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मनरेगा के सामाजिक प्रभाव

Author: 
अरुण तिवारी

जो गाँव आवश्यकता से अधिक होने पर दूध-साग-भाजी आदि को गाँव में बांटकर भी पुण्य कमाने का घमंड नहीं पालता था, वही गाँव अब अपने बच्चे को भूखा रखकर भी दूध बेचकर पैसा कमाना चाहता है। मंडल विद्वेष के कारण यह गाँव के मानस में आया दूरगामी बदलाव है। मनरेगा के बदलाव भिन्न हैं। कई मायने में रचनात्मक व आगे बढ़ने को प्रेरित करने वाले ये बदलाव गाँव के लिए नये विकास व नई चुनौतियों का पर्याय बनेंगे।

राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम के रचनाकारों ने भी शायद न सोचा होगा कि यह अधिनियम कभी सामाजिक वर्ग क्रांति का सूत्रधार बनेगा। सच यह है कि इस कानून के सामाजिक-आर्थिक प्रभाव दिखने शुरु हो गये हैं। मनरेगा में बढ़े भ्रष्टाचार ने जहां गाँव के सबसे गरीब को भी बेईमानी सिखाई; वहीं शहरों में बढ़ी मजदूरी और मनरेगा में मिली रोजगार की गारंटी ने खेतों में मजदूर मिलने की गारंटी छीन ली है। हालांकि, ग्रामीण विकास मंत्रालय, भारत सरकार के एक आला अफसर वी.के. सिन्हा ने 23 सितंबर को इलाहाबाद में दिए अपने एक भाषण में इसे महज एक भ्रामक तथ्य बताया; किंतु बदलता परिदृश्य यही है।... खासकर उन इलाकों का, जहां खेती के लिए अभी पानी का कोई संकट नहीं है।

इसका यह मतलब कतई नहीं कि भारत के खेत अब बिना बोये-काटे रह जायेंगे। इसका मतलब यह है कि जो श्रमिक वर्ग अब तक मजदूर बनकर खेतों में काम करता था, वह अब हिस्सेदार व किरायेदार बनकर खेती करना चाहता है। वह अब खेत मालिक की शर्तों पर काम करने की बजाय, अपनी शर्तों पर और अपनी मनमाफिक खेती करना चाहता है। इसमें वह सफल भी हो रहा है। क्योंकि उसके परिवार का हर सदस्य खेत में काम करता है। उसे किसी को मेहनताना नहीं देना होता। पट्टे की थोड़ी-बहुत जमीन भी उसके पास है। उसके पास जुताई के लिए बैल हैं। गोबर की खाद है। वह साग-भाजी जैसी नकदी फसल बोकर गाँव के हाट में बेचने में शर्म नहीं करता। कुल मिलाकर उसके सफल होने का कारण दो हैं: पहला यह कि उसके लिए खेती घाटे का सौदा नहीं है। वह खेती में गंवाता नहीं, बल्कि कमाता है। दूसरा यह कि अब उसके पास खेती के सिवा आय के और भी साधन हैं। जबकि वर्तमान भूमिधर...खासकर ब्राहम्ण-क्षत्रिय जातियों के उपरोक्त कई क्षमतायें नहीं रखती। इसीलिए अब उनकी जिंदगी में कई बदलाव अवश्यंभावी होंगे।

फिलहाल यह कह सकते हैं कि यदि ग्रामीण मेहनतकशों की आर्थिक सबलता का यह दौर जारी रहा, तो अगले एक दशक में मनरेगा.. मजदूर को मालिक बनाने वाला अधिनियम साबित होगा। भारत के गाँवों के सामाजिक विन्यास में इसके दूरगामी परिणाम होंगे। अब खेती उसी की होगी, जो अपने हाथ से मेहनत करेगा। विकल्प के तौर पर खेती के आधुनिक औजार गाँव में प्रवेश करेगें। छोटी काश्तकारी को पछाड़कर विदेशी तर्ज पर बड़ी फार्मिंग को आगे लाने की व्यावसायिक कोशिशें तेज होंगी। किसान जातियों का पलायन बढ़ेगा। श्रमिक वर्ग के पलायन में कमी आयेगी। आजादी के बाद भारत के गाँवों में सामाजिक बदलाव का यह दूसरा बड़ा दौर है। पहला दौर मंडल आयोग की रिपोर्ट के लागू होने का परिणाम था। मंडल रिपोर्ट को लेकर देश में हुए बवाल ने समाज के मन पर गहरा प्रभाव डाला था। तत्कालीन विवाद ने कालांतर में भूमिधर जातियों और आरक्षण की जद में आई कारीगर जातियों के बीच दूरी बढ़ाई। इससे जजमानी के जरिए एक-दूसरे पर निर्भरता का सदियों पुराना ताना-बाना शिथिल हुआ।

उल्लेखनीय है कि भारतीय जाति व्यवस्था में नाई, लुहार, सुनार, बढ़ई, दर्जी, धोबी, कुम्हार, कंहार और चमार कभी भी भूमिधर जातियां नहीं थीं। खेती या मजदूरी करना कभी इनका पेशा नहीं रहा। ये कारीगर जातियों के तौर पर समाज का हिस्सा रही हैं। खेती करने वाली जातियां ही इनकी काश्तकारी रही हैं। जिसे जजमानी कहते हैं। कारीगर जातियों को उनकी कारीगरी के बदले भूमिधर खेती का हर उत्पाद देते थे। अनाज, फल, सब्जियां, भूसा, मट्ठा से लेकर पैसा व कपड़ा तक, यह पाना उनका हक था। एक-दूसरे पर आश्रित होने के कारण यह ताना-बाना समाज को एक प्रेम बंधन में भी गुंथे हुए था। नाई...महज नाई न होकर काका-दादा होता था। समाज का हर काम साझे की पहिए पर चलता था। जातिगत कारीगरी व्यवस्था भले ही किसी को विकास की नई अवधारणा के खिलाफ लगती हो। किंतु सदियों से भारत के गाँवों की स्वावलंबी व्यवस्था यही थी। इस व्यवस्था में बाजार और नकद के बगैर भी रोजमर्रा के काम रुकते नहीं थे। गाँव अपनी ही दुनिया में मस्त था।

आरक्षण के विद्वेष में आकर कहीं कारीगरों ने जजमानों के यहां काम करने से इंकार किया, तो कहीं जजमानों ने परंपरागत साझे को चोट पहुंचाने का काम किया। नतीजा? कारीगरों ने बाजार व शहर का रुख किया। गाँवों में कारीगरी परंपरागत जातियों की हद से बाहर आने पर मजबूर हुई। बाजारु उत्पादों के लिए गाँवों का रास्ता आसान हुआ। स्थानीय लुहार के दरवाजे जाने की बजाय किसानों ने टाटा का फावडा थाम लिया। इससे देसी कारीगरी को गहरा धक्का लगा। वह टाटा के कमजोर.. किंतु सस्ते फावड़े से हार गई।

बाजार के प्रवेश का सबसे बड़ा नुकसान यह हुआ कि गाँव में ऐसे उत्पाद भी पहुंचे, पहले जिनके बिना गाँव का जीवन चलता था। इनके आकर्षण ने गाँवों में नकद कमाना जरूरी बनाया। परिणामस्वरूप गाँवों से पलायन बढ़ा। दृष्टि व्यावसायिक हुई। जो गाँव आवश्यकता से अधिक होने पर दूध-साग-भाजी आदि को गाँव में बांटकर भी पुण्य कमाने का घमंड नहीं पालता था, वही गाँव अब अपने बच्चे को भूखा रखकर भी दूध बेचकर पैसा कमाना चाहता है। मंडल विद्वेष के कारण यह गाँव के मानस में आया दूरगामी बदलाव है। मनरेगा के बदलाव भिन्न हैं। कई मायने में रचनात्मक व आगे बढ़ने को प्रेरित करने वाले ये बदलाव गाँव के लिए नये विकास व नई चुनौतियों का पर्याय बनेंगे।

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