06 जून, 2012 के शुक्र ग्रह

नवनीत कुमार गुप्ता

इस खगोलीय घटना का आनंद लिजिए


यदि आपने सन् 2004 में शुक्र ग्रह के पारगमन की घटना को देखा है तो आप बहुत भाग्यशाली होंगे जो अपने जीवनकाल में दूसरी बार इस पारगमन को 6 जून 2012 को देख सकेंगे। लेकिन इसके बाद होने वाले शुक्र पारगमन को देखना हम में से शायद ही किसी के लिए संभव हो।

मानव के लिए अंतरिक्ष सदैव से भय, रोमांच, आकर्षण एवं रहस्य से भरा रहा है। अंतरिक्ष में घटने वाली घटनाएं मानव की उत्सुकता को बढ़ाते हुए अंतरिक्ष के रहस्यों से पर्दा उठाने के लिए उत्प्रेरक का कार्य करती रही हैं। ऐसी ही एक घटना ‘शुक्र पारगमन’ 6 जून, 2012 को घटने वाली है। यह घटना इसलिए भी महत्वपूर्ण है कि इसके बाद इस घटना को देखने का सौभाग्य 100 सालों से भी बाद में मिलेगा। जब पृथ्वी और सूर्य के बीच चंद्रमा आता है तो वह घटना ग्रहण कहलाती है। परंतु जब पृथ्वी और सूर्य के बीच में बुध ग्रह अथवा शुक्र ग्रह जैसे आंतरिक ग्रहों में से एक आ जाए, तो यह घटना पारगमन कहलाती है। यह हम जानते हैं कि बुध और शुक्र ग्रह दो ही सौरमंडल के आतंरिक ग्रह हैं। वैसे ग्रहीय पारगमन लगभग चंद्र-ग्रहण की तरह ही होता है। इसमें शुक्र ग्रह पृथ्वी और सूर्य के बीच से होकर गुजरता है। ग्रहण और पारगमन में मुख्य अंतर यह है कि चंद्र-ग्रहण के दौरान पृथ्वी से देखने पर चंद्रमा का आकार सूर्य के जितना ही दिखता है, जबकि दूसरी तरफ शुक्र ग्रह पृथ्वी से सूर्य के मुकाबले बहुत छोटा दिखता है। इसलिए जब ये ग्रह सूर्य के सामने से गुजरते हैं तो यह एक छोटे काले धब्बे जैसा नजर आते हैं। इस समय ऐसा लगता है जैसे सूर्य पर काला दाग लग गया हो।

शुक्र पारगमन से जुड़ी एक महत्वपूर्ण बात यह भी है कि शुक्र ग्रह का पारगमन केवल जून अथवा दिसंबर में ही होता है। ऐसा इसलिए होता है क्योंकि इसी दौरान शुक्र ग्रह की कक्षीय नोड सूर्य के सामने से होकर गुजरती है। शुक्र के मुकाबले बुध ग्रह का पारगमन अधिक बार होता है। बुध ग्रह का पारगमन एक शताब्दी में 13 से 14 बार देखा जा सकता है। 21वीं शताब्दी में बुध ग्रह का पहला पारगमन 7 मई 2003 को हुआ था। जिसको सम्पूर्ण विश्व में देखा गया। शुक्र ग्रह का पारगमन एक दुर्लभतम ग्रहीय सरेखण का परिणाम है। जब से दूरबीन का आविष्कार हुआ है, तब से ऐसी केवल 7 घटनाएं (1631, 1639, 1874, 1882, 1961, 1969 एवं 2004) ही घटित हुई हैं। पिछले 243 वर्शों में शुक्र ग्रह के पारगमन लगभग 4 बार हुए हैं। ये पारगमन घटनाएं जोड़ों में होती हैं और प्रत्येक शताब्दी में केवल एक जोड़ा पारगमन घटनाएं होती हैं जिनके बीच 8 वर्ष का अंतर होता है और उन जोडों के बीच एक शताब्दी का अंतर होता है। शुक्र ग्रह के पारगमन का प्रथम रिकार्ड 1639 ई. में अंग्रेज खगोलविद् जरेमिआ होर्रोक्स द्वारा दूरबीन के आविष्कार के तीन दशक बाद का दर्ज है। यह किसी पारगमन की एक घटना को देखे जाने का प्रमाण था। तब से 1761, 1769, 1874, 1882 और 2004 में पारगमन देखे गए। 1761, 1874 तथा 1984 के पारगमन भारत में पूर्ण रूप से दिखाई दिये थे।

शुक्र पारगमन जैसी घटनाएं खगोलीय अध्ययन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। एडमंड हैले (1656-1742) के अनुसार पारगमन को पृथ्वी से सूर्य की दूरी मापने हेतु प्रयोग किया जा सकता है। इससे पहले केपलर के नियमों से भी सूर्य और अन्य ग्रहों के बीच की आपेक्षिक दूरी पता चली, परंतु निरपेक्ष दूरियां ज्ञात नहीं थी। हालांकि हैले ने अपने जीवनकाल में शुक्र के पारगमन नहीं देखे, परंतु उनके प्रयासों ने 1761 तथा 1769 में शुक्र ग्रह के पारगमन के प्रेक्षण हेतु अनेक अभियानों को जन्म दिया, जिसके परिणामस्वरूप खगोलज्ञों को पृथ्वी से सूर्य के बीच की निश्चित दूरी पता चली। पारगमन और पृथ्वी से सूर्य की दूरी को ज्ञात करने के लिए गणितीय मापों का प्रयोग करते हुए पृथ्वी से सूर्य की दूरी तथा सौर परिवार का आकार जाना जा सकता है। चूंकि अब मापन की परिशुद्ध विधियां उपलब्ध हैं, इसलिए वर्तमान में स्वीकृत दूरियों के मुकाबले 18वीं तथा 19वीं शताब्दी में सावधानीपूर्वक प्राप्त दूरियों में केवल एक प्रतिशत का ही अंतर था। इसके अलावा शुक्र का पारगमन हमारा ध्यान ग्रहों की जटिल गति, केप्लर के नियम, गति की और गुरूत्वाकर्षण की तरफ आकर्षित करता है। 1761 के पारगमन से मिखाइल लोमोनोसोव नामक एक वैज्ञानिक ने यह साबित किया कि शुक्र ग्रह का भी अपना एक वायुमंडल है, जो इस ग्रह के इर्द-गिर्द एक अस्पष्ट और धुंधले प्रभामंडल की तरह दिखता है। सूर्य के सामने से शुक्र ग्रह के पारगमन के प्रेक्षणों से ही शुक्र ग्रह के आकार के बारे में जानकारी मिली है। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि शुक्र के पारगमन की ज्यामिति गणना से सूर्य-पृथ्वी की दूरी, जिसको खगोलीय इकाई कहा जाता है, का अनुमान लगाया जा सकता है।

अंतरिक्ष में घटित होने वाली अनेक आकाशीय घटना रोमांचक और आकर्शक होती हैं। अनंत तक फैला अंतरिक्ष हमारी कल्पनाओं का केंद्र रहा है। इसलिए अंतरिक्ष घटनाओं पर अनेक प्रौराणिक आख्यान, कहानियां, धारणाएं विश्व के लगभग सभी सभ्यताओं में प्रचलित हैं। इसलिए हमें ऐसी घटनाओं से जुड़ी भ्रांतियों, अंधविश्वासों पर विश्वास न करके उनका आनंद उठना चाहिए। यदि आपने सन् 2004 में शुक्र ग्रह के पारगमन की घटना को देखा है तो आप बहुत भाग्यशाली होंगे जो अपने जीवनकाल में दूसरी बार इस पारगमन को 6 जून 2012 को देख सकेंगे। लेकिन इसके बाद होने वाले शुक्र पारगमन को देखना हम में से शायद ही किसी के लिए संभव हो। क्योंकि अगला शुक्र पारगमन 100 से भी अधिक सालों के बाद होगा। इसलिए हमें 6 जून, 2012 को शुक्र पारगमन को देखने का सावधानीपूर्वक देखने का प्रयास अवश्य करना चाहिए ताकि हम अंतरिक्ष की अनोखी परिघटना के साक्षी बन सकें।

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