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भूजल में बढ़ते नाइट्रेट एवं फ्लोराइड का कहर एवं उसका प्रबंधन

Author: 
डॉ. डी.डी. ओझा, एच.आर. भट्ट
Source: 
राष्ट्रीय जल विज्ञान संस्थान, चतुर्थ राष्ट्रीय जल संगोष्ठी, 16-17 दिसम्बर 2011

सृष्टि की संरचना में जल का अपना अलग ही वैशिष्टय है। यह पंचमहाभूतों में एक महत्वपूर्ण घटक है। प्रत्येक जीव की सभी शारीरिक क्रियाएं जलाधारित होने के कारण जल को जीवन की दी गई है। जल के उभयचारी रूप हैं- रोगकारक एवं रोगशामक। विश्व स्वास्थ्य संगठन के प्रतिवेदन के अनुसार लगभग 80 प्रतिशत रोगों का कारण भी जल है। इसी प्रकार आयुर्वेदानुसार जल कई रोगों का शामक है। बढ़ती हुई जनसंख्या, शहरीकरण तथा औद्योगिकीकरण जैसे मानवीय कारणों ने हमारे पर्यावरण को प्रदूषित कर दिया है। आज बढ़ रहे रासायनिक उर्वरकों तथा किटनाशियों के प्रयोग ने हमारे जल के सभी स्रोतों, तथा तालाबों, कुओं, नदियों एवं सागर को भी प्रदूषित कर दिया है।

भू-जल, जो कि देश में जलापूर्ति का एक प्रमुख स्रोत है, में बढ़ते हुइ नाइट्रेट, फ्लोराइड तथा आर्सेनिक की मात्रा अमृत रूपी जल को विष बना रही है। हमारे देश के लगभग 20 राज्यों के 2.5 करोड़ लोग फ्लोरोसिस की बीमारी से ग्रसित हैं। पश्चिम बंगाल, छत्तीसगढ़ तथा मध्यप्रदेश के कुछ हिस्सों में आर्सेनिक की आविषालुता तथा देश के अनेक राज्यों के भू-जल में नाइट्रेट का कहर जल को आविषालु (Toxic) बना रहा है। अतः इस दिशा में समुचित प्रयास एक इस चेतना की महती आवश्यकता है।

जल की गुणवत्ता निर्धारण में इसके भौतिक, रासायनिक एवं जैविक गुणों की बहुत महत्वपूर्ण भूमिका होती है। वस्तुतः जल में कोई स्वाद एवं गंध नहीं होती है, परन्तु भूमि के अनुसार उसमें जो खनिज लवण एवं क्षार आदि मिल जाते हैं, वे ही जल का स्वाद प्रकट करते हैं। इसी प्रकार जल में गंध कुछ वनस्पतियों अथवा अन्य पदार्थ इन स्रोतों में मिल जाने के कारण ही होती है।

रासायनिक दृष्टि से पेयजल की उपयुक्तता निर्धारण में नाइट्रेट तथा फ्लोराइड की महती भूमिका होती है। हमारे देश के कई राज्यों के भू-जल में नाइट्रेट, फ्लोराइड एवं आर्सेनिक की सांद्रता अनुमेय परास से अधिक हो जाने के कारण लाखों लोगो इनके दुष्प्रभाव से प्रभावित हो चुके हैं क्योंकि देश के अधिकांश भागों में जलापूर्ति भू-जल पर ही आश्रित है।

भूजल में बढ़ते नाइट्रेट एवं फ्लोराइड का कहर एवं उसका प्रबंधन (Hazards of rising nitrate and fluoride in groundwater and their management)


सारांशः


सृष्टि की संरचना में जल का अपना अलग ही वैशिष्ट्य है। जल पंचमहाभूतों में से एक महत्त्वपूर्ण घटक है। प्रत्येक जीव की सभी शारीरिक क्रियाएँ जलाधारित होने के कारण कहा गया है कि जल ही जीवन है। जल के उभयचारी रूप हैं- रोगकारक एवं रोगशामक। विश्व स्वास्थ्य संगठन के प्रतिवेदन के अनुसार लगभग 80 प्रतिशत रोगों का कारण भी जल है। इसी प्रकार आयुर्वेदानुसार जल कई रोगों का शामक है। बढ़ती हुई जनसंख्या, शहरीकरण तथा औद्योगिकीकरण जैसे मानवीय कारणों ने हमारे पर्यावरण को प्रदूषित कर दिया है। आज बढ़ रहे रासायनिक उर्वरकों तथा कीटनाशियों के प्रयोग ने जल के सभी स्रोतों, यथा तालाबों, कुँओं, नदियों एवं सागर को भी प्रदूषित कर दिया है। भूजल, जो कि देश में जलापूर्ति का एक प्रमुख स्रोत है, में बढ़ते हुए नाइट्रेट, फ्लोराइड तथा आर्सेनिक की मात्रा अमृत रूपी जल को विष बना रहे हैं। हमारे देश के लगभग 20 राज्यों के 2.5 करोड़ लोग फ्लोरोसिस की बीमारी से ग्रसित हैं। पश्चिम बंगाल, छत्तीसगढ़ तथा मध्य प्रदेश के कुछ हिस्सों में आर्सेनिक की आविषालुता तथा देश के अनेक राज्यों के भूजल में नाइट्रेट का कहर जल को आविषालु (Toxic) बना रहा है। अतः इस दिशा में समुचित प्रयास एवं जनचेतना की महती आवश्यकता है। जल की गुणवत्ता निर्धारण में इसके भौतिक, रासायनिक एवं जैविक गुणों की बहुत महत्त्वपूर्ण भूमिका होती है। वस्तुतः जल में कोई स्वाद एवं गंध नहीं होती है, परंतु स्थान तथा भूमि के अनुसार उसमें जो खनिज लवण एवं क्षार आदि मिल जाते हैं, वे ही जल का स्वाद प्रकट करते हैं। इसी प्रकार जल में गंध कुछ वनस्पतियों अथवा अन्य पदार्थों के मिल जाने के कारण ही होती है। रासायनिक दृष्टि से पेयजल की उपयुक्तता निर्धारण में नाइट्रेट तथा फ्लोराइड की महती भूमिका होती है। भारत के कई राज्यों के भूजल में नाइट्रेट, फ्लोराइड एवं आर्सेनिक की सांद्रता अनुमेय परास से अधिक हो जाने के कारण लाखों लोग इनके दुष्प्रभाव से प्रभावित हो चुके हैं क्योंकि इन क्षेत्रों के अधिकांश भागों में जलापूर्ति भूजल पर ही आश्रित है।

Abstract


Water occupies unique position in the universe. It is an essential component in five elements required for any living being. As all the metabolic reactions of every living organism are water based therefore, water is considered as “Life’’. Water prevails an amphibious role viz. as carrier of diseases and as a medicine. World Health Organization report reveals that 80% diseases are waterborne. Likewise, ayurveda reveals that water is an elixir and acts as medicine. Due to increasing demographic pressure, urbanization and industrialisation the quality of our environment is being polluted and water quality is deteriorated. Increasing use of chemical fertilizers and insecticides have further aggravated the problem which in turn have contaminated all water resources, viz. ponds, wells, rivers and oceans. Ground water, being main source of water supply in India is becoming enriched with toxicities of nitrate, fluoride and arsenic, thereby converting an elixir of life to toxic liquid. In India 2.5 crore people are afflicted with the disease ‘fluorosis’ and are leading vegetative life. Major areas of West Bengal, Chhattisgarh and Madhya Pradesh are prone to problem of arsenic toxicity in groundwater whereas, major parts of Punjab, Haryana, Rajasthan, Madhya Pradesh, Delhi and Maharashtra are afflicted with the problem of nitrate toxicities in ground water. The physical chemical and bacteriological properties of water are important in judging the suitability of water for potable purpose . Potable water should be devoid of any taste, Colour and odour. The increased concentration of nitrate and fluoride in groundwater have created socio-economic problem and have adversely affected the livelihood of inhabitants. Therefore for sustainable development immense and immediate efforts are required to combat the problem. In the present communication the extent of problem, distribution of various hydro chemical parameters, their health effects and management measure will be discussed comprehensively.

भूजल में घुलता नाइट्रेट का जहर


नाइट्रेट- नाइट्रोजन तथा ऑक्सीजन के संयोग से बने हुए कई ऐसे यौगिक होते हैं जो मानव के उपभोग हेतु अनेक खाद्य पदार्थों विशेषतः सब्जियों, मांस एवं मछलियों में पाए जाते हैं। वस्तुतः नाइट्रेट जैविक नाइट्रोजन के वायु स्थिरीकरण के अंतिम उत्पाद होते हैं। ये जलीय एवं स्थलीय प्रक्रम के ऊष्मागतिक स्थिर रूप भी हैं। यह विदित है कि पौधों को वानस्पतिक वृद्धि के लिये नाइट्रोजन की आवश्यकता होती है तथा वे इसकी पूर्ति वायु अथवा जल में घुलनशील नाइट्रेट से करते हैं। यह देखा गया है कि नाइट्रेट की जल में अत्यधिक घुलनशीलता तथा मृदा कणों की कम धारण क्षमता के कारण अति सिंचाई या अति वर्षा से खेतों में से बहता पानी अपने साथ नाइट्रेट को भी बहाकर कुँओं, नालों एवं नहरों में ले जाता है। इस प्रकार मनुष्य और पशुओं के पीने का पानी नाइट्रेट द्वारा प्रदूषित हो जाता है।

यह देखा गया है कि प्रकृति में पाए जाने वाले जल में सभी नाइट्रोजनीय पदार्थों की स्वतः यह प्रवृत्ति होती है कि ये नाइट्रेट में परिणित हो जाते हैं। भूजल में उपलब्ध अन्य लवणों की भांति नाइट्रेट भूमिगत जल में पृथ्वी के भूजलीय एवं जैवमंडलीय नाइट्रोजन-चक्र के माध्यम से प्रवेश करते हैं। भूजल में नाइट्रोजन यौगिक मुख्यतः नाइट्रेट, नाइट्राइट तथा अमोनियम के रूप में मिलते हैं। भूमि में नाइट्रोजन भी अनेक स्रोतों से प्रवेश करती है। कुछ पौधे जैसे अल्फा, फलीदार एवं दालों वाले पौधे वायुमंडल से सीधे नाइट्रोजन ग्रहण करते हैं। कुछ भाग इनके द्वारा सोख लिया जाता है तथा बची हुई नाइट्रोजन जल में नाइट्रेट के रूप में घुलकर मिट्टी के माध्यम से अंततः भूजल में मिल जाती है।

मृदा में नाइट्रोजन के अन्य स्रोतों में सड़े-गले पौधे, पशु अवशेष तथा नाइट्रोजन युक्त उर्वरक भी सम्मिलित होते हैं। इसके अतिरिक्त मल जल उनके संग्रह क्षेत्रों से मृदा में रिसने से भी भूजल में नाइट्रेट की अधिकता हो जाती है। नाइट्रेट आधिक्य वाले भूगर्भीय स्रोतों में चट्टानें, जीवाश्म ईंधन, नाइट्रेट निक्षेप, मैग्मामय चट्टानें तथा मृत्तिका पट्टी प्रमुख होती हैं। कई उद्योगों जैसे रासायनिक उर्वरकों, आसवनी (डिस्टलरी) बूचड़खानों तथा मांस पकाने आदि के बहि-स्रावों में नाइट्रोजनीय यौगिक विद्यमान रहते हैं जो कि अंतः-स्यंदन (फिल्टरेशन) की क्रिया द्वारा भूजल तक पहुँच जाते हैं। कच्चे तथा पूर्णतया उपचारित किए बिना मल-जल भूमि पर फैलता रहता है तथा अंततोगत्वा भूजल को प्रदूषित करता है।

राजस्थान के परिप्रेक्ष्य में यह भी प्रेक्षित किया गया है कि मरु क्षेत्रों के अनेक स्थानों पर गर्मियों मे प्रायः पशु तालाब या बावड़ी के पास आकर बैठते हैं क्योकि यहाँ उन्हें कुछ ठंडक मिलती है, वहाँ स्वभावतः उनका मल-मूत्र भी एकत्रित होता रहता है जो कि वर्षा के समय निक्षालित होकर जल स्रोतों में चला जाता है। लेखक ने राजस्थान के मरुस्थलीय क्षेत्रों के कई कुँओं में यह प्रेक्षित किया कि कुँओं की आंतरिक दीवारों में कबूतरों ने अपने बैठने के लिये कई स्थान बना रखे हैं। उनके निरंतर मल-मूत्र विसर्जन एवं वृक्षों की पत्तियों आदि के जल में गिरने से भी इन क्षेत्रों के कुँओं में नाइट्रेट की सांद्रता अधिक बढ़ जाती है। इसी प्रकार कृषि कार्यों में प्रयुक्त कवक एवं कीटनाशकों के अत्यधिक उपयोग से भी भूजल में नाइट्रेट की मात्रा बढ़ जाती है। सतही जल में नाइट्रोजन यौगिकों का प्रवेश तथा सामुदायिक, कृषिय तथा औद्योगिक अपशिष्ट से भी भूजल में नाइट्रेट की सांद्रता बढ़ती है। जब अधिक नाइट्रेट युक्त भूजल को पंप द्वारा निकालकर पीने के काम में लिया जाता है तब यह मानव एवं पशुओं के शरीर में पहुँचकर विभिन्न प्रकार के रोग उत्पन्न कर देता है।

भारतीय भूजल में नाइट्रेट


भारत के विभिन्न भागों के भूजल के रासायनिक विश्लेषण द्वारा ज्ञात किया गया है कि नाइट्रेट आयन जिसकी सांद्रता जल विश्लेषण के परिणामों में नगण्य समझी जाती थी आज अधिकांश क्षेत्रों में अत्यधिक मात्रा में पाई गई है। हमारे देश की जनसंख्या एक अरब को पार कर चुकी है। अतः इतनी जनसंख्या के भरण-पोषण के लिये अत्यधिक अनाज उत्पादन हेतु रासायनिक उर्वरकों का अधिकतम उपयोग हो रहा है। विगत वर्षों में देश में नाइट्रोजनीय उर्वरकों की खपत भी बहुत बढ़ी है। देश के कई स्थानों के वैज्ञानिकों ने भूजल में बढ़ती हुई नाइट्रेट सांद्रता का प्रभावी कारक नाइट्रोजन उर्वरक को ही माना है। यह भी प्रेक्षित किया गया है कि ग्रामीण क्षेत्रों में संतुलित उर्वरक की अपेक्षा मात्र नाइट्रोजन उर्वरक का उपयोग करते हैं जिससे ऐसी स्थिति पैदा हुई है। देश के कुछ राज्यों के भूजल में नाइट्रेट के अधिकतम मान को सारणी 1 में दर्शाया गया है।

 

सारणी 1 - देश के कुछ राज्यों के भूजल में नाइट्रेट का अधिकतम मान

क्र.सं.

राज्य

अधिकतम नाइट्रेट मान (मिग्रा./लीटर)

1

पश्चिम बंगाल

480

2

उड़ीसा

310

3

बिहार

350

4

उत्तर प्रदेश

695

5

दिल्ली

625

6

हरियाणा

1800

7

पंजाब

565

8

जम्मू एवं कश्मीर

275

9

हिमाचल प्रदेश

180

10

मध्य प्रदेश

470

11

गुजरात

410

12

आंध्र प्रदेश

360

13

तमिलनाडु

1030

14

राजस्थान

2800

स्रोत: डॉ.बी.के. हांडा 1981

डॉ. डी.डी. ओझा (1991, 1993, 1999, 2004, 2009)

 

 

सारणी 2- मरुस्थलीय क्षेत्र के कुछ जिलों के भूजल में अधिकतम नाइट्रेट एवं फ्लोराइड मान

जिले का नाम

नाइट्रेट (मि.ग्रा./लीटर)

फ्लोराइड (मि.ग्रा./लीटर)

पाली

1020

12

बाड़मेर

1900

19.6

बीकानेर

1600

16

चुरू

2400

30

झुंझुनू

1100

14.5

जालोर

1400

14

सीकर

2155

15

नागौर

2800

34

जैसलमेर

1200

12

 

राजस्थान के परिप्रेक्ष्य में विशेषतः मरुस्थलीय क्षेत्रों के भूजल में नाइट्रेट की सांद्रता बहुत अधिक पाई गई है। सारणी 2 में मरुस्थलीय क्षेत्रों के भूजल में अधिकतम नाइट्रेट एवं फ्लोराइड के मान को दर्शाया गया है।

सारणी 2 के अध्ययन से विदित होता है कि मरुस्थल के यद्यपि सभी जिलों के भूजल में नाइट्रेट की विषाक्तता पाई गई है, परन्तु चुरू एवं नागौर जिले इससे सर्वाधिक प्रभावित पाए गए हैं। इन जिलों के 75% भूजल में नाइट्रेट का मान निर्धारित अनुमत परास से अधिक है।

नाइट्रेट के मानक


नाइट्रेट के मानव एवं मवेशियों में बढ़ते घातक प्रभावों को ध्यान में दृष्टिगत रखते हुए विश्व के कई देशों के स्वास्थ्य संस्थानों ने पेयजल में नाइट्रेट के मानक निर्धारित किए हैं जिन्हें सारणी 3 में दर्शाया गया है।

 

सारणी 3- विभिन्न देशों/संस्थानों द्वारा पेयजल में निर्धारित नाइट्रेट परास

देश/संस्थान

नाइट्रेट-नाइट्रोजन (मि.ग्रा./लीटर)

नाइट्रेट (मि.ग्रा./लीटर)

विश्व स्वास्थ्य संगठन

10

45

यू.एस. एन्वायर्न्मेंटल प्रोटेक्शन एजेंसी (पर्यावरण रक्षण एजेंसी)

10

45

भारतीय मानक ब्यूरो एवं भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद

10

45

कनाडा

10

45

पोलैंड

10

45

ई.ई.सी.

11.30

50

बुल्गारिया

6.7

30

बेल्जियम

11.3

50

डेनमार्क

11.3

50

फिनलैंड

6.8

30

हंगरी

9.0

40

यू.के.

11.3

50

संयुक्त राज्य अमरीका

10

45

 

पेयजल में नाइट्रेट के दुष्प्रभाव


पेयजल में नाइट्रेट की अधिक सांद्रता मानव, मवेशी जलीय जीव तथा औद्योगिक क्षेत्र को भी दुष्प्रभावित करती है। इसकी विषयक जानकारी निम्नवत है :

नाइट्रेट एवं स्वास्थ्य


जल रोगकारक तथा रोगशामक दोनों रूपों में अपनी भूमिका निभाता है। वस्तुतः नाइट्रेट स्वयं स्वास्थ्य पर कोई प्रतिकूल प्रभाव नहीं डालता है परन्तु इसके नाइट्राइट में अपचयन (reduction) से निश्चित रूप से इसकी अत्यल्प मात्रा भी घातक हो जाती है। नाइट्रेट जब जल या भोजन के माध्यम से शरीर मे प्रवेश करता है तो मुँह तथा आंतों में स्थित जीवाणुओं द्वारा नाइट्राइट में परिवर्तित कर दिया जाता है जो कि सशक्त ऑक्सीकारक (ऑक्सीडेन्ट) होता है। यह रक्त में विद्यमान हीमोग्लोबिन में उपलब्ध लौह के फैरस (Fe2+) रूप को फैरिक (Fe3+) में बदल देता है। इस प्रकार हीमोग्लोबिन मैथेमोग्लोबिन में बदल जाता है, जिसके कारण हीमोग्लोबिन अपनी ऑक्सीजन परिवहन की क्षमता खो देता है। अत्यधिक रूपांतरण की स्थिति में आंतरिक श्वास-अवरोध हो सकता है जिसके लक्षण चमड़ी तथा म्यूकस झिल्ली के हरे-नीले रंग से पहचाने जा सकते हैं। इसे ब्ल्यू बेबी या साइनोसिस भी कहते हैं। छोटे बच्चों में यह रूपांतरण दुगुनी गति से होता है क्योंकि वे मैथेमोग्लोबिनेमिया के प्रति अधिक संवेदनशील होते हैं। छोटे बच्चे जो स्तनपान करने वाले होते हैं उनकी माताओं द्वारा उच्च नाइट्रेट युक्त जल पीने से दूध भी नाइट्रेट विषक्तता हो जाती है।

मैथेमोग्लोबिनेमिया, जिसको कि द्वितीय विषाक्तता के नाम से जाना जाता है, के अतिरिक्त तृतीयक विषाक्तता नाइट्रोसोएमीन यौगिक के बनने पर होती है। शरीर में नाइट्रेट तथा एमीन की अभिक्रिया के फलस्वरूप ही नाइट्रोसोएमीन उत्पन्न होती है। एमीन हमारे भोजन द्वारा भी मिलती है। विभिन्न अनुसंधान परिणामों ने यह सिद्ध कर दिया है कि नाइट्रोसोएमीन अत्यधिक तीव्र कैंसर उत्पन्न करने वाले होते हैं। प्रायः नाइट्रेट का नाइट्राइट में परिवर्तित होना जीवाणुओं (बैक्टीरिया) की सहायता से होता है जो कि जल वितरण लाइनो में, पेय तथा खाद्य पादार्थों में व्याप्त जीवाणुओं के अपचयन से अांत तथा आमाशय एवं दंत गुहिका के माध्यम से प्रवेश करते हैं।

नाइट्रेट एवं मत्स्य उत्पादन


वैज्ञानिक अनुसंधानों से विदित हुआ है कि अपतृणों (weeds) के अत्यधिक जमाव से लगभग समस्त झीलें निष्क्रिय हो गई हैं। जल तंत्रों के आवाह क्षेत्र में हो रहे है आर्थिक विकास कार्य के बढ़ते स्वरूप ने बिना किसी योजना के अनेक प्रकार के रसायन, पोषक तत्व, रेत आदि की झीलों में प्रवाहित किया है। इस कारण जल संसाधन अतिपोषण से ग्रस्त हो चुके हैं। अपतृणों के अत्यधिक उत्पादन से जल संसाधनों की तलछट में कार्बनिक वर्ग के पदार्थों का जमाव निरंतर बढ़ रहा है, जो मृत जल संसाधनों की तलछट में कार्बनिक वर्ग के मृदा अपतृणों के अवशेष हैं। इस कारण जल-संसाधनों में सुपोषण एक समस्या बनती जा रही है।

जलस्रोतों में बढ़ते हुए नाइट्रेट तथा फॉस्फेट स्तर के कारण पोषक तत्वों की मात्रा बहुत बढ़ जाती है, फलतः नील-हरित शैवाल (algae) की अत्यधिक वृद्धि हो जाती है जो सुपोषण का एक प्रमुख कारण बन जाती है। यह शैवाल वृद्धि जलस्रोतों में अरुचिप्रद स्थिति उत्पन्न कर देती है, क्योंकि कुछ नील-हरित शैवाल विषैली होती हैं। ऑक्सीजन की कमी होने के कारण अवायवीय स्थिति उत्पन्न हो जाती है जिसके कारण मछलियों की मृत्यु हो जाती है।

नाइट्रेट का पशुओं पर प्रभाव


सभी रोमंथी पशुओं जैसे गाय, भैंस, बकरी इत्यादि में नाइट्रेट विषाक्तता देखी गई है। जई, बाजरा, मक्का गेहूँ, जौ, सूडान ग्रास तथा राई घास ऐसे पौधे हैं जिनमें नाइट्रेट की मात्रा अधिक होती है ये चारे हमेशा ही विषाक्त हो ऐसा नहीं है कुछ परिस्थितियों को छोड़कर ये पशुओं के लिये उत्तम हैं। यदि चारे को ऐसी भूमि में उगाया जाए जिसमें कार्बनिक तथा नाइट्रोजन तत्व अधिक हों और नाइट्रोजन उर्वरक अधिक मात्रा में प्रयोग किए गए हों अथवा जल्दी में यूरिया जैसे उर्वरक चारों ओर छिड़काव किया गया हो तो ऐसी स्थिति में इन चारों में नाइट्रेट विषाक्तता अधिक हो जाती है। अनुसंधानों से विदित हुआ है कि गोबर एवं पेशाब के गड्ढों पर उगने वाली पारा घास में नाइट्रेट विष की मात्रा 4.73 प्रतिशत तक हो सकती है। जिस चारे में 1.5 प्रतिशत से अधिक नाइट्रेट (पोटैशियम नाइट्रेट के रूप में) होता है। उसको खाने पर पशुओं में विषाक्तता उत्पन्न हो सकती है। नाइट्रेट विषाक्तता पशुओं में जठर आंत्र शोध उत्पन्न करता है। चारागाह में चरते हुए पशुओं की इस कारण अचानक मृत्यु भी देखी गई है। तेज दर्द, लार-गिरना, कभी-कभी पेट फूलना तथा बहुमूत्रता (polyurea) जैसे लक्षणों के साथ रोग का एकाएक प्रकोप होता है। इससे शीघ्र ही निराशा, कमजोरी व अवसन्नता के लक्षण प्रकट हो जाते हैं। श्वास का तेजी से चलना तथा श्वास में कष्ट होेना, तेज नाड़ी, लड़खड़ाना एवं तापमान का कम हो जाना भी इस रोग के अन्य लक्षण हैं। भारतीय पशु चिकित्सा अनुसंधान संस्थान, इज्जतनगर, बरेली के वैज्ञानिकों ने पारा घास खाने से बछड़ों में अति तेज नाइट्रेट विषाक्तता और बकरियों में चिरकारी नाइट्रेट विषाक्तता प्रेक्षित की है। देश के शुष्क क्षेत्रों में अत्यधिक नाइट्रेट युक्त जल गर्मियों के दिनों में प्यासे पशु जब एक साथ अधिक पानी पी लेते हैं तो उनमें नाइट्रेट विषाक्तता उत्पन्न हो जाती है जो कभी-कभी उनकी मृत्यु का कारण भी बन जाती है। कई दुधारू पशुओं में नाइट्रेट युक्त पानी पीने से दूध में कमी एवं गर्भपात भी देखे गए हैं।

केंद्रीय तंत्रिका तंत्र एवं हृदय तंत्र पर प्रभाव


रूस के वैज्ञानिकों (पेटूकोव तथा इवानोव) ने नाइट्रेट विषाक्तता से केंद्रीय तंत्रिका तंत्र को कुप्रभावित करने के परिणाम भी देखे हैं। उन्होंने रूसी बच्चों में ये प्रभाव 105 से 182 मिलीग्राम प्रति लीटर नाइट्रेट सांद्रण में ही प्रेक्षित किए हैं। उच्च मेथेमोग्लोबिन स्तर की इस कार्य में महती भूमिका होती है। इसी प्रकार पेयजल में उच्च नाइट्रेट सांद्रण से हृदय संवहनी तंत्र (vascular system) पर भी प्रतिकूल प्रभाव देखे गए हैं।

नाइट्रेट तथा कैंसर


जैसा कि वर्णित किया जा चुका है कि नाइट्रेट जब भोजन अथवा जल के माध्यम से हमारे शरीर में पहुँचता है तो यह नाइट्राइट में परिवर्तित हो जाता है। यह नाइट्राइट पुनः द्वितीयक एमीन, एमाइड तथा कार्बेमेट से अभिक्रिया करके एन-नाइट्रोसो यौगिक बनाता है जो कि अत्यधिक कैंसरकारी होते हैं। अनुसंधान परिणामों से विदित हुआ है कि उच्च नाइट्रेट युक्त जल तथा जठर कैंसर में गहरा संबंध होता है। पारिस्थितिकी (इकोलॉजिकल) अध्ययन भी यही दर्शाता है कि भोजन अथवा जल में नाइट्रेट की उच्च मात्रा कैंसर उत्पन्न करने में सहायक होती है। इस कार्य में क्षेत्र विशेष में किया गया सर्वेक्षण (कैंसर पीड़ित रोगी तथा पेयजल में अधिक नाइट्रेट) भी धनात्मक परिणाम देता है।

चिली देश में जहाँ सर्वाधिक जठर कैंसर के रोगी हैं, वहाँ भोजन एवं पानी में उच्च नाइट्रेट मान इस रोग का सामान्य कारण माना जाता है। मुख्य रूप से ग्रामीण क्षेत्रों में जहाँ अत्यधिक नाइट्रोजनीय उर्वरकों का उपयोग होता है, वहाँ के कुँओं में निक्षालन द्वारा नाइट्रेट की मात्रा बढ़ जाती है। इसी प्रकार हंगरी में कई रोगियों के पाचन तंत्र में अर्बुद (ट्यूमर) होने के कारणों में भी पेयजल में अत्यधिक नाइट्रेट होने को मुख्य कारण माना गया है। चीन में किए जानपदिक अनुसंधान परिणाम दर्शाते हैं कि पेयजल में उच्च नाइट्रेट होने से ग्रसिका (इसोफेगस) कैंसर भी हो जाता है अधिक नाइट्रेट जठरांत्र के म्यूकस आस्तर में उत्तेजना उत्पन्न करता है तथा इससे प्रवाहिका (डायरिया) एवं मूत्रल रोग भी हो जाते हैं। यह देखा गया है कि प्रायः तंबाकू सेवन करने वालों एवं सिगरेट पीने वालों के शरीर में नाइट्रोसोएमीन के पूर्वगामी (जैसे निकोटीन या एरीकोलीन तथा थायोसायनेट आदि) का स्तर बढ़ जाता है। अनुसंधान परिणामों से ज्ञात हुआ है कि ऐसी स्थिति में सामान्य व्यक्तियों की अपेक्षा अंतर्जात नाइट्रोसो यौगिकों का संश्लेषण उच्च गति से होता है। अतः ऐसे व्यक्तियों में कैंसर की संभावना बढ़ जाती है।

नाइट्रेट अधिकता एवं उद्योग


यह देखा जा चुका है कि ऊन उद्योग में ऊन तथा सिल्क धागों के रंजन में नाइट्रेट की अधिकता घातक होती है। इसी प्रकार किण्वन प्रक्रमों (फर्मन्टेशन प्रोसेस) में नाइट्रेट विषाक्तता हानिकारक होती है तथा शराब में भी अवांछनीय स्वाद उत्पन्न करती है। मद्यकरण जल में नाइट्रेट का सांद्रण 30मिग्रा./लीटर ही वांछनीय है। वैज्ञानिकों के अनुसार किण्वन प्रक्रिया में अत्यधिक नाइट्रेट आंशिक रूप में नाइट्राइट में परिवर्तित हो जाता है। इसलिये ये खमीर (यीस्ट) के लिये विषाक्त हो जाता है।

नाइट्रेट अपनयन


नाइट्रेट में जल के कहर को देखते हुए इसके अधिक सांद्रण को कम किया जाना चाहिए। जल में नाइट्रेट की अत्यधिक घुलनशीलता के कारण इसका जल से अपनयन दुष्कर कार्य होता है। कृषि प्रधान देशों में नाइट्रेट प्रदूषण एक बड़ी भारी समस्या बन चुकी है जिसका उन्मूलन नितांत आवश्यक है। वर्तमान में किए गए सर्वेक्षण के आधार पर पर हमारे देश के 16 राज्यों यथा राजस्थान, गुजरात, तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश, हरियाणा, कर्नाटक, लक्षद्वीप, मध्य प्रदेश, बिहार, पंजाब, महाराष्ट्र, उड़ीसा, हिमाचल प्रदेश, दिल्ली, जम्मू एवं कश्मीर तथा पश्चिम बंगाल के भूजल में नाइट्रेट का सांद्रण 45 मिलीग्राम प्रति लीटर से अधिक है। इनमें कई राज्यों के भूजल में कुल घुलनशील ठोस का मान भी अधिक है। भूजल से नाइट्रेट अपनयन की विधियों की लागत, स्थान, भूजलीय अवस्था तथा कृषि स्थिति पर निर्भर करती है। इन क्षेत्रों में अत्यधिक नाइट्रेट युक्त जल का नाइट्रेट मुक्त जल से तनुकरण भी एक सरल विधि हो सकती है। सामान्यतया उच्च नाइट्रेट युक्त जलों में कुल घुनलशील ठोस (टी डी एस) का मान भी अधिक होता है। अतः ऐसे क्षेत्रों में निर्लवणीकरण की मानक विधियाँ जैसे कि उत्क्रम परासरण एवं इलेक्ट्रोडायलेसिस भी नाइट्रेट अपनयन में काम में ली जा सकती हैं।

जीवाणुओं द्वारा नाइट्रेट की प्राकृतिक अपघटन विधि से भी नाइट्रेट का अपनयन किया जा सकता है। विनाइट्रीकरण के लिये आंशिक ऑक्सीकरण, अधिक पीएच मान, तापमान सूक्ष्म जीवाणुओं के अपचयन कर्मकों की पर्याप्त पूर्ति की आवश्यकता होती है। सूक्ष्म जीवाणुओं के प्रकार के अनुसार अपचयन कर्मक का अनुप्रयोग होता है, जैसे हाइड्रोजन (स्वपोषित जीवाणु) अथवा जैविक कार्बन यौगिक (परपोषित जीवाणु) आदि। लघुकालीन विनाइट्रीकरण के लिये उच्च सांद्रित जीवाणु उपयुक्त वाहक पर उपयोग में लाये जाते हैं। उपचार के पश्चात ऑक्सीजन वृद्धि के लिये वातन, अपशिष्ट पदार्थों के निष्कासन हेतु सक्रिय कोयला निस्यंदन तथा नाइट्रेट मुक्त जल का रोगाणुनाशन किया जाता है। इस विधि की यह विशेषता है कि केवल नाइट्रेट यौगिक ही नाइट्रोजन गैस में परिवर्तित होते हैं तथा जल की अन्य गुणवत्ता में कोई अंतर नहीं आता है। इसमें किसी भी पृथक्करण तथा पूर्व उपचार की भी आवश्यकता नहीं रहती है। इसके विपरीत इस विधि की कमी यह है कि जल की कार्बोनेट कठोरता बढ़ती है तथा पूर्ण नाइट्रेट अपनयन हेतु विस्तृत जाँच की आवश्यकता होती है। पेयजल आपूर्ति में नाइट्रेट मुक्त जल प्राप्त करने हेतु निम्नलिखित वैकल्पिक विधियाँ भी अपनाई जा सकती हैं।

स्रोत विकास


(क) अन्य जलस्रोत से आंशिक अथवा पूर्ण जलापूर्ति
(ख) ऐसे क्षेत्रों में जहाँ जल में नाइट्रेट स्तर कम हो वहाँ नलकूप खोदकर जलापूर्ति करना, सपाट कुँओं को चौड़ा करना अथवा अधिक गहराई से जल प्राप्त करना आदि।

जलीय तकनीकी विधियाँ


(क) भौतिक-रासायनिक विधियाँ- जैसे विपरीत परासरण (रिवर्स ऑस्मोसिस) आयन विनिमय (शुद्ध ऋणायन विनियम तथा आंशिक निर्लवणीकरण) तथा विद्युत अपोहन।
(ख) जैविक विधियाँ- जैसे हाइड्रोजन से स्वपोषित विनाइट्रीकरण तथा कार्बनिक पदार्थों से परपोषित विनाइट्रीकरण।
(ग) अवमृदा विनाइट्रीकरण।
(घ) उच्च नाइट्रेट उपभोग वनस्पतियों द्वारा विलोपन।

उपर्युक्त विधियों का चयन जलस्रोत से आपूर्ति तथा जलदाय की स्थिति, उपलब्ध पाइप व्यवस्था, भूजलीय कारक तथा जल ग्रहण क्षेत्र की स्थिति पर निर्भर करती है। जबकि प्रत्येक तकनीकी विधि में कच्चे जल का पूर्व उपचार, उपचारित जल का उतर उपचार तथा अपशिष्ट जल के निष्कासन हेतु अतिरिक्त आर्थिक भार पड़ता है जिसका आकलन करना आवश्यक होता है।

यह देखा गया है कि पौधे प्रारंभिक तौर पर नाइट्रोजन का उपयोग नाइट्रेट अथवा अमोनियम आयन के रूप में करते हैं चूँकि अधिकांश भूजलों में नाइट्रेट का स्तर अधिक है अतः यह स्पष्ट है कि ऐसे भूजलों का उपयोग फसलों में नाइट्रोजन की पूर्ति हेतु भी किया जा सकता है जिससे बाहरी रूप से नाइट्रोजन उर्वरक की व्यवस्था कम मात्रा में करनी पड़ेगी। अनुसंधान परिणमों से विदित होता है कि सिंचाई जल की 10 सेंटीमीटर की मात्रा जिसमें 100 मिलीग्राम प्रति लीटर नाइट्रेट होता है, का प्रयोग करने पर 44.5 किलोग्राम नाइट्रेट नाइट्रोजन प्रति हेक्टेयर प्राप्त होती है। सामान्यतया अधिकांश फसलों में नाइट्रेट उर्वरक की 80 से 100 किलोग्राम नाइट्रोजन की सिफारिश की जाती है।

फ्लोराइड का कहर भी घातक


फ्लोराइड भी जन स्वास्थ्य को प्रभावित करने वाला जल का एक महत्त्वपूर्ण घटक है। वस्तुतः फ्लोराइड, फ्लोरीन तत्व का यौगिक है। हैलोजन समूह के इस तत्व का अणुभार एवं परमाणु संख्या क्रमशः 19 एवं 9 है। यह अत्यधिक क्रियाशील होता है तथा फ्लोराइड नामक यौगिक बनाने के लिये अन्य तत्वों में घुल मिल जाने की इसमें अपार क्षमता होती है। प्रकृति में यह मुख्यतया तीन अयस्कों जैसे फ्लुरोस्पार, क्रायोलाइट एवं फ्लुरोएपेटाइट के रूप में पाया जाता है। सामान्यतया फ्लोराइड के अयस्क जल में अविलेय होते हैं, परंतु कुछ-भू-गर्भीय परिस्थितियों में जल में घुलनशील अवस्था में पहुँच जाते हैं। ऐसी मान्यता है कि 60 प्रतिशत फ्लोराइड शरीर में मुख्यतया जल के माध्यम से ही जाता है, परंतु अल्प मात्रा में भोजन, पनीर, चाय, तम्बाकू, सुपारी, गुटखा, फ्लोराइड युक्त टूथपेस्ट, माउथवॉश कुछ किस्म की मछलियों तथा औद्योगिक प्रदूषण इत्यादि के माध्यम से भी शरीर में पहुँचता है। फ्लोराइड के यौगिक जो पृथ्वी की सतह पर चट्टानों एवं रेत के साथ होते हैं उनमें कुछ पानी के साथ घुलनशील होते हैं। ऐसा पानी पीने से अथवा उससे भोजन बनाने में फ्लोराइड हमारे शरीर में पहुँच जाता है। जिस मिट्टी में फ्लोराइड की मात्रा अधिक होती है, वहाँ उत्पन्न होने वाली सब्जियों, अनाज तथा फलों में भी इसकी मात्रा अधिक होती है।

शरीर में फ्लोराइड के निरंतर जाने से उसका शरीर पर द्रष्प्रभाव पड़ता है। वस्तुतः फ्लोराइड विश्व भर में जन-स्वास्थ्य के लिये एक व्यापक समस्या बना हुआ है। अधिक मात्रा में फ्लोराइड युक्त जल का सेवन करने से फ्लोरेसिस रोग हो जाता है। जो दाँतों पर धब्बे या दंत क्षरण से लेकर अपाहिज होने तक के रूप में प्रकट होता है।

भारत में फ्लोरोसिस


एक सर्वेक्षण के अनुसार हमारे देश में 2.5 करोड़ लोग फ्लोराइड जनित रोगों से पीड़ित हैं। यह एक अत्यंत ही चिंतनीय विषय है कि देश की लगभग 5 प्रतिशत जनसंख्या फ्लोराइड विषाक्तता की चपेट में है। इसका मुख्य कारण कइयों में फ्लोराइड की अधिकता। हमारे देश में बीस राज्यों में फ्लोरोसिस की समस्या है, जिनमें से अधिक प्रभावित राज्यों का विवरण सारणी 4 में वर्णित किया गया है।

राजस्थान, मध्य प्रदेश तथा आंध्र प्रदेश में फ्लोरोसिस की व्यापक समस्या है।

 

सारणी 4- फ्लोरोसिस प्रभावित राज्यों का श्रेणीकरण

क्र.सं.

राज्य

श्रेणी

1

जम्मू कश्मीर

*

2

पंजाब

**

3

हरियाणा

**

4

दिल्ली

*

5

उत्तर प्रदेश एवं उत्तरांचल  

***

6

राजस्थान

***

7

गुजरात

***

8

मध्य प्रदेश एवं छत्तीसगढ़    

***

9

महाराष्ट्र

**

10

कर्नाटक

**

11

आंध्र प्रदेश

***

12

केरल

*

13

तमिलनाडु

***

14

उड़ीसा

*

15

बिहार एवं झारखंड

****

*     30 प्रतिशत के कम प्रभावित जिले-4 राज्य

**   30 से 50 प्रतिशत के कम प्रभावित जिले-4 राज्य

***  50 से 100 प्रतिशत के कम प्रभावित जिले-7 राज्य

 

राजस्थान में फ्लोरोसिस


सन 1947 में शौरी ने अजमेर मारवाड़ क्षेत्र की फ्लोरोसिस प्रभावी क्षेत्र के रूप में पहली बार पहचान की। डॉ. कासलीवाल (1950), भार्गव (1974), माथुर (1977) एवं शिवचंद्र (1978) जैसे कई वैज्ञानिकों ने फ्लोरोसिस के विभिन्न पहलुओं पर व्यापक कार्य किया। सीएसआईआर-नीरी, नागपुर के वैज्ञानिकों ने भी इसी दिशा में अन्वेषण कार्य किया है। भौगोलिक रूप से अरावली पर्वत श्रृंखला के तल में एक भूपट्टी है जिसकी शुरूआत गुजरात के पंचमहल से होकर हरियाणा के गुड़गाँव तक फैली है जो दक्षिण-पूर्वी राजस्थान से होकर गुजराती है तथा इसमें फ्लोरस्पार क्रायोलाइट और फ्लुरोऐपेटाइट की प्रचुर मात्रा है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के प्रतिवेदन के अनुसार विश्व के फ्लोराइड से प्रभावित कुल गाँवों का 20 प्रतिशत अकेले भारत में ही है। देश के 32211 फ्लोराइड से प्रभावित गाँवों में से राजस्थान में 16560 गाँव हैं जो आधे से अधिक हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन के इन आँकड़ों से यह निष्कर्ष निकलता है कि विश्व की फ्लोराइड से प्रभावित आबादी का लगभग 10 प्रतिशत भाग राजस्थान में ही है।

राज्य के भूजल एवं जनस्वास्थ्य अभियांत्रिकी (इंजीनियरी) विभाग के वैज्ञानिकों ने भूजल में फ्लोराइड विषाक्तता पर महत्त्वपूर्ण अन्वेषण कार्य किया है तथा लेखक ने भी श्रव्य-दृश्य माध्यमों, पुस्तकों आदि द्वार जनमानस में इसके बारे में चेतना जागृत करने का उल्लेखनीय कार्य किया है। राजस्थान में नागौर, जालोर, सिरोही, जयपुर, अजमेर, झुंझनू, चुरू, डूंगरपुर, उदयपुर जिले फ्लोराइड से सर्वाधिक प्रभावित है। नागौर में सर्वाधिक 34 मि.ग्रा./लीटर फ्लोरोसिस मान प्रेक्षित किया गया।

फ्लोरोसिस को प्रभावित करने वाले कारक


यद्यपि फ्लोरोसिस का प्रत्यक्ष एवं मुख्य कारण फ्लोराइड है फिर भी अप्रत्यक्ष कारण पीने के पानी में क्षारीयता, कैल्शियम तथा भोजन में विटामिन-सी की कमी एवं एल्यूमीनियम, फॉस्फेट आदि का अधिक मात्रा में मानव शरीर में पहुँचना है।

विभिन्न प्रकार के फ्लोरोसिस


फ्लोरोसिस रोग तीन प्रकार का होता है:

दाँतों का फ्लोरोसिसः यह बढ़ती आयु के बच्चों में जब दाँतों से फ्लोराइड का संपर्क होता है तब प्रकट होता है। स्वास्थ्य समस्या के अलावा यह सौंदर्य को भी प्रभावित करता है। इसमें दाँत पहले चॉक जैसे, फिर पीले, फिर भूरे एवं अंत में काले हो जाते हैं। रंगों का यह बदलाव पहले धब्बे के रूप में या लम्बी पतली रेखा के रूप में होता है, जो कि बहुत पास-पास ओर समतल आकार वाली हो सकती है जबकि दाँत के विकास के साथ समतल आकार की इसी प्रकार की नई परतें जुड़ती जाती हैं। दाँतो के तल में रंगों का बदलाव प्रायः अस्वास्थ्यकर चीजों के कारण होता है, जिसे कभी हटाया नहीं जा सकता है क्योंकि यह दाँतों का अभिन्न हिस्सा बन चुका होता है। दाँतों के फ्लोरोसिस में दाँत का एनामेल अपनी चमक तथा सुदंरता खो देता है। अंतिम चरण में सभी दाँत काले हो जाते हैं अथवा वे टूट सकते हैं। छोटी आयु में ही दाँतो का टूटना उन क्षेत्रों में होता है जहाँ फ्लोरोसिस महामारी की तरह फैला होता है। इस प्रकार दंत फ्लोरोसिस एक सामाजिक समस्या भी है, क्योकि इससे ग्रसित होने पर लड़के-लड़कियों के विवाहादि में भी समस्या आती है।

कंकालीय या अस्थि फ्लोरोसिस: यदि व्यक्ति फ्लोराइडयुक्त पानी पीना दीर्घकाल तक जारी रखता है तो रोग बढ़ जाता है। अधिक फ्लोरोइड के कारण हड्डियों में सरंचनात्मक बदलाव होता है। इससे हड्डियाँ बड़ी हो जाती हैं अथवा इनकी ऊपरी सतह अत्यधिक विकसित हो जाती है। फ्लोराइड का सर्वाधिक प्रभाव गर्दन, रीढ़, घुटने तथा कंधों के जोड़ में होता है। इस प्रकार की फ्लोरोसिस की गम्भीरता बढ़ने के साथ ही रीढ़ की हड्डी, गर्दन एवं पीठ के भाग में लचीलापन नहीं रहता, जड़ता आ जाती है और दर्द होता है। ऐसा ही घुटने कुल्हे एवं कंधों के जोड़ में भी होता है। जोड़ों की अपंगता के साथ जोड़ों में जड़ता के कारण कुबड़ापन आ जाता है और धीरे-धीरे हाथों, पैरों में लकवा मार जाता है।

अकंकालीय फ्लोरोसिस: इस परम्परागत अवधारणा को अभी हाल ही के वर्षों में अस्वीकार किया जा चुका है कि फ्लोराइड का प्रभाव केवल हड्डियों एवं दाँतों पर ही पड़ता है। क्योंकि इस बात के स्पष्ट प्रमाण मिले हैं कि कोमल अंग तथा शरीर की तंत्रिकाओं पर भी फ्लोराइड का द्रुष्प्रभाव पड़ता है।

फ्लोराइड की अधिकता से उत्पन्न रोग न केवल मानव वरन वनस्पतियों में भी पाया जाता है। उनमें निम्न रोगों की प्रबल सम्भावना होती है:

1. पत्तियों के किनारों तथा शीर्षों का सूखना 2. विकास अवरोध 3. आनुवांशिक परिवर्तन 4. कोशिका शोथ 5. हरीतिमा क्षति एवं 6. ब्रोजिंग तथा ग्लेजिंग।

फ्लोरोसिस की रोकथाम एवं नियंत्रण


फ्लोरोसिस की देशव्यापी समस्या की रोकथाम एवं नियंत्रण हेतु निम्न सुझाव है:

वर्षाजल संरक्षण: हमारे देश के अनेक भागों में सदियों से वर्षाजल का संग्रहण किया जाता रहा है। सामुदायिक स्तर पर ऐनिकट व बाँध का निर्माण तथा घरेलू स्तर पर वर्षाजल के संग्रह से बहुत राहत मिल सकती है। देश के कई भागों में वर्षा के लिये विभिन्न सरकारी व गैर-सरकारी भवनों में इस प्रकार की व्यवस्था की गई है तथा इससे लाभ भी हुआ है।

आहार परिवर्तन: यह प्रेक्षित किया गया है कि यदि फ्लोराइड की अधिक मात्रा वाले क्षेत्रों में रहने वाले लोग अपने आहार में कुछ परिवर्तन कर लें तो उन्हें फ्लोरोसिस की समस्या से मुक्ति पाने में मदद मिल सकती है। विटामिन-सी फ्लोरोसिस को बढ़ने से रोकता है। अतः लोगों की जानकारी देनी चाहिए कि वे ऑवला, नींबू, संतरा, टमाटर, अंकुरित अनाज, दालों इत्यादि को अपने आहार में शामिल करें। कैल्शियम की अधिक मात्रा फ्लोराइड को कम करती है। अतः फ्लोरोसिस प्रभावित क्षेत्र में कैल्शियम की भरपूर मात्रा वाला आहार लेने की सिफारिश की जाती है। इसमें मीठा, दही, दूध, पत्तों वाली सब्जियाँ इत्यादि शामिल हैं। पपीता, कद्दू, अदरक तथा हरे पत्ते वाली सब्जियों का सेवन करना चाहिए। विटामिन ई भी रोग निरोधक की भूमिका निभाता है। अतः सभी तरह का अनाज, खाद्य तेल आदि का सेवन लाभदायक रहता है।

पेयजल से फ्लोराइड दूर करना: पेयजल से फ्लोराइड हटाने की दो विधियाँ हैं - अवक्षेपण एवं अधिशोषण। अवक्षेपण विधि में फिटकरी जमाव तथा नालगोडा तकनीक शामिल हैं आयन विनियम या अधिशोषण विधि में हड्डी का कोयला, ईंटें एवं सक्रियित (एक्टिवेटेड) एल्यूमिना को उपयोग में लाया जाता है। फिटकरी आधारित नालगोडा विधि में कुएँ अथवा अन्य स्रोत से पानी 20-60 लीटर वाले प्लास्टिक के बरतन में भर लिया जाता है। इसमें तली में 3-5 सेमी ऊँचाई पर एक टोंटी लगा देते हैं। पानी की क्षारीयता के अनुसार, उसमें उचित मात्रा में चूना एवं फिटकरी मिलाई जाती है। दस मिनट तक इस घोल को हिलाने के बाद एक घंटा स्थिर छोड़ दिया जाता है। फिर पानी को निथारकर अलग कर लिया जाता है तथा अशुद्धियों को टोंटी द्वारा बाहर निकाल दिया जाता है। इस प्रक्रिया से शुद्ध किया हुआ जल पीने के लिये उपयुक्त होता है। इस विधि में दस लीटर प्रति व्यक्ति के आधार पर 6 सदस्यों के परिवार को वर्षभर पानी शुद्ध करने के लिये अत्यल्प रुपये ही खर्च करने पड़ते हैं। यह विधि कम खर्चीली तथा सुविधाजनक है। एक्टिवेटेड एल्यूमिना विधि में पॉली एल्यूमीनियम क्लोराइड (पी.ए.सी.) के घोल को क्षारीयता अनुसार जल में मिलाकर तथा दस मिनट तक हिलाकर रखते हैं। इसके पश्चात इसे निथार लेते हैं। आई.आई.टी. कानपुर ने पी.ए.सी. फिल्टर भी विकसित किए हैं, जो लाभदायक साबित हुए हैं।

फ्लोरोसिस का नियंत्रण व रोकथाम


सुरक्षित पानी द्वारा उपचार: लोगों को सुरक्षित पानी के स्रोत से पानी पीने के लिये प्रेरित करना, जिसमें फ्लोराइड की मात्रा 1 मिग्रा. प्रति लीटर से कम हो, यदि सुरक्षित पेयजल स्रोत न हों तो लोगों को घरेलू स्रोत जल उपलब्ध करवाना, जिसमें फ्लोराइड रहित पीने का पानी उपलब्ध हो सके।

पोषण द्वारा उपचार: कैल्शियम, विटामिन सी एवं प्रति-ऑक्सीकारक (एंटी ऑक्सीडेंट) से युक्त भोजन लेने की सलाह दी जाती है। इनके स्रोतों का ब्यौरा निम्नवत है:

 

विटामिन सी

कैल्शियम

प्रति-ऑक्सीकारक

विटामिन ई

आंवला

दूध

अदरक

वनस्पति तेल

नींबू

दही

गाजर

सूखा मेवा

संतरा

हरी पत्तेदार सब्जियाँ

हरी पत्तेदार सब्जियाँ

अनाज

टमाटर

गुड़

पपीता

हरी सब्जियाँ

धनिए की चटनी

तिल

कद्दू

दालें

अंकुरित अनाज व दालें

पनीर

 

 

 

कमल की ककड़ी

 

 

 

अरबी

 

 

 

चौलाई का साग

 

 

 

जीरा

 

 

 

सहजन की फली एवं पत्ते

 

 

 

उपर्युक्त उपायों द्वारा देशव्यापी फ्लोरोसिस की समस्या को दूर किया जा सकता है।

संदर्भ
1. Kalsiwal R M & Solomon S K, Fluorosis in a case report, Journal, Asso. Phys. India 7 (1959) 56-59.

2. Shiv Chandra, Endemic Fluorosis in Rajasthan, Association of Preventive and social medicine, Rajasthan Chapter Conference S.P. Medical College Bikaner, (1983).

3. Ozha DD & Jain PC, Some toxic components of ground waters of arid areas of Rajasthan, International Journal Occ and EnvI. Health, 2 (1992) 41-46.

4. Ozha DD & Mathur S B, Scourge of Hydro-toxicant Fluoride in groundwater of Rajasthan, Journal Inst. Public Health, 4 (2001) 5.

5. Gupta S K, Gupta R C, Chhabra S K, Gupta A K & Gupta Rita, Health issues related to N-Pollution in water & in air. Curr, Sci. 94 (11), (2008) 1469.

6. Gupta Sunil, Gupta R C & Gupta A B, Nitrate toxicity and human Health, Agricultural Nitrogen uses and its implications, International Publishing House, Pvt. Ltd. (2007) 517-548.

सम्पर्क


डी डी ओझा एवं एच आर भट्ट, DD OZha & H R Bhatt
भूजल विभाग, जोधपुर 342003 (राजस्थान), Ground Water Department, Jodhpur 342003 (Rajasthan)

भारतीय वैज्ञानिक एवं औद्योगिक अनुसंधान पत्रिका, 01 जून, 2012


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