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हम चिड़ियों का घर बनाते हैं

Author: 
संजीव कुमार दुबे
Source: 
जी न्यूज डॉट कॉम, 20 मई 2012
आज हमारे जंगल तथा आस-पड़ोस से पक्षियों का चहचहाना कम हो गया है। जिन पक्षियों के चहचहाने से सुबह होने का पता चलता था। आज वे पक्षियां विलुप्त होने के कगार पर हैं इन चिड़ियों से हमारे आस-पास के गंदगियों से सफाई मिलती थी। खतरनाक कीट पतंगों को खाकर हमें अनेक बीमारियों से बचाने वाली चिड़ियों को हमें बचाना होगा। पक्षियों के संरक्षण पर लंबे अरसे से कार्य कर रहे पर्यावरणविद् राकेश खत्री से बात करते संजीव कुमार दुबे।

बचपन की एक घटना मुझे याद आती है जब राकेश शर्मा अंतरिक्ष यात्रा से वापस आये थे तो उन्होंने एक विज्ञापन दृष्टिहीन बच्चों के लिए किया था जिसमें एक बच्चा उनसे पूछता है। अंकल यह चांदनी क्या होती। शायद कुछ सालों बाद हर बच्चा अपने बड़ों से यही सवाल पूछता दिखेगा की पापा यह जुगनू कहां होता है। जंगलों में दहाड़ मारनेवाले शेर कहां चले गये, कोयल क्यों नहीं कूकती या फिर मेंढक की टर्र-टर्र अब क्यों नहीं फिजाओं में गूंजती। उस समय तो राकेश शर्मा ने बच्चों को अच्छे तरह से समझा दिया था लेकिन हम और हमारे बाद के लोग शायद जवाब देने के बजाय उनकी तस्वीरों को कोरे कागज पर उकेरने के अलावा और कुछ नहीं कर पाएंगे।

प्रकृति की सबसे खूबसूरत सौगात पर्यावरण का जिस प्रकार हमने अपनी जरूरतों की खातिर क्रूरता से दोहन किया है। उससे उत्पन्न हुए और हो रहे खतरों की फेहरिस्त बड़ी लंबी हो गई है। पर्यावरण पर इंसानी क्रूर प्रहार और दोहन की वजह से परिंदों का बसेरा भी अब छिन गया है। पक्षियों की कई खूबसूरत प्रजातियां अब नजर नहीं आती और पर्यावरण के दोहन से हमने उनके विलुप्त होने की बुनियाद रख दी है। जाहिर सी बात है शहरीकरण और कटते जंगल इसके जिम्मेदार कारकों में सबसे अहम है।

पक्षियों के संरक्षण पर लंबे अरसे से कार्य कर रहे पर्यावरणविद् राकेश खत्री पक्षियों को आशियाना देने की मुहिम से जुड़े हैं। उन्होंने अपने इस अनोखे मुहिम के जरिए हजारों बच्चों को जोड़ा है। अब तक उनके मुहिम से दिल्ली और एनसीआर के लगभग 12 हजार स्कूली बच्चे जुड़ चुके हैं जो उनके वर्कशाप में पर्यावरण के साथ परिंदों का रिश्ता और पक्षियों को घोसले में आशियाना देने की खूबसूरत कवायद बड़ी एकाग्रता के साथ सीखते हैं। राकेश खत्री नेचर फाउंडेशन इंडिया के कार्यकारी अध्यक्ष है और इसके जरिए होनेवाली पर्यावरण से जुड़ी तमाम गतिविधियों का संचालन वह खुद करते हैं।

राकेश जी की इन कोशिशों को कुछ गैर स्वयंसेवी संगठनों ने भी सराहा है तो बच्चों के अभिभावकों ने भी उनके इस शानदार पहल की तारीफ की है। परिदों को घोसले के जरिए आशियाना देने की पहल को लेकर राकेश खत्री इन दिनों सुर्खियों में हैं। उनसे बातचीत कर हमने पर्यावरण और परिदों के बीच अटूट रिश्तों की कुछ तहों को तलाशने की कोशिश की। पेश है उनसे बातचीत के कुछ प्रमुख अंश।

आपका गौरैया को बचाने के लिये बच्चों के साथ काम करने का कोई खास कारण? क्या आपको ऐसा लगता है कि बच्चों की इसमें भूमिका सराहनीय होगी या फिर इससे इस मुहिम को बल मिलेगा?

जी हां, मुझे अपने बचपन की कुछ यादें मेरे जेहन में अब भी ताजा है। आपको भी याद होगा वह खेल जो हम लोग खेला करते थे -चिड़िया उड़। साथ ही उस समय हमारे एक कलाकार दोस्त वीरेन्द्र सक्सेना एक फिल्म प्रभाग का गाना गाया करते थे- एक चिड़िया अनेक चिड़िया, पता नहीं क्यों यह मेरे दिमाग में घर कर गया था। पर्यावरण पर फिल्में बनाते- बनाते अचानक यह लगने लगा की क्यों जुगनू खोते जा रहे हैं। मेंढक की टर्र-टर्र की आवाज क्यों नहीं सुनाई देती। लेकिन इन चीजों के अलावा इस छोटी चिड़िया जिसकी आवाज सुबह सबसे पहले सुनाई देती थी वह अब शांत होती चली जा रही है। कारण कई लेकिन उपाय फिर वही गोष्ठियां, लेख और चिंता जो सबसे आसान है। सोचा क्यों न बच्चों को इसमे शामिल किया जाए क्योकि उन्हें समझाना और प्रेरित करना मेरे लिये आसान था। चिंता का कारण यह है खेल-खेल में उड़ने वाली चिड़ियां को सचमुच हमने उड़ा दिया।

आप बच्चों को इस संदर्भ में जागरूक करने के लिए किस प्रकार की कार्यशाला करते है?

बड़ी आसान होती है यह कार्यशाला। जैसे शुरू में उनसे सामान्य सवाल कौओं और कबूतर को छोड़कर किए जाते है कि वह 10 पक्षियों के नाम बता दे जो आपके घर के आस-पास दिखते हैं। फिर शुरू होता एक मनोरंजक सफर जो थोड़े समय में एक होड़ में शामिल हो जाता है। किसी प्रोग्राम में बच्चे 10 गिना देते हैं तो कही 5 के बाद फुलस्टॉप। उसके बाद जब चिड़िया पर आते है तो जवाब सबका एक ही होता है अब नहीं दिखती। तब पूछा जाता है क्यों तो कारण कई आते है कुछ ही बता पाते है की हाउस स्पैरो को घर इसलिये नहीं मिलता की अब घर में हम जगह ही नहीं छोड़ते। उन पंखो के कटोरे, स्विच बोर्ड, मीटर का बक्सा और कहीं भी छोटा सा आशियाना बनाने की जगह हमने छोड़ी ही नहीं।

क्या आपको लगता है शहरीकरण की इस रफ्तार और बाकी चीजों के बीच आप और बच्चे इस विषय पर कुछ कर पायेंगे?

जनाब यही तो कमाल की बात है। बच्चे इतनी रूचि दिखाते हैं की हैरानी होती है। उस वक्त दिली खुशी होती है कि मेरी मुहिम रंग ला रही है। पिछले तीन साल से अबतक तकरीबन 12000 बच्चों के साथ और मेरी टीम के सदस्य वर्कशॉप कर चुके हैं। साथ ही साथ इसमे रेसिंडेशियल वेलफेयर एसोसिएशन का जुड़ाव भी एक अच्छा संकेत है। बच्चे जब मेल पर या फोन पर जानकारी मांगते है तो सुकून सा लगता है और इस खुशी को बयां कर पाना बेहद मुश्किल है। यह सिर्फ मैं महसूस कर सकता हूं। इस खुशी में परिंदों की चहचहाहट सा अनुभव होता है।

पक्षियों और पर्यावरण के जुड़ाव को आप किस प्रकार देखते हैं। कृपया इसे समझाएं कि पक्षियों के विलुप्त होने का पर्यावरण पर क्या असर होगा?

पक्षी हमारे पर्यावरण का एक अहम हिस्सा है। पर्यावरण को बचाने में पक्षी तीन तरह की भूमिका निभाते हैं। कुछ पक्षी प्रकृति की कुछ चीजों का फैलाव करते है, जैसे बीजों का फैलाव इससे पौधों का विस्तार होता है। पक्षी ऐसे कीटों और पतंगों को खा जाते है जो पर्यावरण के लिये हानिकारक होते है। तीसरा पक्षी प्रदूषण के प्रभाव के अच्छे संकेतक होते हैं। पक्षियों का विलुप्त होना गंभीर चिंता का विषय है। इसके गंभीर परिणाम होंगे पूरा खाद्य चक्र इनसे जुड़ा पारिस्थितिकी असंतुलन हो जायेगा।

आपने कहा कि पक्षियों की कई प्रजातियां विलुप्त हो रही है। विलुप्त होती प्रजातियों के पीछे आप सबसे बड़ी वजह क्या मानते हैं। क्या तेजी से कम होते जंगल और शहरीकरण में इजाफा इसका सबसे बड़ा कारण है?

बिल्कुल सही। विकास और विनाश के बीच एक पतली रेखा है जिसे हम अपने आधुनिकीकरण की होड़ में नजर अंदाज कर जाते है। जिस कगार पर हम आ खड़े हुए हैं वह ज्यादा खुशहाल नहीं है। बातें तो हरियाली की हम करते हैं। बडे आंकड़े कार्यशाला में दिखाते हैं फॉरेस्ट कवर बदलने की लेकिन उनका घर जो हम बर्बाद कर रहे हैं। इस संतुलन को अगर हम बना कर रखें तो शायद जो कुछ हमने अब तक देखा है उसका कुछ हिस्सा आने वाली पीढ़ी देख सकेंगी वरना भविष्य को भूतकाल बनने से कोई नहीं रोक पायेगा।

घोसला बनाते समय क्या यह बात आपके जेहन में आती है कि कोई पक्षी इसमें अपना बसेरा बनाएगा। घोसले की अहमियत पक्षियों को बचाने और उनके संरक्षण के लिहाज से आप जरूरी क्यों मानते हैं?

यह बात आती है लेकिन अब इतने दिन बाद यह निष्कर्ष देख कर अच्छा लगता है की काफी ऐसे पक्षी जो कृत्रिम घोंसला नहीं पकड़ते थे जैसे सफेद उल्लू जिसने हमारे लगाये ओखला पक्षी विहार के तीन अलग-अलग घरो में बच्चे दिये हैं। भारतीय होर्नबिल और तो और हरियल जो अब देखने को भी कम मिलता है उसने ने भी बसेरा बनाया।

घोसला बनाना बच्चों तक पहुंचने का आसान तरीका है क्योंकि उनमें सृजन की चाह होती है। लकड़ी या और कुछ सामान का प्रयोग न करके हमने सड़क किनारे पड़े बेकार हरे नारियल का प्रयोग किया। कुछ घास, थोड़ा गोंद, सुतली और अखबार की कतरन और एक छोटी लकड़ी, कुल जमा खर्च 20 रूपए। लीजिये तैयार अपनी प्यारी गौरेया का घर। हमारा यह मकसद है और जिसमें हम प्रयत्नशील भी हैं की यह बच्चे और जागरूक नागरिक इस मुहिम में जुड़ कर कुछ सार्थक कर पायें। बच्चे जनमानस एक दिन जागरुक कर पाने में कामयाब होंगे ऐसा मेरा विश्वास है।

आपकी मुहिम से अबतक 12 हजार से भी ज्यादा बच्चे जुड़ चुके हैं। घोसला बनाकर पक्षियों का संरक्षण किस प्रकार मुमकिन है। इस मुहिम से बच्चों को जोड़ने का लाभ आप किस प्रकार देखते हैं। क्या जागरूकता की यह सीढी बच्चों तक ही जरूरी है या फिर पूरा जनमानस को इसके लिए जागरूक होना होगा?

घोसला या नेस्ट बच्चा अपनी पहली पुस्तक से देखता आ रहा है और हमेशा ही यह एक उत्सुकता का विषय रहा है। क्योंकि हमने इस पीढ़ी को कई अच्छी चीजों से वंचित करके सौंपा है तो मुझे लगता है यह बच्चे कुछ अच्छा करके आगे सौंपे तो वह और भी सुखद होगा। अब तक दिल्ली और एनसीआर के तकरीबन 12000 बच्चों के साथ हम जुड़ चुके हैं। यह सब किसी न किसी रूप में जुडे हैं। प्रचार-प्रसार बचाना और अपने से आगे के लोगों को प्रेरित करना शायद इन सब समूह सदस्यों ने दैनिक कार्य बना लिया है। मेरा मानना है अगर कुछ अच्छे लोग और जिम्मेदार समाज के नागरिक साथ दे तो हम कुछ सार्थक कर पायेंगे। यह खूबसूरती जाहिर तौर पर पर्यावरण के आवरण को फिर से खूबसूसरत आकार प्रदान करेगी।

बर्ड हाउस के जरिए हम पक्षियों की प्रजातियों को किस प्रकार संरक्षित कर सकते हैं। जैसा कि मैंने पहले कहा कि पक्षियों की प्रजातियां मुख्य रूप से मानव गतिविधियों की वजह से विलुप्त हो रही है। हम उन्हें छोटे और प्रभावी उपायों से बचा सकते हैं और उनमें से एक हैं- बर्ड हाउस।

कोशिश करें की स्थानीय पेड़ों की किस्में लगाये क्योंकि पक्षी इन्हीं पर घर बनाते हैं छोटे और घने पेड़ भी एक अच्छा आमंत्रण है। टर्की देश एक अच्छा उदहारण हैं। वहां घर के बाहर पक्षियों के लिए घर बनाना बहुत शुभ माना जाता है । मुझे लगता है साल के अपने त्यौहार की तरह प्रजनन के महीने मार्च से पहले यह भी एक रिवाज बना लेना चाहिए। देखिए शायद प्रकृति जो हमसे वापस धन्यवाद के रूप में कुछ नहीं मांगती उसे कुछ दे पाये इसमें घर और समाज का योगदान और बच्चों की रूचि ही बदलाव ला सकती है।

जो पक्षी विलुप्त हो गए हैं क्या उनकी वापसी मुमकिन है या फिर जो पक्षी विलुप्त होने की कगार पर है उनके बचाने के लिए किस प्रकार के कारगर उपाय किए जाने चाहिए?

यह संभव नहीं है कि विलुप्त हो चुकी प्रजातियां वापस आ सके लेकिन इस दिशा में चर्चा और प्रयास जारी है भविष्य पर आपके साथ हमारी भी निगाह है। विलुप्त प्रजातियों की "क्लोनिंग" करने की चर्चा वैज्ञानिक क्षेत्र में की जा रही है हांलाकि ये बहुत ही कठिन कार्य है।

हां ये संभव है। कुछ ऐसे तरीके हैं मसलन जानवरों के बसेरे को संजोना, अपने घर पर एक चिड़ियों के पानी का बर्तन रखें। अपने बगीचे में कम्पोस्टिंग करें। पेड़ लगायें। पर्यावरण को बचाने के लिए लोगों को जागरूक करें। सबसे ज्यादा जरूरी है कि बच्चों को प्रेरित किया जाए कि अपने आस-पास के पक्षियों और पेड़ों को पहचाने छोटे समूह बनाये। हमारी जरूरत हो तो हमे संपर्क करें हम साथ हैं । रिड्यूस (Reduce),रियूज(Reuse), रिसाइकिल (Recycle) के साथ अगर हम RESPECT (आदर) प्रकृति के लिए भी जोड़ दें तो भला इससे बेहतर क्या होगा। ऐसा करना पर्यावरण को खूबसूरत कर पाने की यकीनन एक बेहतर पहल होगी।( धन्यवाद)

(इस विषय पर और जानकारी हासिल करने के लिए आप राकेश खत्री को मेल भेज सकते हैं। kraakesh@gmail.com)

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