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किसानों के पलायन का यह पक्ष

पहले गांव से किसी घर में धुआं उठता नहीं दिखता था तो पड़ोसी जाकर पूछते थे कि घर में आज खाना क्यों नहीं बना है? उस पड़ोसी के खाने का इंतजाम कैसे होगा, इसकी चिन्ता पूरा गांव करता था।” आज यह बात गांव तक पहुंच गई है कि पड़ोसी कितनी जल्दी अपना घर छोड़कर जाए तो हम अपने घर की दीवार थोड़ी और बढ़ा लें। इसी लूट की मानसिकता का परिणाम है कि कबरई और ओरछा की प्राकृतिक संपदा का नाश किया जा रहा है। इनकी संपदा ही इनकी दुश्मन बनती जा रही है।

श्रम और धन के बीच के रिश्ते इतने गहरे हैं, पलायन के संदर्भ में इस बात को भोपाल की संस्था 'विकास संवाद' के परिसंवाद में शामिल होने से पहले समझना थोड़ा मुश्किल था। साधारण शब्दों में जब समाज के अंदर श्रम का महत्व कम हुआ और पूंजी का महत्व बढ़ा, उसी दौरान समाज के ही अंदर एक और परिवर्तन तेजी से हो रहा था। माने शहर और गांव का अंतर तेजी से बढ़ रहा था। शहर के पास पूंजी की ताकत थी और गांव के पास श्रम की शक्ति। देश के जो योजनाकार देश की तरक्की की पटकथा लिख रहे थे, उन्होंने ही श्रम बेचने वालों की भूमिका भिखारी की लिखी और इस कहानी में धन को नियामक बनाया गया खरीदने का और देश के महानगर पूंजी माने सत्ता के केन्द्र बने। लेन-देन की प्रथाएं धीरे-धीरे समाज से गायब हुईं।

श्रम से जुड़ा हुआ काम सम्मानजनक नहीं है, ना जाने कैसे यह बात प्रचारित हुई और कॉलर को सफेद रखकर किए जाने वाले कामों के प्रति लोगों का रूझान बढ़ा। गांव से होने वाले पलायन के पीछे की एक वजह यह रही होगी कि गांव में रहने वाले लोगों ने विचार किया होगा कि उनके श्रम को सम्मान नहीं मिल रहा। कुल मिलाकर सारी बात श्रम को बेचकर पैसा कमाने तक सीमित है तो जो अधिक पैसे दे रहा है, उसे ही श्रम बेचा जाए। यदि कोई शोध छात्र गंभीरता से पलायन पर पूंजी के महत्व को केन्द्र में रखकर अध्ययन करे तो यह स्पष्ट हो जाएगा कि जैसे-जैसे देश में पूंजी का महत्व बढ़ा है। गांव से शहर की तरफ पलायन भी बढ़ा है। सिक्किम के मंगन क्षेत्र जो हाल में ही भूकंप से प्रभावित हुआ और अंडमान -निकोबार द्वीप में पलायन दूसरे हिस्सों की तरह नजर नहीं आता। बस्तर के लोगों का विश्वास भी पलायन में नहीं रहा। उनके लिए अपना गांव छोड़ने की वजह नक्सल संघर्ष है। इन इलाकों में पलायन नहीं होने की वजह साफ है कि यहां अभी भी मानवीय रिश्तों पर पैसों का वजन भारी नहीं हुआ है।

आज बुंदेलखंड के किसान पिपरमिन्ट, पान और परवल जैसी संवेदनशील खेती कर रहे हैं। चूंकि वे किसान हैं, इसलिए सफेद कॉलर वालों के बीच में कम समझदार माने जाते हैं। खेती जो पहले प्रतिष्ठा से जुड़ा हुआ काम था, उसे आज की तारीख में हमने मजबूरी का दूसरा नाम बना दिया। राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण की रिपोर्ट ही कहती है कि देश के लगभग आधे किसान खेती छोड़ देना चाहते हैं। देश के लिए योजना बनाने वाली इकाई को इस बात की फिक्र है? यदि होती तो वह गांव से करोड़ों लोगों के पलायन को गंभीरता से नहीं लेता ? इस बात की क्या वजह हो सकती है कि देश के पास गांव से शहर की तरफ पलायन को लेकर स्पष्ट आंकड़े नहीं हैं। 2011 की जनगणना में पलायन के गंभीरता की थोड़ी सी झलक मिलती है। परिणाम चौंकाने वाले हैं। 90 सालों के बाद पिछले एक दशक में गांव के मुकाबले इस बार शहरी जनसंख्या में अधिक लोग जुड़े हैं। वरिष्ठ पत्रकार पी। साईनाथ लिखते हैं- “हमारे गांव की आबादी इस समय 83.31 करोड़ है। यह पिछले दशक की ग्रामीण जनसंख्या की तुलना में 9.06 करोड़ ज्यादा है लेकिन दिलचस्प यह है कि शहरी आबादी में 9.10 करोड़ का इजाफा हुआ है।”

अखिल भारतीय सजीव खेती से जुड़े भारतेन्दु प्रकाश बुंदेलखंड में 1783 का जिक्र करते हुए कहते हैं- “वह बड़ा अकाल था। लाखों लोग उससे प्रभावित हुए लेकिन 1790 आते-आते सात सालों में समाज ने खुद को फिर से संभाल लिया। इसका पता उस समय इंग्लैंड से आए शोधार्थियों की एक दल की रिपोर्ट से चलता है, जिन्होंने तब के सीपी एंड बरार के दमोह के एक गांव के लिए लिखा है कि वहां बड़ा अमन चैन था। पहले गांव से किसी घर में धुआं उठता नहीं दिखता था तो पड़ोसी जाकर पूछते थे कि घर में आज खाना क्यों नहीं बना है? उस पड़ोसी के खाने का इंतजाम कैसे होगा, इसकी चिन्ता पूरा गांव करता था।” आज यह बात गांव तक पहुंच गई है कि पड़ोसी कितनी जल्दी अपना घर छोड़कर जाए तो हम अपने घर की दीवार थोड़ी और बढ़ा लें। इसी लूट की मानसिकता का परिणाम है कि कबरई और ओरछा की प्राकृतिक संपदा का नाश किया जा रहा है। इनकी संपदा ही इनकी दुश्मन बनती जा रही है।

बुन्देलखंड में आत्महत्या को मजबूर किसानबुन्देलखंड में आत्महत्या को मजबूर किसानभारतेन्दु प्रकाश बुंदेलखंड के अंदर 1783 में आए अकाल और आज के अकाल की तुलना करते हुए कहते हैं, -“इस बार जब बुंदेलखंड अकाल से जुझ रहा था, बड़ी संख्या में लोगों ने अपने घरों से पलायन किया। आत्महत्या उन किसानों ने की, जिनके लिए अपना घर छोड़ना मुश्किल था। जो पलायन नहीं करना चाहते थे। घर छोड़ने से आसान उनके लिए प्राण छोड़ना था, इसलिए प्राण छोड़ दिए, घर नहीं छोड़ा।” भारतेन्दु का यह कथन और दिल्ली से प्रकाशित एक दैनिक समाचार पत्र की एक खोजपरक खबर - ‘दिल्ली के विकास के लिए बुंदेलखंड को पलायन जारी रखना होगा’ मानों एक पल के लिए आमने-सामने खड़े हो गए हों और एक दूसरे से जवाब मांग रहे हों। दिल्ली के खाड़ी बावड़ी से छपने वाले लुगदी साहित्य के ‘क्या आप जानते हैं’ अंदाज में बात को आगे बढ़ाया जाए तो कैसा रहेगा? क्या आप जानते हैं?

• योजना आयोग के एक सदस्य के हवाले से, देश के योजना आयोग के उपाध्यक्ष मोंटेक सिंह ने स्वयं स्वीकार किया कि पलायन की गंभीर समस्या के साइड इफेक्ट से वे ठीक-ठीक वाकिफ नहीं थे।
• आज जेट युग का हम दम भर रहे हैं और देश की बड़ी आबादी आज भी कार और बाइक पर नहीं बल्कि बैलगाड़ी, भैंसागाड़ी और घोड़ागाड़ी पर यात्रा कर रही है।
• मध्य प्रदेश के पुनर्वास विभाग के सचिव के पास राज्य से विस्थापितों के आंकड़े मौजूद नहीं हैं। ऊपर से साहब फर्माते हैं कि “आंकड़ा इकट्ठा करना हमारा काम नहीं है।” वे यह भी बताने को तैयार नहीं हैं कि यह किसका काम है।
• एनएसी की सदस्य अरुणा राय अपने लंबे संघर्ष के बावजूद मनरेगा मजदूरों के लिए एक संगठन पंजीकृत नहीं करवा पाईं।
• वाल्टर फर्नाडिस के जिन साढ़े तीन करोड़ पलायन वाले आंकड़ों को जगह-जगह इस्तेमाल किया जाता है, उसे लेकर वाल्टर खुद मानते हैं कि आंकड़े आधिकारिक नहीं हैं।
• क्या आप जानते हैं कि दिल्ली में जिन डेढ़ लाख बेघर लोगों को सड़क पर रात बितानी पड़ती है, उनमें पैंतीस फीसदी आबादी मुस्लिम है। शेष में नब्बे फीसदी दलित और पिछड़ी जाति के लोग हैं।
• दिल्ली में सभी लोगों को अपना घर उपलब्ध कराने के लिए लगभग तेरह लाख नए घरों की जरूरत है।
• बारहवीं पंचवर्षीय योजना की बड़ी चिन्ता निर्माण क्षेत्र में मजदूरों की कमी है। चूंकि जिस समाज से श्रम आता रहा है, उनका रूझान धीरे-धीरे शिक्षा की तरफ बढ़ रहा है।

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