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सॉफ्ट कम्प्यूटिंग तकनीकों द्वारा भू-जल स्तर का आंकलन

Author: 
रमा मेहता, विपिन कुमार, कुमार गर्वित, नरेश सैनी
Source: 
राष्ट्रीय जल विज्ञान संस्थान, चतुर्थ राष्ट्रीय जल संगोष्ठी, 16-17 दिसम्बर 2011

देश के विभिन्न भागों में बढ़ती माँग की पूर्ति करने के लिए भूजल का दोहन किया जा रहा है, जिसके परिणामस्वरूप भौमजल स्तर में गिरावट आ रही है इस कारण भविष्य में जल उपलब्धता का गंभीर संकट पैदा हो सकता है। भूजल संसाधनों की प्रक्रिया को समझने एवं भविष्य की सम्भावित परिस्थितियों में क्या हो सकता है यह जानने के लिए भूजल प्रतिदर्शों का बड़े पैमाने पर प्रयोग हो रहा है। भूजल प्रवाह की जटिल समस्याओं पर काबू पाने के लिए ऐसी तकनीकें विकसित करने की आवश्यकता है जो इन समस्याओं का अर्थपूर्ण समाधान प्रदान कर सके। आसान संगणन तकनीकें (soft computing techniques) जल वैज्ञानिक एवं जल संसाधन तंत्र के प्रयोग में केवल जलविज्ञानीय चर राशियों के क्रम रहित होने के कारण ही महत्वपूर्ण नहीं हैं बल्कि निर्णय लेने में अशुद्धता, वस्तुपरखता एवं अस्पष्टता तथा पर्याप्त आंकड़ों की कमी के कारण भी है।

फज्जी लॉजिक तकनीक में इस प्रकार की अनिश्चितता का अच्छे तरीके से ध्यान रखा गया है। इसीलिए उत्तर प्रदेश के बदायूँ जिले हेतु प्रतिदर्श विकसित करने के लिए नई बढ़ती हुई तकनीकों जैसे कि न्यूरो-फज्जी तकनीक एवं ए.एन.एन. का प्रयोग किया गया है। जलविज्ञानीय भविष्य वाणियों में न्यूरो फज्जी तकनीकों का बहुत अधिक प्रयोग किया जा रहा है। जादेह द्वारा विकसित फज्जी सेट की परिकल्पना समतुल्य संबंधों को भाषा की दृष्टि से निम्न, मध्यम एवं उच्च रूप में प्रयोग करने का अवसर प्रदान करती है।

सॉफ्ट कम्प्यूटिंग तकनीकों द्वारा भूजल स्तर का आंकलन (Hybrid subtractive clustering technique for estimation of ground water table)


रमा मेहता, विपिन कुमार, कुमार गर्वित एवं नरेश सैनी
भारतीय वैज्ञानिक एवं औद्योगिक अनुसंधान पत्रिका, 01 जून, 2012

सारांश


देश के विभिन्न भागों में बढ़ती मांग की पूर्ति करने के लिये भूजल का दोहन किया जा रहा है, जिसके परिणामस्वरूप भूजल स्तर में गिरावट आ रही है। इस कारण भविष्य में जल उपलब्धता का गंभीर संकट पैदा हो सकता है। भूजल संसाधनों की प्रक्रिया को समझने एवं भविष्य की सम्भावित परिस्थितियों में क्या हो सकता है यह जानने के लिये भूजल प्रतिदर्शों का बड़े पैमाने पर प्रयोग हो रहा है। भूजल प्रवाह की जटिल समस्याओं पर काबू पाने के लिये ऐसी तकनीकें विकसित करने की आवश्यकता है जो इन समस्याओं का अर्थपूर्ण समाधान प्रदान कर सके। आसान संगणन तकनीकें (soft computing techniques) जलवैज्ञानिक एवं जल संसाधन तंत्र के प्रयोग में केवल जलविज्ञानीय चर राशियों के क्रम रहित होने के कारण ही महत्त्वपूर्ण नहीं है बल्कि निर्णय लेने में अशुद्धता वस्तुपरखता एवं अस्पष्टता तथा पर्याप्त आँकड़ों की कमी के कारण भी हैं। फज्जी लॉजिक तकनीक में इस प्रकार की अनिश्चितता का अच्छे तरीके से ध्यान रखा गया है। इसीलिये उत्तर प्रदेश के बदायूं जिले हेतु प्रतिदर्श विकसित करने के लिये नयी बढ़ती हुई तकनीकों जैसे कि न्यूरो-फज्जी तकनीक एवं ए.एन.एन. का प्रयेाग किया गया है। जलविज्ञानीय भविष्यवाणियों में न्यूरो-फज्जी तकनीकों का बहुत अधिक प्रयोग किया जा रहा है। जादेह द्वारा विकसित फज्जी सेट की परिकल्पना समतुल्य संबंधों की भाषा की दृष्टि से निम्न मध्यम एवं उच्च रूप में प्रयोग करने का अवसर प्रदान करती है।

ABSTRACT


Groundwater scarcity and groundwater table decline at alarming rate create many problems for managers and planners. This problem will be worsening in future as demand for water would rise tremendously due to steady rise in human population. Optimal-exploitation of groundwater in all the areas that are getting fast depleted is required to estimate the groundwater table. Keeping this in view different models have been developed for an Indian catchment located in North-East region of India. Groundwater studies have not been conducted much by researchers for the problematic area of Budaun district where the water table is continuously declining at a faster rate. The present study is taken up to study the groundwater availability in the district. Models have been developed for prediction of water table behaviour and a proper groundwater recharge plan for the problematic areas can be suggested. Over the last decade soft computing techniques like Fuzzy logic and Artificial Neural Networks (ANN) are increasingly used in hydrological studies. Furthemore, their computational speed in simulating and forecasting is very welcomed in real time operations. It is robust and flexible in managing real world complex systems involving uncertainty and imprecise data. Fuzzy Logic Controller (FLC) provides a means of converting a linguistic control strategy based on operator's knowledge into an automatic control strategy. An important feature of fuzzy set theory is the symmetry between the objective function and constraints. During this study a Neuro-Fuzzy approach such as ANFIS (Adaptive Neuro Fuzzy Inference System) subtractive cluster method (SCM) and ANN techniques have been used for monsoon (M) and non-monson (NM) periods in order to estimate the groundwater tables. Input data of the network (ANN) are composed by past measurements of nearby inflow and rainfall, and the quantity of water which has been pumped out from ground during that specific period. Input data are fuzzified with different degrees of of membership. The models are developed and applied for Budaun district in Uttar Pradesh to get the optimum output during monsoon and non-monsoon period. Models developed by SCM techniques give better results than ANN techniques.

प्रस्तावना


फज्जी लॉजिक वर्तमान में प्रयोग में लायी जा रही कार्य प्रणाली को समझने एवं व्याख्या करने का आसान तरीका प्रदान करती है। औद्योगिक कूड़े के पर्यावरणीय प्रभाव का फज्जी अपवाह अध्ययन कुमार द्वारा किया गया है। फज्जी नियमों पर आधारित आधुनिक जलविज्ञानीय प्रतिरूपण का विकास बहुत से अनुसंधानकर्ताओं द्वारा किया गया है।

वर्तमान अध्ययन में आँकड़े मानसून (M) (जून से अक्टूबर) एवं नॉन-मानसून [NM] (नवम्बर से मई) के लिये ANFIS-SCM तकनीकों का प्रयोग कर संसाधित किये गये। मानसून एवं गैर मानसून काल के लिये ANFIS-SCM तकनीकों का प्रयोग कर दो प्रतिदर्शों की कार्य क्षमता का मूल्याकंन, परीक्षण आँकड़ों द्वारा किया गया।

प्रणाली एवं तथ्य


फज्जी प्रतिरूपण हेतु न्यूरल नेटवर्क साहित्य में विकसित विभिन्न तकनीकों में प्रयोग होने वाला न्यूरो फज्जी प्रतिरूपण फज्जी इन्टरफेज सिस्टम (FIS) से सम्बंधित है। FIS के मूलभूत स्वरूप में तीन वैचारिक घटक हैं, एक नियम आधार जिसमें फज्जी नियमों के चयन एक आँकड़ा आधार जो फज्जी नियमों हेतु प्रयोग में लाये जाने वाले MF को परिभाषित करता है एवं एक तर्क-वितर्क प्रक्रिया जो आउटपुट हेतु नियमों पर इन्टरफेस प्रक्रिया पूरी करते हैं (चित्र 1)। FIS, इन्टर स्पेस से आउटपुट स्पेस पर एक अरेखीय मैपिंग कार्यान्वित करता है। इस मैपिंग में बहुत से फज्जी यदि तब (if-then) नियम होते हैं जिनमें से प्रत्येक नियम मैपिंग के स्थानीय व्यवहार का वर्णन करता है। यदि तब नियम के मानदण्ड इनपुट स्पेस के फज्जी क्षेत्र को परिभाषित करते हैं एवं आउटपुट स्पेस के मानदण्ड संबंधित आउटपुट को उल्लेखित करते हैं इस प्रकार FIS की कार्यक्षमता आगणित मानदण्डों पर निर्भर करती है। फज्जी इन्टरफेस सिस्टम का प्रवाह सचित्र चित्र 1 में दिया गया है।

.

फज्जी लॉजिक थ्योरी (FLT)


फज्जी लॉजिक थ्योरी एक इनपुट को एक आउटपुट स्पेस में दर्शाने का सरल तरीका है। फज्जी सिस्टम, लीनियर सिस्टम, एक्सपर्ट सिस्टम, न्यूरल नेटवर्क, डिफरेन्शियल इक्वेशन, इन्टरपोलेटेड मल्टी डाइमेन्शनल लुक उप टेबिल आदि अनेक तरीके इष्टतमीकरण समस्याओं को हल करने हेतु उपलब्ध हैं। इनमें से फज्जी सिस्टम समझने में आसान एवं लचकदार है। इस अध्ययन के दौरान भूजल स्तर मूल्यांकन हेतु सब्ट्रेक्टिव क्लस्टर तकनीक का प्रयोग किया गया।

सब्ट्रेक्टिव क्लस्टरिंग मैथड (SCM)


फज्जी क्लस्टरिंग का उद्देश्य विशाल आँकड़ा समूह से प्राकृतिक समूहीकरण की पहचान करना एवं प्रणाली के व्यवहार का संक्षिप्त प्रतिनिधित्व प्रस्तुत करना है। साहित्य में विभिन्न प्रकार के फज्जी क्लस्टरिंग तरीके जैसे कि फज्जी C-मीन क्लस्टरिंग माउन्टेन क्लस्टरिंग सब्ट्रेक्टिव क्लस्टरिंग एवं गुस्टाफसोन केशल (GK) फज्जी क्लस्टरिंग प्रतिवेदित किये गये हैं।

फज्जी SCM एक आँकड़ा क्लस्टरिंग तकनीक है जहाँ पर प्रत्येक आँकड़ा इकाई एक क्लस्टर से कुछ मात्रा तक संबंधित होती है जो मेम्बरशिप वैल्यू द्वारा स्पष्ट रूप से बतायी जाती है। संख्यात्मक आँकड़ों का गुच्छन बहुत से वर्गीकरणों एवं तंत्र प्रतिदर्श कलन विधि (system modeling algorithms) हेतु आधार बनाता है। इस पद्धति में संगणन आँकड़ा इकाइयों संख्या के अनुपात एवं विचारार्थ समस्या के विस्तार से स्वतंत्र होते हैं। नायक में SCM प्रतिदर्श संरचना पहचान का वर्णन किया है, प्रत्येक क्लस्टर केन्द्र को P- डाइमेन्शनल स्पेस में N आँकड़ा इकाइयों के सेट में प्रत्येक आँकड़ा इकाई को निर्दिष्ट सामर्थ्य मान Pi द्वारा पहचाना जाता है।

. जहाँ पर ra(0) एवं II xi-xjII क्रमशः क्लस्टर अर्धव्यास एवं किसी बिन्दु C से इक्यूलिडियन दूरी है। अधिकतम सामर्थ्य मान (Pi) वाली आँकड़ा इकाई को प्रथम क्लस्टर केन्द्र D1 माना जाता है। अन्य आँकड़ा इकाइयों की सामर्थ्य को प्रथम क्लस्टर केन्द्र के प्रभाव को घटकार संशोधित किया जाता है। संशोधित अधिकतम सामर्थ्य मान वाली इकाई को द्वितीय क्लस्टर केन्द्र (D2) माना जाता है एवं इस प्रक्रिया को अन्य क्लस्टर केन्द्रों की गणना करने हेतु दोहराया जाता है। इस प्रकार आँकड़ा इकाइयों के संशोधित सामर्थ्य मान को Jth क्लस्टर केन्द्र की संगणना के उपरांत इस प्रकार दर्शाया जा सकता है।

. जहाँ rb(rb>ra0) पास की आँकड़ा इकाइयों के कारण घटे हुए अर्धव्यास हैं एवं उनमें बहुत अधिक पास वाले क्लस्टर केन्द्र सम्मिलित नहीं हैं। इस प्रक्रिया को तब तक दोहराया जाता है जब तक कि काफी मात्रा में कल्स्टर केन्द्र प्राप्त नहीं हो जाते एवं जब निम्नलिखित शर्त पूरी हो जाती है तो प्रक्रिया को रोक दिया जाता है।

. जहाँ पर € रद्द अनुपात है। ये क्लस्टर केन्द्र (Di*, i=1, K) फज्जी नियम परिसर के इनपुट डाटा वेक्टर X के केन्द्र के रूप में प्रयोग किये जा सकते हैं। और जिस अवस्था तक नियम i की संतुष्टि होती है उसे गौसियन मेम्बरशिप फंक्शन द्वारा परिभाषित किया जाता है।

. क्लस्टर विश्लेषणों द्वारा नियमों का एक ढाँचा एवं पूर्ववर्ती सदस्यता फलन निर्धारित किया जाता है जो आँकड़ों के व्यवहार को प्रतिरूप देते हैं। ग्लोबल लीस्ट स्क्वायर ऐस्टीमेशन का प्रयोग कर प्रत्येक नियम के लिये तर्कसंगत समीकरण निर्धारित कि जाती है। इस पद्धति का यह फायदा है कि यह गौसियन मेम्बरशिप फंक्शन को फज्जी सेट के रूप में उत्पन्न करती है जो प्रत्येक इनपुट वेक्टर के लिये अनन्त आधार रखती है।

प्रत्येक फज्जी सेट के लिये सदस्यता मूल्य की गणना की जाती है एवं इस वजह से नियम आधार का प्रत्येक नियम कार्य करता है इनपुट एवं आउटपुट चैनलों के संबंधों को ठीक-ठीक व्याख्या करने वाले केवल एकक जोड़ा नियमों के पैदा करने की संभावना रहती है।

अध्ययन क्षेत्र


बदायूँ जिला उत्तर प्रदेश के रूहेलखण्ड क्षेत्र का एक विशिष्ट जिला है जो लगभग 5163 वर्ग कि.मी. के क्षेत्र में फैला हुआ है। यह मुरादाबाद, बरेली, रामपुर, शाहजहाँपुर, इटावा, अलीगढ़ एवं बुलन्दशहर जिलों से घिरा हुआ है। यह क्षेत्र 18 विकास खण्ड चतुर्थ से वर्तमान काल के सिंधु गंगा जलोढ़ उत्तर-पश्चिम से दक्षिण पूर्व की ओर है।

बदायूँ जिला, 79 डिग्री 1’ 20’’ उत्तर देशान्तर एवं 28 डिग्री 2’ 30’’ पू. अक्षांश के मध्य पड़ता है। बदायूँ जिले के दक्षिण-पश्चिम सीमा गंगा एवं पूर्वी सीमा राम गंगा नदी द्वारा निर्धारित की गई है। यहाँ पर जिले में पाँच तहसील (बदायूँ, दातागंज, सहसवान, गुनौर एवं बिसौली) एवं 18 विकास खण्ड हैं जिन्हें चित्र 2 में दर्शाया गया है।

. यहाँ की जलवायु अर्ध-शुष्क उष्णकटिबंधीय है। ग्रीष्म ऋतु में गर्मी एवं शीत ऋतु में सर्दी होती है। जिले की औसत वार्षिक वर्षा 907.2 मिमी है।

भू-विज्ञान की दृष्टि से अध्ययन क्षेत्र में बजरी, रेत, मिट्टी, गाद एवं कंकर हैं। इस क्षेत्र की औसत ऊँचाई सुदूर पूर्व में 245 मीटर से सुदूर उत्तर में 298 मीटर के मध्य है। मृदा आवरण के निचले जलदायी क्षेत्रों में सामान्यतः कंकर युक्त या कंकर विहीन मोटा रेत पाया जाता है।

आँकड़ा प्रक्रमण


बदायूँ जिले के सिंचाई विभाग द्वारा तहसील मुख्यालय पर अभिलेखित 22 वर्षों (1981-2002) की अवधि के मासिक वर्षा आँकड़े एकत्र किये गए। भारत सर्वेक्षण विभाग बदायूँ जिले की 1:2,50,000 पैमाने वाली टोपोशीट एवं जी.आई.एस. सॉफ्टवेयर (जियोमिडिया प्रोफेशनल 5.1 वर्जन) इस अध्ययन हेतु प्रयोग में लाये गये। बदायूँ जिले की टोपोशीट को जिले एवं तहसीलों की सीमा एवं वर्षा मापन केन्द्रों की स्थिति निर्धारण हेतु जियोलॉजिकल इन्फार्मेशन सिस्टम (जी.आई.एस.) प्रयोग कर अंकीकृत किया गया। त्रिभुजों के तन्त्र को बनाने हेतु वर्षा मापन केन्द्रों को जोड़ा गया। वर्षा वितरण के असमान प्रभाव को वर्षा मापन केन्द्रों के क्षेत्रानुसार महत्व के अनुसार प्रतिनिधित्व देने के लिये प्रत्येक वर्षा मापन केन्द्र के थिसिन बहुभुज तैयार किये गये (चित्र 3)। वर्षा मापन केन्द्र के केन्द्र भार निर्धारण एवं ‘‘एरियल पालीगान’’ तैयार करने के लिये थिमेटिक मैप तैयार करने हेतु सामर्थ्यवान साधन जी.आई.एस. का प्रयोग किया।

. किसी मापन केन्द्र को i वे बहुभुज के मीन एरियल प्रेसिपिटेशन (MAP) को उस गेजिंग स्टेशन के प्रेसिपिटेशन प्वाइंट Ri के बराबर माना जाता है।

इसे निम्न प्रकार लिख सकते हैं:

MAPi=Ri(5)

जहाँ i पालिन नम्बर है जो 1 से 5 तक परिवर्तित होता है।

उत्तर प्रदेश के बदायूँ जिले के तहसील मुख्यालयों पर पाँच वर्षा मापन केन्द्र हैं। प्रत्येक तहसील गुन्नौर, बिसौली, सहसवान, बदायूँ एवं दातांगज के लिये थिसिन पॉलीगन एवं जी.आई.एस. सॉफ्टवेयर का प्रयोग कर भार (weight) निर्धारित किये गए।

बदायूँ जिले की औसत वार्षिक वर्षा लगभग 752.03 मि.मी. पायी गई। सारणी 1 में केन्द्र भार, औसत वार्षिक वर्षा एवं बहुभुज क्षेत्रफल को पाँचों तहसीलों के लिये दर्शाया गया है।

 

सारणी 1- बदायूँ जिले की पाँचों तहसीलों के लिये केंद्र भार, औसत वार्षिक वर्षा एवं बहुभुज क्षेत्रफल मौसम केन्द्र बहुभुज क्षेत्रफल

मौसम केन्द्र

 

बहुभुज क्षेत्रफल

औसत वार्षिक वर्षा

केन्द्र भार

(वर्ग कि.मी.)

(मि.मी.)

Wi

गुन्नौर

1003.95

869.36

0.1855

बिसौली

1238.55

695.18

0.2289

सहसवान

947.12

640.41

0.1750

बदायूँ

1271.11

752.03

0.2349

दातागंज

949.95

760.05

0.1755

 


जिले में पाँच तहसीलें एवं 18 विकास खण्ड है। पाँचों केन्द्रो की औसत वर्षा को सभी 22 वर्षों के लिये चित्र 4 में दर्शाया गया है।

. बदायूँ जिले में मानसून एवं नॉन-मानसून ऋतुओं के लिये जलस्तर आँकड़े, सिंचाई विभाग से एकत्र किये गए। पूरे अंतर्वाह आँकड़ों को मानसून अवधि M (जून से अक्टूबर) NM (नवम्बर से मई) के भागों में बाँटा गया है। दोनों ऋतुओं के आँकड़ों के कुल अन्तर्वाह (वर्षा + वापस अपवाह) एवं पम्पों द्वारा भूमि से बाहर निकाले गए पानी को विश्लेषण हेतु इनटपुट डाटा के रूप में प्रयोग में लाया गया।

आँकड़ो का फ्यूजीफिकेशन


सब्ट्रेक्टिव क्लस्टरिंग मैथड (SCM) में दोनों इनपुट आँकड़ों को “G-bell” मेम्बरशिप फंक्शन (MF) एवं थ्री मेम्बरशिप कैटेगरीज (in 1mf1,in 2mf2 एवं in 3mf3) के द्वारा फ्यूजीफाइड किया गया ताकि मानसून काल में मॉडल से सर्वोत्तम परिणाम प्राप्त किये जा सकें। इनपुट इनफ्लो की निम्न एवं उच्च सीमा (600 से 2000) एवं पम्पिंग (500 से 1400) के लिये मेम्बरशिप फंक्शन चित्र 5(a,b) में मानसून काल के लिये एवं चित्र 5(c,d) में नॉन-मानसून काल के लिये इनपुट इनफ्लो (600 से 1300) एवं पम्पिंग (1500 से 2000) हेतु दर्शाये गये हैं।

. इन चित्रों में मानसून काल में इनफ्लों (200mm), नॉन मानसून काल (1300mm) की अपेक्षा अधिक है जबकि पम्पों द्वारा मानसून काल (1400mm) से नॉन मानसून (4000mm) में पम्पों द्वारा पानी का दोहन अधिक किया गया है।

प्रतिदर्श संवर्धन


नई उभरती हुई एस.सी.एम. तकनीक का प्रयोग मानसून एवं नॉन-मानसून काल हेतु प्रतिदर्श विकसित करने हेतु किया गया। त्रुटियों को कम करने के लिये विभिन्न ए.एन.एफ.आई.एस. (ANFIS) आर्किटेक्चरों का प्रयोग किया गया।

एस सी एम (SCM) प्रतिदर्श हेतु प्रशिक्षण


ए.एन.एफ.आई.एस. सब्ट्रेक्टिव क्लस्टरिंग तकनीक द्वारा दो प्रतिदर्शों का प्रशिक्षित किया गया:

1. एस.सी.एम.एम. प्रतिदर्श: मानसून काल हेतु सब्ट्रेक्टिव क्लस्टरिंग प्रतिदर्श
2. एस.सी.एम.एन.एम. प्रतिदर्श: नॉन-मानसून काल हेतु सब्ट्रेक्टिव क्लस्टरिंग प्रतिदर्श

प्रतिदर्श की पहचान दो चरणों में की जाती है: (1) फज्जी क्ल्स्टरिंग पद्धति का प्रयोग कर फज्जी नियमों की संख्या एवं उनसे सम्बद्ध मेम्बरशिप फंक्शन का निर्धारण एवं (2) हाइब्रिड एवं बैंक प्रोपेगेशन तरीकों द्वारा टी.एस. फज्जी मॉडल का इष्टतमीकरण क्लस्टरिंग। सब्ट्रेक्टिव क्लस्टरिंग एप्रोच का प्रयोग नियम आधार एवं मेम्बरशिप फंक्शन की गणना करने के लिये किया जाता है। क्लस्टर केन्द्रों एवं इस प्रकार प्रत्येक केस के लिये अभिनिर्धारित मेम्बरशिप फंक्शन का प्रयोग इष्टतमीकरण पद्धति द्वारा अगले प्राचलों की गणना करने में किया जाता है। अन्ततः एक टी.एस.फज्जी सब -क्लस्टरिंग मॉडल विकसित किया जाता है। प्रत्येक वेक्टर इनपुट के लिये, ‘जी बेल’ मेम्बरशिप फंक्शन से जीरो से अधिक मेम्बरशिप डिग्री की गणना की जाती है। हाइब्रिड ऑप्टीमाइजेशन एप्रोच मानसून एवं नान-मानसून दोनों के लिये उपयोग की गई। सारणी 2, ए. एन.एफ.आई.एस. मॉडल की परीक्षण संरचना को दर्शाती है। प्रशिक्षण त्रुटियाँ (एस.सी.एम.एम.-0.00145, एस.सी.एम.एम.-0.00012), चेकिंग त्रुटियाँ (एस. सी.एम.एन.एम.-0.1321) की अपेक्षा काफी कम है क्योंकि मॉडल को ट्रेनिंग डाटा से ट्रेड करके चेकिंग डाटा के लिये प्रशिक्षित किया गया है।

 

सारणी 2-  ANFIS क्लस्टर मॉडल के ट्रेनिंग स्ट्रक्चर  

 

 

 

 

प्रशिक्षण

चेकिंग

संख्या

त्रुटि

त्रुटि

 

एस.सी.एम.एम.

हाइब्रिड ऑप्टीमाइजेशन

0.00145

0.24518

28/2

एस.सी.एम.एन.एम.

-तदैव-

0.0012

0.1321

22/2

 

परिणाम एवं व्याख्या


एस.सी.एम. तकनीकों द्वारा मानसून काल के आँकड़ों की चेकिंग/वेलिडेशन हेतु प्रयुक्त भूजल स्तर आँकड़े चित्र 6 में दर्शाए गए हैं। इससे पता चलता है कि एस.सी.एम.एम. मॉडल द्वारा भूजल स्तर परिवर्तन मापे गए मान के काफी करीब हैं। इसलिए मानसून काल के एस.सी.एम. मॉडल को भविष्य के आकलनों हेतु सिफारिश की जाती है। चित्र 7 में प्रतिदर्शित एवं प्रेक्षित आँकड़ों के मध्य रेखित संबंध (linear relationship) को दर्शाया गया है।

. कुल मिलाकर 36 प्रेक्षणों के परिणामों को प्रामाणिक बनाने हेतु प्रयास किया गया। एस.सी.एम.एम. प्रतिदर्श बेहतर रेखीय सम्बंध देता है, क्योंकि इसका प्रतिगमन गुणांक (regression coefficient) 0.970 है।

चित्र 8 में नॉन-मानसून काल में डाटा चैकिंग/वेलिडेशन (36 प्रेक्षण) हेतु भूजल स्तर में हुए परिवर्तन को दिखलाया गया है। चित्र 9 में प्रतिगमन गुणांक 0.963 के साथ एस.सी.एम.एन.एम. मॉडल का रेखीय सम्बन्ध दर्शाया गया है।

.

कार्य निष्पादन सूचियाँ


प्रतिदर्श की कार्य निष्पादन क्षमता का मूल्यांकन करने हेतु विभिन्न मूल्यांकन तरीकों पर अपनाये गए उनसे प्राप्त जलालेखों का आँकड़ों की दृष्टि से विश्लेषण किया गया ग्लोबल एरर स्टेटिस्टिक्स, जिसमें संगणित एवं प्रेक्षित अपवाह के मध्य रूट मीन स्क्वॉयर एरर (RMSE) प्रतिगमन गुणांक (R2) एवं वेरेक्स (वेरियन्स का प्रतिशत) के लिये नैश-साइन्टिफिक क्राइटेरिया सम्मिलित हैं, सम्पूर्ण कार्य निष्पादन पर संबंधित सूचनाएं प्रदान करते हैं।

. प्रशिक्षण त्रुटि, प्रशिक्षण आँकड़ा आउटपुट मान एवं उसी प्रशिक्षण आँकड़ा मान के लिये फ्यूजी इन्टरफेस सिस्टम से आउटपुट मान के बीच का अन्तर हैं सभी मॉडलों के कार्य निष्पादन मान को सारणी 3 में दर्शाया गया है।

सारणी तीन से पता चलता है कि एस.सी.एम.एम. मॉडल के लिये ट्रेनिंग आर.एम.एस.ई. का मान 0.0251 है, जो मानसून काल के लिये एस.सी.एम. मॉडल क बेहतर कार्य निष्पादन क्षमता को दर्शाता है। एस.सी.एम.एम. (0.97) एवं एस.सी.एम.एन.एम. (0.963) के प्रतिगमन गुणांक में कोई विशेष बदलाव नहीं है। इससे पता चलता है कि एस.सी.एम. तकनीक भविष्य के विश्लेषणों के लिये अधिक उपयुक्त है। एस.सी.एम.एम. में वेरियेन्स का प्रतिशत 98.495 है जो बहुत अधिक है। इन परिणामों से प्रकट होता है कि एस.सी.एम.एम. एवं एस.सी.एम.एन.एम. प्रतिदर्शों का भविष्य के विश्लेषणों हेतु प्रयोग किया जा सकता है। जल-वैज्ञानिक एवं प्रबन्धक, वर्तमान समय के अंतर्वाह (inflow) एवं पम्पिंग के भूजल स्तर मान प्रतिदर्श का प्रयोग कर सीधे प्राप्त कर सकते हैं। ये परिणाम उन्हें उस क्षेत्र से और पानी दोहन के बारे में निर्णय लेने में सहायता प्रदान कर सकते हैं।

 

सारणी 3 वैलिडेशन डाटा द्वारा मॉडल की कार्य निष्पादन सूचियाँ

क्रम संख्या

कार्य निष्पादन सूची

मानसून काल एस.सी.एम.एम.

नॉन-मानसून काल एस.सी.एम.एन.एम.

1

आर.एम.एस.ई.

0.0251

0.023

2

प्रतिगमन गुणांक

0.9496

0.9172

3

वेरक्स

98.495

98.65

 

निष्कर्ष


उपरोक्त अध्ययन से यह निष्कर्ष निकाला जाता है कि सब्ट्रेक्टिव क्लस्टर तकनीक दिये हुए इनपुट डाटा के लिये भविष्य के भूजल स्तर का अनुमान लगाने हेतु अधिक उपयुक्त है। प्रतिदर्श एस.सी.एम.एम. एवं एस.सी.एम.एन.एम. की मानसून एवं नॉन-मानसून काल में बदायूँ जिले के मैदानों हेतु भूजल स्तर का पता लगाने हेतु सिफारिश की जाती है। इन प्रतिदर्शों का प्रयोग कर जल वैज्ञानिक प्रस्तावित जल योजनाओं के लिये निर्णय ले सकेंगे।

संदर्भ
1. मेयर एच एवं डाण्डी जी, न्यूरल नेटवर्क द्वारा जल संसाधन चरों की भविष्यवाणीः प्रतिदर्श एवं उनके अनुप्रयोगों की एक समीक्षा, एनवायरनमेंट मॉडल सॉफ्टवेयर 15 (1), (2000) 101-124.

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सम्पर्क


रमा मेहता, विपिन कुमार, कुमार गर्वित एवं नरेश सैनी, (Rama Mehta, Vipin Kumar kumar Garvi & Naresh Saini), राष्ट्रीय जल विज्ञान संस्थान, रुड़की, (National Institute of Hydrology, Roorkee), एन.आई.टी. दुर्गापुर, (NIT, Durgapur)

भारतीय वैज्ञानिक एवं औद्योगिक अनुसंधान पत्रिका, 01 जून, 2012

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इस सरल गणितीय समस्या का समाधान करें. जैसे- उदाहरण 1+ 3= 4 और अपना पोस्ट करें
8 + 0 =
Solve this simple math problem and enter the result. E.g. for 1+3, enter 4.