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उड़ीसा में समुद्री तूफान

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पर्वत पर्वत, बस्ती बस्ती पुस्तक से साभार, प्रथम संस्करण 2011

उल्लेखनीय तथ्य यह है कि समुद्रतटीय इलाकों में समुद्री चक्रवात से बचाव के प्रथम प्रहरी समुद्रतटीय और कछारी वनों (Mangrove) को मानव ने पूर्व में ही समाप्त कर दिया था। इसके अतिरिक्त चक्रवात के कारण लाखों पेड़ भी नष्ट हो गए। ये वन न केवल लोगों की आर्थिक के बहुत बड़े आधार थे बल्कि प्राकृतिक आपदा से बचाव के बहुत बड़े साधन थे। जलवायु के नियंत्रक स्थानीय जीवन चक्र के भी बहुत बड़े आधार थे। इनके उजड़ जाने से प्राकृतिक प्रकोपों की मार को स्वतः ही बढ़ावा मिल गया। लाखों की संख्या में नारियल, सुपारी, आम और अन्य अनेकों प्रकार के फलों के पेड़ नष्ट होने से लोगों की जीविका समाप्त हो गई है।

उड़ीसा के समुद्र तटीय 12 जिले इस बार अभूतपूर्व समुद्री तूफान से बुरी तरह नष्ट भ्रष्ट हो गए हैं। सरकारी आंकड़ों के अनुसार 12 जिलों के 101 विकासखंडों तथा 26 नगर पंचायतों में भीषण तबाही मची है। लगभग दस हजार लोग और साढ़े तीन लाख पशु मारे गए हैं। साढ़े बारह लाख से अधिक मकान पूरी तरह ध्वस्त हो गए हैं। सवा करोड़ से अधिक लोग इस भीषण समुद्री तूफान से बुरी तरह प्रभावित हुए हैं। अनुमान है कि 20 लाख से अधिक पेड़ धराशायी हो गए और 16 लाख हेक्टेयर से अधिक कृषि भूमि फसल सहित नष्ट हो गई है। इन सरकारी आंकड़ों से अलग, लोग इस क्षति को कहीं अधिक बता रहे हैं। 29 अक्टूबर से शुरू इस भीषण प्राकृतिक आपदा से प्रभावित कई गांव के लोगों तक कोई राहत सहायता तीन सप्ताह बाद भी नहीं पहुंच पाई है। चक्रवात प्रभावित ज्यादातर इलाके बुरी तरह उजाड़ बने हुए हैं। लोग भूख, बीमारी, धूप और ठंड जैसी भयंकर यातनाएं झेलने के लिए विवश हैं और सरकारी तथा सामाजिक तंत्र इस त्रासदी से जूझने व लोगों को वास्तविक राहत पहुंचा पाने में अपेक्षा के अनुरूप सफल नहीं हो पा रहे हैं।

1999 विश्वव्यापी प्राकृतिक आपदाओं का वर्ष रहा है। हमारे देश में ही उत्तराखंड में भूकंप के विनाश के बाद जंगलों की आग, भूस्खलन, बाढ़ और उसके बाद इस सदी के सबसे बड़े चक्रवात की मार लोगों को झेलनी पड़ी है। इन सबका मुकाबला करने में हम काफी कमजोर सिद्ध हुए हैं। अक्टूबर के आखिरी हफ्ते में जब हम गढ़वाल के अपने कार्यक्षेत्र के एक गांव दाड़मी, जो कि भूस्खलन और भूकंप से अति प्रभावित था, के कुछ परिवारों को नए मकान बनाकर बसाने से कुछ संतोष महसूस कर ही रहे थे और भूकंप से अन्य क्षेत्रों में सात माह बाद भी पुनर्वास के कोई कारगर प्रयास न हो पाने के प्रति चिंता व्यक्त करते हुए बेघरों को स्थाई-अस्थाई किसी भी प्रकार के आवासों की मांग करने में एकजुट थे कि रेडियों, टेलीवविजन और अखबारों के माध्यम से बंगाल की खाड़ी में तूफान बनने की आशंका और उससे आंध्र, उड़ीसा और पश्चिम बंगाल के समुद्र तटीय क्षेत्रों के लोगों को सचेत करने की खबरें सुन-पढ़ रहे थे। उसके बाद विनाश और महाविनाश की खबरें पढ़ी।

1990 में आंध्र के समुद्री तूफान से पीड़ित क्षेत्रों में अपने उस क्षेत्र के मित्रों के साथ मैंने भ्रमण किया था। उस त्रासदी के अनुभवों तथा देश के विभिन्न भागों में प्राकृतिक आपदाओं से जूझते लोगों तथा राहत और बचाव कार्यों के उदाहरणों और परिणामों से प्राप्त अनुभवों के आधार पर मैंने उड़ीसा के कुछ चक्रवात पीड़ित क्षेत्रों का भ्रमण कर अपने उड़ीसा के मित्रों के साथ विचार-विमर्श करने और पीड़ितों के प्रति अपनी संवेदनाएं व्यक्त करने का कार्यक्रम बनाया। मैंने पारादीप, इरसमा, मणिजंगा, तिरतोल, ककटपुर, कजंग, नीपाड़ा, अस्तरंग, कोणार्क, पिपली, पुरी, भुवनेश्वर, कटक, ढेकानला आदि क्षेत्रों में यह भीषणतम विनाशलीला डॉ. सुरेश चंद्र त्रिपाठी, प्रणव कुमार सारंगी, प्रकाश सारंगी, जो स्नेह नाम से एक स्वयंसेवी संस्था संचालित करते हैं, तथा रियोड इंडिया से जुड़े विजोय नंदा और महापात्र आदि मित्रों के साथ देखी। भुवनेश्वर में रियोड़, उड़ीसा आपदा न्यूनीकरण और प्रबंधन, सी.वाई.एस.डी. आदि संगठनों के अलावा लगभग डेढ़ दर्जन संस्थाओं और कुछ अधिकारियों से भी वार्ता हुई। कुछ स्थानीय परिस्थितियों और समस्याओं से भी मैं अवगत हुआ।

यह बात एकदम सही है कि उड़ीसा का यह समुद्री तूफान अपने में अभूतपूर्व था और इतने बड़े तूफान की हमारी व्यवस्था में कल्पना भी मौजूद नहीं थी। तब उससे निपटने की व्यवस्था की तो कल्पना ही व्यर्थ है। लेकिन यह भी प्रायः तय है कि समुद्रतटीय क्षेत्रों में समुद्री तूफान प्रायः आते ही रहते हैं और देश के दूसरे क्षेत्रों में भिन्न प्रकार की प्राकृतिक विपदाएं घटित होती रहती हैं। अनेक कारणों से इसमें लगातार वृद्धि भी हो रही है। किंतु इस सच्चाई को भी नकारा नहीं जा सकता है कि इनसे निपटने, लोगों को बचाने तथा उनके व्यावहारिक पुनर्वास की व्यवस्था करने के लिए हम कोई प्रभावी तंत्र विकसित नहीं कर पाए हैं। उड़ीसा की चक्रवात की त्रासदी ने इसे अधिक मुखर रूप में सामने खड़ा किया है। उड़ीसा के इस चक्रवाती विनाश ने सैकड़ों गांवों को इस बुरी तरह से उजाड़ कर रख दिया है कि उन्हें फिर से बसाने और पिछला स्वरूप प्रदान करने में कई वर्ष लग जाएंगे। इसके लिए भारी मात्रा में संसाधनों की आवश्यकता भी होगी, जबकि हमारे पास संसाधनों की भारी कमी बताई जा रही हैं।

यह एक तथ्य है कि इस विनाश के आरंभ में भारतीय मौसम विभाग द्वारा जो चेतावनी दी गई, वह न केवल अपर्याप्त थी बल्कि उसमें गम्भीरता का भी अभाव था। इसके अनेक कारण हो सकते हैं लेकिन सबसे बड़ा सवाल इन घोषणाओं की उन्हें आम आदमी तक पहुंचाने की गंभीरता का है। इन दोनों मुद्दों पर विभाग काफी कमजोर दिखाई देता है। यही कारण है कि तीन सौ किमी. तक प्रति घंटे की रफ्तार से आए तूफान, जो कि 36 घंटों तक तबाही मचाता रहा, के पूर्वानुमान लोगों तक नहीं पहुंच पाए और वे उनसे बचने की कोशिश नहीं कर पाए। लोगों के सामने सुरक्षित ठौर पाने तथा वहां तक पहुंचने की विवशता भी रही। अन्यथा लोगों की मौत के आंकड़े निश्चय ही कम हो सकते थे। यह बात भी ध्यान में रखनी आवश्यक है कि चक्रवात की भीषणता चाहे बहुत ज्यादा और कल्पना से परे रही लेकिन जगन्नाथ पुरी के मंदिर तथा राम चंडी मंदिर उससे साफ बचे रहे। इसका अर्थ यह भी है कि हम जो बसासतें बसा रहे हैं, उनके प्रति भी हमारी गंभीरता बहुत कम है। समुद्री लहरों, जो कि एक नियमित प्राकृतिक प्रक्रिया है, से गांवों और लोगों के बचाव की हमारी तैयारी भी बहुत कम है तथा उससे लोगों के जूझने और बचाव के प्रशिक्षण के प्रयास भी कम तथा आधे-अधूरे हैं। इस प्रकार की त्रासदी में बचाव और राहत कार्य कैसे संचालित किए जाएं और ऐसी स्थिति में हमारी प्राथमिकताएं क्या हों तथा उन्हें किस प्रकार कार्यरूप में परिणित किया जाए, इसकी भी व्यवस्थित तैयारी प्रायः नहीं है।

पुरी जिले में नवागढ़ गांव में समुद्री तूपान से बचाव के लिए एक पक्का आश्रय स्थल बना हुआ है। वहां रेडक्रास की ओर से युवाओं को बचाव और राहत का प्रशिक्षण भी दिया गया है। इसका काफी लाभ भी मिला है। जैसे ही तूफान से गांव में तबाही मची रेडक्रास के इन प्रशिक्षित युवाओं ने सायरन बजाकर ग्रामीणों को सचेत कर दिया। उन्होंने लोगों को रस्से बांध कर भी बचाया तथा शरणस्थल में 1442 लोगों को शरण मिल गई। इस गांव की दो गर्भवती महिलाओं को इसी शरणस्थल के शौचालय और भंडार गृह में प्रसव करा कर उनकी तथा नवजात शिशुओं की रक्षा की गई। इस प्रशिक्षित दल के संजय कुमार का कहना है कि ऐसे शरणस्थल बड़े पैमाने पर बनाए जाने चाहिए।

यह विडंबना ही कहीं जाएगी कि जहां भारत सरकार तथा देश की अनेक राज्य सरकारों के साथ स्वयंसेवी संस्थाओं ने बड़े पैमाने पर राहत कार्यों की घोषणा की किंतु विपरीत कई गांवों में अभी तक कोई नहीं पहुंच पाया। इन गांवों के लोग तीन सप्ताह बाद भी जीवन-मरण के भंवर में फंसे हुए हैं। रुपयों की घोषणा हो रही है, राशन और राहत और राहत सामग्री के ट्रक जहां-तहां देखे जा सकते हैं लेकिन बड़ी संख्या में जरुरतमंद उनसे वंचित हैं। पुरी जिले के ही नीमपाड़ा विकासखंड के तुसपुर गांव की ग्राम पंचायत की सरपंच श्रीमती मनोरमा कांडी बताती हैं कि 465 परिवारों के उनके गांव में थोड़े बहुत खाद्यान्न के अलावा अभी तक कोई मदद नहीं पहुंची है। पानी को पीने योग्य बनाने के लिए ब्लीचिंग पाउडर तक नहीं मिल पाया है। जिससे उनके ग्रामवासी डायरिया, मलेरिया जैसी घातक और संक्रामक रोगों से पीड़ित हो रहे हैं। मनोरमा का परिवार स्वयं भी बहुत गरीब और पीड़ित है। कुछ लोगों ने अपने बलबूते पर ही सड़क के किनारे घास-फूस के छप्पर बनाए हैं और उसी में परिवार सहित रहते हैं। उनमें सरपंच का परिवार भी शामिल है।

सरकारी अधिकारियों के अनुसार धन तथा सामग्री की कमी नहीं है लेकिन उनका सामयिक वितरण दुष्कर हुआ है। सबसे बड़ी मृतक और पशुओं के शवों को ठीक से निपटाने और डूबे क्षेत्रों का पानी निकालने की है। पीड़ितों तक पहुंचाने के लिए संपर्क मार्ग नहीं हैं। उल्लेखनीय तथ्य यह है कि समुद्रतटीय इलाकों में समुद्री चक्रवात से बचाव के प्रथम प्रहरी समुद्रतटीय और कछारी वनों (Mangrove) को मानव ने पूर्व में ही समाप्त कर दिया था। इसके अतिरिक्त चक्रवात के कारण लाखों पेड़ भी नष्ट हो गए। ये वन न केवल लोगों की आर्थिक के बहुत बड़े आधार थे बल्कि प्राकृतिक आपदा से बचाव के बहुत बड़े साधन थे। जलवायु के नियंत्रक स्थानीय जीवन चक्र के भी बहुत बड़े आधार थे। इनके उजड़ जाने से प्राकृतिक प्रकोपों की मार को स्वतः ही बढ़ावा मिल गया। लाखों की संख्या में नारियल, सुपारी, आम और अन्य अनेकों प्रकार के फलों के पेड़ नष्ट होने से लोगों की जीविका समाप्त हो गई है। लाखों की संख्या में पशुओं के मारे जाने के कारण दूध के साथ ही यह समस्या भी खड़ी हो गई है कि बैलों के बिना खेतों में हल कैसे लगेगी?

यद्यपि समुद्री तूफान के कारणों, उनसे हुए नुकसान, उनसे पीड़ितों को उबारने, बेघर और बेरोजगार हुए लोगों के पुनर्वास के लिए व्यापक अध्ययन, व्यावहारिक नियोजन की आवश्यकता है लेकिन मेरा मानना है कि कुछ कार्य प्राथमिकता के आधार पर तुरंत किए जाने आवश्यक हैं-

1. प्रत्येक गांव में सरपंच, एक महिला पंच तथा दो सरकारी ग्राम स्तरीय कार्यकर्ताओं की समिति बनाई जाए जो पीड़ितों का सही चिह्नांकन करें तथा उन्हें प्राथमिकता के आधार पर खाद्यान्न तथा अन्य सहायता वितरित करे तथा प्रत्येक परिवार की प्राथमिकताएं भी तय करे। इन समितियों में यथा संभव स्थानीय संस्थाओं के प्रतिनिधियों को भी शामिल किया जाए।

2. हमारा अनुभव है और सुझाव भी कि एक परिवार को खाद्य सामग्री का कोटा एक बार में कम से कम एक माह के लिए एक साथ देने की व्यवस्था की जाए। वितरित वस्तु की पावती ली जाए तथा इसको व्यापक प्रचार-प्रसार किया जाए।

3. जिला और ब्लॉक स्तर पर भी अधिकारियों और जनप्रतिनिधियों की समितियां बनायी जाएं। इनमें ईमानदार उत्साही और कर्मठ लोगों को रखा जाए। इसके प्रभावी अनुश्रवण की व्यवस्था कायम की जाए। समितियों में प्रभावी समंवय की व्यवस्था की जाए।

4. लाखों की संख्या में बेघर लोगों को प्रति परिवार कम से कम एक मजबूत तिरपाल तथा आवश्यकता के अनुसार बांस एवं लकड़ी उपलब्ध कराई जाए तथा उन्हें आवश्यकता के अनुसार पारिश्रमिक भी उपलब्ध करा कर उन्हें अपने लिए स्वयं झोपड़ी अथवा घर बनाने के लिए प्रेरित किया जाए। ताकि वे अपने स्वाभिमान व पुरुषार्थ को पुनः जिंदा करें तथा नव रचना में जुट जाएं।

5. बाहर से स्वयंसेवियों का आह्वान किया जए और उन्हें गांव आवंटित किए जाए ताकि संतुलित तथा आवश्यक संख्या में ही लोग गांवों में आएं।

6. बड़ी संख्या में गिरे पेड़ों से लोगों को रोजगार तथा आवास हेतु लकड़ी मिल सकती है। इसके साथ ही क्षतिग्रस्त खेतों, संपर्क मार्गों, मकानों आदि के निर्माण के लिए बड़े पैमाने पर सुनिश्चित रोजगार योजना चलाई जाए।

7. कृषि कार्य तुरंत पुनर्स्थापित करने के लिए बीज, बैल, दुधारू पशु आदि संसाधन बड़े पैमाने पर शीघ्र उपलब्ध कराए जाएं।

8. कुछ राज्यों ने जिलों में पुनर्वास कार्यक्रम चलाने की घोषणा की है। इसका लाभ उठाया जाना चाहिए और ऐसे राज्यों, संगठनों को राहत और पुनर्वास के मंडल और पैकेज बनाकर दिए जाने चाहिए ताकि वे उनके अनुरुप कार्य कर सकें।

9. भारत सरकार तथा राज्य सरकार मिल कर पुनर्वास का कार्यक्रम बनाएं उसमें यह ध्यान रखा जाए कि वह भावी त्रासदी को झेलने में सक्षम हो। इसके साथ ही वह लोक पुरुषार्थ को भी जागृत करने में सफल हो। इसके लिए राहत और पुनर्वास कार्यक्रम लोक कार्यक्रम के रूप में संचालित किए जाएं।

10. परंपरागत कुटीर उद्योगों की स्थापना, खेतों तथा बगीचों का सुधार और पुनर्स्थापना जैसे कार्य तुरंत शुरू किए जाएं।

11. सूचना तकनीकी को मजबूत बनाकर गांव-गांव तक फैलाने, ग्रामीणों और ग्रामस्तरीय कार्यकर्ताओं को व्यापक प्रशिक्षण देने, आपदा के न्यूनीकरण हेतु सुरक्षित स्थानों, कम लागत में तूफान को झेल सकने वाले तथा स्थानीय सामग्री पर आधारीत मकानों के निर्माण की तकनीक का विकास एवं विस्तार करने तथा पूरे क्षेत्र का अध्ययन कर इसकी जानकारी ग्राम स्तर तक सुलभ कराने का एक व्यावहारिक तंत्र विकसित किया जाए।

12. छात्रों की शिक्षा पुनः आरंभ करने के लिए उन्हें पाठ्य सामग्री, वर्दियां आदि उपलब्ध कराने के लिए एक व्यापक अभियान चलाया जाएं और शिक्षण कार्य शीघ्र आरंभ किया जाए।

13. अनाथों एवं विकलांगों को सरकारी एवं गैरसरकारी स्तर का आश्रय उपलब्ध कराने के लिए व्यापक अभियान चलाया जाए।

14. बड़े पैमाने पर हरियाली लाने और उद्यानों तथा वनों की पुनर्स्थापना के लिए एक अग्रगामी कार्यक्रम शीघ्र बनाया जाए जो अगले एक दो महीनों में आरंभ हो सके। यह देखा गया है कि वृक्ष जिनकी जड़े कम गहरी थी, वे ज्यादा बड़ी संख्या में उखड़े हैं। इसलिए लंबी-गहरी जड़ों वाले, स्थानीय परिस्थितियों के अनुकूल प्रजातियों को बढ़ावा देते हुए इस कार्यक्रम को जन अभियान के रूप में चलाया जाए। इसमें उद्यान एवं वन विशेषज्ञों की सहायता ली जाए।

15. कछारी और समुद्रतटीय वनों के पुनर्जनन एवं पुनर्स्थापना को अति प्राथमिकता के आधार पर शुरु किया जाए तथा उनके संरक्षण के लिए प्रभावी उपाय किए जाए।

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