Latest

कच्छ की खाड़ी के जंगली गधे

Author: 
नीता शाह
Source: 
अनुवादः अरविन्द गुप्ता, सेंटर फॉर इंनवायरोनमेंट एडयूकेशन

नीता शाह
नीता शाह एक स्वतंत्र जीववैज्ञानिक हैं। भारत के ठंडे और गर्म रेगिस्तानी क्षेत्रों पर उन्होंनें शोधकार्य किया है। बीएससी और एमएससी की उपाधियों के बाद उन्होंने वाइल्डलाइफ इंस्ट्टियूट ऑफ इंडिया, देहरादून में, पीएचडी के लिये दाखिला लिया। उन्होंने कच्छ की खाड़ी में, जंगली गधे के परिवेश पर शोधकार्य किया है। उनके अध्ययनों में पहली बार, जंगली गधे पर, रेडियो-टेलीमेटरी तकनीकों का प्रयोग किया गया। उनके शोधकार्य ने जंगली गधे के परिवेश के प्रबंधन में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। 1994 से नीता के अध्ययन क्षेत्र कच्छ के गर्म रेगिस्तानों से हटकर, हिमालय के पार लद्दाख और सिक्किम का क्षेत्र बने हैं। परंतु जंगली गधे पर उनका शोध अभी भी जारी है। वो जंगली गधे पर शोधकार्य के दौरान तिब्बत और चीन के क्षेत्रों को देखने के लिये तत्पर और उत्साहित हैं।

मेरा बचपन बैंगलोर में बीता। स्कूली दिनों में मैं बहुत उत्साही थी और खेलों में प्रवीण थी। मेरे माता-पिता ने भरतनाट्यम से मेरा परिचय कराया। मैंने बचपन के अगले नौ वर्ष कठिन प्रशिक्षण, शारीरिक मुद्राओं का अभ्यास, भावनाओं के नियंत्रण और भावमुद्राओं को संवारने में गुजारे। इस ट्रेनिंग से मुझे जीवन में बहुत लाभ मिला। मुझे कनार्टक गायकी भी सीखने का सुअवसर मिला। मैं अपने नृत्य और संगीत शिक्षकों का शुक्रगुजार हूं जिन्होंने बहुत धीरज से मुझे शास्त्रीय नृत्य सिखाया। इससे मुझे प्रकृति का महत्व समझने में भी मदद मिली।

मेरे परिवार की हमेशा ऐसी गतिविधियों में रुचि थी जिनसे हम प्रकृति के करीब आयें। बचपन से ही मेरे माता-पिता, भाई और मैं ऐसी योजनायें बनाते जिससे कि हम कर्नाटक के दूर-सुदूर और बीहड़ इलाकों में अपनी छुट्टियां बिता सकें। मेरे भाई को पर्वतारोहण का बहुत शौक था। वो हिमालय के सघन वनों और दूर-सुदूर के इलाकों में अपना समय बिताता और फिर मुझे अपने अनुभवों को बताता।

जब मैं बैंगलोर में सोफिया हाई स्कूल की छात्रा थी तो मुझे छुट्टियों में, देश के विभिन्न भागों में, भ्रमण के लिये ले जाया जाता था। इस प्रकार मैंने स्वतंत्र रूप से स्थितियों से जूझना सीखा। जैसे सामान्य लोगों का सपना होता है वैसे मैं भी बड़े होकर डॉक्टर या दंतचिकित्सक बनना चाहती थी। परंतु लगता है कि प्रकृति की कुछ और ही मर्जी थी। मुझे जीवविज्ञान में स्नातक की डिग्री की पढ़ाई के लिये वडोडरा के एम एस विश्वविद्यालय में दाखिला मिल गया।

इन सारे वर्षों में मैं डब्लूडब्लूएफ-इंडिया, आईएनएसओएनए (उस समय इंडियन सोसायटी फॉर नैचुरिलिस्टस) और बांबे नैचुरल हिस्ट्री सोसायटी की सक्रिय सदस्या थी। प्राकृतिक चिकित्सा प्रणाली में मुझे विश्वास था, मैं पर्यावरण संबंधी प्रकृति शिक्षण शिविरों की गतिविधियों में भाग लेती। अंत में विश्वविद्यालय के वनस्पतिशास्त्र विभाग में मेरी भेंट प्रतिष्ठित गुरु/शिक्षक प्रोफेसर जी एम ओजा से हुई। मैंने उन्हें वन्यजीवन और प्रकृति संरक्षण में अपनी रुचि के बारे में बताया और मैंने प्रयोगशाला की बजाए फील्ड अध्ययन करने में रुचि दिखायी। उन्होंने ही संरक्षण के क्षेत्र में मेरा मार्गदर्शन किया जो अंत में मेरा पेशा बना।

मैं, 80 के दशक के शुरुआत से ही विश्वविद्यालय के दिनों से ही प्रकृति संबंधी गतिविधियों से जुड़ी थी। हफ्ते के अंत में हम लोग पक्षी-निरीक्षण और पक्षियों की गिनती करने के लिये भ्रमण पर जाते थे। एमएससी स्तर पर यह, पक्षीविज्ञान विषय की पढ़ाई का ही एक भाग था। विश्वविद्यालय के कुछ अन्य मित्रों के साथ मैं सुबह होने से पहले ही निकल जाती। हम पक्षियों के अवलोकन के साथ-साथ वडोडरा के आसपास के दलदली इलाकों के पक्षियों को भी गिनते। वहां पर एक खेत था जिसमें शहर का गंदा पानी गिरता था। वहां बहुत सारी चिडि़ये आकर्षित होती थीं।

मेरी सबसे गहरी रुचि इथौलिजी (यानि जानवरों के व्यवहार विज्ञान) में थी। मैं ऐसे विषयों को खोजने लगी जिनके बारे में फील्ड अध्ययन करना संभव हो। 1983 तक मैं आसपास के सभी जंगली क्षेत्र और अभयारण्य घूम चुकी थी - खुद अकेले या फिर शिविरों के जरिये। यहां मैंने बहुत से स्थानीय लोगों से मिलकर चर्चायें की और उनसे जंगलों के बारे में बहुत कुछ सीखा। मैं उन दिनों वन्यजीवन पर कोई भी फिल्म या टीवी कार्यक्रम देखने का मौका नहीं गंवाती थी। उस दौरान मैंने जीवव्यवहार वैज्ञानिकों, प्राणि वैज्ञानिकों और संरक्षण पर काम कर रहे लोगों से संबंधित कई पुस्तकें भी पढ़ीं। अफ्रीका में प्राणि वैज्ञानिकों ने जिस प्रकार का काम किया, उसने मुझे बहुत आकर्षित किया।

इतवार वाले दिन मैं अपनी साइकिल पर वडोडरा के पास स्थित माही नदी के ऊबड़-खाबड़ वाले इलाकों में जाती और वहां पूरा दिन जंगली जानवरों और पक्षियों का अवलोकन करती। अब वो क्षेत्र, सिंधौड़ नेचर रिजर्व के नाम से जाना जाता है। वडोडरा में मेरे घर के पास कृषि के खेत और अमरूद के बगीचे थे। यहां मैं पूरे-पूरे दिन पक्षियों, सियारों, जंगली बिल्लियों और सरीसृपों का निरीक्षण और अध्ययन करती। धीरे-धीरे इस क्षेत्र का विकास होने लगा और खुले मैदान सिमटने लगे। आज वहीं पर एक बड़ा रिहायशी इलाका है - मोर और सियारों की आवाजें अब वहां नहीं सुनाई देती हैं।

मैंने फील्ड आधारित संरक्षण का काम करने का पक्का निश्चय कर लिया था। इसलिये इस क्षेत्र में संभावनायें जानने के लिये मैंने बीएनएचएस से संपर्क किया और वाइल्डलाइफ इंस्ट्टियूट ऑफ इंडिया (डब्लूआईआई) को भी लिखा। एक दिन भाग्य ने मेरा दरवाजा खटखटाया। मुझे डब्लूआईआई, देहरादून में एक लिखित परीक्षा के लिये बुलाया गया। यह जीवविज्ञान में मेरे एमएससी खत्म होने के तुरंत बाद हुआ। मैंने देहरादून पहुंच कर परीक्षा दी, उसमें उत्तीर्ण हुई और फिर साक्षात्कार के लिये गई। कुल आठ लोगों को चुना गया और उसमें से मैं ही अकेली महिला जीव वैज्ञानिक थी। इस प्रकार संरक्षण के क्षेत्र में मेरा काम शुरू हुआ। उन्मुखीकरण की अवधि समाप्त होने के बाद मुझे रेगिस्तान में काम करने के लिये भेजा गया। शुरू की योजना में मुझे संरक्षण विस्तार के काम में भेजा जा रहा था। इस पर मैंने तत्काल प्रतिक्रिया की और अधिकारियों से निवेदन किया कि जीवविज्ञानी होने के नाते मेरी रुचि दो पायों वाले जीवों से अधिक चैपायों में होगी।

1988-89 में, मैं पहली बार कच्छ की खाड़ी को देखने गई। उस अनुभव की याद, मैं अभी तक भुला नहीं पायी हूं। जाड़ा खत्म होने के बाद धीरे-धीरे गर्मी बढ़ रही थी। सामने एक सपाट, बीहड़, सूखा मैदान था जो लगभग शून्य में खोया था। उसी समय भूरी, नमकीन मिट्टी क्षितिज से मिली और उसे देखकर दिल में एक रहस्यमयी भावना पैदा हुई। मुझे ऐसा लगा जैसे यही वो क्षेत्र है जहां मैं अपना सबसे उत्तम योगदान दे पाऊंगी। मुझे पहले दिन से ही इस इलाके में बहुत अपनापन जैसा लगा। मेरा ड्राईवर यादगिरी, हैद्राबाद का रहने वाला था। उसने पहले कभी रेगिस्तान नहीं देखा था। उसके चेहरे पर उलझन दिखाई दी क्योंकि उसे ऐसा लग रहा था जैसे वो चारों तरफ से पानी से घिरा हो।

मैंने उसे उस जगह पर चलने को कहा जहां उसे पानी दिखाई दिया हो। जब उसे वहां पहुंच कर पानी के कोई दर्शन नहीं हुये तब उसे अपने दृष्टिभ्रम का अंदाजा हुआ। ऐसा तब लगता है जब कोई मृगमारीचिका (मिराज) देखता है। वो उस इलाके से जल्दी ही वापिस जाना चाहता था। वो समझ नहीं पा रहा था कि मैं अगले साढ़े तीन साल तक उस इलाके में कैसे काम करूंगी।

फील्ड में मेरे ड्राईवर धर्मसिंह थे। वो गाड़ी के साथ सूर्यास्त तक रहते और फिर मुझे जानवरों के उस झुंड के पास से लेने के लिये आते, जिनका मैं अवलोकन कर रही होती। एक बार, कोपरानी के पास, धर्मसिंह जीप को सीधे, खुर प्राणियों के झुंड के बीच में ले गये और इससे उन जानवरों की सामान्य दिनचर्या गड़बड़ा गई। मैंने उनसे जानना चाहा कि उन्होंनें ऐसा क्यों किया। उन्होंने बताया कि जब वो दोपहर के बाद सो रहे थे तब अचानक कहीं से सात औरतें आयीं और उन्होंने उनसे पूछा, “आप यहां जीप में लेटे क्या कर रहे हैं, जबकि आपकी मैडम (यानि मैं) वहां धूप में खड़ी हैं?” उसके बाद उन्होंने जीप स्टार्ट की और मुझ तक जल्दी पहुंचने के लिये उन्होंने जीप को तेजी से दौड़ाया। फिर वो जानवरों के उस झुंड से आकर टकरा गये जिसका मैं अवलोकन कर रही थी। इस हादसे के कारण उस दिन, सुबह से शाम तक का मेरा पूरा काम बेकार चला गया।

मुझे वो दिन भी याद हैं जब मैं रेडियो-कालर बंधे अपने जंगली गधे को खोजने में असमर्थ होती। तब मैं बहुत निराश और दुखी होती। परंतु फिर मैं खाड़ी के बियाबान इलाके में गाड़ी चलाकर अपनी सारी निराशा को त्याग देती। खाड़ी में कुछ घंटे बिताने के बाद मुझे बेहद चैन और तसल्ली मिलती। इसलिये खाड़ी का वो क्षेत्र, दुख और सुख दोनों में, मेरा साथी बना।

एक दिन जाड़ों में मध्यरात्रि के समय जब मैं रेडियो-कालर बंधे गधे की गतिविधियों का अवलोकन कर रही थी तब अचानक वीराने में, मुझे एक रोशनी दिखायी दी। वहां पहुंचने पर मुझे एक वाघरी परिवार मिला जो इतनी रात गये खाना पका रहा था। पूछने पर उन्होंने बताया कि वो कंटीली पूछों वाली छिपकलियां पकड़ रहे थे। जाड़ों में ये छिपकलियां शीतनिद्रा में सोयी होती हैं इसलिये यही उनको पकड़ने का सबसे उपयुक्त समय होता है। वो वाघरी समूह अभी तक बारह छिपकलियां पकड़ चुका था जिनकी पीठ तोड़ने के बाद उन्हें एक थैले में डाल दिया गया था। इसे देख मुझे बहुत गुस्सा आया। मुझे एक अधखुदा गड्ढा दिखायी दिया और उसमें से मैंने एक छिपकली को मुक्त किया। यह पालतू छिपकली मेरे साथ छह सालों तक रही। उस छिपकली ने बहुत सैर-सपाटा किया - उसने मेरे साथ बैंगलोर से हिमालय की गढ़वाल पहाडि़यों तक की सैर की।

मेरी महिंद्रा जीप का नाम पड़ा ‘प्रोसोपिस डांसर’ (प्रोसोपिस को हिंदी में पगला बबूल कहते हैं)। उस जीप में मैंने खाड़ी में एक लाख किलोमीटर से भी अधिक की यात्रा की। हम कभी-कभी ही पक्की सड़क पर जाते। इस प्रकार जीप चलाने से समय बचता और ऊबड़-खाबड़ सड़कों पर भी नहीं चलना पड़ता। अब शायद यह रोमांचक लगे परंतु उस समय मुझे टीम के साथ अपने तौर-तरीकों को ढालना पड़ा था। धीरे-धीरे टीम के सदस्य भी मेरी कार्यप्रणाली को समझ गये थे और उन्होंने भी मुझे सहयोग दिया था।

बारिश के मौसम में भी मुझे शोध् के लिये घूमना-फिरना जरूरी था। मैं हर माह जंगली गधे की गिनती करती थी। वर्षा में मैं इसके लिये जीप इस्तेमाल नहीं कर सकती थी। इन परिस्थितियों में मैं केवल ‘रेगिस्तान का जहाज’ यानि ऊंट द्वारा ही गीली खाड़ी में इधर-उधर घूम सकती थी।

एक बार मैंने पूरी रात भर चार ऊंटों के काफिले के साथ खाड़ी की यात्रा की। उस साल बहुत कम बारिश हुई थी और इससे खाड़ी की जमीन पर यात्रा करना सामान्य से भी अधिक कठिन हो गया था। मुझे एक द्वीप पर जाकर वहां पर जंगली गधे की संख्या को गिनना था। मेरा वहां रात को ठहरने का कोई इरादा नहीं था क्योंकि वहां कभी भी बारिश हो सकती थी। गर्म हवा में बहुत नमी थी। ऊंट की लंबी और कठिन यात्रा के बाद हम लोग द्वीप पर पहुंचने से पहले कुछ देर सुस्ताने के लिये रुके।

मुझे यह देखकर काफी हैरानी हुई कि मेरे सहायकों ने मेरे हिस्से के पानी को एक जेरीकैन में खाली कर दिया था। उनके विचार में, महिला होने के नाते, पानी के अभाव में मैं वापिस लौट चलूंगी! मैंने उन्हें फटकार सुनायी और उनसे एक ऊंट पर वापिस जाकर पानी लाने को कहा। मुझे द्वीप पर पानी होने का पता तो था परंतु निरीक्षण करने पर वो पानी पीने लायक नहीं निकला। द्वीप पर मुझे जंगली गधे का एक बड़ा झुंड दिखायी दिया। तालाब में बहुत कम पानी ही बचा था क्योंकि गडेरिये वहां पहले से आ चुके थे और उनके मवेशियों ने पानी को गंदा, बदबूदार और मल से भर दिया था। अंत में मैंने उस पानी को उबाला (जिससे वो हरा हो गया) और फिर मैंने उसे अपनी हनारी (कैनवस का थैला जिसे रेगिस्तान में पानी ठंडा करने के लिये उपयोग में लाया जाता है) में भरा। हम लोगों ने बिना कुछ खाये ही काम चलाया।

मैंने देर शाम तक गधे की गिनती की और उसके बाद द्वीप को छोड़ा। मैं खुश थी क्योंकि इस सारी मेहनत से काफी कुछ हासिल हुआ था। दो ऊंटों और सहायकों को मैंने पहले ही दूसरे द्वीप पर पूर्व तैयारी के लिये भेज दिया था। अचानक मुझे नीचे की जमीन धंसती हुई महसूस हुई। सुबह के मुकाबले जमीन अब अधिक धंस रही थी। ऊंटेश्वर (ऊंट के चालक) को उस जगह का कुछ अतापता नहीं मालूम था। हम लोग कहां थे यह भी उसे नहीं पता था। यह सुनकर मैं एकदम सहम गई। हमारे पास केवल एक गिलास पानी बचा था। खाड़ी में रात के समय अत्यधिक ठंड पड़ती है। हमारी प्रार्थना सफल हुई और जल्द ही हमें सूखी जमीन का एक टुकड़ा मिला। वहां पर हम ऊंट से उतरे और उस दिन के लिये हमने काम बंद किया।

इस बीच मेरे सहायक दूसरे गांव में पहुंच गये थे। वहां हमारे न पहुंचने पर वो फिक्र करने लगे थे। गांव के मुखिया - खान चाचा जिनके साथ मैं पिछले साढ़े तीन साल से रह रही थी इससे बहुत परेशान हुये। धीरे-धीरे करके रात बीती। मुझे पूरी रात ऊंट के पास बैठकर जागना पड़ा क्योंकि ऊंट के नीचे दबने का डर था (ऊंट अपनी करवट बदलता है और भगवान जाने मैं कब उसके नीचे आ जाऊं।)

मैं भोर से पहले ही उठ गई। मैं ऊंट पर चढ़कर बैठी और सूरज के उगने की प्रतीक्षा करने लगी जिससे कि मैं अपने गांव की ओर कूच कर सकूं। मैंने पानी वाले स्थल की ओर अपनी यात्रा शुरू की। तभी मुझे क्षितिज पर 10-15 लोग दिखायी दिये जो द्वीप की ओर बढ़ रहे थे। ये सभी गांववासी थे, उनके हाथों में पानी के कनस्तर थे और वो हमें खोजने के लिये आ रहे थे। मुझे तलाशने के लिये उन्होंने, रात को साढ़े तीन बजे गांव छोड़ा था।

खाड़ी में नहाना बहुत कम ही होता था। धूल भरी आंधियों से ही इंसान पूरी तरह नहा जाता है। हम लोग खुद अपना खाना पकाते थे और रेत के कणों के साथ उसे चुपचाप खाते थे।

खाड़ी में सितारों से भरी रात के नीचे सोना भी एक अनूठा अनुभव है। पूर्ण चंद्रमा वाली रातें सबसे मनमोहक होती हैं। उस दिन आसमान में इतना प्रकाश होता है कि जीप की हेडलाइट जलाने की जरूरत ही नहीं पड़ती है। रहने की तमाम मुश्किलें झेलने के बाद भी मुझे खाड़ी में बहुत आनंद आया। मुझे खाड़ी हमेशा ही बहुत सुरक्षित स्थान लगा। एक बार वहां पहुंचने के बाद आप समस्त दुनिया से पूरी तरह कट जाते हैं।

खाड़ी के लोगों ने इस दौरान मेरा बहुत ख्याल रखा और मेरी बहुत खातिरदारी की। मैं इसके लिये खाड़ी और उसके निवासियों की सदैव आभारी रहूंगी। अपने पति, माता-पिता और दोनों परिवारों के सहयोग के बिना भारत के इन बीहड़, बंजर, परंतु जीवन से परिपूर्ण, ठंडे और गर्म इलाकों में मेरे लिये काम करना संभव न हो पाता।

इस क्षेत्र में मैं अब एक अच्छी प्रशासक, श्रोता और योजनाकार बन गई हूं। ध्यान से अवलोकन करने की क्षमता के साथ-साथ इसमें इंसान को पूरी तरह समर्पित होना पड़ता है। इस पेशे में बहुत सहनशक्ति भी चाहिये परंतु इसमें आपको अपने देश की संपदा के संरक्षण की अपार खुशी भी मिलती है।

तब मैं खाड़ी को ‘आंधियों और मृगमरीचकाओं का देश’ बुलाती थी। मुझे आज भी उसकी बहुत याद सताती है। इस क्षेत्र ने मुझे कुछ अनूठे अनुभव, शक्ति और आत्मविश्वास दिया। मैंने यहां अकेलेपन, थकान, मायूसी की मार झेली है। मुझे अपनी टीम के सदस्यों (जिनमें सभी स्थानीय लोग थे) को उनके क्षेत्र में, अपने शोध का उद्देश्य समझाना पड़ा है। आज मेरा नाम उन ठोस, शक्तिशाली और अतिसुंदर चैपायों - ‘गोरखर’ यानि जंगली गधे के साथ जुड़ गया है।

मेरी जिंदगी कठिनाईयों और रोमांच से भरी हुई है पर अंत में मुझे वन्यजीवन के संरक्षण का पेशा चुनने का कोई गम नहीं है। मुझे मृगमरीचकाओं के इस बंजर इलाके से दिली लगाव हो गया है और मैं हर साल वहां अपने जंगली गधे से मुलाकात करने जाती हूं।

Computer Science

I really feel a type of strange after reading your research.

Post new comment

The content of this field is kept private and will not be shown publicly.
  • Web page addresses and e-mail addresses turn into links automatically.
  • Allowed HTML tags: <a> <em> <strong> <cite> <code> <ul> <ol> <li> <dl> <dt> <dd>
  • Lines and paragraphs break automatically.

More information about formatting options

CAPTCHA
यह सवाल इस परीक्षण के लिए है कि क्या आप एक इंसान हैं या मशीनी स्वचालित स्पैम प्रस्तुतियाँ डालने वाली चीज
इस सरल गणितीय समस्या का समाधान करें. जैसे- उदाहरण 1+ 3= 4 और अपना पोस्ट करें
1 + 0 =
Solve this simple math problem and enter the result. E.g. for 1+3, enter 4.