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जल विभाजक के लिए अभिकल्प अपवाह वक्र संख्या का निर्धारण

Author: 
सुरेंद्र कुमार मिश्रा, अजय कुमार कन्सल, पुष्पेंद्र अग्रवाल, निशांत अग्रवाल
Source: 
राष्ट्रीय जल विज्ञान संस्थान, चतुर्थ राष्ट्रीय जल संगोष्ठी, 16-17 दिसम्बर 2011

अनगेज्ड लघु जल विभाजकों के लिए वृष्टि घटक अपवाह का आंकलन जलविज्ञान की प्रमुख गतिविधियों में से एक है। जल संसाधन एवं सिंचाई अभियांत्रिकी के क्षेत्र में अनगिनत संगणक निदर्श उपलब्ध हैं तथा इनमें से अधिकांश वृहत एवं लोकप्रिय निदर्श वर्षा घटक से अतिरिक्त वर्षा निर्धारण के लिए मृदा संरक्षण सेवा वक्र संख्या प्रौद्योगिकी (SCS - CN) का प्रयोग करते हैं। इन समस्याओं के सरलतम समाधान के लिए अधिकांशतः उपयोग किये जाने वाली तकनीकों में SCS वक्र संख्या पद्धति एक लोकप्रिय पद्धति है। इस पद्धति का प्राचल CN, मृदा एवं वनस्पति के दिये गये मिश्रण में जल धारण का एक मापक है तथा इसका मान शून्य (अपवाह रहित अवस्था) से 100 (जब सम्पूर्ण वर्षा अपवाह में परिवर्तित हो जाए) तक परिवर्तनीय है।

प्रस्तुत अध्ययन में प्रत्येक दिवस की वर्शा एवं इसमें सम्बद्ध अपवाह को एक घटक स्वीकार करते हुए इसकी सहायता से भारतवर्ष के झारखण्ड राज्य में स्थित मैथन जल विभाजक के दीर्घावधि दैनिक वर्षा-अपवाह आकँड़ों के लिए SCS - CN पद्धति का प्रयोग किया गया है। SCS - CN पद्धति में प्राचल के रूप में प्रयोग हेतु विभिन्न अवधियों, आर्द्र स्थितियों एवं वापसी अवधियों के लिए अभिकल्प अपवाह की व्युत्पत्ति के लिए एक सरल पद्धति को प्रस्तावित किया गया है। व्युत्पत्ति अभिकल्प CN मानों का परीक्षण उनके मान्यकरण हेतु प्रेक्षित आँकड़ों से रूढ़िवादी अभिकल्प अपवाह आंकलन के प्रयोग द्वारा किया गया है। अध्ययन किये गये जल विभाजक के लिए 10 वर्ष की वापसी अवधि हेतु CN द्वारा जनित अभिकल्प अपवाह एवं रूढ़िवादी अपवाह के मध्य तुलनात्मक अध्ययन संतोषजनक पाया गया है।

मैथन जल विभाजक के लिये अभिकल्प अपवाह वक्र संख्या का निर्धारण (Assessment of design runoff curve number for Maithon watershed)


सारांश


अमापित लघु जल विभाजकों के लिये वृष्टि घटक अपवाह का आंकलन जलविज्ञान की प्रमुख गतिविधियों में से एक है। जल संसाधन एवं सिंचाई अभियांत्रिकी के क्षेत्र में अनगिनत संगणक निदर्श उपलब्ध हैं। तथा इनमें से अधिकांश वृहत एवं लोकप्रिय निदर्श वर्षा घटक से अतिरिक्त वर्षा निर्धारण के लिये मृदा संरक्षण सेवा वक्र संख्या प्रौद्योगिकी (SCS-CN) का प्रयोग करते हैं। इन समस्याओं के सरलतम समाधान के लिये अधिकांशतः उपयोग किये जाने वाली तकनीकों में SCS वक्र संख्या पद्धति एक लोकप्रिय पद्धति है। इस पद्धति का प्राचल CN मृदा एवं वनस्पति के दिये गये मिश्रण में जल धारण का एक मापक है तथा इसका मान शून्य (अपवाह रहित अवस्था) से 100 (जब सम्पूर्ण वर्षा अपवाह में परिवर्तित हो जाए) तक परिवर्तनीय है। प्रस्तुत अध्ययन में प्रतिदिन की वर्षा एवं इसमें सम्बद्ध अपवाह को एक घटक स्वीकार करते हुए इसकी सहायता से भारत के झारखण्ड राज्य में स्थित मैथन जल विभाजक के दीर्घावधि दैनिक वर्षा अफवाह आँकड़ों के लिये SCS-CN पद्धति का प्रयोग किया गया है। SCS-CN पद्धति में प्राचल के रूप में प्रयोग हेतु विभिन्न अवधियों, आर्द्र स्थितियों एवं आपसी अवधियों के लिये अभिकल्प अपवाह की व्युत्पित्ति के लिये एक सरल पद्धति को प्रस्तावित किया गया है। व्युत्पत्ति अभिकल्प CN मानों का परीक्षण उनके मान्यकरण हेतु प्रेक्षित आँकड़ों से रूढ़िवादी अभिकल्प अपवाह आंकलन के प्रयोग द्वारा किया गया है। अध्ययन किये गये जल विभाजक के लिये 10 वर्ष की वापसी अवधि हेतु CN द्वारा जनित अभिकल्प अपवाह एवं रूढ़िवादी अपवाह के मध्य तुलनात्मक अध्ययन संतोषजनक पाया गया है।

Abstract


Estimation of storm event runoff is one of the major activities in applied hydrology for ungauged small watersheds. There exist a myriad computer models in the field of water resource and irrigation engineering and the most comprehensive and popular ones use the soil Conservation Service (SCS) curve number methodology to determine the rainfall-excess from rainfall event. The SCS Curve Number (CN) (SCS-CN) technique is one of the most popular and well accepted techniques for it is a simple approach for direct runoff estimation. Its parameter CN is measure of water retention by a given combination of soil and vegetation and varies from 0 (no runoff) to 100 (all rainfall becomes runoff). In this study, considering each day’s rainfall and corresponding runoff as an event, the SCS-CN method is employed to long-term daily rainfall-runoff data of Maithon watershed located in Jharkhand (India). A simple approach has been suggested for derivation of the design runoff CN for different durations antecedent moisture conditions (AMCs), and return periods for use in the SCS-CN methodology. The derived design CN values are tested for their validity using the design runoff computed from observed data conventionally. The match between the CN-generated design runoff and the conventional one is found to be satisfactory for return periods up to 10-year return period for the studied watershed.

प्रस्तावना


लघु कृषि जल विभाजकों से दिये गये वर्षा घटक के लिये सतही अपवाह के आयतन की गणना हेतु मृदा संरक्षक सेवा-वक्र संख्या पद्धति (SCS-CN) (SCS. 1956, 1964, 1969, 1971, 1972, 1985, 1993) उपलब्ध लोकप्रिय पद्धतियों में से एक है। यह पद्धति कृषि, जल विज्ञान साहित्य में विचार विमर्श पर प्रकाश डालती है तथा इसका प्रयोग निरन्तर निदर्शन योजनाओं में भी वृहत रूप में किया जाता है। अधिकांश जल वैज्ञानिकों द्वारा इस पद्धति के प्रयोग का मुख्य कारण इसकी सरलता तथा न्यूनतम जलविज्ञानीय सूचनाओं जैसे मृदा प्रकार, भूमि उपयोग एवं उपचार, सतही स्थितियों एवं पूर्ववर्ती आर्द्रता स्थितियों की सहायता से जलविभाजक हेतु इसका प्रयोग किये जाने की क्षमता है। अमापित जल विभाजक के लिये वर्षा-अपवाह घटकों के सीमित मानों एवं तीन पूर्ववर्ती आर्द्रता स्थितियों के लिये मापन रहित जलविभाजक हेतु NEH-4 सारणी के प्रयोग द्वारा CN मानों को व्युत्पत्ति किया गया है। बाद में वर्षा के क्रम पर आधारित पद्धति को साहित्य में प्रस्तावित किया गया है। पौन्स एवं हॉकिन्स (1996) ने इस पद्धति का परीक्षण किया, इसके संकल्पनात्मक एवं अनुभाविक आधारों को स्पष्टीकृत किया, इसकी क्षमताओं, सीमाओं एवं उपयोगों का प्रस्तुतीकरण किया एवं SCS-CN प्रौद्योगिकी में अनुसंधान हेतु क्षेत्रों को चयनित किया। चरम या वृहत्त अपवाह आयतन के आंकलन के लिये अपवाह वक्र संख्या पद्धति को विकसित किया गया। तथापि इसका प्रयोग जलविज्ञानीय अनुकरण निदर्श उदाहरणतः CREAMS (निसल 1980) एवं AGNPS (यंग एवं अन्य 1987) द्वारा दैनिक वर्षा घटकों से प्रत्यक्ष अपवाह आंकलन हेतु किया गया।

विभिन्न स्थितियों के अंतर्गत किसी जल विभाजक के लिये अपवाह वक्र संख्या को चयनित करने की पद्धतियाँ ‘‘नेशनल इन्जीनियरिंग हैन्डबुक, खण्ड-4 जलविज्ञान या NEH-4 (SCN, 1972)” में उपलब्ध हैं। CN मानों को मूल रूप से लघु कृषि जलविभाजकों पर वार्षिक अधिकतम वर्षा एवं अपवाह आँकड़ों से परिभाषित किया गया था जहाँ जलविज्ञानीय मृदा समूह, भूमि उपयोग/उपचार एवं सतही स्थितियाँ ज्ञात थीं। विभिन्न कृषि पद्धतियों एवं सतही खनन एवं सुधार जल विभाजकों के लिये भी CN मानों का प्रवेक्षण किया गया।

SCS-CN पद्धति जलविभाजक विशिष्टताओं एवं 5 दिवस भी पूर्ववर्ती वर्षा से व्युत्पत्ति CN मान के उपयोग द्वारा वर्षा को सतही अपवाह में परिवर्तित करती है। इस निदर्श का चयन अपवाह भविष्यवाणी के लिये किया गया क्योंकि (1) यह एक सुपरिचित पद्धति है। जिसका प्रयोग विश्व में अनेक वर्षों से किया जा रहा है। (2) इसकी संगणना प्रभावी रूप से की जा सकती है। (3) इसके लिये आवश्यक निवेश सामान्यतः उपलब्ध है। (4) यह अपवाह का संबंध मृदा प्रकार भूमि उपयोग एवं प्रबंधन पद्धतियों से करती हैं। किसी अमापित जलविभाजक के लिये CN के मान की व्युत्पत्ति करने हेतु SCS (1956) ने मृदा प्रकार, भूमि आच्छादन एवं पद्धति, जलीय स्थिति एवं ए.एम.सी. पर आधारित सारणियाँ प्रदान की हैं AMC (शुष्क) से AMCIII (आर्द्र) या AMCII (सामान्य) स्तरों से CN परिवर्तन के लिये शुद्ध गणितीय अभिव्यंजन भी उपलब्ध हैं। जेलम्फेल्ट एवं अन्य (1982) ने AMCIII स्तरों के द्वारा सांख्यिकीय विधि से क्रमशः AMCI के साथ संबंध स्थापित किया जिसका मान दी गई वर्षा के लिये अपवाह गहराई की 90,10 एवं 50 संचयी सम्भाव्यता से श्रेष्ठ पाया गया। अमापित जल विभाजकों के लिये माध्य CN के सापेक्ष AMCII एवं वितरित वर्षा-अफवाह चित्रण की ऊपरी एवं निम्न सीमा के सापेक्ष क्रमशः AMCIII एवं AMCI पर विचार करते हुए वर्षा अपवाह आँकड़ा घटनाओं से CN गणना की संस्तुति की।

जलविज्ञानीय अभिकल्प उद्देश्यों के लिये हॉकिन्स (1993) हॉकिन्स एवं अन्य (2001) ने वर्षा-अपवाह आँकड़ों के क्रम से CN की व्युत्पत्ति की एवं मैक क्यून (2002) ने CN को एक बेतरतीब परिवर्ती मानते हुए CN मानों (65 से 95) के लिये विश्वसनीय अन्तराल को विकसित किया। मिश्रा एवं अन्य (2004) ने उपलब्ध SCS-CN निदर्शों एवं संशोधित मिश्रा एवं सिंह (2003, a,b,c) निदर्शों की तुलना लघु से दीर्घ जल विभाजकों के आँकड़ों की सहायता से की एवं यह पाया कि पश्च निदर्श, पूर्व की तुलना में श्रेष्ठ निष्पादन प्रदान करते हैं। जैन एवं अन्य (2006 इ) ने अमेरिका में स्थित लघु से दीर्घ जलविभाजकों से वर्षा-अफवाह आँकड़ों के वृहत्त समूह के उपयोग द्वारा विशिष्ट भूमि उपयोग, मृदा प्रकार एवं उनके सम्मिश्रण के लिये वर्तमान SCS-CN निदर्शों एवं संशोधित मिश्रा एवं सिंह (2003 a) निदर्शों का मात्रात्मक रूप से मूल्यांकन किया।

उपरोक्त पद्धतियाँ यद्यपि CN मानों की गणना (SCS, 1971, हॉकिन्स एवं अन्य 2001) के लिये परिवर्तनीय समय अवधियों (1-क के समान या कम) के पृथक वृष्टि घटकों (सामान्यतः वार्षिक चरम घटकों) का उपयोग करती हैं। परिणामस्वरूप प्राप्त CN परिणाम केवल तीव्र वर्षा एवं लघु अवधि के उन घटकों के लिये ही प्रयोग किये जा सकते हैं जिनसे उन्हें व्युत्पत्ति किया गया है तथा इनका प्रयोग वर्षा की निम्न मात्रा और/या दीर्घ अवधि के लिये उपयुक्त नहीं है। यह सामान्य अनुभव है कि किसी जल विभाजक में प्राप्त वर्षा से अधिक या निम्न अपवाह की मात्रा लघु या दीर्घ समयावधि/समयान्तराल, अन्तःस्यंदन एवं वाष्पन हानियों, तथा जलविभाजक में जल उपलब्ध रहने की अवधि पर निर्भर करती है। अतः दीर्घ अवधि वृष्टि घटनाओं के लिये, वर्षा अवधि पर CN मानों की निर्भरता एवं परिवर्तनीय घटक अवधि के कारण CN परिवर्तनीयता (जो कि AMC के पदो में मूल पद्धति में आकलित की गई है) के अन्वेषण द्वारा मूल SCS-CN पद्धति के अनुप्रयोग का अन्वेषण करना उपयुक्त है। अतः अध्ययन के उद्देश्य निम्न हैं:

1. आर्द्रता स्थितियों के तीन स्तरों (AMC के स्थान पर शुष्क, सामान्य एवं आर्द्र के रूप में वर्णित) एवं जल विभाजक की दीर्घावधि दैनिक वर्षा अपवाह आँकड़ों से विविध अवधियों के लिये CN मानों को व्युत्क्रमित करने हेतु सरल पद्धति को प्रस्तावित करना।

2. वक्र संख्या पर वर्षा अवधि प्रभाव का अन्वेषण करना एवं CN वर्षा अवधि संबंध विकसित करना।

3. जलीय अभिकल्प के लिये वक्र संख्या का निर्धारण करना।

4. व्युत्पत्ति अभिकल्प वक्र संख्या का मान्यकरण करना।

सामग्री एवं विधि


वर्तमान SCS-CN समीकरण को निम्न रूप में प्रस्तुत किया जा सकता है:

. एवं 0.2 एक नियतांक है जो (प्रारम्भिक पृथक्करण नियतांक विमाहीन) का प्रतिनिधित्व करता है। प्राचल S, मृदा प्रकार, भूमि उपयोग, जलीय स्थितियों एवं आर्द्रता स्थिति पर आधारित है अभिकलिप्त CN मान के आंकलन के लिये प्रस्तावित पद्धति निम्न है।

विभिन्न आर्द्रता स्थितियों एवं अवधियों के लिये CN मानों का आंकलन


(अ) उपलब्ध आंकड़ों की अवधि के लिये उपलब्ध दैनिक वर्षा (P) एवं अपवाह (Q) के मध्य समान इकाई (उदाहरणतः मिमी/दिन) में एक श्रेणी तैयार कर इन आँकड़ों से अपवाह गुणक (C=Q/P)>1 का प्रयोग करते हुए (P-Q) आँकड़ों के जोड़ों को अलग करें। इसके पश्चात शेष (P-Q) आँकड़ों को P के घटते क्रम में व्यवस्थित करें तथा वेवुल प्लॉटिंग स्थित सूत्र की सहायता से P को प्रायिकता प्रदान करें। इन आँकड़ों को प्लाट करें।

(ब) CN या S के लिये एक उपयुक्त मान की कल्पना करें तथा समीकरण 1 का प्रयोग करके सभी P मानों के लिये Q के मानों की गणना करें। सम्पूर्ण आँकड़ों के लिये विभिन्न CN मानों के लिये प्रथम चरण P मानों से गणित Q मानों की ऊपरी सीमा को प्रदर्शित करती हुई एक रेखा को प्लाट पर फिट करने का प्रयास करें। सम्पूर्ण P-Q आँकड़ा समय की ऊपरी सीमा में फिट होने वाले निकटतम CN मान का चयन करें। इसी प्रकार सम्पूर्ण आँकड़ों की मध्य एवं निम्न सीमा को प्रदर्शित करने वाले उपयुक्त CN मान के लिये Q रेखाओं की व्युत्पत्ति करें। ये CN मान क्रमशः आर्द्र सामान्य एवं शुष्क स्थितियों के सदृश लिये जाने चाहिए। ध्यान देने योग्य बात यह है कि क्योंकि ये मान दैनिक P-Q आँकड़ों में व्युत्पत्ति किये गये हैं अतः व्युत्क्रमित CN मान 1- D वर्षा अवधि के सदृश होंगे।

(स) उपरोक्त दैनिक P-Q आँकड़ों को जोड़कर, समान अवधि के लिये दो दिवसीय, तीन दिवसीय, चार दिवसीय व्युत्क्रमित करें। ध्यान रहे कि P एवं Q दोनों मान गहराई की इकाई में हैं।

(द) विभिन्न आर्द्र स्थितियों एवं सभी अवधियों के लिये अलग-अलग विकसित सभी P-Q श्रेणियों के लिये CN मानों को व्युत्पत्ति करने हेतु चरण 1 ब को दोहरायें। प्रत्येक आर्द्र स्थिति के लिये उपयुक्त न्यूनतम वर्ग पद्धति का अलग-अलग प्रयोग कर CN एवं वर्षा अवधि के मध्य संबंध स्थापित करें।

2. अभिकल्प CN का आंकलन


(अ) चरण 1, सम्पूर्ण अवधि के लिये संपूर्ण P-Q आँकड़ों पर आधारित है। तथापि अभिकल्प CN के निर्धारण के लिये प्रत्येक वर्ष हेतु दैनिक दो दिवसीय, तीन दिवसीय, P-Q आँकड़ा श्रेणी को चरण-1 के अनुसार ही विकसित किया गया।

(ब) प्रत्येक वार्षिक P-Q श्रेणियों के लिये तीन आर्द्र स्थितियों हेतु CN मानों की व्युत्पत्ति किया गया है। अतः एक वर्ष के लिये प्रत्येक आर्द्र स्थितियों हेतु दी गई, आर्द्र स्थितियों एवं अवधि के लिये केवल एक CN मान उपलब्ध है। यह मान तीनों आर्द्र स्थितियों में से प्रत्येक के लिये तथा विचारणीय अवधि में से प्रत्येक के लिये एक वार्षिक CN श्रेणी विकसित करने के लिये प्रयोग किया गया है। प्रत्येक CN श्रेणी को एक बेतरतीब श्रेणी माना जा सकता है। तथा दो निकटवर्ती वार्षिक CN मानों के मध्य कोई संबंध नहीं है।

(स) दी गई प्रत्येक आर्द्र स्थिति एवं अवधि के लिये वार्षिक CN श्रेणी में उपयुक्त बारम्बरता वितरण स्थापित करें एवं विभिन्न वापसी अवधियों के समय CN मानों को व्युत्क्रमित करें।

(द) अन्य आर्द्र स्थितियों एवं वर्षा अवधियों के लिये क्वान्टम CN मानों के निर्धारण हेतु चरण 4(अ) से 4 (स) को दोहरायें। विभिन्न वापसी अवधियों, विभिन्न आर्द्र स्थितियों, एवं अन्य विभिन्न अवधियों के लिये उपलब्ध CN मानों को उपयोग हेतु प्लाट करें।

3. आंकलित अभिकल्प CN मानों का मान्यकरण


(अ) किसी विशिष्ट अवधि के लिये एक उपयुक्त वितरण के प्रयोग द्वारा विभिन्न वापसी अवधियों के अनुरूप, अभिकल्प P मानों के निर्धारण हेतु वार्षिक (चरम) P श्रेणी विकसित करें।

(ब) विभिन्न वापसी अवधियों के लिये व्युत्पत्ति अभिकल्प वर्षा P मानों से SCS-CN पद्धति (समीकरण-1) एवं समान वापसी अवधि CN का प्रयोग कर अभिकल्प अपवाह की गणना करें। इनकी गणना Q मानों के लिये भी करें।

(स) चरण 3 (अ) के समान ही, समान अवधि एवं वापसी अवधि के लिये प्रेक्षित वार्षिक Q श्रेणी के लिये उपयुक्त वितरण का प्रयोग करक अभिकल्प Q मानों की व्युत्पत्ति करें। चरण 3 (ब) से प्राप्त मानों के साथ तुलना करने के लिये इन मानों की रूढ़िवादी आंकलित अभिकल्प अपवाह के रूप में स्वीकार करें।

अध्ययन क्षेत्र


. बाराकर नदी पूर्वी भारत में दामोदर नदी की मुख्य सहायक नदी है। झारखण्ड के हजारी बाग जिले में पदमा के निकट से उद्गमित होकर पश्चिमी बंगाल के वर्धमान जिले में दिशेरगढ़ के निकट दामोदर नदी में समाहित होने से पूर्व यह नदी छोटा नागपुर के उत्तरी भाग के साथ-साथ मुख्यतः पश्चिम से पूर्व दिशा में लगभग 225 किमी. की दूरी तक प्रवाहित होती है। अध्ययन क्षेत्र 23044’ से 2400’ उत्तरी अक्षांश एवं 86044’ से 86052’ पूर्वी देशान्तर के मध्य स्थित है। नदी का आवाह क्षेत्र 6294 वर्ग किमी. है तथा समुद्र तल से औसत ऊँचाई लगभग 110 मी. है। मुख्य आवाह क्षेत्र जिसमें गंगा मैदानी क्षेत्र तथा दामोदर तटीय क्षेत्र संलग्न है, के अंतर्गत छः प्रकार की मृदा चयनित की गई है। लाल दानेदार मिट्टी (लेटराइट) क्षेत्र में मुख्यतः साल (सोरियावुस्टा) के खुले वन एवं ऊपरी घाटी में लाल एवं पीली दोमट मिट्टी वाले क्षेत्रों में साल के घने वन उपलब्ध हैं। क्षेत्र की जलवायु के अंतर्गत शरद ऋतु में सामान्य ठण्ड एवं ग्रीष्म ऋतु में गर्म एवं आर्द्र मौसम पाया जाता है। भारत के शेष भागों की तरह ही इस क्षेत्र में दो मुख्य वर्षा ऋतुएँ होती हैं। शरद ऋतु में दिसम्बर से मार्च के मध्य यहाँ अल्प वर्षा होती है। गीष्म ऋतु में जून से सितम्बर माह के मध्य वायु का प्रवाह समुद्र से भूमि की ओर होने के कारण इस क्षेत्र की जलवायु में अधिक आर्द्रता, बादल एवं वर्षा होती है। इस घाटी में वार्षिक वर्षा लगभग 1000 मिमी. से 1800 मिमी. तक होती है। आवाह क्षेत्र के अंतर्गत दामोदर बेसिन के ऊपरी एवं मध्य भागों में वार्षिक वर्षा 1209 मिमी. प्राप्त होती है। तथा मुख्य प्लेटू कगार के ऊपर निम्न घाटी में वर्षा की वार्षिक मात्रा 1329 किमी. है तथा वर्षा का यह मान बढ़कर 1500 मिमी. तक हो जाता है। बेसिन में माध्य वार्षिक वर्षा 1300 मिमी. होती है। जिसका लगभग 80 प्रतिशत भाग ग्रीष्म ऋतु (जून-सितम्बर) के दौरान प्राप्त होता है। घाटी के अधिकांश भागों में प्राप्त होने वाला अधिकतम उच्चतम तापमान 460C प्रेक्षित किया गया। ग्रीष्म ऋतु (मई-जून) के मध्य तापमान सामान्यतः 460C से 420C एवं शरद ऋतु (दिसम्बर-जनवरी) के मध्य सामान्य तापमान 230C 260C प्रेक्षित किया गया। माध्य आर्द्रता जुलाई-सितम्बर के मध्य 80 प्रतिशत से मार्च, अप्रैल, मई के मध्य 40 प्रतिशत तक परिवर्तनीय है। चित्र 1 में मैथन बाँध आवाह क्षेत्र को दर्शाया गया है।

परिणाम एवं विवेचना


. जैसा कि ऊपर वर्णित किया जा चुका है मैथन जलविभाजक के लिये 10 वर्षों की उपलब्ध दैनिक वर्षा P एवं अपवाह (Q) आँकड़ा श्रेणियों को कालानुक्रम में सर्वप्रथम व्यवस्थित किया गया। इसके पश्चात इन श्रेणियों का प्रक्रमण इस प्रकार किया गया है कि दैनिक अपवाह नियतांक (Q/P) के उन जोड़ों को जिनके मान 1.0 से अधिक है उन्हें आँकड़ा श्रेणी में अलग कर दिया गया। यह ध्यान देने योग्य बात है कि P एवं Q दोनों मिमी. में है। प्रक्रमित आँकड़ों को P के घटते क्रम में व्यवस्थित किया गया एवं कुल प्लाटिंग पोजीशन सूत्र के प्रयोग द्वारा P की सम्भावना स्थापित की गई। इसके पश्चात CN या S को उपयुक्त मान की कल्पना करके सभी P मानों के लिये Q मानों की गणना की गई तथा उन्हें चित्र 2 में प्लाट किया गया। CN के ट्रायल मानों इस प्रकार चयनित किय गया कि Q रेखा संपूर्ण आँकड़ों की ऊपरी निम्न एवं मध्य सीमा को दर्शाती है। CN मानों की ऊपरी सीमा आर्द्र स्थितियों निम्न सीमा शुष्क स्थितियों एवं मध्य सीमा सामान्य स्थितियों के अनुरूप स्थितियों को दर्शाती है। क्योंकि CN मानों को दैनिक P-Q आँकड़ों से व्युत्क्रमित किया गया अतः इन्हें एक दिवस के समरूप लिया गया। उदाहरणार्थ चित्र 2 एक दिवस अवधि के लिये आर्द्र स्थितियों के द्वारा शुष्क स्थितियों के लिये उपयुक्तता को दर्शाता है। इसी प्रकार दो दिवसीय, तीन दिवसीय, चार दिवसीय इत्यादि P-Q श्रेणी के लिये क्रमशः दो दिवसीय, तीन दिवसीय, चार दिवसीय इत्यादि CN मानों को व्युत्पत्ति किया गया।

. उपरोक्त का अनुसरण करते हुए विभिन्न आर्द्र स्थितियों एवं अवधियों के लिये CN मानों को व्युत्क्रमित किया गया एवं उन्हें चित्र 3 में प्लाट किया गया है। जैसा चित्र में दर्शाया गया है अवधि में वृद्धि होने पर CN मानों में लगभग घातांकी रूप में क्षय होता है। व्युत्पत्ति पद्धति के अनुसार वर्षा अवधि में वृद्धि होने पर सुसंसगत रूप में CN मान कम होते हैं क्योंकि जलविभाजक में जल हानि के लिये समय के वृहत्त अवसर उपलब्ध हैं ये CN मान जलविभाजक विशिष्टताओं का प्रतिनिधित्व करते हैं।

वक्र संख्याओं की ऊपरी एवं निम्न सीमा आर्द्र एवं शुष्क स्थितियों को तथा मध्य सीमा सामान्य स्थिति को दर्शाती है। अध्ययन हेतु 10 वर्षों के आँकड़े प्रयोग किये गये।

अभिकल्प वक्र संख्या का निर्धारण


क्षेत्र की उपयोगिता में वृद्धि के लिये उपर्युक्त वर्णित पद्धति का अनुसरण करते हुए वार्षिक P-Q आँकड़ा श्रेणी के प्रयोग द्वारा विभिन्न अवधियों एवं वापसी अवधियों के लिये अभिकल्प वक्र संख्याओं को व्युत्पत्ति किया गया। प्रत्येक वर्ष के लिये 1 से 3 दिवसों हेेतु तीन आर्द्र स्थितियों के लिये वक्र संख्या मानों को व्युत्क्रमित किया गया। दी गई अवधि एवं आर्द्र स्थिति के लिये बेतरतीब उपरोक्त वार्षिक वक्र संख्या श्रेणियों को स्वीकार करते हुए विभिन्न वापसी अवधियों के समरूप अभिकल्प CN मानों को व्युत्पत्तित करने के लिये विभिन्न बारम्बारता वितरणों का अनुप्रयोग किया गया। तीन वितरणों गम्बल एक्स्ट्रीम मान, लघु नॉर्मल, एवं लघु परसन टाइप III पर प्रयास किये गये तथा मानक त्रुटि एवं CN<100 कसौटी के आधार पर लॉग परसन टाइप III वितरण को स्वीकार कर लिया गया एवं विभिन्न आर्द्र स्थितियों के लिये इनके चित्रण को चित्र (4a-4c) में दर्शाया गया है। इन चित्रों से यह प्रदर्शित होता है कि दी गई वापसी अवधि के लिये, अवधि के बढ़ने पर क्वान्टम CN मान में कमी होती है। तथा इसके विपरीत अवधि के कम होने पर क्वान्टम मान में वृद्धि पाई जाती है। वैकल्पिक रूप से किसी दी गई अवधि में वापसी अवधि के लिये विपरीत प्रवृत्ति प्रदर्शित होती है। इसी प्रकार किसी दी हुई वापसी अवधि के लिये आर्द्र स्थितियों के शुष्क से आर्द्र की ओर प्रगति करने पर अभिकल्प CN मानों में भी वृद्धि होती है।

.

व्युत्पत्ति अभिकल्प वक्र संख्याओं का मान्यकरण


जैसा कि ऊपर वर्णित किया गया है अभिकल्प CN मानों का मान्यकरण निम्न प्रकार से किया गया। लॉग परसन टाइप III वितरण के प्रयोग द्वारा विभिन्न वापसी अवधियों के लिये वार्षिक अधिकतम प्रेक्षित वर्षा श्रेणी की सहायता से अभिकल्प वर्षा मानों की गणना की गई। विभिन्न AMC के लिये समान वापसी अवधि के समरूप अभिकल्प CN मानों के प्रयोग द्वारा समीकरण 1 से अभिकल्प अपवाह की गणना की गई इसको आंकलित अभिकल्प अपवाह (Q-आंकलित) तक माना गया। इसी प्रकार समान पद्धति एवं वर्षा के लिये वितरण के प्रयोग द्वारा विभिन्न वापसी अवधियों के लिये अभिकल्प अपवाह को प्रत्यक्षतः व्युत्पत्तित किया गया। परिणामी अभिकल्प Q मानों को Q प्रेषित के रूप में नामित किया गया। इनकी तुलना विभिन्न आर्द्र स्थितियों एवं वापसी अवधियों के लिये चित्र 5a-5c में आदर्श फिट रेखा के रूप में दी गई है। यह देखा गया है कि दी गई अवधि एवं शुष्क स्थिति के लिये 10 वर्षों तक की वापसी अवधियों के लिये (Q-आंकलित) Q- प्रेषित के निकट है।

निष्कर्ष
1. किसी दी गई अवधि के लिये आर्द्र स्थितियों के आर्द्र से सामान्य, एवं सामान्य से शुष्क तक परिवर्तित होने की अवस्था में CN के मानों में कमी हो जाती है एवं दी गई आर्द्र स्थितियों में अवधि के कम होने पर CN मानों में कमी होती है इसका विपरीत परिणाम भी सम्भव है।

2. दी गई आर्द्र स्थिति एवं वापसी अवधि में वर्षा अवधि के बढ़ने पर CN मान में कमी व वर्षा अवधि में कमी होने पर CN मान में वृद्धि होती है। इसी प्रकार दी गई अवधि के लिये आर्द्रता के शुष्क से आर्द्र की ओर प्रगति करने पर CN मान में वृद्धि होती है।

3. शुष्क स्थितियों के लिये वक्र जनित अभिकल्प अपवाह मान, प्रेक्षित मैथन जल विभाजक के लिये दस वर्षों तक दिये गये दिवस एवं वापसी अवधि के लिये CN जनित अभिकल्प अपवाह मान, अन्य मानों की तुलना में प्रेक्षित मान के निकट है।

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11. पोन्स वी एम एवं हाकिन्स आर एच, अपवाह वक्र संख्या: हैज इट रीच्ड मैच्योरिटी? जर्नल ऑफ हाईड्रोलॉजिक इन्जी ASCE (1) (1996) 11.19.

12. रिट्टर जॉन बी एवं गार्डनर थॉम्स डब्ल्यू, पेनसिलवानिया में रिक्लेमड सतही खानों के लिये अपवाह वक्र संख्या SCS (1956, 1964, 1969, 1971, 1972, 1985, 1993) जलविज्ञान-नेशनल इन्जी. हैन्डबुक (1991).

13. सप्लीमेन्ट ए, खण्ड-4, अध्याय-10 मृदा संरक्षक सेवा, USDA एवं वशिंगटन, डी.सी.

14. यंग आर ए, ऑनस्टेड सी ए, बौस्च डी डी एवं एंडरसन डब्ल्यू पी, AGNPS एक कृषि अबिन्दु स्रोत प्रदूषक निदर्शः एक वृहत्त जल विश्लेषण निदर्श, यू.एस. कृषि विभाग, कौन्स.रिस.रिपो.संख्या, 35 (1987) 77.

सम्पर्क


सुरेनद्र कुमार मिश्रा, अजय कुमार कन्सल, पुष्पेन्द्र कुमार अग्रवाल, एवं निशांत अग्रवाल (Surendra Kumar Mishra, Ajay Kumar Kansal, P.K. Agarwal & Nishant Agarwal), जल संसाधन विकास एवं प्रबंधन संस्थान, भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान रुड़की, (Dept. WRD&M IIT Roorkee, Roorkee-247667 (UK)), राष्ट्रीय जलविज्ञान संस्थान रुड़की, (N.I.T. Kurukshetra PRA, National Institute of Hydrology, Roorkee)

भारतीय वैज्ञानिक एवं औद्योगिक अनुसंधान पत्रिका, 01 जून, 2012

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