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बाघ के लिए त्रासदी बना इंसान

वेब/संगठन: 
visfot.com
Author: 
डी पी मिश्र , 11 नवंबर 2011
बाघबाघ केंद्र सरकार बाघों के संरक्षण के लिए दो दशक पूर्व से ‘प्रोजेक्ट टाइगर‘ चला रही है। किंतु प्रोजेक्ट टाइगर यूं सफल नहीक हा जा सकता है क्योंकि राजस्थान का सारिस्का नेशनल पार्क बाघों से खाली हो गया है। पन्ना टाइगर रिजर्व एवं मध्य प्रदेश के रणथम्भौर नेशनल पार्क के बाघों की दशा दयनीय हो चली है। उत्तर प्रदेश के दुधवा नेशनल पार्क में बाघों की संख्या आंकड़ेबाजी की भेट चढ़ी हुई है। इसके बाद भी देश के वन एवं पर्यावरण राज्यमंत्री जयराम रमेश ने विगत माह घोषणा की थी कि देश में 1411 से बढ़कर बाघों की संख्या 1700 से ऊपर हो गई है।

इसमें पिछली गणना में सुंदर वन को शामिल नहीं किया गया था जबकि इसबार सुंदर बन के बाघ शामिल हैं। फिर बाघों की संख्या कैसे बढ़ गई यह स्वयं में विचारणीय प्रश्न है। आंकड़े भले ही देश में बाघों की संख्या बढ़ा रहे हों किंतु हकीकत एकदम से बिपरीत है। भारत में बाघों की दुनिया सिमटती ही जा रही है। इसका प्रमुख कारण है कि पिछले कुछेक सालों में मानव और बाघों के बीच शुरू हुआ संघर्ष। बढती आवादी के साथ प्राकृतिक संपदा एवं जंगलों का दोहन और अनियोजित विकास वनराज को अपनी सल्तनत छोड़ने के लिए विवश होना पड़ रहा है। उत्तर प्रदेश के पूरे तराई क्षेत्र का जंगल हो अथवा उत्तरांचल का वनक्षेत्र हो या फिर मध्य प्रदेश, महाराष्ट्, उड़ीसा आदि प्रदेशों के जंगल हों उसमें से बाहर निकलने वाले बाध चारों तरफ अक्सर अपना आतंक फैलाते रहते हैं और वेकसूर ग्रामीण उनका निवाला बन रहे हैं। बाध और मानव के बीच संधर्ष क्यो बढ़ रहा है? और बाघ जंगल के बाहर निकलने के लिए क्यों बिवश हैं? इस विकट समस्या का समय रहते समाधान किया जाना आवश्यक है। वैसे भी पूरे विश्व में बाघों की दुनिया सिमटती जा रही है। ऐसी स्थिति में भारतीय वन क्षेत्र के बाहर आने वाले बाघों को गोली का निशाना बनाया जाता रहा तो वह दिन भी दूर नहीं होगा जव भारत की घरा से बाघ विलुप्त हो जाएगें।

उत्तर प्रदेश के जिला खीरी एवं पीलीभीत के जंगलों से बाहर निकले बाघों ने विगत साल जिला खीरी, पीलीभीत, शाहजहांपुर, सीतापुर, बाराबंकी, लखनऊ, फैजाबाद में करीब दो दर्जन व्यक्तियों को अपना शिकार बनाया था। इसमें मौत का वारंट जारी करके दो बाघों को गोली मारी गयी थी। जबकि एक बाघ को पकड़कर लखनऊ प्राणी उद्यान भेज दिया गया था। पिछले छह माह के भीतर उत्तरांचल में भी जंगल से बाहर आकर मानवभक्षी बनने वाले दो बाघों को गोली मारी जा चुकी है एवं आधा दर्जन बाघों के शव मिल चुके हैं। देहरादून के पास मानवभक्षी एक बेजुबान तेंदुआ को गुस्साई भीड़ ने आग में जिंदा जलाकर बहिशयाना ढंग से मौत के घाट उतार दिया था। इसे हम इंसानों के लिए त्रासदी कह सकते हैं लेकिन जितनी त्रासदी यह इंसानों के लिए है उससे अधिक त्रासदी उन बाघों के लिए जो इंसानों का शिकार कर रहे हैं। बाघ जन्म से हिंस्रक और खूंखार तो होता है, लेकिन मानवभक्षी नहीं होता। इंसानों से डरने वाले वनराज बाघ को मानवजनित अथवा प्राकृतिक परिस्थितियां मानव पर हमला करने को विवश करती हैं।

उत्तर प्रदेश के दुधवा टाइगर रिजर्व परिक्षेत्र के साथ किशनपुर वनपशु विहार, पीलीभीत और शाहजहांपुर के जंगल आपस में सटे हैं। गांवों की बस्तियां और कृषि भूमि जंगल के समीप हैं। इसी प्रकार दुधवा नेशनल पार्क तथा कतरनिया वन्यजीव प्रभाग का वनक्षेत्र भारत-नेपाल की अंतर्राष्ट्रीय खुली सीमा से सटा है साथ ही आसपास जंगल के किनारे तमाम गांव आबाद हैं। जिससे सीमा पर नेपाली नागरिको के साथ ही भारतीय क्षेत्र में मानव आबादी का दबाव जंगलों पर बढ़ता ही जा रहा है। इसके चलते विभिन्न परितंत्रों के बीच एक ऐसा त्रिकोण बनता है जहां ग्रामवासियों और वनपशुओं को अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए जाना ही पड़ता है। भौगोलिक परिस्थितियों के चलते बनने वाला त्रिकोण परिक्षेत्र दुर्घटना जोन बन जाते हैं। सन् 2007 में किशनुपर परिक्षेत्र में आबाद गावों में आधा दर्जन मानव हत्याएं करने वाली बाघिन को मृत्यु दण्ड देकर गोली मार दी गयी थी। इसके बाद नवंबर 2008 में पीलीभीत के जंगल से निकला बाघ खीरी, शाहजहांपुर, सीतापुर, बाराबंकी होते हुए सूबे की राजधानी लखनऊ की सीमा तक पहुंच गया था। इस दौरान बाघ ने एक दर्जन ग्रामीणों का शिकार किया था, बाद में इस आतंकी बाघ को नरभक्षी घोषित करके फैजाबाद के पास गोली मारकर मौत दे दी गयी थी। सन् 2009 के माह जनवरी में किशनपुर एवं नार्थ खीरी फारेस्ट डिवीजन के क्षेत्र में जंगल से बाहर आये बाघ ने चार मानव हत्याएं करने के साथ ही कई मवेशियों का शिकार भी किया। इस पर काफी मशक्कत के बाद बाघ को पिंजरें में कैद कर लखनऊ प्राणी उद्यान भेज दिया गया था। सन् 2010 पीलीभीत के जंगल से निकले बाघ द्वारा खीरी, शाहजहांपुर में द्वारा आठ ग्रामीण मौत के घाट उतारे गए थे। वन विभाग ने प्रयास करके बाघ को पिंजरे में कैद करके लखनउ प्राणि उद्यान में भेज दिया था। उत्तर प्रदेश में ही नहीं वरन उत्तरांचल में भी बाघ जंगल से बाहर भाग रहे हैं। 2011 के माह जनवरी व फरवरी के वीते एक पखवारे के भीतर उत्तरांचल के जिम कार्वेट पार्क के ग्रामीण सीमाई क्षेत्रों में दो बाघों को मानवभक्षी घोषित करके गोली मारी जा चुकी है। इस साल भी दुधवा टाइगर रिजर्व से सटे किशनपुर वंयजीव विहार एवं साउथ खीरी फारेस्ट डिवीजन के जंगल के किनारे शिकारियों ने दो तेंदुओं को फांसी पर लटकाकर क्रूरता पूर्वक मौत के घाट उतार दिया था। दुधवा पार्क के जंगलों के साथ ही उससे सटे जिला बहराइच, पीलीभीत, गोंडा के जंगलों में बाघों का शिकार एवं उसके अंगों का अंतर्राष्ट्ीय स्तर पर अवैध कारोबार करने वाले गैंग की कुख्यात महिला सरगना दलीपो को माह मार्च 2011 में खीरी की निचली अदालत ने पांच साल की सश्रम कठोर कारावास एवं दस हजार रुपए के दंड की सजा सुनाई है। चीन में बाघ के अंगों की बढती मांग के कारण पैसों के लालच में भी भारत के वनक्षेत्रों में बाघों का अवैध शिकार किया जा रहा है। अवैध शिकार के कारण ही राजस्थान के सारिस्का नेशनल पार्क और मध्य प्रदेश के रणथम्भौर नेशनल पार्क से बाघ गायब हो चुके हैं। देश में संकटापन्न दशा से गुजर रहे बाघों की दुनिया को एक तरफ जहां शिकारी समेट रहे हैं वहीं दूसरी तरफ वनक्षेत्रों से बाहर आने वाले बाघों को आतंकी या मानवभक्षी घोषित करके मौत के घाट उतार देना न समस्या का समाधान है और न ही यह बाघों के हित में है।

जन्म से खूंखार होने के बाद भी विशेषज्ञों की राय में बाघ इंसान पर डर के कारण हमला नहीं करता। यही कारण है कि वह इंसानों से दूर रहकर घने जंगलों में छुप कर रहता है। मानव पर हमला करने के लिए परिस्थितियां बिवश करती हैं। बाघ अथवा वन्यजीव जंगल से क्यों निकलते हैं इसके लिए प्राकृतिक एवं मानवजनित कई कारण हैं। इनमें छोटे-मोटे स्वार्थो के कारण न केवल जंगल काटे गए बल्कि जंगली जानवरों का भरपूर शिकार किया गया। आज भी नेशनल पार्क का आरक्षित वनक्षेत्र हो या संरक्षित जंगल हो उनमें लगातार अवैध शिकार जारी है। यही कारण है कि वन्यजीवों की तमाम प्रजातियां संकटापन्न होकर विलुप्त होने की कगार पर हैं। इस बात का अभी अंदेशा भर जताया जा सकता है कि इस इलाके में बाघों की संख्या बढ़ने पर उनके लिए भोजन का संकट आया हो। असमान्य व्यवहार आसपास के लोगों के लिए खतरे की घंटी हो सकता है। मगर इससे भी बड़ा खतरा इस बात का है कि कहीं मनुष्यों और जंगली जानवर के बीच अपने को जिन्दा रखने के लिए खाने की जद्दोजेहाद नए सिरे से किसी परिस्थितिकीय असंतुलन को न पैदा कर दे। जब तक भरपूर मात्रा में जंगल रहे तब तक वन्यजीव गांव या शहर की ओर रूख नहीं करते थे। लेकिन मनुष्य ने जब उनके ठिकानों पर हमला बोल दिया तो वे मजबूर होकर इधर-उधर भटकने को मजबूर हो गए हैं।

प्राकृतिक कारणों से जंगल के भीतर चारागाह भी सिमट गए अथवा वन विभाग के कर्मचारियों की निजस्वार्थपरता से हुए कुप्रबंधन के कारण चारागाह ऊंची घास के मैदानों में बदल गए इससे जंगल में चारा की कमी हो गई है। परिणाम स्वरूप वनस्पति आहारी वन्यजीव चारा की तलाश में जंगल के बाहर आने को विवश हैं तो अपनी भूख शांत करने के लिए वनराज बाघ भी उनके साथ पीछे-पीछे बाहर आकर आसान शिकार की प्रत्याशा में खेतों को अस्थाई शरणगाह बना लेते हैं।

पूर्व केंद्रीय वन एवं पर्यावरण राज्यमंत्री जयराम रमेश ने हाल ही में चार साल के वजाय एक साल में बाघों की गणना करने की बात कही है उनका मानना है कि इससे बाघों की सही ढंग से निगरानी हो सकेगी, सर्वेक्षण की दृष्टि से यह बात ठीक है। किंतु सरकार इस तरह की कोई भी दीर्घकालिक योजना बनाने में असफल है जिसमें वन्यजीव जंगल के बाहर न आए। इधर प्राकृतिक कारणों से जंगल के भीतर चारागाह भी सिमट गए अथवा वन विभाग के कर्मचारियों की निजस्वार्थपरता से हुए कुप्रबंधन के कारण चारागाह ऊंची घास के मैदानों में बदल गए इससे जंगल में चारा की कमी हो गई है। परिणाम स्वरूप वनस्पति आहारी वन्यजीव चारा की तलाश में जंगल के बाहर आने को विवश हैं तो अपनी भूख शांत करने के लिए वनराज बाघ भी उनके साथ पीछे-पीछे बाहर आकर आसान शिकार की प्रत्याशा में खेतों को अस्थाई शरणगाह बना लेते हैं। परिणाम सह अस्तित्व के बीच मानव तथा वन्यजीवों के बीच संघर्ष बढ़ जाता है। इसको रोकने के लिए अब जरूरी हो गया है कि वन्यजीवों के अवैध शिकार पर सख्ती से रोक लगाई जाये तथा जंगल के भीतर अनुपयोगी हो रहे चारागाहों को पुराना स्वरूप दिया जाए ताकि वन्यजीव चारे के लिए जंगल के बाहर न आयें। इसके अतिरिक्त बाघों के प्राकृतिक वासस्थलों में मानव की बढ़ती घुसपैठ को रोका जाये साथ ही ऐसे भी कारगर प्रयास किये जायें जिससे मानव एवं वन्यजीव एक दूसरे को प्रभावित किये बिना रह सकें। ऐसा न किए जाने की स्थिति में परिणाम घातक ही निकलते रहेंगे, जिसमें मानव की अपेक्षा सर्वाधिक नुकसान बाघों के हिस्से में ही आएगा।

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