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मृदाओं में अन्तःस्यन्दन दरों का मापन

Author: 
ओमकार सिंह, मुकेश कुमार शर्मा, वी.के.चौबे, राजदेव सिंह
Source: 
राष्ट्रीय जल विज्ञान संस्थान, चतुर्थ राष्ट्रीय जल संगोष्ठी, 16-17 दिसम्बर 2011
जम्मू क्षेत्र की अंतः स्यंदन परिक्षण स्थलों का मानचित्रजम्मू क्षेत्र की अंतः स्यंदन परिक्षण स्थलों का मानचित्रजलविज्ञानीय अध्ययनों के लिए विभिन्न प्रकार की मृदाओं एवं भूमि उपयोगों की स्थिति में अन्तःस्यन्दन ज्ञान जरूरी है। अन्तःस्यन्दन दर मृदा में जल के प्रवेश कर सकने की अधिकतम दर को निर्धारित करती है। अन्तःस्यन्दन दर प्रारंभ में बहुत तेजी से कम होती है फिर कुछ समय के पश्चात यह एक स्थिर दर पर पहुंच जाती है। यह दर पूर्वगामी मृदा नमी एवं प्रपुण्ज घनत्व में परिर्वतन से प्रभावित होती है। अन्तःस्यन्दन जल संतुलन की गणना का एक आवश्यक अंग है। कृषि एवं जलविज्ञान में अन्तःस्यन्दन अध्ययनों में प्रयोग के कारण इसका अध्ययन अत्यन्त जरूरी है।

प्रस्तुत प्रपत्र में जम्मू एवं हिमाचल प्रदेश के बैरा नाला जल संग्रहण क्षेत्रों के विभिन्न प्रकार के भू उपयोगों में अन्तःस्यन्दन दरों का विभिन्न स्थलों पर अध्ययन किया गया है। अध्ययन से विदित है कि वन आच्छादित भूमियों में औसतन प्रारम्भिक अन्तःस्यन्दन दर सर्वाधिक अंकित की गयी। यह दर बंजर भूमियों में सबसे कम पायी गई।

मृदाओं में अन्तः स्यन्दन दरों का मापन (Measurement of infiltration rates in soils)


भारतीय वैज्ञानिक एवं औद्योगिक अनुसंधान पत्रिका, 01 जून, 2012

सारांश:


जलविज्ञानीय अध्ययनों के लिये विभिन्न प्रकार की मृदाओं एवं भूमि उपयोगों की स्थिति में अन्तःस्यन्दन ज्ञान जरूरी है। अन्तःस्यन्दन दर मृदा में जल के प्रवेश कर सकने की अधिकतम दर को निर्धारित करती है। अन्तःस्यन्दन दर प्रारम्भ में बहुत तेजी से कम होती है। फिर कुछ समय के पश्चात यह एक स्थिर दर पर पहुँच जाती है। यह दर पूर्वगामी मृदा नमी एवं प्रपुंज घनत्व में परिवर्तन से प्रभावित होती है। अन्तःस्यन्दन जल संतुलन की गणना का एक आवश्यक अंग है। कृषि एवं जलविज्ञान में अन्तःस्यन्दन अध्ययनों में प्रयोग के कारण इसका अध्ययन अत्यन्त जरूरी है। प्रस्तुत प्रपत्र में जम्मू एवं हिमाचल प्रदेश के बैरा नाला जल संग्रहण क्षेत्रों के विभिन्न प्रकार के भू-उपयोगों में अन्तःस्यन्दन दरों का विभिन्न स्थलों पर अध्ययन किया गया है। अध्ययन से विदित हुआ है कि वन आच्छादित मृदाओं में औसतन प्रारम्भिक अन्तःस्यन्दन दर सर्वाधिक पायी गई। यह दर बंजर भूमियों में सबसे कम पायी गई।

Abstract


Knowledge of infiltration characteristics is necessary for hydrological studies in different soils and land uses. It may be defined as the process of water entry into the soil. Initially the rate of infiltration uses to be higher and then reduces with elapsed time till attaining a constant infiltration rate (final infiltration rate). The infiltration is mainly affected by intensity and duration of rainfall, soil characteristics, soil moisture content, vegetal cover, land use etc. Thus, infiltration is an essential component for water balance studies of different watersheds. Therefore, information about infiltration characteristics is very much useful in hydrological studies and agriculture. In the present paper, infiltration characteristics of Jammu, Kathua and Udhampur Districts (J & K) and Baira Nalla sub-catchment (H.P.) obtained under different land uses viz, forest grass, agriculture, barren have been discussed. The studies have shown higher initial infiltration rates in forest and lowest in barren land uses, respectively.

प्रस्तावना


वर्षा के जल का कुछ भाग भू-पृष्ठ पर पहुँच कर मृदा में प्रवेश करता है। मृदा की पृष्ठ तहों तक पानी के प्रवेश तथा नीचे की ओर जाने की क्रिया को अन्तःस्यन्दन कहते हैं। अन्तःस्यन्दन जल संतुलन की गणना का एक आवश्यक अंग है। सर्वप्रथम अन्तःस्यन्दन शब्द का प्रयोग संयुक्त राज्य अमरीका में जार्ज पी.मार्श द्वारा सन 1861 में किया गया। प्रस्तुत विषय पर विभिन्न शोधकर्ताओं के अध्ययनों के पूर्वावलोकन से विदित हुआ है कि विभिन्न प्रकार की मृदाओं तथा भू-उपयोगों में अन्तःस्यन्दन दरें काफी हद तक अलग-अलग पायी जाती है। प्रस्तुत अध्ययन में जम्मू क्षेत्र के तीन जिलों (जम्मू, कठुआ, एवं ऊधमपुर) एवं हिमाचल प्रदेश के बैरा नाला जल संग्रहण क्षेत्रों का अन्तःस्यन्दन परीक्षण किया गया है। इस क्षेत्र में जम्मू पठानकोट राष्ट्रीय राजमार्ग के उत्तर में स्थित मृदाएं ऊबड़-खाबड़ एवं ऊँची हिमाचल की चोटियाँ पाई जाती हैं, जबकि दक्षिण भाग (तराई) में अपेक्षाकृत कम ऊबड़-खाबड़ एवं समतल मृदाएं पायी जाती हैं। तराई क्षेत्र की मृदाओं में जलस्तर काफी ऊँचा है जिसके कारण मृदा लवणता एवं जल मग्नता की समस्या रहती है।

जम्मू शहर के मध्य से तवी नदी गुजरती है, जो चिनाब नदी की सहायक नदी है तथा चिनाब इस क्षेत्र की प्रमुख नदी मानी जाती है, इसी प्रकार जम्मू क्षेत्र का कुछ भाग उझ नदी के जल संग्रहण क्षेत्र में भी आता है, जो रावी नदी की सहायक नदी है। जम्मू क्षेत्र में विभिन्न प्रकार की मृदाएं पायी जाती हैं। फुट हिल्स एवं उसके आस-पास की मृदाएं बजरीली एवं कंकड़युक्त होती हैं। जलोढ़ क्षेत्र (Alluvial plains) में सामान्यतः कम नाइट्रोजन एवं मध्यम फास्फोरस एवं पोटाश युक्त मृदाएं विद्यमान हैं, जबकि पहाड़ी क्षेत्र की मृदाओं में कार्बनिक पदार्थ की मात्रा प्राकृतिक वनस्पतियों के विघटन के कारण कुछ ज्यादा पायी जाती हैं तथा ये मृदाएं भी भारी होती हैं। जम्मू क्षेत्र के अधिकतर भागों में ग्रीष्मकाल में अत्यधिक गर्मी रहती है। जम्मू क्षेत्र में औसत वार्षिक वर्षा 1052 मिमी. होती है। जम्मू क्षेत्र के अन्तःस्यन्दन परीक्षण स्थल चित्र 1 में दर्शाए गये हैं।

Fig-1 हिमाचल प्रदेश में स्थित अध्ययन स्थल (बैरा नाला जल संग्रहण क्षेत्र) का अक्षांश 320 47’ से 3302’ (उत्तर) एवं देशान्तर 750 57’ से 760 23’ (पूर्व) है। इसका क्षेत्रफल 585 वर्ग किलोमीटर है (चित्र 2)। इस क्षेत्र में वार्षिक औसत वर्षा करीब 1122 मिमी. होती है। इस अध्ययन क्षेत्र की न्यूनतम एवं अधिकतम ऊँचाईयाँ क्रमशः 2693 मी. एवं 5321 मी. हैं तथा शीतकालीन में यह अध्ययन क्षेत्र आंशिक रूप से बर्फ से आच्छादित रहता है। बैरा नाला जल संग्रहण क्षेत्र में परीक्षण स्थल चित्र 3 में दर्शाये गये हैं (रा.ज.सं. 1993-94)।

Fig-2

सामग्री एवं विधि


अध्ययन में डबल रिंग सिलेन्डर इन्फिल्टरोमीटर का प्रयोग किया गया है। इसके बाह्य सिलेन्डर का व्यास 45 सेमी. तथा अन्तः सिलेन्डर का व्यास 30 सेमी. तथा दोनों सिलेन्डरों की ऊँचाई 45 सेमी होती है। दोनों सिलेन्डरों को वांछित भूमि प्रयोग पर करीब 5-10 सेमी. अंदर भूमि में हथोड़े से सावधानीपूर्वक स्थापित किया जाता है। अन्तःस्यन्दन अंकित करने के लिये दोनों सिलेन्डरों में समान ऊँचाई तक एक साथ समान जलगुणता एवं तापमान वाला पानी एक साथ डालना चाहिए तथा अन्तःस्यन्दन की दर आन्तरिक सिलेन्डर में विभिन्न समयान्तराल पर अंकित की गई वाटर इनफिल्टरेटेड डेथ द्वारा निकाली जा सकती है। अन्तःस्यन्दन की दर के किये गये परीक्षणों से प्राप्त आँकड़ों को कोशियाकोव निदर्शन की सहायता से अन्तःस्यन्दन दरों का अध्ययन किया गया।

कोशियाकोव निदर्शन: I=bt-c
I = अन्तःस्यन्दन दर (सेमी./घंटा)
t = इलेप्स्ड टाइम (समय)
जबकि b,c उपरोक्त निदर्शन में प्रयुक्त किये गये स्थिरांक हैं।

परिणाम एवं विवेचना


विभिन्न स्थानों पर कृषि, घास, वन एवं बंजर मृदाओं पर किये गये गये परीक्षणों से प्राप्त आँकड़े सारणी 1 (जम्मू क्षेत्र) एवं सारणी 2 (बैरा नाला संग्रहण क्षेत्र) में दिये गये हैं।

 

सारणी 1- जम्मू क्षेत्र के विभिन्न स्थानों पर किये गये परीक्षणों से प्राप्त औसत अन्तःस्यंदन दरें

भू-उपयोग

औसत अन्तःस्यंदन दर प्रारम्भिक

(सेमी./घं.) अंतिम

कृषि

21.0

1.4

घास

22

2.15

वन

46

0.8

बंजर

13.7

1.2

 

 

सारणी 2- हिमाचल प्रदेश के बैरा नाला संग्रहण क्षेत्र में किये गये परीक्षणों से प्राप्त औसत अन्तःस्यंदन दरें

भू-उपयोग

औसत अन्तःस्यंदन दर प्रारम्भिक

(सेमी./घं.) अंतिम

कृषि

36

6.5

घास

24.4

3.3

वन

42.5

9.2

बंजर

26.4

1.6

 

सारणी 1 से स्पष्ट है कि जम्मू क्षेत्र के वन भूमि (46 सेमी./घं.) में औसत प्रारम्भिक अन्तःस्यन्दन दर सर्वाधिक पायी गई जबकि घास से आच्छादित भूमियों में यह दर 22 सेमी/घं., कृषि में 21.0 सेमी./घं. तथा बंजर भूमियों में 13.7 सेमी/घं., अंकित की गई। विभिन्न अध्ययनों से विदित है कि वन भूमियों में अन्तःस्यंदन दर मृदाओं के ऊपरी भाग में पेड़ पौधों की पत्तियों से प्राप्त कार्बनिक पदार्थों के विघटन से मृदा संरचना में बदलाव के कारण होता है। बंजर भूमियों में औसत प्रारम्भिक अन्तःस्यंदन दर सबसे कम (13.7 सेमी./घं.) अंकित की गई। ज्ञातव्य है कि बंजर भूमियों में वानस्पतिक घटकों का अभाव रहता है जिसके कारण मृदा का विकास समुचित न हो पाने के कारण अन्तःस्यंदन दर प्रभावित होती है। अध्ययन से स्पष्ट है कि वन भूमियों में प्रारम्भिक अन्तःस्यंदन दरें अन्य भू-उपयोगों की अपेक्षाकृत सर्वाधिक अंकित की गई। सामान्यतः जैसे-जैसे अन्तःस्यंदन दरों का परीक्षण समय बढ़ता जाता है, वैसे-वैसे यह दर तेजी से कम होते हुए अंतराल के बाद स्थिर हो जाती है। लेकिन कभी-कभी कुछ भूमियों की विभिन्न परतों में मिट्टी के साथ-साथ कंक्रीट, बजरी व अन्य बड़े पत्थर एवं पेड़ पौधों की जड़ें आदि विद्यमान होने की वजह से अन्तःस्यंदन की स्थिर अवस्था प्राप्त होने में कुछ कठिनाई आ सकती है। लेकिन अन्ततः कुछ और अंतराल के बाद यह दर पुनः स्थिर हो जाती है जो अंतिम अन्तःस्यंदन दर को दर्शाती हैं। बैरा नाला (हिमाचल प्रदेश) जल संग्रहण क्षेत्र में भी वन भूमियों में औसत अन्तःस्यंदन दर अन्य भू-उपयोगों की तुलना में सर्वाधिक (42.5 सेमी./घं.) अंकित की गई तथा बंजर भूमि में औसत प्रारम्भिक अन्तःस्यंदन दरें न्यूनतम अंकित की गई (सारणी 2)।

विभिन्न मृदाओं में अन्तःस्यन्दन दरें


जम्मू क्षेत्र में विभिन्न मृदाओं (दोमट चिकनी मिट्टी, बलुई दोमट, सिल्ट दोमट एवं दोमट) पर किये गये परीक्षणों से प्राप्त आँकड़ें सारणी 3 में दिये गये हैं।

 

सारणी 3- जम्मू क्षेत्र की विभिन्न मृदाओं में अन्तःस्यंदन दरें  

क्रमांक

मृदाएं

औसत अन्तःस्यंदन दर (सेमी./घं.)

 

प्रारम्भिक

अंतिम

1

दोमट चिकनी मिट्टी

20.6

0.56

2

बुलई दोमट

42.0

0.75

3

सिल्ट दोमट

22.3

1.6

4

दोमट

25.0

1.3

 

अध्ययन में दोमट चिकनी मिट्टी, बलुई दोमट, सिल्ट दोमट, एवं दोमट मृदाओं में प्रारंभिक औसत अन्तःस्यंदन की दरें क्रमशः 20.6, 42.0, 22.3, एवं 25 सेमी/घंटा पायी गई तथा अंतिम औसत अन्तःस्यंदन की दरें क्रमशः 0.56, 0.75, 1.9 एवं 1.3 सेमी./घंटा पर स्थिर अंकित की गई। अतः उपरोक्त सारणी से स्पष्ट है कि बलुई दोमट में औसत प्रारम्भिक अन्तःस्यंदन दरें सर्वाधिक (42.0 सेमी./घं.) एवं दोमट चिकनी मिट्टी में सबसे कम (20.6 सेमी./घं.) आकलित की गई। अन्य अनुसंधानकर्ताओं द्वारा बलुई भूमियों में अन्तःस्यंदन की दरें अधिकतम रिपोर्ट की गई। उपरोक्त अध्ययन से विदित है कि विभिन्न मृदाओं के भौतिक गुणों (मृदा गठन, संरचना, सरन्ध्रता, घनत्व, मदा नमी, आदि) में भिन्नता होने के कारण अन्तःस्यंदन दरों में अंतर स्पष्ट दिखाई देता है। अन्तःस्यंदन की विभिन्न भूमियों में उपरोक्त विशेषताओं के कारण इसका सीधा प्रभाव अपवाह (Runoff) पर पड़ता है।

अन्तःस्यंदन निर्देश


प्रस्तुत अध्ययन में प्राप्त अन्तःस्यंदन आँकड़ों को प्रचलित अन्तःस्यंदन निदर्श में अनुरूप विभिन्न प्राचल ज्ञात किये गये। विभिन्न भू-उपयोगों के लिये कोसियाकोव निदर्श द्वारा प्राप्त R2 के मान सारणी 4 में दिये गये हैं। अध्ययन से विदित होता है कि दोनों क्षेत्रों (जम्मू क्षेत्र एवं बैरा नाला) में कोसियाकोव अन्तःस्यंदन निदर्श के द्वारा स्थानीय आँकड़ों का R2 मान बहुत अच्छा पाया गया।

 

सारणी 4- कोसियाकोव निदर्श के R2 मान  

क्रमांक

भू-उपयोग

R2  का मान

 

 

जम्मू क्षेत्र

बैरा नाला जल ग्रहण क्षेत्र

1

कृषि

0.97-0.99

0.97-0.98

2

घास

0.95-0.99

0.97-0.99

3

वन

0.96-0.99

0.99

4

बंजर

0.98-0.99

0.97-0.99

 

अतः विभिन्न भू-प्रयोगों में कोसियाकोव अन्तःस्यन्दन निदर्श से प्राप्त सभी प्राचलों का प्रयोग विभिन्न जलविज्ञानीय अध्ययनों में किया जा सकता है।

निष्कर्ष


प्रस्तुत प्रपत्र में जम्मू क्षेत्र के जम्मू, कठुआ, ऊधमपुर एवं हिमाचल प्रदेश के बैरा नाला जल संग्रहण क्षेत्रों में अन्तःस्यन्दन परीक्षणों पर आधारित आँकड़ों का पुनः अवलोकन किया गया है। अध्ययन से विदित हुआ है कि वन मृदाओं में प्रारम्भिक दर सर्वाधिक पायी जाती है। अधिक वानस्पतिक विघटन के कारण वन मृदाओं की मृदा संरचना में बदलाव के कारण ऐसा सम्भव है। यह दर बंजर भूमियों में सबसे कम पायी गई। विभिन्न मृदाओं पर किये गये अन्तःस्यन्दन परीक्षणों से विदित होता है कि बलुई प्रभावित मृदाओं में अन्य मृदाओं की तुलना में औसत प्रारम्भिक दर सर्वाधिक पायी जाती है। जिसका वर्णन अन्य परीक्षणकर्ताओं ने भी किया है। कोसियाकोव अन्तःस्यन्दन निदर्श के R2 के आधार पर यह भी निष्कर्ष निकाला गया कि दोनों क्षेत्रों जो अलग-अलग प्रदेशों में है जिनमें R2 के मान बहुत अच्छे पाये गये तथा जल विज्ञान अध्ययन के आधार स्वरूप प्रयोग में लाए जा सकते हैं।

आभार


लेखक क्षेत्रीय केन्द्र जम्मू के तत्कालीन सभी अधिकारियों एवं कर्मचारियों का आभार प्रकट करते हैं, जिन्होंने इस अध्ययन के लिये अपना अमूल्य समय दिया।

संदर्भ
1. ओमकार एस एवं पटवारी वी सी, जम्मू क्षेत्र में अन्तःस्यन्दन दरों का अध्ययन, रा.ज.सं., टी.आर. (1992-93), 163.

2. पटवारी वी सी, रामशास्त्री के. एस, राव एस वी एन, ओमकार एस एवं शर्मा मुकेश कुमार, जम्मू क्षेत्र में विभिन्न प्रकार के भूमि उपयोगों के अधीन अन्तःस्यन्दन दरों की विशेषतायें, आई डब्ल्यू आर एस 7(3), (1997).

3. रा.ज.सं., बैरा नाला जल संग्रहण क्षेत्र में अन्तःस्यन्दन दरों का अध्ययन, राष्ट्रीय जलविज्ञान संस्थान, रुड़की CS/AR. 142 (1993-94).

4. रा.ज.सं., जल विज्ञान शब्दावली -I राष्ट्रीय जलविज्ञान संस्थान, रुड़की (1994-95).

5. कोसियाकोव, ट्रान्सेक्सनः ऑफ सिक्थ कमिशन, इन्टरनेशनल सोसायटी ऑफ सॉयल साइन्स, रसियान, (1932)17-21.

6. रागन्ना जी, लोकेश के एन, गजेन्द्रगड, एम आर, चन्द्रकान्था जी, हशेंद्रा के, अर्स ए के एवं कोरी एमइएन, दक्षिण कन्नड़ जिले के पावांजे नदी क्षेत्र की मृदाओं में अन्तःस्यन्दन गुणों का अध्ययन, हाइड्रोलॉजी ज., आई.ए.एच., 14 (1), (1991), 33-40.

सम्पर्क


ओमकार सिंह, मुकेश कुमार शर्मा, वी के चौबे एवं राजदेव सिंह, Omkar Singh, Mukesh Kumar Sharma, V.K. Choubey & Raj Dev Singh
राष्ट्रीय जलविज्ञान संस्थान, रूड़की, National Institute of Hydrology, Roorkee


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