समुद्र कृषि की नई प्रगतियाँ

Submitted by Hindi on Fri, 09/16/2011 - 13:44
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Source
केंद्रीय समुद्री मात्स्यिकी अनुसंधान संस्थान कोच्ची
सस्य संघटकों के जैव संपोषण के लिए आजकल घन-अवस्था किण्वन का प्रयोग बढ़ रहा है। यह प्रौद्योगिकी कम लागत की है जिसके जरिए पोषण प्रोफाइल व पाच्यता बढ़ाया जा सकता है। एनजाइम की जलविश्लेषण के लिए भी यह सहायक होता है।

घन वस्तुओं पर सुक्ष्म जीवियों की बढ़ती से पानी के स्वतंत्र सान्निध्य के बिना किए जाने वाला किण्वन को आमतौर पर घन-अवस्था किण्वन कहता है। किण्वन के दौरान घन अवस्था को स्थिर, भागिक या नियमित रूप से बदला जा सकता है। आर्द्रता 12 प्रतिशत से कम हो जाने पर जैविक क्रियाकलाप और घनावस्था में किण्वन कम हो जाता है। जबकि आर्द्रता की प्रतिशतता बढ़ाने पर किण्वन प्रकार्य बढ़ जाता है। सी एम एफ आर आई में घनावस्था किण्वन स्थायी स्थितियों में 60-75 प्रतिशत आर्द्रता में बेक्टीरिया बासिल्लस कोयागुलन्स या फंगै अस्पेरिगल्लस नैगर के प्रयोग से किया है। कई सुक्ष्म जीव घन प्रतलों में बढ़ते हुए देखा है, पर तंतुकीय फंगी और चुने गए बेक्टीरियाओं में यह लक्षण दिखायी पड़ता है।

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Submitted by MOHAN SINGH (not verified) on Sat, 02/18/2017 - 12:00

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sw rojgar ke baare me jankari helps

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