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कृषि

कृषि भूमि को खोदकर अथवा जोतकर और बीज बोकर व्यवस्थित रूप से अनाज उत्पन्न करने की प्रक्रिया को कृषि अथवा खेती कहते हैं। मनुष्य ने पहले-पहल कब, कहाँ और कैसे खेती करना आरंभ किया, इसका उत्तर सहज नहीं है। सभी देशों के इतिहास में खेती के विषय में कुछ न कुछ कहा गया है। कुछ भूमि अब भी ऐसी है जहाँ पर खेती नहीं होती। यथा-अफ्रीका और अरब के रेगिस्तान, तिब्बत एवं मंगोलिया के ऊँचे पठार तथा मध्य आस्ट्रेलिया। कांगो के बौने और अंदमान के बनवासी खेती नहीं करते।

आदिम अवस्था में मनुष्य जंगली जानवरों का शिकारकर अपनी उदरपूर्ति करता था। पश्चात्‌ उसने कंद-मूल, फल और स्वत: उगे अन्न का प्रयोग आरंभ किया; और इसी अवस्था में किसी समय खेती द्वारा अन्न उत्पादन करने का आविष्कार उन्होंने किया होगा। फ्रांस में जो आदिमकालिक गुफाएँ प्रकाश में आई है। उनके उत्खनन और अध्ययन से ज्ञात होता है कि पूर्वपाषाण युग मे ही मनुष्य खेती से परिचित हो गया था। बैलों को हल में लगाकर जोतने का प्रमाण मिश्र की पुरातन सभ्यता से मिलता है। अमरीका मे केवल खुरपी और मिट्टी खोदनेवाली लकड़ी का पता चलता है।

भारत में पाषाण युग में कृषि का विकास कितना और किस प्रकार हुआ था इसकी संप्रती कोई जानकारी नहीं है। किंतु सिंधुनदी के काँठे के पुरावशेषों के उत्खनन के इस बात के प्रचुर प्रमाण मिले है कि आज से पाँच हजार वर्ष पूर्व कृषि अत्युन्नत अवस्था में थी और लोग राजस्व अनाज के रूप में चुकाते थे, ऐसा अनुमान पुरातत्वविद् मोहन जोदड़ो में मिले बडे बडे कोठरों के आधार पर करते हैं। वहाँ से उत्खनन में मिले गेहूँ और जौ के नमूनों से उस प्रदेश में उन दिनों इनके बोए जाने का प्रमाण मिलता है। वहाँ से मिले गेहुँ के दाने ट्रिटिकम कंपैक्टम (Triticum Compactum) अथवा ट्रिटिकम स्फीरौकोकम (Triticum sphaerococcum) जाति के हैं। इन दोनो ही जाति के गेहूँ की खेती आज भी पंजाब में होती है। यहाँ से मिला जौ हाडियम बलगेयर (Hordeum Vulgare) जाति का है। उसी जाति के जौ मिश्र के पिरामिडो में भी मिलते है। कपास जिसके लिए सिंध की आज भी ख्याति है उन दिनों भी प्रचुर मात्रा में पैदा होता था।

भारत के निवासी आर्य कृषिकार्य से पूर्णतया परिचित थे, यह वैदिक साहित्य से स्पष्ट परिलक्षित होता है। ऋगवेद और अर्थर्ववेद में कृषि संबंधी अनेक ऋचाएँ है जिनमे कृषि संबंधी उपकरणों का उल्लेख तथा कृषि विधा का परिचय है। ऋग्वेद में क्षेत्रपति, सीता और शुनासीर को लक्ष्यकर रची गई एक ऋचा (4।57।--8) है जिससे वैदिक आर्यों के कृषिविषयक ज्ञान का बोध होता है

शुनं वाहा: शुनं नर: शुनं कृषतु लाङ्‌गलम्‌।
शनुं वरत्रा बध्यंतां शुनमष्ट्रामुदिङ्‌गय।।

शुनासीराविमां वाचं जुषेथां यद् दिवि चक्रयु: पय:।
तेने मामुप सिंचतं।
अर्वाची सभुगे भव सीते वंदामहे त्वा।
यथा न: सुभगाससि यथा न: सुफलाससि।।

इन्द्र: सीतां नि गृह्‌ णातु तां पूषानु यच्छत।
सा न: पयस्वती दुहामुत्तरामुत्तरां समाम्‌।।

शुनं न: फाला वि कृषन्तु भूमिं।।
शुनं कीनाशा अभि यन्तु वाहै:।।
शुनं पर्जन्यो मधुना पयोभि:।
शुनासीरा शुनमस्मासु धत्तम्‌

एक अन्य ऋचा से प्रकट होता है कि उस समय जौ हल से जोताई करके उपजाया जाता था-

एवं वृकेणश्विना वपन्तेषं
दुहंता मनुषाय दस्त्रा।
अभिदस्युं वकुरेणा धमन्तोरू
ज्योतिश्चक्रथुरार्याय।।

अथर्वेद से ज्ञात होता है कि जौ, धान, दाल और तिल तत्कालीन मुख्य शस्य थे-

व्राहीमतं यव मत्त मथो
माषमथों विलम्‌।
एष वां भागो निहितो रन्नधेयाय
दन्तौ माहिसिष्टं पितरं मातरंच ।।

अथर्ववेद में खाद का भी संकेत मिलता है जिससे प्रकट है कि अधिक अन्न पैदा करने के लिए लोग खाद का भी उपयोग करते थे-

संजग्माना अबिभ्युषीरस्मिन्‌
गोष्ठं करिषिणी।
बिभ्रंती सोभ्यं।
मध्वनमीवा उपेतन ।।

गृह्य एवं श्रौत सूत्रों में कृषि से संबंधित धार्मिक कृत्यों का विस्तार के साथ उल्लेख हुआ है। उसमें वर्षा के निमित्त विधिविधान की तो चर्चा है ही, इस बात का भी उल्लेख है कि चूहों और पक्षियों से खेत में लगे अन्न की रक्षा कैसे की जाए। पाणिनि की अष्टाध्यायी में कृषि संबंधी अनेक शब्दों की चर्चा है जिससे तत्कालीन कृषि व्यवस्था की जानकारी प्राप्त होती है।

भारत में ऋग्वैदिक काल से ही कृषि पारिवारिक उद्योग रहा है और बहुत कुछ आज भी उसका रूप है। लोगों को कृषि संबंधी जो अनुभव होते रहें हैं उन्हें वे अपने बच्चों को बताते रहे हैं और उनके अनुभव लोगों में प्रचलित होते रहे। उन अनुभवों ने कालांतर में लोकोक्तियों और कहावतों का रूप धारण कर लिया जो विविध भाषाभाषियों के बीच किसी न किसी कृषि पंडित के नाम प्रचलित है और किसानों जिह्वा पर बने हुए हैं। हिंदी भाषाभाषियों के बीच ये घाघ और भड्डरी के नाम से प्रसिद्ध है। उनके ये अनुभव आघुनिक वैज्ञानिक अनुसंधानों के परिप्रेक्ष्य मे खरे उतरे हैं ।

उत्तम कृषि के निमित्त आवश्यक होते जिन पर भारतीय किसान सदा से ध्यान देते आए हैं और जिन पर आज भी ध्यान दिया जाना आवश्यक है, इस प्रकार है।

(1) बोवाई के उचित समय का ठीक ज्ञान। हर फसल की बोवाई के लिए उपयुक्त नक्षत्र एवं समय होता है। उससे पहले या पीछे बोने से फसल को हानि होती है तथा उपज भी संतोषप्रद नहीं होती। बोवाई के समय खेत में कितनी नमी हो एवं खेत की मिट्टी किस दशा में हो, इसका भी ज्ञान भी आवश्यक है। जिस प्रकार प्रत्येक फसल के लिए अलग-

अलग समय है, उसी प्रकार भूमि की दशा, नमी की मात्रा तथा बोवाई के ढंग भी अलग-अलग हैं। यदि चने की तरह गेहूँ बोई जाए तो गेहूँ मक्का की फसल अच्छी नही होगी। ईख की बोवई का ढंग इनसे अलग है। किस जाति की फसल किस प्रांत या भूभाग में बोई जाए, इसका ज्ञान भी अपेक्षित है। जो धान कश्मीर में अच्छा होता है वह उत्तर प्रदेश में भी पैदा होगा ही ऐसी बात नही है। यह बात सभी फसलों के लिए है। प्रत्येक प्रदेश के लिए फसल की उचित जातियों की खोज आधुनिक वैज्ञानिकों ने की है। तदनुसार उचित जाति के फसल बोने से उपज अच्छी होगी। प्रत्येक फसल के लिए भूमि भिन्न प्रकार की होती है। यथा: धान मटियार अथवा नीचे खेतों में अच्छा होता है। बाजरा, मूँग, मक्का तथा मूँगफली ऊँचे अथवा बलुआ खेतों में अच्छी होती है। इनके खेतों में पानी भर जाना हानिकारक होता है। किंतु पानी भरने से धान को लाभ होता है। चना मटियार ढेलेवाले खेतों में अच्छा पैदा होता है और गेहुँ बारीक तथा दोमट खेतों में।

(2) बोवाई के पश्चात्‌ कितने दिनों बाद, किस प्रकार खेत में पानी लगाया जाए, या न लगाया जाए तथा पानी लगाने के बाद निकाई गोडाई कैसे और कब की जाए, यह जानना भी वांछनीय है। इसमे धाखा होने से फसल को हानि हो सकती है।

(3) खेती की सब क्रियाएँ ठीक होने पर भी खाद की कमी से फसल की उपज धट जाती है। खाद की मात्रा पूरी होने पर बिना खादवाले खात की तुलना में उपज चार पाँच गुना बढ़ जाती है। चीन, जापान, इंगलैंड, जर्मनी इत्यादि देशों में खाद डालने अथवा भूमि की उर्वरा शक्ति बढ़ाने पर अधिक ध्यान दिया गया है। वहाँ धान तथा गेहूँ की उपज भारत की तुलना में कई गुना अधिक है। इस संबंध में अधिक जानकारी के लिए खाद और उर्वरक लेख देखे।

(4) खेती की उन्नति और उपज की वृद्धि के लिए उन्नत बीज का उपयोग आवश्यक है। प्रत्येक अनाज के बीज की अनेक जातियाँ होती है। बीज की अलग जातियों का परीक्षण करने के उपरांत, जो जाति सबसे अधिक उपज प्रदान करनेवाली ज्ञात होती है उसे ही उन्नत बीज कहा जाता है। आजकल उन्नत बीज की खोज का काम राज्य की ओर से किया जाता है। कृषि विभाग अपने देश और अन्य देशों, से बीजों की विभिन्न जातियों को एकत्र करके उनकी परीक्षा करता है। जो बीज सबसे अच्छा सिद्ध होता है उसे वे उन्नत बीज की संज्ञा देता हैं। उन्नत बीज की खोज हो जाने पर उसे तीव्र गति से बढ़ाया जाता है। शीघ्र से शीघ्र इतना बीज पैदा करने का प्रयत्न किया जाता है कि वह सारे देश के किसानों को पहुँचाया जा सके । साधारणतया एक मन बीज से एक साल में लगभग 10 से 20 मन तक अनाज उत्पन्न किया जा सकता है। उत्तर प्रदेश में ऐसे भी ढंग निकाले गए है जिनसे एक मन बीज से 100 से 200 मन गेहूँ तक पैदा किया जा सकता है। यथा: अधिक से अधिक प्राप्त करने के लिए गेहूँ पंक्तियों में बोया जाता है। एक पंक्ति की दूरी 6 इंच तथा एक दाने से दूसरे दाने की परस्पर दूरी साढ़े चार इंच होती है। इस ढंग की बोवाई मे एक एकड़ भूमि केवल 6 या 7 सेर गेहूँ पर्याप्त है। इस ढंग से बोए हुए गेहूँ की उपज साधारण ढंग से बोए हुए गेहूँ से कुछ अधिक होती है और दाने भी अधिक मोटे होते है। बोते समय खेत में अच्छी नमी हो, खाद भी पूरी पड़ी हो दाने घुने न हों, तथा बराबर गहराई पर बोए जाए जिससे सब उग आएँ और खुब कल्ले निकलने से खेत पूरा भर जाए तो 6 सेर गेहूँ बोकर 45 से 50 मन प्रति एकड़ तक अन्नाज उपजाया जा सकता है।

(5) पौधे अपना पोषण पदार्थ विलयन के रूप में ही पृथ्वी से लेते है। अत आवश्यक है कि भूमि में पानी की इतनी मात्रा बराबर बनी रहे जिससे पेड़ों और पौधौ के पोषक तत्व विलयन के रूप में पौंधो के पोषक तत्व विलयन के रूप में पौधों की जड़ों में पहुँचते रहे। उर्वरा भूमि में भी पानी की कमी होने पर भी फसल हरी-भरी नहीं होती। इसलिए प्राचीन काल से ही लोगों का विशेष ध्यान रहा है। खेतों में आवश्यकतानुसार पानी पहुँचाने के लिए कुएँ, तालाब, बाँध तथा नहरे बनाए जाते रहे है। खेत में नमी पहुँचने के बाद ऊपर की भूमि गोड़ाई करके भुरभुरी कर दी जानी चाहिए जिससे नीचे की नमी नीचे ही बनी रहे आकर हवा में न उड़ जाए जड़ों को विलयन के रूप में पोषक तत्व मिलता रहे। कमपोस्ट, गोबर, हरी खाद या ताल की खाद डालने से भी भूमि की तरी देर तक ठहरती है। अत सिंचाई करने की शीघ्र आवश्यकता नही पड़ती ।

सिंचाई का प्रबंध कृषक शासन प्राचीन काल से ही करते रहें है, फिर भी केवल 18 प्रतिशत खेती की भूमि में सिंचाई होती है; 82 प्रतिशत को वर्षा का ही सहारा है। 1970-71 के उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार इस देश मे 16.74 करोड़ हेक्टर भूमि में खेती होती है। इनमें केवल 3.12 करोड़ भूमि कि ही सिंचाई नहरों, तालाबों, कुओं अथवा अन्य साधनों से ही पाती है।

(6) जिस खेत से धास उग आती है उसमे फसल अच्छी नही होती। अत: सामान्यत इस बात का प्रयास होता है कि फसल के साथ कोई घास पैदा न होने पाए। किंतु घास केवल खड़ी फसल को ही हानी नहीं पहुँचाती वरन्‌ खेत में घास फसल से पहले भी उगती है तो वह भी नमीं और पौंधों का भोजन भूमि से खींचकर नष्ट कर देती है फलत: पोषक तत्वों और नमी की कमी से बोई गई फसल अच्छी प्रकार नही बढ़ पाती। घास प्रत्येक दशा में पैदा होकर जमीन से पौधे की खुराक निकाल लेती है और भूमि को कमजोर कर देती हैं। इसलिए खेत की जुताई इस प्रकार की जानी चाहिए कि खेत में घास कभी बढ़ने न पाए। घास प्रायः बरसात में बढ़ती है और इसको मारने में सामान्य हल उतना सफल नहीं होता जितना कि मिट्टी पलटने वाला हल। सामान्य हल भूमि को चीरता हुआ चलता है और घास की जड़े नीचे भूमि में लगी रह जाती है। बरसात में जड़े फिर भूमि पकड़ लेती है और घास फिर से हरी हो जाती है। बरसात के दिनों में कई जुताइयाँ किए बिना घास नही दबती। यदि बरसात में मिट्टी पलटनेवाले हल से एक घनी जुताई कर दी जाए तो मिट्टी पलट जाने से जडें ऊपर की ओर धूप मे आ जाएँगी औऱ तना और पत्तियाँ भूमि में दब कर सड़ कर खाद का काम देंगी। जुताई के तुरंत बाद ही यदि बादल और वर्षा हो तब भी जड़े ऊपर निकल आने के कारण और पौंधो के तने एवं पत्तियाँ भूमि में दब जाने के कारण, घास फिर से हरी नही हो पाती।

पौंधे की जडें पोली जमीन के भीतर तीव्र गति से बढ़ती हैं। जुताई से जमीन बहुत गरम और पोली हो जाती है और आसानी के साथ पौंधों की जड़ें फैलती है। जिस प्रकार मनुष्यों को और पशुओं को जीवित रहने के लिए हवा की आवश्यकता होती है, उसी प्रकार पौंधों की जड़ों के लिए भी हवा आवश्यक है। बिना हवा के जड़ भूमि के भीतर नही बढ़ पाती और पीले पड़ जाते है या मर जाते है। जिन खेतों मे पानी लग जाता है उनमें भी जड़ों तक हवा नहीं पहुँच पाती फलत: पानी लगने से अरहर, मक्का, मूंगफली, कपास इत्यादि फसलों को हानि पहुँचती है। अत: फसल के कुछ दिनों बाद तक यदि खेत मे गुड़ाई होती रहे तो इससे बहुत लाभ होता है। जुताई और गुड़ाई का लाभ यह भी है कि भूमि के भीतर का समस्त वानस्पतिक भाग, हवा और जीवाणुओं की सहायता से, पौधे का वास्तविक भोजन, नाइट्रेट, बन जाता है इस काम के लिए भूमि में हवा की बड़ी आवश्यकता होती है। बरसात के दिनों में जितनी बार भी खेत जोता गौड़ा जाता है उतना ही अधिक नाइट्रेट तैयार होता है। यदि जोताई या गोड़ाई कम की जाए तो जीवाणुओं को प्राप्त आक्सिजन गैस, जो हवा में विद्यमान होती है, न मिलने के कारण पौधे का भोजन अच्छी प्रकार तैयार नहीं होता।

भारत में सबसे अधिक खेती धान, (चावल) गेहूँ, जौ, मटर,चना,ज्वार आदि की होती है। ये सब खाद्यान्न हैं। इनके अतिरिक्त औद्योगिक महत्व की कुछ अन्य वस्तुओं की भी खेती होती है। यथाशक्कर के लिए ईख और चुकंदर की खेती संसार में बहुत फैली हुई है। कपड़े का व्यवसाय चालू रखने के लिए कपास की खेती की जाती है। रेशे के लिए सन और जूट की खेती होती है। तिलहन के लिए मूँगफली, सरसों रेड तिल आदि की फसलें भी बड़े क्षेत्रों मे भी बोई जाती हैं। शकरकंद की खेती का भी बड़ा महत्व है। थोडे क्षेत्रफल में अधिक भोजन प्राप्त करने के लिए यह बहुमूल्य फसल है। मानव उपयोग की वस्तुओं के अतिरिक्त पशुओं के चारे के लिए भी बरसीम आदि घासों तथा अन्य पक्तियों की भी लोग खेती करते हैं।

नगरों तथा गाँवों के निकटवर्ती खेतों में तरकारी की खेती होती है। जाड़े में गोभी, बंदगोभी, मूली, बैंगन, प्याज, लहसुन आदि और गर्मी में भिंडी, तोरई, लौकी, परवल आदि की खेती की जाती है। तरकारी के साथ साथ खरबूजा, तरबूज, ककड़ी, खीरा, आदि की खेती भी, विशेषकर नदी के किनारे बलुए क्षेत्रों में, अधिक होती है।

तरकारियों के साथ-साथ फलों के बगीचों का भी विशेष स्थान है। यह अन्न की खेती की अपेक्षा अधिक लाभप्रद व्यवसाय है। इस दृष्टि से अंगूर, अनार, आम, अमरूद, कटहल, केला, नींबू, संतरा, लीची, लोकाट, पपीता, फालसा बेर आदि का विशेष महत्व है। मैदानी भागों का बहुत बड़ा क्षेत्र इन बागों से ढँका है। पहाड़ों मंम सेब, आडू, नाशपाती , नाख, खुबानी, आलुचा, अखरोठ आदि पैदा होते है। (सं. ब. सिं. ; प. ला. गु.)

कृषि अनुसंधान और शिक्षा- मनुष्य अपने ढंग से कृषि के क्षेत्र में नाना प्रकार के प्रयोग करता रहा है किंतु उसके ये प्रयोग एकांतिक और अव्यवस्थित ही रहे है। कृषि के विकास के लिए विविध क्षेत्रों से प्राप्त ज्ञान का व्यवस्थित संयोजन आवश्यक है। फलस्वरूप कृषि की विविध दिशाओं में अनुसंधान का कार्य किया जा रहा है।

कृषि संबंधी अनुसंधान की स्थूल रूप में निम्नलिखित दिशाएँ हैं:-


1. वनस्पति विज्ञान (Botany), 2. रसायन, 3. कीटविज्ञान (Entomology), 4. पादप व्याधिकी (Plant Pathology), 5.शस्य विज्ञान (Agronomy), 6. मृदारक्षण (Soil Protection), 7. उद्यान विज्ञान (Horticulture), 8. सांख्यिकी (Statistics) और 9. इंजीनियरी (Engineering)।

फसलों की उन्नत जातियों की खोज वनस्पति विज्ञान से संबंधित है। ईख की उन्नत प्रकार की जातियाँ तैयार कर चीनी के उद्योग का विस्तार इस दिशा में किए गए जानेवाले कार्य का एक उदाहरण है। इसी प्रकार अच्छी कपासों की जातियों को खोजकर कपड़े के व्यवसाय को उन्नत बनाया जा सका है। धान ,गेहूँ ,जौ, चना, मक्का, सरसों आदि की अच्छी जातियाँ इन्हीं वनस्पति वैज्ञानिकों की प्रयोगशालाओं की देन है। इन प्रयोगशालाओं में संसार भर के अच्छे प्रकार के बीज मँगाकर अपने यहाँ पैदा करके देखा जाता है। जो जातियाँ हमारी भूमि तथा जलवायु में अच्छी से अच्छी पैदावार देती हैं, उन जातियों की वृद्धि का प्रयास किया जाता है। सबसे अच्छी जाति का छाँटना; फसलों की नई उन्नत जाति प्रचलित करना उनका मुख्य कार्य हैं।

इन प्रयोगशालाओं में संकरण करके फसलों की नई जातियाँ निकाली जाती हैं। यथा-ईख की कोई जाति अच्छी पैदावार देती है, किंतु उसमें चीनी की मात्रा कम है और एक दूसरी जाति की ईख में चीनी अधिक है पर पैदावार कम हैं, तो दोनों का संकरण करने से एक ऐसी नई जाति विकसित होने की संभावना रहती है जिसमें अधिक पैदावार और अधिक चीनी के दोनों गुण हों। हमारे देश में ईख, गेहूँ इत्यादि की अनेक अच्छी नई जातियाँ संकरण करके पैदा की गई हैं। दूर देश से आई हुई नई जातियाँ आरंभ में अच्छी फसल नहीं देतीं कई साल तक बराबर बोते रहने पर जलवायु की अनुकूलता ग्रहणकर अच्छी पैदावार देने लगती है। इस ढंग से विदेशी बीज को अपने देश के अनूकूल बनाने की प्रक्रिया को वायुजलानुकूलन (Acclimatization) कहते हैं।

कृषि अनुसंधान में रसायनज्ञ का अपना महत्व हैं। भूमि में क्या तत्व हैं और किन तत्वों की कमी हैं, किन तत्वों को मिलाने से भूमि की उर्वरा शक्ति बढ़ाई जा सकती हैं, ईख में चीनी की मात्रा कैसे घटती और कैसे बढ़ती है, यह रसायनज्ञों के अनुसंधान का विषय है। खाद बनाने को ढंग आदि भी रसायनज्ञ ही ढूँढ़ निकालते हैं। यथा-स्वीडेन के वैज्ञानिकों ने यह ज्ञात किया है कि उर्वरक को मिट्टी की सतह पर डालते ही पौधों की जड़ें अविलंब इस लेना प्रारंभ कर देती है। अमरीकी वैज्ञानिकों ने पता लगाया कि घास की पत्तियों पर डाले गए उर्वरक उनके द्वारा ग्रहण कर लिए जाते हैं। अतएव घास के मैदान को जोतने की आवश्यकता नहीं हैं। रुसी वैज्ञानिकों ने पता लगाया कि फॉस्फोरस के वितरण पर बलुई मिट्टी विशेष प्रभाव नहीं डालतीं, किंतु मिट्टी को यदि ढीला कर दिया जाए तो वर्षा का जल इसको सरलता से बहा ले जाता हैं। कपास, तंबाकू, मक्का तथा चुकंदर पैदा करनेवालों की बहुत बड़ी बचत इस अनुसंधान से यह हुई है कि इनके पौधे केवल उगने की प्रारंभिक अवस्था में ही उर्वरकों से फॉस्फोरस लेते हैं और बाद में डालने पर धुल कर निकल जाने का भय रहता हैं। इसके विपरीत आलू का पौधा बढ़ने की अंतिम अवस्था तक इससे लाभान्वित होता रहता हैं। अनुसंधानों द्वारा यह भी सिद्ध हुआ हैं कि सिंचाई के जल के साथ मिलाकर फॉस्फरिक अम्ल देने से उतना ही लाभदायक होता हैं जितना सूखा उर्वरक मिट्टी पर फैलाने से।

प्रयोगों द्वारा यह भी ज्ञात हुआ है कि फलवाले वृक्षों फॉस्फोरस उर्वरक का विलयन डालने से कोई लाभ नहीं होता। उत्तम उपाय यह है कि 30-35 सेंटीमीटर की गहराई के छिद्रों में उर्वरक डाले जाएँ। यह भी ज्ञात हुआ है कि कपास के पौधों के लिए उर्वरक उसके बीज के साथ ही देने से लाभप्रद होता है। मक्का एवं दूब घास उर्वरक का अच्छा उपयोग तभी कर पाती हैं जब उसे मैदान की सतह पर न फैलाकर छिद्रों में डाला जाए। चुकंदर, गेहूँ एवं मक्का इत्यादि फसलों के बीज जब रेडियोधर्मी विलयन में भिगो दिए जाते हैं तब उपज में वृद्धि हो जाती है। केवल थोड़े व्यय से अनुसारक तत्व ही फलों एवं सब्जियों की साधारण ताप पर परिरक्षणक्षमता बढ़ा देते हैं।

फसलों की टिड्डी, दीमक, रतुआ, उकठा, कंडवा आदि कीटों से जो क्षति होती है, उनको रोकने और कृषिविनाशक कीड़ों का नाश करने का उपाय ढूँढ़ना कीटज्ञ (Entomologist) के अनुसंधान का विषय हैं। मधुमक्खी और रेशम के कीड़ों के पालन तथा उनसे संबंधित अनुसंधान तथा फसलों और गल्लों को चूहों तथा घुन आदि से बचाने का उपाय भी कीटज्ञ करते हैं।

फसलों में बहुत सी व्याधियाँ लगती हैं, यथा-ईख में सूखा की बीमारी, गेहूँ में गेरुई की बीमारी आदि। इनके निवारण करने के उपायों को अन्वेषण पादप-व्याधिकी करते हैं।

खेती किस प्रकार की जाए, भूमि की जोताई कैसे और कब हो, किस मात्रा में, किस समय और कौन सी खाद डाली जाए, कैसे सिंचाई की जाए, कब-कब गोड़ाई की जाए, कैसे किसी फसल की अधिक से अधिक पैदावार हो इन सब प्रश्नों के उत्तर ढूँढ़ निकालना शस्यविज्ञान के विषय हैं।

मृदारक्षण-कृषिसंबंधी समस्याओं में एक महत्वपूर्ण समस्या मृदारक्षण भी हैं। तेज हवा और वर्षा से ऊपर की अच्छी मृदा (उपजाऊ मिट्टी) उड़ जाती हैं अथवा कटकर बह जाती हैं और नीचे से बेकार भूमि निकल आती हैं। इस कटाव से भूमि को सुरक्षित बनाने के उपाय ढूँढ़ना कृषि अनुसंधान की एक विशिष्ट दिशा हैं।

उद्यान विज्ञान के बिना अच्छे प्रकार के फल एवं तरकारियाँ नहीं उगाई जा सकतीं। इस विषय में भी खोज तथा अन्वेषण हो रहे हैं। कृषि संबंधी कलपुर्जों, आवागमन के वाहनों तथा भूमि के कटाव और बाढ़ की रोकथाम, सिंचाई एवं पानी के निकास के साधनों का विकास एवं निर्माण कृषि इंजीनियरी के विषय हैं। वस्तुत: यह अपने आप में कोई एक विषय नहीं है वरन्‌ इसका संबंध यांत्रिक (Machanical), वैद्युत्‌ (Electrical) और सिविल इंजीनियरिंग सबके साथ हैं। कृषि इंजीनियर यांत्रिक इंजीनियर की तरह कृषि की उत्पादन वृद्धि के लिए कृषि यंत्रों का आविष्कार और निर्माण करता हैं। वह विद्युत्‌ इंजीनियरी के सिद्धांतों का प्रयोग कृषिकार्यों के लिए करता हैं। यथा-चारा काटना, दाल दलना, मक्खन निकालना, सिंचाई के लिए पानी निकालना आदि। फसलों के लिए उचित मात्रा में पानी की पूर्ति के लिए बाँध और नहर बनाना और जल निकास के लिए नाली एवं भवन निर्माण करना, गूलों की उचित व्यवस्था करना तथा अधिक से अधिक क्षेत्रफल की सिंचाई का प्रबंध करना भी कृषि इंजीनियरी के कार्य हैं। बड़ी इमारतों तथा गोदामों आदि के निर्माणकार्य में जिन सिविल सिद्धांतों को प्रयोग होता हैं। उनका अनुकरण कृषक के निवासगृहों, दुग्धशालाओं, अनाज रखने के गोदामों आदि के निर्माण में, भूमिसंरक्षण, अनुपयोगी जल का निकास, रासायनिक क्रियाओं द्वारा मनुष्य, एवं पशुओं के लिए जल को उपयोगी बनाना और कृषिक्षेत्रों में भवननिर्माण इत्यादि कृषि इंजीनियरी के कार्य हैं।

कृषि अनुसंधान कार्य आरंभ करनेवालों में फ्रांस के लावाज्ये (Lavoisier, सन्‌ 1743-1794) तथा जर्मनी के ऐलबर्ट थॉर (Albert Thor 1752-1828) के नाम प्रसिद्ध हैं। उनके बाद बोसिंगाल्ट ने ऐलसेस में सन्‌ 1834 से 1871 तक काम किया। इन्होंने बीज के उगने के समय के रासायनिक परिवर्तनों पर, पौधों के हवा से नाइट्रोजन इकट्ठा करने पर, फसलों के हेर-फेर, रासायनिक खादों के उपयोग पर, जानवरों की खाद को उचित रूप से रखने पर, विविध इत्यादि विषयों पर बड़ी गहरी खोज की। इंग्लैंड में लावेस तथा गिल्बर्ट ने सन्‌ 1814 से सन्‌ 1900 तक रॉथेम्स्टेड में रासायनिक खादों पर बड़ा काम किया। यह अनुसंधान अब तक रॉथेम्स्टेड में चल रहा हैं। रॉथेम्स्टेड संसार की सबसे पुरानी कृषि अनुसंधानशाला हैं। सन्‌ 1909 में इंग्लैंड की पार्लियामेंट ने खेती के अनुसंधान कार्य के लिए 20,00,000 पाउंड देना स्वीकार किया और रॉथेम्स्टेड को भूमि, वनस्पतिपोषण तथा रोगान्वेषण का कार्य सौंपा गया। पशुपोषण का कार्य रोबेट अनुसंधानशाला, ऐबरडीन (Aberdeen), को दिया गया। वनस्पति-शरीर-क्रिया-विज्ञान ‘इंपीरियल कॉलेज ऑव साइंस ऐंड टेकनॉलॉजी’ (लंदन) को दिया गया। वनस्पति प्रजनन तथा विजातीय संस्करण का काम केंब्रिज विश्वविद्यालय तथा यूनिवर्सिटी कॉलेज, अब्रेस्टविथ और स्काटिश प्लांट ब्रीडिंग स्टेशन, एडिनबरा को दिया गया। फलों के अनुसंधान का प्रबंध लांग अशटन, ब्रिस्टल तथा ईस्ट मालिंग, केंट में, किया गया। पशुप्रजनन यूनिवर्सिटी तथा डेरी अनुसंधान का कार्य रेडिंग यूनिवर्सिटी एवं रॉयल बेटेरिनरी कॉलेज, लंदन, में रखा गया।

कैनाडा में कृषि अनुसंधान के फलस्वरुप मारक्विस जाति का गेहूँ निकाला गया, जिसने सारे राज्य के कृषि अनुसंधान के व्यय की पूर्ति कर दी। मिस्र में गेजिरा और मैदानी में कपास की अनुसंधानशालाएँ खुली। मलाया में रबर रिसर्च इंस्टीट्यूट तथा लंका में चाय रिसर्च इंस्टीट्यूट खोले गए। डेनमार्क, फ्रांस, जर्मनी, हालैंड, आदि देशों मेें कृषि अनुसंधानशालाएँ खुली, जिनमें उन देशों को बड़ा लाभ हुआ। रूस में सन्‌ 1938 में 14,000 वैज्ञानिक 60 कृषि अनुसंधानशालाओं 367, अन्वेषणसंस्थाओं एवं कृषि प्रयोग क्षेत्रों में काम कर रहे थे।

1903 ई. के आसपास अमरीका के शिकागो नगर निवासी हेनरी फिप्स ने भारत में कृषि संबंधी वैज्ञानिक अन्वेषण के लिए 30,000 पौंड की धनराशि प्रदान की जिससे बिहार राज्य के पूसा नामक स्थान में एक विशाल कृषि अनुसंधान केंद्र स्थापित किया गया। जब वह 1934 ई. के प्रचंड भूकंप में नष्ट हो गया तब उसकी पुन: स्थापना दिल्ली में की गई। आज वह राष्ट्रीय कृषि अनुसधान केंद्र के नाम से ख्यात है। आज देश के विविध स्थानों में कई अनुसंधानशालाएँ हैं। इन अनुसंधानशालाओं मे गेहूँ, धान, ईख, कपास, चना, मटर, मूँग आदि की जातियाँ विकसित की गई हैं और की जा रही है।

कृषि अनुसंधान के समान ही कृषिविषयक शिक्षा का भी महत्व है। इसका अनुभव यूरोप में ही किया जाने लगा था। सन्‌ 1768 ई. मे यूनाइटेड किंगडम के एडिनबरा विश्वविद्यालय में रसायनशास्त्र के प्रोफेसर विलियम कलेन ने कृषिविज्ञान संबंधी कुछ भाषण दिए गए। वनस्पति और कृषि संबंधी कुछ भाषण दिए जो वनस्पति और कृषि संबंधी नौ व्याख्यानों का सारांश के नाम से प्रकाशित हुए। एडिनबरा विश्वविद्यालय के ही एक दूसरे प्रोफेसर जान वाकर ने सन्‌ 1788 मे कृषि विषय पर कई व्याख्यान दिए जो 1812 ई. में एसेज आनॅ नैचुरल हिस्ट्री ऐंड रूरल एकनॉमिक्स (Essays on Natural History and Rural Economics) के नाम से प्रकाशित किए गए। इन दोनों वैज्ञानिकों के परिश्रम और कार्य से सर विलियम पुलटेनी बड़े उत्साहित हुए और 1790 में एडिनबरा में कृषि तथा रूरल इकोनॉमिक्स एक विषय गृहीत हुआ और वे उसके प्रोफेसर बने। इस प्रकार एडिनबरा विश्वविद्यालय ने कृषिशिक्षा का श्रीगणेश किया।

सर विलियम पुलेटनी के बाद प्रोफेसर विलियम कवेंट्री और उनके बाद श्री डेविड लो इस विषय के शिक्षक हुए। लो ने ब्रीडस आवॅ डोमेस्टिकेटेड एनिमल्स ऑव द ब्रिटिश आइल्स नाम की पुस्तक लिखी । इनके बाद जॉन विलसन प्रधानाचार्य नियुक्त किए गए और 1850 तक रॉयल ऐग्रिकल्चरल कालेज, सिरेंसेस्टर (cirencester) मे प्रधानाचार्य बने रहे। उनकी लिखी हुई आवर फार्म क्रॉप्स नामक पुस्तक सन्‌ 1860 ई. में प्रकाशित हुई।

सन्‌ 1884 तक एडिनबरा विश्वविद्यालय रूरल एकनॉमिक्स और वनस्पति विज्ञान का एक सम्मिलित विभाग था। जिसके कारण कृषि विषय पर स्वतंत्र रूप से विशेष रूप से ध्यान नही दिया गया, उसके बाद वनस्पति विभाग अलग कर दिया गया। और रायॅल कालेज की स्थापना हुई। उसी की भांति सन्‌ 1880 में एक दूसरा विद्यालय डाउंटन में स्थापित किया गया। सन्‌ 1882 ई. में कृषिशिक्षा को सरकार ने अपने हाथ में ले लिया। और साउथ केसिंगटन में कृषिशिक्षा का कार्य आरंभ हुआ।

1868 ई में लंदन की रॉयल ऐग्रिकल्चरल सोसायटी ने एक परीक्षा आरंभ की, जिसमें छात्रों को प्रमाणपत्र ,पारितोषिक तथा छात्रवृति दी जाती थी। ये सुविधाएँ उन छात्रों को दी जाती हैं किसी फार्म अथवा कृषि विद्यालय से संबंधित होते थे। इस कार्य में विशषे सफलता मिली, परन्तु कुछ दिनों बाद यह योजना हाइलैंड ऐंड ऐग्रिकल्चरल सोसायटी ऑव स्कॉटलैंड के साथ संबद्ध कर दी गई। यह संस्था भी रॉयल सोसायटी की भाँति थी और परीक्षण कार्य के लिए स्वतंत्र थी। सन्‌ 1898-99 में दोनो संस्थाओं की एक सम्मिलित कृषि-परीक्षा-योजना तैयार की गई जिसके अनुसार सर्वप्रथम 1900 ई. में नैशनल डिप्लोमा इन एग्रिकल्चर नाम से प्रमाणपत्र दिए गए। इन संस्थानों में स्काटलैंड के शिक्षा विभाग, कृषि एवं मत्स्य विभाग के सदस्य ही सम्मिलित होते थे। इसी प्रकार की एक परीक्षा गोपालन विषय में 1897 ई. में आरंभ की गई तथा राष्ट्रीय कृषि परीक्षा बोर्ड के अधीन रखी गई। आरंभ में कृषि शिक्षा केवल पुस्तकीय थी। बाद में उसे व्यावहारिक एवं गवेषणात्मक रूप दिया गया। इंग्लैंड में कृषि तथा गोपालन की शिक्षा का आधुनिक विकास 1888 ई. में आरंभ हुआ और सर रिचार्ड पैगेट की अध्यक्षता में कृषिशिक्षा को उन्नतिशील बनाने का निश्चय किया गया।

कैनाडा में 1874 ई. से ग्वेल्फ में एक उच्च कोटि का एक कृषिविद्यालय स्थापित किया गया तथा 550 एकड़ का एक कृषि फार्म इससे संबंध कर दिया गया। सन्‌ 1907 सर विलियम मैकडानल्ड ने मांट्रियल में एक कृषिविद्यालय की स्थापना के लिए बृहत्‌ धनराशि प्रदान की तथा एक विद्यालय की स्थापना की गई। आस्ट्रेलिया के प्रत्येक राज्य में उच्च स्तर पर कृषिविद्यालय स्थापित किए गए तथा किसी न किसी विश्वविद्यालय से संबंधित कर दिए गए। प्रत्येक राज्य में अनेक माध्यमिक स्कूल भी कृषिशिक्षा के लिए स्थापित किए गए। अमरीका में कृषिशिक्षा तथा गवेषणा के लिए अनेक संस्थाएँ कार्य कर रही हैं। इन कृषिविद्यालयों से संबंघित बड़े बड़े कृषि फार्म हैं। इनके कुशल संचालन के लिए पर्याप्त धन प्रदान किया गया है। मिस्र के गाजा नामक स्थान में एक उत्तम श्रेणी का कृषिविद्यालय है। इस प्रकार संसार के सभी देशों में कषि संबंधी शिक्षा की व्यवस्था उपलब्ध है।

संयुक्त राज्य अमरीका एवं कैनाडा में इंजीनियरी की प्रगति बड़ी तेजी से हुई। परंतु इंग्लैंड और यूरोप के कुछ भागों में कृषि इंजीनियरी का विस्तार प्राकृतिक साधनों के पूर्ण रूप से उपलब्ध होने पर भी विशेष उल्लेखनीय नहीं रहा, क्योंकि यहाँ कृषि इंजीनियरों की कार्य यांत्रिक और सिविल इंजीनियरी को दे दिया गया। यांत्रिक इंजीनियरों को कृषिगत ऊर्जा और यंत्र तथा सिविल को भूमि एवं सिंचाई की व्यवस्थाएँ सौंपी गई।

संयुक्त राज्य अमरीका में कृषि इंजीनियरी की पढ़ाई का श्रीगणेश सन्‌ 1905 में लोआ स्टेट कालेज, एम्स, में हुआ और चार वर्ष के पाठ्यक्रम के उपरांत बी. एस-सी. (कृषि इंजीनियरिंग) की उपाधि प्रदान करने की व्यवस्था की गई। सन्‌ 1959 में संयुक्त राज्य अमरीका में कृषि इंजीनियरी संबंधी 46 महाविद्यालय थे। आज विश्व के 45 देशों में इसकी शिक्षा दी जा रही है।

भारत में कृषि के वैज्ञानिक विकास का आरंभ ईस्ट इंडिया कंपनी के आगमन के पश्चात्‌ हुआ। कंपनी के व्यापार से निर्यात के लिए अधिक शस्य उपजाने को प्रोत्साहन मिला। शस्य की उपज में वृद्धि के लिए पाश्चात्य कृषि के वैज्ञानिक ज्ञान का उपयोग किया गया। 1839 ई. में कंपनी ने कपास बोनेवाली 12 मशीनें लगाकर कपास की खेती में उन्नति करने का प्रयास किया। 1864 ई. में वाष्प इंजनों द्वारा जुताई के यंत्रों का प्रयोग किया गया। 1880 ई. में अकालनिवारण पर विचार करने के लिए जब कमीशन नियुक्त किया गया तब उसने कृषि की उन्नति के व्यावहारिक साधनों का गंभीरतापूर्वक अध्ययन किया। 1889 ई. में इंग्लैंड की रॉयल ऐग्रिकल्चरल सोसायटी के सदस्य डॉक्टर वोल्कर का कृषि की उन्नति संबंधी सुझाव के लिए आमंत्रित किया गया। 1892 ई. में मि. जेम्स मालिसन, तत्पश्चात्‌ डॉ. लेदर तथा डॉ. बारबर जैसे वैज्ञानिकों ने भारत में कृषि की उन्नति के लिए अपने विचार तथा, सरल उपाय प्रस्तुत किए। 1901 ई. में जब अकाल की समस्याओं पर विचार करने के लिए एक नए कमीशन की स्थापना हुई तब उसके सुझाव पर तत्कालीन वाइसराय लार्ड कर्जन की सरकार ने कृषिविज्ञान की शिक्षा के लिए कई प्रांतों में प्रथम बार कृषिविद्यालयों की स्थापना की। अब तो देश के प्रत्येक राज्य में कृषिशिक्षा के अनेक कॉलेजों तथा स्कूलों में वैज्ञानिक कृषि की शिक्षा दी जा रही है। और कई कृषि विश्वविद्यालयों की स्थापना की गई है जिनमें पंतनगर स्थित विश्वविद्यालय विशेष महत्व का है और वह कृषि अनुसंधान का एक बहुत बड़ा केंद्र हैं। (ज. रा. सिं.; रा. प्र.; स. ब. सिं.; प. ल. गु.)

कृषि यंत्र- कृषि कार्य अर्थात्‌ खेत तैयार करने, जोतने बोने, काटने आदि के लिए मनुष्य को आरंभ से ही उपकरणों की आवश्यकता रही है। उसने खेत जोतने के लिए हल का आविष्कार किया। आरंभ में वे पूर्णतया लकड़ी के थे। पत्थर, हड्डी और धातु के आविष्कार के बाद उसके फल लोहे के बनने लगे। इसी प्रकार उसने कुदाल, फावड़ा, खुरपी, हँसिया आदि दूसरे प्रकार के उपकरण भी बनाए और मानवशक्ति के साथ-साथ पशुशक्तिका उपयोग किया। इसके लिए बैल, घोड़ा, खच्चर, ऊँट अधिक लाभदायक सिद्ध हुए। इन्हीं साधनों से थोड़े हेर-फेर के साथ संसार के सभी देशों में 18वीं शती के आरंभ तक खेती होती रही।

अठारहवीं शती में उद्योगों के यंत्रीकरण के आरंभ होने पर कृषि क्षेत्र में भी लोगों का ध्यान यंत्रीकरण की ओर गया और धीरे-धीरे कृषि के उपकरण यंत्र का रूप धारण करने लगे। उन्नत देशों में कृषक सामान्यत: लोहे के हलों का उपयोग करते हैं। वहाँ 1840 ई. से ही लोहे के हलों का उपयोग किया जा रहा है; वे मिट्टी को अच्छी तरह काटते हैं। भारवहन की पर्याप्त क्षमता के कारण इनसे खेती करना सुविधाजनक है। 20वीं शताब्दी में हलों में पर्याप्त सुधार किए गए, जिनके कारण हलों पर भार घट गया। कोल्टर्स के उपयोग के कारण हलों में खर पतवार कम फँसते है और भूमि में हल आसानी से चलाए जाते हैं। अब रबर के पहिए के कारण कृषियंत्रों और ट्रैक्टरों द्वारा भार के खिंचाव में सुविधा हो गई है। अच्छे आल्कपन, अच्छी बनावट तथा दृढ़ धातु के उपयोग के कारण घर्षण कम हो गया है। फलत: भार घट गया है। पिछड़े हुए देशों में अभी तक अच्छे प्रकार के कृषियंत्रों के उपयोग की समस्या बनी हुई है।

1900 ई. के बाद विशेषत: प्रथम विश्वयुद्ध के पश्चात्‌, रूस, आस्ट्रेलिया, न्यूज़ीलैंड, दक्षिणी अमरीका और अफ्रीका में कृषि के यंत्रीकरण का प्रचलन अधिक हुआ। परिश्रम एवं श्रम की महत्ता समझनेवाले अनेक देशों के कृषक कृषिक्षेत्रों पर जुताई तथा फसल की बटाई आदि समस्त कामों के लिए ट्रैक्टर का व्यवहार करने लगे, किंतु अफ्रीका और एशिया के बहुत से देशों में अभी यांत्रिक शक्ति का उपयोग अधिक मात्रा में नहीं हो पाया है। रूस में साइबीरिया के सामूहिक खेतों पर, दक्षिण तथा मध्य अमरीका में मक्का उगाने के लिए, अर्जेंटाइना में कपास तथा ईख आदि की फसलें उगाने के लिए शक्तिएवं यंत्रों का उपयोग विशेष रूप से होता है। भारत में कृषियंत्रों का व्यवहार पिछले दस बारह बरसों से आरंभ हुआ है और उसका तेजी से विस्तार हो रहा है।

आधुनिक यंत्रों के प्रयोग से खाद्य एवं पहनने की वस्तुओं के उत्पादन में काफी प्रगति हुई है। भिन्न-भिन्न प्रकार की मिट्टी और विभिन्न प्रकार की फसलों का ध्यान रखते हुए अनेक प्रकार के यंत्रों का निर्माण होने लगा है। खेती के काम के लिए शक्ति के बढ़ने हुए उपयोग के कारण, मशीनों को चलानेवाली मोटरों तथा विद्युत्‌ का प्रयोग तीव्र गति से बढ़ रहा है। संयुक्त राज्य (अमरीका) में, खेती की वृद्धि के साथ-साथ विद्युच्छक्ति का उपयोग मुर्गी तथा सूअरों के पालने, घास के सुखाने, आटा पीसने की मशीनों तथा डेयरी मशीनें आदि चलाने के कार्यों में भी होने लगा है। फलत: घोड़ों और ऊँटों का प्रयोग बहुत ही कम हो गया। हाथ तथा पशुओं से चलाए जानेवाले यंत्रों में भी पर्याप्त सुधार हुआ और शक्तिचालित यंत्रों का आविष्कार एवं उपयोग बढ़ता गया। कृषि अनुसंधानकर्ताओं एवं अभियंताओं ने अब पौधे लगानेवाली, चुकंदर के बीज अलग करनेवाली एवं दाना तथा भूसा अलग करने आदि, कृषिकार्यों के लिए उपयोगी मशीनों को भी शक्तिचालित बनाने में सफलता प्राप्त की है।

संयुक्त राज्य अमरीका में कृषिकार्य में शक्ति और यंत्रों के उपयोगों के प्रारंभ का क्षेत्र बड़ा व्यापक था, वहाँ के खेत विभिन्न प्रकार की मिट्टी के होने के कारण छोटे-छोटे भागों में बँटे हुए थे। अत: वहाँ छोटे से छोटे खेतों में उपयोग करने के निमित्त मशीनें बनीं, जिसका ज्वलंत उदाहरण छोटे ट्रैक्टर हैं। ये पारिवारिक तथा छोटे खेतों के लिए उपयोगी सिद्ध हुए है। यही बात प्लांटिंग मशीन और फर्टिलाइज़र डिस्ट्रिब्यूटर के विषय में भी कही जा सकती है।

ग्रेट ब्रिटेन में जुताई के लिए वाष्पचालित ट्रैक्टर उपयोग में लाए जाते थे। द्वितीय विश्वयुद्ध के पश्चात्‌ वहाँ पेट्रोल से चलनेवाले ट्रैक्टरों की संख्या अधिक हो गई है। कृषिसंबंधी श्रमिकों की कमी ने फार्मों पर शक्ति एवं यंत्रों के उपयोग में दिनों दिन वृद्धि की है।

वहाँ के किसानों ने घास से अधिक लाभ उठाने के हेतु शक्ति एवं मशीनों का उपयोग विशेष रूप से किया है। वर्षा के कारण घास को अच्छी दशा में रखना कठिन था, अत: घास को साइलों में रखने की प्रथा का पर्याप्त विकास हुआ। परिणामस्वरूप इनसाइलेज कटर (चारा काटने की मशीन), साइलोफियरं, साइलेज हारवेस्टर जैसी मशीनों का वहाँ कुछ फसलों की कटाई रीपर के द्वारा होती है, जो फसल को बिना गट्ठर बनाए ही भूमि पर डाल देता है। यह कटी हुई फसल ट्रक एवं बैंगनों में रखकर मड़ाई के लिए जाती है। वहाँ की थ्रोशिंग मशीनें केवल भूसे को ही दाने से अलग नहीं करतीं, वरन्‌ छोट-छोटे खर कतवार, लकड़ी, पत्थर और मिट्टी को भी अनाज से अलग करती है। हवा में अधिक नमी होने के कारण ब्रिटेन के बहुत से चरागाहों में काई अधिक पैदा हो जाने से ग्रीष्म में हैरो का उपयोग होने लगा है।

सोवियत रूस में सहकारी खेती, पंचवर्षीय योजना, भूमिसुधार और छोटे-छोटे खेतों को तोड़कर बड़े फार्म बनाने की योजनाओं के कार्यान्वित होने से ही यांत्रिक खेती की प्रगति हुई है। सुनिश्चित समय में योजनाओं के अंतर्गत यंत्रीकरण उन्नति की ओर विशेष तथा सस्ते ईधंन की प्राप्ति, रूस के कृषियंत्रीकरण में विशेष सहायक सिद्ध हुई। देश में ट्रैक्टर बनाने के बहुत से कारखाने खोले गए तथा आदमियों के प्रशिक्षण की व्यवस्था की गई। लगभग सन्‌ 1940 तक रूस में खेती का एक बड़ा भाग सामूहिक खेती के रूप में होता रहा। अंत में इन छोटे भागों को मिलाकर बड़ी इकाई का रूप दे दिया गया, जिसके प्रबंध में पर्याप्त सुविधा हुई। मध्यम तथा छोटी माप के सामूहिक कृषिक्षेत्र (फार्म) आवश्यकता पड़ने पर राजकीय कृषिक्षेत्र से मशीनें लाकर कार्य करते हैं।

1936 के बाद रूस में मशीनें गेहूँ, जौ, जई, राई और दूसरे अनाज उगाने के काम में आने लगीं और जो मशीनें अन्यत्र यांत्रिक खेती के लिये प्रयुक्त होती रहीं उनका उपयोग कपास, चुकंदर इत्यादि फसलों की खेती में भी किया जाने लगा। अब वहाँ लगभग सभी कृषिकार्य मशीनों के द्वारा होते हैं। दूसरे शब्दों में कृषि का 95 प्रतिशत यंत्रीकरण हो चुका है। वहाँ विभिन्न प्रकार के 1,000 कृषियंत्र बनने लगे हैं।

जर्मनी में लोगों का झुकाव डीज़ेल तथा सेमिडीज़ेल छोटे ट्रैक्टरो के निर्माण की ओर अधिक है। झुकाव का मुख्य कारण वहाँ अधिक से अधिक भूमि में खाद्यान्नों को पैदा करने के उद्देश्य हैं। यांत्रिक शक्ति के उपयोग से फसल उगाने के लिये पुरस्कार स्वरूप जर्मनी के कृषकों को 3 से 5 एकड़ ज़मीन मिल जाती रही हैं। स्वभावत: लोगों का झुकाव ट्रैक्टरो एवं ट्रकों से कृषिक्षेत्रों की उत्पत्ति को बाजार ले जाने की ओर हुआ। वहाँ मशीनों के आकल्पन (design) में खाद्योत्पादन की वृद्धि की और विशेष ध्यान दिया गया, जिससे वहाँ के छोटे छोटे फार्मों से अत्यधिक लाभ उठाया जा सके। कतारों में बुनाई करनेवाली इस देश की मशीनों की सूक्ष्मता दूसरे देशों के लिये एक नमूना है। द्वितीय विश्वयुद्ध के पूर्व भी जर्मनी के कृषि फार्मों पर विद्युच्छक्ति का उपयोग होता था। सिफ्ट जर्मनी का एक विख्यात ट्रैक्टर है, जिसका निर्माण सन्‌ 1947-48 में प्रारंभ हुआ। ट्रैक्टरों से चलनेवाले स्पाइक टुथ हैरो तथा पल्वराइज़र इत्यादि इस देश में प्रचुर मात्रा में निर्मित होते हैं।

फ्रांस में छोटे छोटे फार्मों की अधिकता के कारण यांत्रिक खेती का उतना विकास नहीं है जितना ग्रेट ब्रिटेन, रूस तथा जर्मनी में। फ्रांस के कृषक अपने शक्तिशाली घोड़ों के लिये प्रसिद्ध हैं। कृषिकार्यों के लिये इनका बड़ी मात्रा में उपयोग होता है, तब भी इस देश में छोटे छोटे ट्रैक्टरों के उपयोग की प्रगति हुई। इस देश में स्प्रेइंग तथा डस्टिंम मशीनों का प्रयोग एवं फलों तरकारियों की खेती में अधिक तथा कुछ सीमा तक व्यापारिक उर्वरक के लिये होता है।

दक्षिणी अफ्रीका, आस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड तथा अर्जेंटाइना में भी कृषियंत्रों की ओर लोगों का झुकाव है किंतु जहाँ कही भी पेट्रोल का मूल्य अधिक है तथा जानवर रखने की सुविधा है (जैसा अर्जेंटाइना में है), कृषकों ने पशुशक्ति पर निर्वाह करना उचित समझा। इन देशों में यांत्रिक शक्ति का उपयोग केवल खेत तैयार करने तथा फसल की कटाई तक ही सीमित है। न्यूजीलैंड में डेरी उद्योगों की उन्नति होने के फलस्वरूप वहाँ पर डेरी से संबंधित यंत्रों का अत्यधिक मात्रा में उपयोग एवं साथ ही साथ विकास भी हुआ है।

अफ्रीका में नील नदी की घाटी और दक्षिणी अफ्रीका के अतिरिक्त अन्य सभी जगह खेती अब भी पुराने ढंग से की जाती है और सामान्य यंत्र तथा पशु उपयोग में लाए जाते हैं। यही स्थिति एशिया के लगभग सभी देशों की है।

अधिक जनसंख्या होने के कारण चीन में ट्रेक्टरों एवं बड़ी मशीनों का उपयोग बहुत ही सीमित है। मानव एवं पशुचालित यंत्र ही वहाँ विशेष प्रचलित हैं। चीन में कृषिकार्यों की शक्ति का मुख्य साधन मनुष्य ही है। यहाँ तक कि हल तथा गाड़ियाँ भी मनुष्यों द्वारा चलाई जाती हैं। साइलेज कटर, पनचक्की, राइस हलर, राइस ्थ्रौशर, दो पहिएवाले हल इत्यादि कुछ उन्नतिशील कृषियंत्रों का निर्माण अब चीन में होने लगा है।

यूरोप और संयुक्त राज्य अमरीका में विद्युतचालित यंत्रों का प्रयोग होने लगा है क्योंकि वहाँ बिजली अधिक सस्ते दर पर उपलब्ध है एवं इसको उपयोग में लाना भी सरल होता है। इसके अतिरिक्त विद्युतचालितऔजार और यंत्र भी पर्याप्त समय तक ठीक दशा में रखे जा सकते हैं, समय की बचत होती है, कार्यनिपुणता बढ़ती है और व्यय कम होता है।

कृषि प्रबंध- कृषि का उपयोग केवल जीवननिर्वाह के साधन मात्रा के रूप में ही नहीं, अपितु लाभ अर्जित करने के लिये व्यापार के रूप में भी है। व्यापार के रूप में कृषक के लिये इस बात का ध्यान रखना आवश्यक है कि जितना परिश्रम और प्रयास वह करता है उसका उसको अधिक से अधिक लाभ मिले। इस उद्देश्य की पूर्ति के लिये कृषिक को खेतीबारी संबंधी साधारण बातों के पूर्ण ज्ञान के साथ साथ उत्पति के साधनों अर्थात्‌ भूमि, श्रम और पूँजी का भी पूर्ण ज्ञान आवश्यक है। उसके लिये कृषिक्षेत्र के यंत्रों, जलवायु, कीड़ों, बीमारियों, पशुपालन और क्रय विक्रय का ज्ञान अनिवार्य है। साथ ही, उसे उत्पति के आर्थिक नियमों, अर्थात्‌ उत्पत्ह्रासि नियम (Law of Diminishing Returns), सम सीमांत उत्पति का नियम (Law of Equipmarginal Returns) आदि का भी जानना आवश्यक है। इस प्रकार सफल कृषक के लिये उत्पति और उसके विक्रय आदि पर प्रभाव डालने वाली दशाओं के ज्ञान की आवश्यकता होती है। कृषिप्रबंध एक विज्ञान है जो उत्पति के साधन, जैसे भूमि, श्रम और पूँजी का उचित चलन और कार्यान्विति, फसल, पशुपालन आदि उद्योगों का चयन करते हुए, कृषिक्षेत्र की इकाई से लगातार और अधिकतम लाभार्जन कराता है। यह कोरा विज्ञान न होकर व्यावहारिक विज्ञान है।

कृषिप्रबंध के दो मुख्य खंड हैं : (1) कृषिक्षेत्र का संगठन और (2) कृषिसंबंधी क्रियाएँ। कृषिक्षेत्र के संगठन के अंतर्गत वे निर्णय आते हैं जो कृषिक्षेत्र के आकार, चुनाव और सीमानिर्धारण तथा क्षेत्र के लिये आवश्यक यंत्रों से संबंद्ध हैं।

वित्तीय साधन, जनसंख्या की सघनता, जलवायु, भूमि की दशा, उगाई जानेवाली फसलों का स्वभाव, सिंचाई के साधन, कृषिकार्य की प्रकृति, संगठन की क्षमता और पैतृक तथा राजकीय नियम द्वारा ही कृषिक्षेत्र के आकार का निर्धारण होता है। कृषक को, अपने को पूर्ण रूप से स्थापित करने के लिये निम्नलिखित बातों पर विशेष रूप से ध्यान देने की आवश्यकता होती है-

1. प्राप्त सामाजिक सुविधाओं से संबंध प्रवृति एवं रुचि, जैसे विश्वालय, चिकित्सालय, पड़ोस तथा अन्य सामाजिक सुविधाएँ।

2. भौतिक अवस्थाएँ, जैसे जलवायु, भूमि की उर्वरता तथा तल की समानता, पानी की पूर्ति तथा निकास की सुविधा, कीट, बीमारियाँ तथा बाढ़ के प्रकोप आदि।

3. आर्थिक विचार, जैसे भूमि का मूल्य, कृषिक्षेत्र का ढलाव और प्रकृति, पूँजी की आवश्यकता तथा, यातायात के साधन, नगर और सड़क के दृष्टिकोण से कृषिक्षेत्र की स्थिति, मंडी से दूरी, सरकारी कर तथा अन्य राजकीय नियम और उचित दर पर श्रमिकों का प्राप्त होना, इत्यादि।

भारतीय दृष्टिकोण से प्रमुख कृषिउद्योग ये है : (1) सामान्य कृषि, (2) फलोत्पादन, (3) तरकारियों की खेती, (4) डेरी, (5) पशुप्रजनन (Breeding), (6) मुर्गीपालन , (7) सूअरपालन आदि।

कृषि उद्योग का चुनाव करते समय निम्नलिखित बातें ध्यान में रखना आवश्यक है: भूमि का उपयोग, उर्वरता का संरक्षण, श्रम का विभाजन, अतिरिक्त उपचार का उपयोग, साहस की सीमा, आय का विभाजन, बैलो तथा यंत्रों का उपयोग, जलवायु, विभिन्न फसलों की दृष्टि से भूमि की उपयोगिता, व्यक्तिगत एवं पारिवारिक रुचि, अनुभव, दक्षता तथा स्वास्थ, बाजार का आकार प्रकार तथा विभिन्न उद्योगों के तुलनात्मक आय और व्यय, उद्योगों की सामाजिक तथा वैधानिक स्थिति आदि।

भूमिप्रबंध, श्रमप्रबंध, पूँजी की उपलब्धि, उत्पादन का क्रय विक्रय आदि सभी कृषिक्षेत्र के महत्वपूर्ण पहलू है। अत: प्रबंधक का मुख्य कर्तव्य है कि वह प्राप्त विभिन्न साधनों को इस प्रकार उपयोग करे कि वह अधिक से अधिक लाभ अपने कृषिक्षेत्र से प्राप्त कर सके। दूसरे शब्दों में कृषक परिवार के पास प्राप्त साधनों द्वारा लगातार अधिकतम लाभ प्राप्त करना ही कृषि के संगठन और कार्यवाहन का मुख्य उद्देश्य है। इसलिये कृषिकार्य को व्यापारिक आधार पर संगठित करते समय यही आधारभूत सिद्धांत होना चाहिए कि ऐसे फसल संयोगों को ही उगाया जाय जो प्रति एकड़ अधिकतम उपज तथा मूल्य दे सकें। इसके लिए निम्नलिखित बातों को ध्यान में रखना चाहिए :

1. इस तरह उद्योगों का चयन किया जाए जो कृषिक्षेत्र की भौतिक अवस्था, बाजार की दशा और संगठनकर्ता की आवश्यकताओं के अनुरूप हों।

2. स्थानीय कृषकों के अनुभव तथा कृषिसंबंधी रीतियों को पथ-प्रदर्शक के रूप में ग्रहण किया जाए।

3. कृषिकार्य योजनाबद्ध हो। उसमें फसल तथा पशु संबंधी उन उद्योगों को सम्मिलित करना चाहिए जिनके द्वारा लाभ हो सके।

4. फसलों के उत्पादन की ऐसी योजना बनाई जाए जिसमें प्रत्येक लाभप्रद फसल का क्षेत्रनिर्धारण, जलवायु, सिंचाई की सुविधा, बाजार वित्तिय साधन और संगठनकर्ता की आवश्यकताएँ आदि सभी बातों पर ध्यान हो।

5. योजना सामयिक हो और मौसम तथा बाजार के संक्रमण काल में परिवर्तित की जा सके।

6. उपज और कृषि का संतुलन बना रहे। यह संतुलन फसलों के मूल्य में पारस्परिक परिवर्तनों के आधार पर हो जिससें भविष्य में हानि की संभावना न रहे।

7. भूमि की उर्वरता की वृद्धि के लिए पशुओं, श्रमिकों, तथा अन्य साधनों के साथ साथ खेती करने की विभिन्न रीतियों का पूर्ण उपयोग किया जाए, जिससे फसल उत्पन्न करने का आदर्श प्रस्तुत कर सकें। इससे विभिन्न फसलें करने का अच्छा अवसर रहेगा और उत्पादन को उपयोग में लाने और बेचने की सुविधा रहेगी।

योजना बनाते समय उन बातों की जानकारी आवश्यक है जिनका संबंध फसलों की उत्पत्ति, फसल की कृषक को आवश्यकता, उपज की बाजार में खपत, कृषक को उधार लेने की आवश्यकता, उचित ब्याज पर पर्याप्त पूँजी प्राप्त करने की सुविधा, कार्यकारी पूँजी का ब्याज, भूमि का विभिन्न रीतियों से उपयोग और उचित मूल्य पर बाजार संबंधी सेवाएँ प्राप्त करना आदि है। ये सभी स्वाभाविक समस्याएँ है और उनका कृषि में बड़ा महत्व है। योजना का उद्देश्य किसान की अपनी वास्तविक आय में वृद्धि है। अत: फसलों को उत्पन्न करने में बहुत से निर्णय लेने होते हैं, यथा-किस प्रकार फसलों को बदलकर उत्पन्न किया जाए, कितनी और किस प्रकार की गाएँ, बैल, मुर्गियाँ और कृषिकोष की आवश्यक वस्तुएँ रखी जाएँ तथा भवन, मशीन, औजार, और श्रम तथा शक्ति के कौन से साधन उपयोग में लाए जाएँ। दूसरे शब्दों में, व्यापार की सभी बातों को ध्यान में रखना आवश्यक है। जो फसलें चुनी जायँ वे बाजार की माँग के अनुकूल हों। अच्छी खेती के लिये अदल बदल कर फसलें बोई जाएँ और ऐसे श्रम का उपयोग किया जाए जिसमें अधिकाधिक लाभ प्राप्त हो। ऐसी योजना बनाई जाए जिसमें पशुओं से अधिकतम कार्य लिया जाए और आवश्यकतानुसार उसमें परिवर्तन किए जा सकें। उत्पादनपद्धति के समान ही व्यापारिक का भी महत्व है। अत: कृषिव्यापार में इन दोनों बातों का ध्यान रखना अनिवार्य है। दोनों के बीच एकता स्थापित करने से ही अधिकतम और लगातार लाभ अर्जित कर सकना संभव है।

कृषि श्रम और मजदूरी- भारत में कृषि एक व्यापारिक उद्योग है। उसमें परिवार के सभी लोगों का योग होता है। किंतु कृषिसंबंधी कुछ कार्य ऐसे हैं जिसे सभी परिवार के लोग अथवा परिवार के सभी लोग नहीं कर पाते। उसके लिये अन्य लोगों की सहायता की आवश्यकता होती है, और वे इस सहायता को मजदूरी देकर प्राप्त करते हैं। कृषिकार्य करनेवाले श्रमिकों को मजदूरी रुपए पैसे में नकद न देकर श्रमिक को कृषि उत्पादन का अंश देने की प्रथा इस देश में प्राचीनकाल से रही है। यह प्रथा बहुत कुछ में आज भी पंजाब, उत्तर प्रदेश, बिहार तथा देश के कतिपय अन्य भागों में प्रचलित है। जिन श्रमिकों के पास अपनी भूमि नहीं है, वे इस प्रथा को पसंद करते हैं। इसके द्वारा वे अपने श्रम का अधिक से अधिक मूल्य प्राप्त कर सकते हैं। इस प्रकार श्रमिक की मजदूरी स्थानीय प्रथा के आधार पर दी जाती है। यथा-पंजाब में कपास तोड़ने और जमा करनेवाले का उत्पादन का इक्कीसवाँ भाग दिया जाता हैं। उत्तर प्रदेश में कतिपय जिलों में गेहूँ की खेती के श्रमिकों को उत्पादन का बारहवाँ भाग मिलता है। मेरठ जिले में ईख की खेती का चालीसवाँ भाग दिया जाता है, इस प्रकार के श्रमिकों को इस पारिश्रमिक के अतिरिक्त जलपान, पीने के लिये तंबाकू, पहनने के लिये कपड़े, घर बनाने के लिये समूचित उपकरण और भोजन देने की भी प्रथा है। किंतु ये सुविधाएँ उन्हीं श्रमिको को प्राप्त होती है जो परिवार के साथ स्थायी रूप से सम्बद्ध होते हैं।

मजदूरी की इस अवस्था का एक अन्य रूप रहा है जिसमें श्रमिक को अपने जीवनयापन के लिये भूमि प्रदान की जाती थी और वह उस भूमि के कर का भुगतान भूस्वामी को अपने श्रम द्वारा करता है। दूसरे शब्दों में उसे मजदूरी मुद्रा अथवा उत्पादन के रूप में नहीं प्राप्त होती वरन्‌ वह उसे भूमि के फलोपभोग के रूप में प्राप्त होती है। इसे अर्थशस्त्रियों ने कृषिदासता का नाम दिया है।

कृषिदासता स्वामी तथा श्रमिक के पारस्परिक कर्तव्य पर निर्भर थी। श्रमिक की सेवाओं तथा श्रम का विनिमय स्वामी की भूमि की उत्पत्ति के कुछ निश्चित अंश के अधिकार से होता था। जिस समय मुद्राओं का प्रचलन प्रचुर रूप से नहीं हुआ था उस समय कृषिदासता क्षेत्रिकप्रधान समाज का सहज रूप था। इसे सामाजिक आर्थिक संस्था माना गया था। वह सामंतवादी व्यवस्था का अपरिहार्य अंग थी। कृषिदास को वे ही अधिकार प्राप्त होते थे जिसे भूमिपति कृपा करके दे देता था। कृषिदासता यूरोपीय सामंती व्यवस्था की विशेषता थी, किंतु वह भारत तथा चीन ऐसे देशों में भी स्पष्ट रूप से पनपी। आज भी अपने देश के अत्यधिक पिछड़े प्रदेशों में कृषिदासता बनी हुई है।

अब कृषिदासता और उत्पत्तिसहभाग की प्रथा के स्थान पर श्रम का मूल्य नकद रूपए पैसों में देने का व्यवहार बढ़ता जा रहा है। इस प्रकार के पारिश्रमिक का दर प्रत्येक प्रदेश तथा प्रत्येक स्थान में स्थानीय परिपाटी, काम के स्वरूप, रहनसहन के स्तर और श्रम की पूर्ति और माँग पर निर्भर करती है। किंतु यह पारिश्रमिक औद्योगिक क्षेत्र में काम करनेवाले श्रमिकों के पारिश्रमिक की तुलना में इतना कम रहा है कि कृषिश्रमिकों के जीवनस्तर की समूचित उन्नति नहीं हो सकी। फलत: प्रथम पंचवर्षीय योजना के अंतर्गत कृषिश्रमिकों का एक निश्चित जीवनस्तर स्थापित करने की योजना थी। फलत: पंजाब, राजस्थान, दिल्ली, हिमाचल प्रदेश आदि अनेक प्रदेशों में कृषिश्रमिकों का न्यूनतम वेतन कानून बनाकर निर्धारित कर दिया गया है।

कृषि ऋण- कृषि के लिये बीज, खाद, यंत्र, पशु आदि की इसकी पूर्ति स्वयं अपने साधनों से कर लेता है। शेष के लिये उसे दूसरे से ऋण लेने की आश्यकता होती है। वैदिक काल में कृषि में सहयोग देना राजधर्म था। यह सहयोग कृषक को राजा से बीज, पशु और जलप्रदाय के रूप में होता था। समय के साथ इस सहयोग में ऋण का रूप लिया और ऋण देना कुछ व्यक्तियों का व्यवसाय बन गया। कृषिऋण सामान्यत: उत्पादक क्रियाओं के लिये भी इसकी आवश्यकता पड़ती है। निरंतर सूखा पड़ने पर कृषक को पेट भरने के लिये भी ऋण की आवश्यकता होती है। कभी कभी सामाजिक प्रथाओं में व्यय के लिये भी उधार लेता है। कृषि के लिये उधार लेने की परंपरा सभी देशों में है। इसके बिना कृषक उत्पादन कार्य नहीं कर सकता। किंतु अनुत्पादक ऋण उस के लिये कई बार ऐसा बोझ बन जाता है जो निरंतर बढ़ता ही रहता है। जिस देशों में कृषि मुख्य व्यवसाय और पिछड़ी हुई स्थिति में है, वहाँ कृषिऋण एक गंभीर समस्या बन गई है। कृषक को कभी थोड़े समय के लिये और कभी अधिक समय के लिये ऋण की आश्यकता होती है। समय के अनुसार कृषिगत ऋण तीन भागों में विभक्त किया जा सकता है: (1) अल्पकालीन उधार, अर्थात्‌ वह ऋण जो आगामी फसल तक के लिये, (2) मध्यकालीन उधार, छह मास से तीन वर्ष तक के लिये; (3) दीर्घकालीन उधार, जो 20 वर्ष या इससे भी अधिक समय के लिये हो। अल्पकालीन उधार बीजादि के लिये होता है और इसके सूद की दर भी कम रहती है। मध्यकालीन उधार पशु आदि के लिये होता है। दीर्घकालीन उधार भूमि आदि के लिय लिया जाता है और यह परिमाण में भी अधिक रहता है। समयानुसार ब्याज की दर निर्धारित होती है।

कृषिऋण देने के लिये विभिन्न देशों में विभिन्न संस्थाएँ है। कहीं सरकार स्वयं यह प्रबंध करती है और उत्पादन के पश्चात्‌ ऋण वसूल कर लेती है। अनेक देशों में सहकारी समितियों का संगठन है। गैरसरकारी होते हुए भी ये समितियाँ सरकार नियंत्रित हैं। द्रव्य या अन्य सहायता के रूप में कृषक, जो समिति का सदस्य होता है, ऋण प्राप्त कर सकता है। बैंको से भी कृषकों को आर्थिक सहायता मिल सकती है। इनके अतिरिक्त कुछ व्यक्ति भी, जिनका व्यवसाय ही ऋण देना है, कृषकों को उधार देते हैं। ऐसे व्यक्ति अधिक ब्याज पर रुपया उठाते हैं और कृषक की लाचारी का पूरा पूरा लाभ उठाने की चेष्टा करते हैं। इनके अत्याचारों को रोकने के लिये कानून द्वारा अब इनपर नियंत्रण रखा जाने लगा है।

कृषि बीमा- साधारणतया खेती में अनेक प्रकार से दैविक हानियाँ होती हैं, यथा-अनावृष्टि, अतिवृष्टि, ओला, पौधों की बीमारी या कीटाणुग्रस्त हो जाना; चूहे इत्यादि से फसल का बरबाद हो जाना। किसान स्वयं कोई ऐसा उपाय नहीं कर सकता जिससे वह इन सब हानियों से बच सके। इसलिये देश की अन्नसमस्या को हल करने को दृष्टिगत रखकर, इनसे कृषक की रक्षा करने का एकमात्र साधन है कृषक की उपज तथा जानवरों आदि का बीमा। इससे दैविक आपत्तियों द्वारा होनेवाली किसान की इस क्षति की पूर्ति की जा सकती है अर्थात्‌ किसान का उपज खराब होने से हुई आर्थिक क्षति से बचाया जा सकता है। इसके लिये संसार के अनेक देशों में नाना प्रकार की बीमा योजनाएँ काम कर रही हैं। किंतु अभी तक इस प्रकार की योजना भारत में प्रचलित नहीं हुई है।

कृषि उत्तराधिकार- भारतवर्ष में ब्रिटिश शासन से पहले, कृषि उत्तराधिकार और दूसरी अचलसंपत्ति दोनों के उत्तराधिकार का न्यायगमन (डेवोल्यूशन) वैयक्तिक विधि (पर्सनल लॉ) अथवा आचार के आधार पर होता था। ब्रिटिश शासन की स्थापना के पश्चात्‌ विभिन्न प्रांतों के काश्तकारी के अपने अपने विधान बनाए गए। इन विधानो में कृषि उत्तराधिकार का निर्णय करने के नियम भी दिए गए। सामान्यत: यही नियम बना कि परिभोक्ता कृषक (आकपाइंग टेनेंट) का कृषि उत्तराधिकार, यदि वह हिंदू है तो हिंदू विधि के अनुसार, यदि मुसलमान है तो मुसलिम विधि के अनुसार नियमन होगा। अन्य लोगों पर इंडियन सक्सेशन ऐक्ट (1925) के नियम लागू किए गए। साथ ही कुछ अन्य नियम भी बने। यथा-बंगाल टेनेंसी ऐक्ट, 1885 की धारा 26 में यह कहा गया कि यदि कोई रैयत परिभोग अधिकार (राइट ऑफ आकुपेंसी) के विषय में बिना वसीयत किए मर जाए तो उसका उत्तराधिकार वैयक्तिक विधि से ही होगा, जब तक कि उसके विरूद्ध कोई आचार न हो। अर्थात्‌ कुछ दशाओं में उत्तराधिकारी की नियुक्ति आचार द्वारा भी हो सकती थी। इसी प्रकार पंजाब में भी अधिकतर उत्तराधिकारी आचार द्वारा ही निर्धारित किया जाता था। अवध स्टेटस ऐक्ट, 1869 की धारा 23 में भी यही बात कही गई थी कि जब कोई ताल्लकेदार बिना वसीयत किए मर जाए, तो उसकी संपति का उत्तराधिकार उसके धर्म या जाति के सामान्य नियमों द्वारा ही निर्धारित किया जाए, और इस सामान्य नियम में आचार भी सम्मिलित था।

कुछ विधानों में एक अन्य नियम भी था। बंगाल सेटिल्ड स्टेट्स ऐक्ट, 1904 की धारा 10 (1) के अनुसार संपदा (स्टेट) सदैव बड़े लड़के को मिलती थी। इसी कारण मद्रास इंपार्टिबल स्टेट्स ऐक्ट, 1904 द्वारा भी संपदा (स्टेट) सदैव अग्रजत्व के नियमानुसार मिलती थी। कुछ काश्तकारी विधानों में कृषि उत्तराधिकार की सूची भी दी गई थी। जब 1935 में गवर्नमेंट ऑफ इंडिया एक्ट बना तो उसकी सप्तम अनुसूची 2 (प्रान्तीय सूची), प्रविष्टि 21 के अनुसार कृषिभूमि का हस्तांतरण, अन्य संक्रमण और न्यायगमन (ट्रांस्फर ऐलिएनेशन और उत्तराधिकार) को प्रान्तों के अधिकार के अंतर्गत माना गया। उपर्युक्त एक्ट की सूची 3, समवर्ती सूची, प्रविष्टि 7 में इच्छापत्र, इच्छापत्रहीनत्व और उत्तराधिकार, कृषि भूमि के विषय के अतिरिक्त (विल्स, इंटेरस्टैंसी एंड सेक्सेशन) का उल्लेख था। इस प्रकार कृषि उत्तराधिकार का निर्धारण प्रांतों का अपना विषय था। इसी कारण केन्दीय सरकार ने जब 1937 में द हिन्दू वीमेंस राइट्स टू प्रापर्टी एक्ट पारित किया तो वह कृषि उत्तराधिकार पर लागू न हो सका। इस विधान को काश्तकारी भूमि पर लागू करने के लिये अनेक प्रान्तों ने विशेष विधान पारित किए यथा-विहार एक्ट 6 (1942 का); बाँबे एक्ट 17 (1942 का); यू.पी. विहार एक्ट 11(1942 का); और मद्रास एक्ट 26 (1947 का)।

स्वतंत्रता के पश्चात्‌ जब भारतीय संविधान बना तो उसकी सप्तम अनुसूची, सूची 2 (राज्यसूची), प्रविष्टि 18 के अनुसार केवल कृषिभूमि का हस्तान्तरण और अन्य संक्रमण (ट्रांस्फर ऐंड ऐलिएनेशन) को ही राज्यों के अधिकार में रखा गया। न्यायगमन (डेवोल्यूशन ),अब राज्य सूची में नहीं है। इसी प्रकार भारतीय संविधान की सप्तम अनुसूची, सूची 3 (समवर्ती सूची), प्रविष्टि 5 में मात्र इच्छापत्र, इच्छापत्रहीनत्व और उत्तराधिकार शब्द है। काश्तकारी भूमि का उत्तराधिकार का नियमन अगर केंद्रीय सरकार चाहे तो अपने हाथ में ले सकती है। 1956 ई. में केद्रीय सरकार ने हिन्दू उत्तराधिकार कानून पास किया। उसकी धारा 4 (2) इस प्रकार है : शंकासमाधान के हेतु यह घोषित किया जाता है कि इस विधान की कोई भी धारा किसी प्रचलित कानून में समायुक्त प्रावधानों (प्रविजंस) पर कोई प्रभाव नहीं डालेगी जो कि खेतिहर भूमि संबंधित काश्तकारी अधिकारों के न्यायगमन के लिये प्रावधानित किये गये हो। अर्थात्‌ मृत हिन्दू की कृषि भूमि का उत्तराधिकार कानून के द्वारा निश्चित किया जाएगा पर काश्तकारी अधिकार जैसे भूमि का विभाजन, भोग इत्यादि, राज्यविधान द्वारा निर्णीत होंगे। इस प्रकार जहाँ तक हिन्दूओं का प्रश्न है, उनका कृषि उत्तराधिकार कानून द्वारा ही निश्चित किया जायेगा।

पंजाब में इस कानून से पहले, कृषि उत्तराधिकारी का निर्णय अधिकतर आचार (कस्टम) के द्वारा ही होता था और स्त्री को कृषिभूमि पर अधिकार नहीं प्राप्त होता था। अब इस विधान के अनुसार किसी हिन्दू के पुत्र, पुत्री, माँ, आदि को, उनके बिना वसीयत किए मर जाने पर, उनकी संपत्ति से समान हिस्सा मिलता है।

निष्कर्ष यह है कि भारतवर्ष में कृषि उत्तराधिकार का निर्धारण कई प्रकार से होता है -वैयक्तिक विधि द्वारा, आचार द्वारा या राज्य के विधान के द्वारा निर्धारित सूची के अनुसार जिसमें वह मनुष्य रहता है।

कृषि और राज्य- भारतीय शासनाव्यवस्था का आधार कृषि रहा है। वह राजस्व का एक प्रमुख साधन था इस कारण कृषि की उन्नति के लिये प्रयास राजधर्म माना गया है इसकी स्पष्ट चर्चा कौटिल्य के अर्थशास्त्र में हुई है। उससे ज्ञात होता है कि मौर्यकाल में राज्य की ओर से कृषिव्यवस्था की देखरेख के लिये एक स्वतंत्र विभाग था। इस विभाग का अध्यक्ष सीताध्यक्ष कहलाता था। उसके लिये कृषितंत्र, गुल्मतंत्र, वृक्षतंत्र, आयुर्वेद आदि का ज्ञान आवश्यक समझा जाता था। धान्य, फल, फूल, शाक, सब्जी, कंदमूल, कपास आदि बीजों का संग्रह करना, उनकी निगरानी करना समय पर बोने के लिये वितरण करना उसका कार्य था। विभिन्न प्रकार की खेती के लिये कौन सी भूमि उपयुक्त है, इस बात की जानकारी भी रखने की व्यवस्था थी। कृषि की दृष्टि से देश का देवमात्रक और नदीमात्रक दो विभाजन किया गया था। देवमात्रक वह भूभाग कहा जाता था जहाँ खेती वर्षा पर निर्भर करती थी। खेती की सिंचाई के लिये नदी आदि पर निर्भर प्रदेशों को नदीमात्रक कहते थे। राज्य की ओर से इस बात का भी प्रयास किया जाता था कि लोग मात्र देवमात्रक कृषक न हों वरन्‌ नदीमात्रक बनें इसके निमित्त राज्य की ओर से कुआँ, तालाब, नहर आदि का निर्माण कराया जाता था। जूनागढ़ स्थित गिरनार पर्वत पर अशोक ने सिंचाई के निमित्त बाँध बनाकर पानी संग्रह करने के लिये सुदर्शन नामक एक विशाल झील बनवाई और उससे नहर निकाला था। इस झील की मरम्मत के पीछे शकनरेश रुद्रदामन और गुप्तवंशी सम्राट स्कंदगुप्त ने कराया था चंद्रगुप्त मौर्य के समय में मेगस्थने नामक जोर यवन राजदूत आया था। उसने भारत की कृषि व्यवस्था पर आश्चर्य प्रकट किया था और अपने वृत में उसने उसका गौरवभरा उल्लेख किया है।

उस समय से अब तक देश के सभी शासक कृषि की उन्नति के प्रति सजग रहे हैं। और उन्होने समय समय पर तालाब बनवाए, कु एँ खुदवाए और नहर निकाली थी। उनकी चर्चा प्रायः तत्कालीन अभिलेखों में प्राप्त होती है। आज भी कर्नाटक, तेलंगाना, महाराष्ट, गुजरात आदि में प्राचीन तालाब और बाँध देखने को आते है।

ब्रिटिश शासनकाल में कृषिसंबंधी सरकारी दायित्व की ओर से 1919 ई. के बाद ही विशेष ध्यान दिया गया। उस समय जो देश का शासन विधान बना उसमें इस कार्य का दायित्व भारतीय मंत्रियों पर डाला गया । 1929 ई0 में सरकार ने केन्द्रीय कृषि अनुसंधान परिशद (इंडियन कांउनसिल ऑव एग्रिकल्चरल रिसर्च) की स्थापना की और सरकार ने कृषि अंनुसंधान संबंधी योजनाओं को सहायता देना आरंभ किया। तदनंतर फसलों के विकास पर भी ध्यान देने के निमित्त ईख, कपास, तिलहन, जूट, नारियल, तंबाकू आदि के लिये अलग अलग समितियों की स्थापना की गई। ये समितियाँ आज भी क्रियाशील है और अपने विषय में संबंधित अनुसंधान और विपणन आदि पर ध्यान देती है।

आधुनिक शासन व्यवस्था के अंतर्गत केन्द्रीय और राज्य सरकारों के अपने अपने मंत्रालय है। केन्द्रीय सरकार कृषि पर होने वाले व्यय में योग देती है और अनाज तथा गन्ने का मूल्यनियंत्रण तथा अंतप्रादेशिक वितरण और संरक्षण की व्यवस्था प्रदेशीय सरकार के सहयोग से करती है। प्रदेशीय स्तर पर अनेक विभाग है जो कृषि सहकारिता, पशुपालन, सिंचाई, खाद्य, ईख तथा नियोजन आदि कृषि संबंधित कार्यों को देखते है। केन्द्रीय स्तर पर यह कार्य खाद्य तथा कृषि सहकारिता और सामुदायिक विकास मंत्रालय देखता है। प्रान्तीय स्तर पर यह कार्य अनेक मंत्रालयों के बीच बँटा हुआ है। वहाँ कृषिमंत्रालय कृषि पशुपालन और सहकारिता, सिंचाई मंत्रालय सिंचाई से संबंधित कार्य, खाद्यमंत्रालय खाद्यपदार्थों का वितरण, वनमंत्रालय वनविकास और नियोजनमंत्रालय कृषि संबंधी नियोजन कार्यों की देखभाल करता है। नियोजनमंत्रालय के अंतर्गत विकासखंड में सहकारिता, कृषि तथा पशुपालन के अलग अलग विभाग है नियोजन विभाग सिंचाई के लिये छोटे छोटे नलकूप और नए कुएँ बनवाता और पुराने कुओं की मरम्मत तथा देखभाल करता है।

कृषि मंत्रालय के अंतर्गत कृषि विभाग, ईख विभाग, पशुपालन विभाग तथा सहकारी विभाग है। कृषि विभाग का कृषि संचालक, पशुपालन विभाग का, पशुपालन संचालक, ईख विभाग का ईख आयुक्त तथा सहकारी विभाग का सहकारी समितियों के निबंधक संचालन करते है। इन सब विभागों के प्रतिनिधि क्षेत्रीय स्तर पर तथा जिला स्तर पर भी है। ईख विभाग के अधिकारी उन्हीं जिलों में है जहाँ ईख की खेती विशेष रूप से होती है।

कृषि विभाग की तरफ से कृषि फार्म और बीजगोदाम है। कृषि फार्म पर उन्नत ढ़ंग से खेती करके दिखलाई जाती है। बीजभंडारों द्वारा समुन्नत कोटि का बीज बाँटा जाता है। पशुपालन विभाग की ओर से जगह जगह पर पशुओं की चिकित्सा के लिये चिकित्सालय है। ईख विभाग की और से ईख समितियाँ बनी है, जो कृषि के यंत्र तथा खाद आदि किसानों की ईख खरीदकर मिलों को देती है। सहकारी विभाग की ओर से समितियाँ और यूनियनें बनी है, जिनके माध्यम से ऋण बाँटा जाता है। कृषि के लिये खाद, बीज और औजार भी सहकारी गोदामों में बाँटे जाते है।

जिले से नीचे प्रत्येक विकास खंड में कृषि, सहकारी और पशुपालन विभागों के प्रतिनिधि रहते है जो ग्रामसेवकों और सहायकों द्वारा इन विभागो के काम गाँव में करते हैं। सिंचाई विभाग का काम मुख्य अभियंता (Chief Engineer); अधीक्षक अभियंता (Superinternding Engineer) और कार्यकारी अभियंता (Executive Engineer) देखते हैं। वन विभाग का काम मुख्य वनरक्षक (Forest Conservation Officer) देखते है। क्षेत्रीय स्तर पर सहायक वनरक्षक और मंडलीय वनवंरक्षक इस विभाग का काम देखते हैं।

फलों और तरकारियों के संरक्षण के लिये एक अलग विभाग है, जिसका नाम फलपरीक्षण विभाग है। यह विभाग पर्वतीय क्षेत्रों में बागवानी का काम देखता है और प्रदेश भर में फल एवं तरकारी के संरक्षण की देख रेख करता है।

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