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नदी मुक्ति की विश्वव्यापी चेतना

Author: 
अवधेश कुमार
Source: 
राष्ट्रीय सहारा (हस्तक्षेप) 31 मार्च 2012

आखिर हम सबका लक्ष्य तो एक ही है- नदियां हर प्रकार के बंधनों से मुक्त हों, प्रदूषण रहित हों, कारपोरेट नियंत्रण से आजाद हों और लोगों के लिए मुक्त रहें ताकि वह हमारा आपका पोषण कर सकें, हमें आनंद दे सकें, रचनाकारों के लिए निर्बाध प्रेरणा का स्रोत बनें, साधकों को अपने पवित्र वायुमंडल से आनंद की अनुभूति कराएं, हमारी आत्मसाधना को लक्ष्य तक ले जाएं और कुल मिलाकर प्रकृति के अनुरूप सभ्यता स्वाभाविक रूप से सतत विकास करें।

प्रकृति कहती है, अगर आप मेरी रक्षा करना नहीं चाहते हैं तो मैं अपना बोरिया बिस्तर बांधकर चली जाऊंगी। चेक गणराज्य में एल्बी नदी पर प्रस्तावित बांध के विरोध में आर्निका नेचर कंजर्वेशन प्रोग्राम द्वारा किए गए प्रदर्शन का यह थीम वाक्य है। नदियों के साथ अत्याचार और उनका विरूपण पूरी दुनिया में अब एक प्रमुख मुद्दा बन चुका है। पिछले 15 वर्षों से इंटरनेशनल डे ऑफ एक्शन फॉर रिवर्स यानी अंतर्राष्ट्रीय नदी कार्रवाई दिवस का आयोजन किया जाता है। अभी तक जितनी सूचनाएं एकत्रित हुईं हैं उनके अनुसार पिछले 14 अप्रैल को अंतर्राष्ट्रीय नदी कार्रवाई दिवस के अवसर पर करीब 43 देशों में नदियों की मुक्ति से संबंधित करीब 150 आयोजन किए गए। इस दिन दुनिया भर के हजारों लोग केवल एक लक्ष्य दुनिया की जीवन रेखा नदियों का मुक्ति प्रवाह सुनिश्चित करने के लिए अलग-अलग स्थानों पर एकत्रित होकर अपनी एकजुटता दर्शाते हैं। कई जगह इसके पूर्व से कार्यक्रम आरंभ होकर आगे भी चलते हैं। चेक गणराज्य का प्रदर्शन इसी का अंग था। सामान्यत: 8-9 मार्च से कार्यक्रम आरंभ हो जाता है। संयोग देखिए कि भारत में स्वामी ज्ञानस्वरूप सानंद का अनशन जिसे वे तपस्या कहते हैं 9 मार्च से ही आरंभ हुआ।

विश्व दिवस कार्रवाई के पीछे मुख्य हेतु अलग-अलग देशों में नदियों को बचाने के लिए जारी संघर्ष में एक दूसरे को प्रेरणा देने, उनका समर्थन करने, उन सरकारों तक प्रभावी तरीके से मांग पहुंचाने तथा उन पर देश के अंदर आम नागरिकों एवं अंतर्राष्ट्रीय स्तर से दबाव डालने की है। नदियां जिन देशों की भौगोलिक सीमाओं के अंदर प्रवाहित हैं, उनका तो है ही; यह विश्व समुदाय की प्राकृतिक संपदा भी है, क्योंकि ये भूमंडलीय पारिस्थितिकी के अंग हैं। कोई आवश्यक नहीं कि सूर्य की गर्मी से खींचा गया जल बारिश के रूप में उसी देश के अंदर बरसे जहां नदी अवस्थित है। किसी नदी का पानी किसी देश में जाकर बरस सकता है। फिर अंतत: सारी नदियां किसी न किसी माध्यम से समुद्र में समाहित होती हैं। इस नाते वैसे भी आप नदी बचाने के लिए भले स्थानीय स्तर पर संघर्ष या कोशिशें करते हैं पर यह व्यापक रूप में वैश्विक नदी प्रणालियों के संघर्ष का अंग बन जाता है। कहने की आवश्यकता नहीं कि एक दिवस के रूप में मनाने से इसका चरित्र वैश्विक संघर्ष का बनता है तथा एकजुटता का भाव तो पैदा होता ही है। तो आइए पहले कुछ देशों के आयोजनों को रेखांकित करें :-

इस वर्ष अंतर्राष्ट्रीय नदी कार्रवाई दिवस की मुख्य थीम बांध विरोध रही।
1. थाईलैंड के सालवीन नदी के किनारे लोगों ने एकत्रित होकर प्रस्तावित करीब 20 बांधों के खतरों के बारे में लोगों को चेताया एवं इसके विरोध करने का संकल्प व्यक्त किया।

2. फ्रांस के मार्सेइल्ल शहर में छठे विश्व जल मंच (वर्ल्ड वाटर फोरम) के आयोजन के समानांतर वैकल्पिक विश्व जल मंच के बैनर से प्रदर्शन और विरोध किया गया। वहां सरकारें और निजी निगम जल विद्युत के स्थायित्व पर चर्चा कर रहे थे। विरोधियों ने बांध निर्माताओं के कारनामों को उजागर करने के साथ इसे नदी के सहारे जीवन जीने वाले लाखों लोगों के अधिकारों के साथ खिलवाड़ साबित किया। इसका सामाजिक एवं वायुमंडलीय प्रभाव कितना विनाशकारी है, यह भी स्पष्ट किया।

3. ब्राजील के 10 शहरों के बांध पीड़ित लोगों के संघर्ष ने थोड़ी सफलता पाई। नदी कार्रवाई दिवस के अवसर पर आई जानकारी के अनुसार राष्ट्रपति गिल्बटरे काव्रेल्हो के सचिवालय ने उनकी कुछ मांगें मानी जिनमें बांध प्रभावितों की स्थिति का नए तरीके से मूल्यांकन और उनके अधिकारों की रक्षा के लिए रास्ता निकालने पर सहमति व्यक्त की। जल के निजीकरण के विरोध को अभी सफलता नहीं मिली है लेकिन संघर्ष जारी है।

4. हमारे पड़ोसी बांग्लादेश की 73 नदियों की दुर्दशा एवं उसे दुरुस्त करने की योजना संबंधी एक रिपोर्ट प्रकाशित की गई। इसके साथ एक चार्टर भी प्रकाशित हुआ, जिसमें बांग्लादेश की नदियों को जीवित बचाने एवं उनके विकास संबंधी मांगें थीं।

5. ताईवान में मेइनंग पीपुल्स एसोसिएशन ने चीनी भाषा में एक पुस्तिका प्रकाशित किया, सफल बांध समापन कथाएं (सक्सेशफुल डैम रिमोवल स्टोरीज)’। इसमें सरकार से अपील की गई कि वह बांधों के प्रभावों की समीक्षा करे तथा विकल्प के तौर पर बांधों के अंत पर विचार करे।

6. पनामा में तो इस दिन 40 दिनों से चल रहे विरोध का अंत नेशनल असेम्बली भवन तक के मार्च के साथ किया गया।

7. रूस में ट्रांस्सिबिर्स्की जल विद्युत परियोजना सहित अन्य कई बांधों के विरोध में करीब 15 प्रदर्शन आयोजित हुए। रिवर्स विदाउट बाउंडरीज की अगुवाई में किए गए प्रदर्शन कई राज्यों में देखे गए।

8. कंबोडिया में कन्दल राज्य के लोगों ने मेकांग नदी प्रणाली पर बनाए जा रहे बांध के अंत की मांग की।

ऐसे छोटे-बड़े आयोजन अब भी चल रहे हैं। मैक्सिको, पाकिस्तान, कंबोडिया, कोलंबिया, तुर्की, दक्षिण अफ्रीका..सब जगह। शायद अनेक प्रदर्शनों या कार्यक्रमों की सूचना नहीं उपलब्ध हों।

इन सारे कार्यक्रमों को हम नदियों के मुक्त प्रवाह के लिए वृहत्तर वैश्विक संघर्ष का भाग कह सकते हैं। दुनिया की सहमति से 22 मार्च को विश्व जल दिवस घोषित किया गया। जाहिर है, इसके ठीक आठ दिन पूर्व नदी कार्रवाई दिवस घोषित करने के पीछे इसका भी ध्यान रखा गया ताकि 14 मार्च से 22 मार्च तक वायुमंडल बना रहे। 14 मार्च के एक सप्ताह पूर्व से ही अनेक देशों में कार्यक्रम आरंभ हो जाते हैं और 22 मार्च तक चलाया जाता है। ज्यादातर देशों में 22 मार्च और उससे आगे भी प्रदर्शन, मांग पत्र देने, जन जागरण, पत्र लेखन आदि कार्यक्रम जारी रहेगा। यह ठीक है कि इन आयोजनों के पीछे एनजीओ की भूमिका प्रमुख है और यह नदी बचाओ के विश्वव्यापी कल्पना की सीमाएं बांध देता है। एनजीओ लंबा आंदोलन नहीं कर सकते पर उनके द्वारा मांग उठाने और अपने तंत्र से इसे अलग-अलग देशों में जोड़ने से नदियों के प्रति स्थानीय स्तरों पर जागृत चेतनाएं सुदृढ़ हुई हैं। वास्तव में नदियों की मुक्ति के प्रति विश्व चेतना जागृत और सुदृढ़ हो तो इसका व्यापक असर पड़ेगा। आखिर हम सबका लक्ष्य तो एक ही है- नदियां हर प्रकार के बंधनों से मुक्त हों, प्रदूषण रहित हों, कारपोरेट नियंत्रण से आजाद हों और लोगों के लिए मुक्त रहें ताकि वह हमारा आपका पोषण कर सकें, हमें आनंद दे सकें, रचनाकारों के लिए निर्बाध प्रेरणा का स्रोत बनें, साधकों को अपने पवित्र वायुमंडल से आनंद की अनुभूति कराएं, हमारी आत्मसाधना को लक्ष्य तक ले जाएं और कुल मिलाकर प्रकृति के अनुरूप सभ्यता स्वाभाविक रूप से सतत विकास करे।

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