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ठेकेदार केन्द्रित हैं नदी जोड़ योजनाएं

Author: 
एसए शाद
Source: 
याहू जागरण, अगस्त 2011

स्थानीय छोटी-छोटी नदियों को जोड़ कर एक बड़ा 'रिजर्वायर' बने और इस जल-प्रबंधन में ग्रामीणों की पूरी भागीदारी हो। उन्होंने कहा कि राजस्थान और हिमाचल प्रदेश ने भू-सांस्कृतिक विविधता को ध्यान में रखकर अपनी जल नीति बनायी है। इसके बहुत अच्छे नतीजे सामने आ रहे हैं। वहां 'ट्रैडिशनल वाटर हार्वेस्टिंग' का पूरा ख्याल रखा गया है। यही काम कनाडा ने भी किया है और इसी कारण विश्व में जल संरक्षण एवं जल के बेहतर उपयोग के मामले में यह विश्व में एक मिसाल है।

मैगसेसे एवार्ड से सम्मानित मशहूर वाटर एक्टिविस्ट राजेंद्र सिंह नदी जोड़ योजना के मौजूदा स्वरूप से बिल्कुल संतुष्ट नहीं हैं। उनके मुताबिक, अधिकांश डीपीआर 'कांट्रैक्टर ड्रिविन' (ठेकेदारों पर केन्द्रित) हैं। इसके चलते बड़े पैमाने पर विस्थापन होगा। वह सूबे में जल संरक्षण से अधिक जल के बेहतर उपयोग को महत्वपूर्ण बताते हैं। साफ कहते हैं- 'यहां लोगों में जल के उपयोग का संस्कार नहीं है।' उनका सुझाव है कि राज्य को पहले अपनी अलग 'नदी नीति' बनानी चाहिए। 'दैनिक जागरण' से सोमवार को विशेष बातचीत में राजेंद्र सिंह ने कहा कि नदी जोड़ने के क्रम में इनकी असल धारा को नजरअंदाज किया जा रहा है। इससे लोगों का बड़े पैमाने पर विस्थापन होगा। साथ ही भू-सांस्कृतिक विविधता प्रभावित होगी। बिहार में भी ऐसा ही हो रहा है। रविवार को मैं समस्तीपुर में था। वहां बूढ़ी गंडक और गंगा नदी को जोड़ने का जो रास्ता (लिंक) चुना गया है, वह 60 किलोमीटर लंबा है, जबकि इन्हें जोड़ने का मात्र 7 किलोमीटर लंबा रास्ता मौजूद है। खर्च भी कई गुना कम आएगा। दरअसल, नदी जोड़ योजना की विस्तृत परियोजना रिपोर्ट (डीपीआर) ठेकेदारों के हित पर अधिक केन्द्रित हैं, जबकि इन्हें 'कम्युनिटी ड्रिविन' (समुदायों पर केन्द्रित) होनी चाहिए। ऐसे अनेक उदाहरण हैं। बिहार में दुनिया का सबसे बड़ा भू-जल भंडार है।

यहां जल संरक्षण से बड़ी समस्या जल के बेहतर उपयोग की है। जल के उपयोग का संस्कार नहीं है। पेयजल के स्त्रोत बहुत प्रदूषित हैं। जल जनित बीमारियां सबसे अधिक हैं। मूल सिद्धांत है जहर और अमृत को अलग-अलग रखना। परन्तु इस पर कहीं अमल नहीं है। गंदे नालों का पानी सीधे नदियों में जाता है। इनके 'ट्रीटमेंट' की कोई व्यवस्था नहीं है। पिछले तीस सालों में आर्सेनिक और फ्लोराइड की मात्रा जल में तेजी से बढ़ी है। बिहार में अगर सही 'जल संस्कृति' पैदा हो जाए तो यह सबसे अच्छा राज्य हो जाएगा। प्रदेश में जल नीति से अलग एक 'नदी नीति' बननी चाहिए और यह पहले बननी चाहिए। नदी नीति प्रदेश की समृद्धि का मार्ग प्रशस्त करेगी। प्रदेश में जिन इलाकों में अधिक जल है, वहां वैसी खेती हो रही जिसे अधिक पानी की जरूरत होती है। कम जल वाले इलाकों में वैसी फसल उगायी जा रही है जिन्हें अधिक पानी दरकार है।

इस संस्कृति को पूरी तरह से बदलना होगा। नदी जोड़ योजना के विकल्प पर जोर देते हुए उन्होंने कहा कि नदियों से समाज को जोड़ने का प्रयास हो। स्थानीय छोटी-छोटी नदियों को जोड़ कर एक बड़ा 'रिजर्वायर' बने और इस जल-प्रबंधन में ग्रामीणों की पूरी भागीदारी हो। उन्होंने कहा कि राजस्थान और हिमाचल प्रदेश ने भू-सांस्कृतिक विविधता को ध्यान में रखकर अपनी जल नीति बनायी है। इसके बहुत अच्छे नतीजे सामने आ रहे हैं। वहां 'ट्रैडिशनल वाटर हार्वेस्टिंग' का पूरा ख्याल रखा गया है। यही काम कनाडा ने भी किया है और इसी कारण विश्व में जल संरक्षण एवं जल के बेहतर उपयोग के मामले में यह विश्व में एक मिसाल है।

इस खबर के स्रोत का लिंक: 
http://in.jagran.yahoo.com/

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