Sustainability) से जुड़े मुद्दों का गम्भीरतापूर्वक प्रचार-प्रसार करना।
a. अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर विज्ञान और तकनीक में सुचारू सम्बन्ध होना, प्रत्येक देश का विकास होना और उनकी आत्मनिर्भरता में बढ़ोत्तरी आवश्यक है। विकासशील देशों (Developing Nations) के लिए यह और भी आवश्यक है।
b. सभी देशों की संस्कृति और आध्यात्मिकता (Spiritual Wisdom) को सुरक्षित रखना है। इससे पर्यावरण और मानव हितों (Human Well Being) की रक्षा होती है।
c. इस बात की भी कोशिश करनी होगी कि स्वास्थ्य (Health), पर्यावरण सुरक्षा (Environmental Protection) और आनुवांशिकता (Genetic Information) से जुड़ी आवश्यक और लाभदायक जानकारी लोगों को मिलती रहे।

III. सामाजिक और आर्थिक न्याय:


9. भौतिक (Ethical), सामाजिक (Social) और पर्यावरण संरक्षण (Environment Protection) की दृष्टि से गरीबी को निश्चित रूप से दूर करना।
a. यह तय करना होगा कि शुद्ध जल, शुद्ध वायु, भोजन, घर और सफाई जैसी सुविधाएँ सभी के लिए हों।
b. विकासशील देशों में शिक्षा, तकनीक, सामाजिक और आर्थिक संसाधनों का निरंतर विकास होना चाहिए तथा उन्हें भारी अंतर्राष्ट्रीय कर्जों से मुक्ति मिलनी चाहिए।
c. हमें इस बात का ध्यान रखना होगा कि सभी प्रकार के व्यापार में प्राकृतिक संसाधनों (Natural Resources) के पुन: इस्तेमाल के महत्व को समझा जाए। यदि ऐसे व्यापारों में श्रमिकों से काम लिया जा रहा है तो श्रम नीतियाँ लागू हों।
d. बहुराष्ट्रीय (Multinationals) कम्पनियों और अंतर्राष्ट्रीय आर्थिक संगठनों (International Financial Organizations) को सार्वजनिक हित के काम में आगे आना चाहिए। उनके कामों में पारदर्शिता (Transparency) होनी चाहिए।

10. आर्थिक संस्थानों (Institutions) द्वारा हर स्तर पर मानव विकास के लिए संसाधन जुटाना तथा समानता और आत्मनिर्भरता लाना।
a. राष्ट्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर अर्थ का समान रूप से विभाजन अपेक्षित है।
b. सभी को शिक्षा और आजीविका के साधन मिलने चाहिए तथा उन्हें सामाजिक सुरक्षा भी प्रदान की जानी चाहिए विशेषकर जो इन्हें प्राप्त करने में असमर्थ हैं।
c. उपेक्षित (Ignored), प्रताड़ित (Vulnerable) और पीड़ित वर्ग की क्षमताओं का विकास करना आवश्यक है।

11. हमारे चिरस्थाई विकास (Sustainable Development) के लिए लैंगिक समानता (Gender Equity) तथा समदृष्टि (Equity) जैसी भावनाओं को अपनाना। सभी को एक समान शिक्षा, स्वास्थ्य कल्याण और आर्थिक अवसर उपलब्ध कराना।
a. महिलाओं और लड़कियों को मानव अधिकारों से अलग नहीं किया जा सकता। उनके खिलाफ हो रहे सभी प्रकार के अत्याचारों को रोकना होगा।
b. महिलाओं को पुरुषों के बराबर आर्थिक, सामाजिक, राजनैतिक और सांस्कृतिक गतिविधियों में भाग लेने को प्रोत्साहित करना होगा।
c. परिवार के सभी सदस्यों के बीच सुरक्षा और प्रेम की भावना का विकास करते हुए परिवार की संकल्पना को मेज़बूत करना होगा।

12. बिना किसी भेदभाव के उन सभी अधिकारों को महत्व देना जो व्यक्ति के सम्मान, स्वास्थ्य और आध्यात्मिक चेतना (Spiritual Well Being) से जुड़े हैं। इसके साथ ही अल्प संख्यकों और आदिवासियों के अधिकारों का भी सम्मान करना।
a. जाति, रंग, लिंग, धर्म, भाषा, राष्ट्र और सामाजिक परिस्थितियों के आधार पर उपजे भेदभाव को समाप्त करना होगा।
b. हमें आदिवासियों के रहन-सहन, जीविका प्राप्त करने के तौर-तरीकों, भूमि सम्बन्धी अधिकारों और धार्मिक धारणाओं को स्वीकार करना होगा।
c. समाज के युवा वर्ग की भावनाओं को सम्मान और प्रोत्साहन देना जिससे कि वे एक स्वस्थ और आत्मनिर्भर समाज के निर्माण में अपना योगदान दे सकें।
d. सांस्कृतिक तथा आध्यात्मिक महत्व (Cultural and Spiritual Significance) के सभी स्थानों की सुरक्षा और रख-रखाव की ज़िम्मेदारी लेनी पड़ेगी।

IV. लोकतंत्र, अहिंसा और शांति:


13. हमें लोकतांत्रिक संस्थाओं (Democratic Institutions) और उनकी कार्य योजनाओं को हर स्तर पर मज़बूत करना होगा। उन्हें काम करने के लिए उचित अवसर तथा निर्णय लेने और न्याय प्राप्त करने के अधिकार देने होंगे।
a. सबको पर्यावरण सम्बन्धी व सभी प्रकार की विकास योजनाओं तथा प्रक्रियाओं (Activities) की सम्पूर्ण जानकारी मिलनी चाहिए।
b. हमें स्थानीय (Local), क्षेत्रीय (Regional) तथा अंतर्राष्ट्रीय (Global) स्तर पर नागरिकों के उत्थान के लिए प्रयास करना होगा।
c. विचारों की अभिव्यक्ति, किसी बात पर असहमत होने तथा शांतिपूर्ण सभा करने का अधिकार सभी को मिलना चाहिए।
d. कुशल प्रशासन तथा स्वतंत्र न्याय प्रणाली (Independent Judicial Procedures) की स्थापना ज़रूरी है। वातावरण को प्रदूषण से बचाने और उसके सुधार का प्रयत्न भी आवश्यक है।
e. सभी सरकारी और गैर सरकारी संस्थाओं से भ्रष्टाचार को हटाना होगा।
f. स्थानीय समुदायों को मज़बूत बनाना होगा ताकि वे अपने आसपास के पर्यावरण के प्रति जागरूक रह सकें।

14. चिरस्थाई विकास के लिए ज्ञान, आदर्श और हुनर जैसे गुणों की आवश्यकता पड़ती है। इन गुणों का औपचारिक (Formal ) और जीवन शिक्षा में समावेश करना होगा।
a. सभी को, विशेषकर बच्चों और युवाओं को शिक्षा के अवसर देने होंगे तभी हमारा समाज आत्मनिर्भर हो सकेगा।
b. विभिन्न कलाओं और विज्ञान का लाभ रोजगारोन्मुखी शिक्षा को मिल सके, इसकी व्यवस्था करनी होगी।
c. सामाजिक और पर्यावरणिक चुनौती के प्रति जागरूकता के लिए संचार माध्यमों (Mass Media) की मदद लेनी होगी।
d. नैतिक तथा आध्यात्मिक शिक्षा के बिना हम आत्मनिर्भर नहीं हो सकते, इस बात को भी ध्यान में रखना होगा।

15. सभी जीवों के प्रति सम्मान तथा सम्मान की भावना रखें।
a. हर जीव के प्रति दया की भावना रखनी होगी।
b. वन्य प्राणियों का शिकार, उन्हें जाल में फँसाना, जलीय जीवों को पकड़ना ये सभी क्रूरतापूर्ण कार्य दूसरे जीवों को कष्ट देते हैं, इन्हें रोकना होगा।
c. वैसे प्राणी जो लुप्त प्राणियों (Non-Targeted) की श्रेणी में नहीं हैं, उन प्राणियों की भी रक्षा करना हमारा कर्तव्य है।

16. सहनशीलता, अहिंसा और शांति की संस्कृति को बढ़ावा दें।
a. अपने देश और दूसरे देशों में रहने वाले भिन्न-भिन्न संस्कृति एवं धर्मों के लोगों के बीच सौहार्द (Mutual Understanding), एकता और सहकारिता (Co-operation) की भावना को बढ़ावा देना होगा।
b. हिंसात्मक टकराव (Violent conflict) को रोकने के लिए ठोस पहल करनी होगी। पर्यावरण की रक्षा पर आम राय बनानी होगी।
c. सैनिक संसाधनों का प्रयोग शांति के लिए होना चाहिए। पारिस्थिकी के पुनर्निर्माण (Restoration) में भी इसका उपयोग हो सकता है।
d. आणविक व जैविक अस्त्रों जैसे विध्वंसक और वातावरण में विष फैलाने वाले अस्त्रों पर रोक लगनी चाहिए।
e. पृथ्वी व आकाश (Orbital and Outer Space) का प्रयोग पर्यावरण की सुरक्षा और शांति के लिए होना चाहिए।
f. हमें यह मालूम होना चाहिए कि शांति एक सम्पूर्ण प्रक्रिया (Whole Process) है। स्वयं की खोज आवश्यक है और यही खोज जब दूसरे लोगों की ओर, दूसरी संस्कृति की ओर, दूसरे जीवधारियों की ओर बढ़ती है और जब पूरी पृथ्वी से हमारा एक जीवंत रिश्ता बन जाता है तो शांति का प्रारम्भ होता है।

आगे की राह:

इतिहास में ऐसा पहले कभी नहीं हुआ था, पर यह एक नई शुरुआत है। इस नवीनीकरण (Renewal) का अर्थ है अर्थ चार्टर से जुड़े सभी वादों के प्रति विश्वास। सुखद भविष्य के लिए हमें उन सभी मूल्यों और आदर्शों को अपनाना होगा, जो अर्थ चार्टर का लक्ष्य है। इसके लिए हमें स्वयं को बदलना होगा, स्वयं की सोच को बदलना होगा, अपने रहन-सहन को बदलना होगा। साथ-साथ मौखिक सहयोग, पारस्परिक निर्भरता और सार्वभौमिक उत्तरदायित्व (Universal Responsibility) की भी अनदेखी नहीं की जा सकती है। हमें स्थानीय, क्षेत्रीय, राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर एक स्थाई और स्थिरतापूर्वक विकास करने वाली जीवन पद्धति को विकसित करना होगा।

विश्व की सांस्कृतिक विविधता हमारी सबसे बड़ी पूंजी है क्योंकि यही विविधता हमारे लिए कई अनुकूल रास्ते बनाएगी। हमें अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर संवाद बढ़ाना होगा और उसके क्षेत्र का विस्तार करना होगा क्योंकि सत्य को पाने और बुद्धि के विकास के लिए यह जो साझा प्रयास चल रहा है उससे हमें बहुत कुछ सीखना है। जीवन में महत्वपूर्ण मूल्यों के बीच विरोध प्रकट होते रहते हैं और फिर इनके बीच चयन मुश्किल हो जाता है पर हमें अनेकता में एकता लानी होगी। आज़ादी का उपयोग सार्वजनिक भलाई के लिए हो, इसकी व्यवस्था करनी होगी। बड़े लक्ष्यों तक पहुँचने के लिए हमें छोटे-छोटे लक्ष्यों का प्रयोग करना होगा। प्रत्येक व्यक्ति, परिवार, संगठन और समुदाय को अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभानी पड़ेगी। कला, विज्ञान, धर्म, शिक्षण संस्थाओं, संचार व्यवस्था, व्यापार, सरकारी और गैर-सरकारी संगठनों की रचनात्मकता में विश्वास करना होगा। कार्यशील प्रशासन के लिए सरकार, समाज और वाणिज्य में तालमेल आवश्यक है।

विश्वव्यापी चिरस्थाई समाज का निर्माण करने के लिए विश्व के सभी देशों को संयुक्त राष्ट्र संघ के प्रति आस्था प्रकट करनी होगी और उसके कानून को अंतर्राष्ट्रीय कानून के रूप में स्वीकार करना होगा, तभी पर्यावरण की सुरक्षा तथा विकास सम्भव है। आने वाली पीढ़ी हमारे समय को सम्मान के भाव से देखेगी। उसके लिए यह एक ऐसा युग होगा जब शांति, आत्मनिर्भरता और पर्यावरण की सुरक्षा के लिए सम्पूर्ण विश्व द्वारा एक रचनात्मक संघर्ष किया गया था। एक ऐसा युग, जब जीवन के आनन्द का उत्सव मनाते हुए उसका पूरी तरह से उपयोग किया गया था।

संदर्भ: 
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