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गंगा मुक्ति का यक्ष प्रश्न

Author: 
अवधेश कुमार
Source: 
प्रथम प्रवक्ता, मई 2012

प्राधिकरण के सामने गंगा संकट की समग्र स्थिति आई। गंगा मुक्ति आंदोलनों, उनसे जुड़े अलग-अलग सत्याग्रहों, अनशनों, यात्राओं, गोष्ठियों, सेमिनारों आदि के द्वारा भी सारी बातें समय-समय पर आती रहीं। अगर उन सबका संज्ञान लेकर एक निश्चित समय सीमा का मास्टर प्लान यानी पूर्ण योजना बनाकर उस पर अमल आरंभ किया जाए तो गंगा को मुक्त किया जा सकता है। पर ऐसा हुआ ही नहीं। सच यह है कि प्राधिकरण में दूरगामी योजना की बातें कम उठी।

राष्ट्रीय गंगा बेसिन प्राधिकरण की तीसरी बैठक 17 अप्रैल को प्रधानमंत्री की अध्यक्षता में संपन्न हुई। प्राधिकरण की तीन वर्ष की उम्र में यह तीसरी बैठक थी। बैठक में प्रधानमंत्री ने स्वयं यह स्वीकार किया कि गंगा के किनारे बसे शहरों से प्रतिदिन 290 करोड़ गंदा पानी इस नदी में मिलता है। इसमें से 110 करोड़ लीटर का ही शोधन हो पाता है। प्रधानमंत्री ने इस बात पर भी दुख प्रकट किया कि ‘राष्ट्रीय गंगा सफाई मिशन’ के तहत पर्याप्त धन उपलब्ध है। और राज्य हैं कि उपयुक्त प्रस्ताव ही नहीं भेजते। अब जिस प्राधिकरण की तीन साल में सिर्फ तीन बैठक हो, वह भी अनशन सत्याग्रह के दबाव में तो प्राधिकरण कितना काम कर रहा होगा, इसकी कल्पना करना कठिन काम नहीं है। उस बैठक में हुआ क्या? आपको इसके उत्तर में बस शून्य ही हाथ आएगा। प्रधानमंत्री ने स्वयं यह स्वीकार किया कि गंगा के किनारे बसे शहरों से प्रतिदिन 290 करोड़ लीटर गंदा पानी इस नदी मे मिलता है। इसमें से 110 करोड़ लीटर का ही शोधन हो पाता है।

प्रधानमंत्री ने इस बात पर भी दुख प्रकट किया कि ‘राष्ट्रीय गंगा सफाई मिशन’ के तहत पर्याप्त धन उपलब्ध है और राज्य है कि उपयुक्त प्रस्ताव ही नहीं भेजते। प्रधानमंत्री का भाषण हालांकि इस बात पर केंद्रित था कि गंगा को कैसे प्रदूषण मुक्त किया जाए, लेकिन विषयवस्तु राज्यों को कठघरे में खड़ा करने वाला था। यानी राज्य यदि प्रस्ताव ही नहीं भेजेंगे तो हम धन निर्गत कैसे करेंगे। अगर राज्यों के प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड प्रदूषण रिसाव मानकों के अनुसार निगरानी नहीं करेंगे, दोषी उद्योगों के खिलाफ कार्रवाई नहीं करेंगे तो फिर गंगा स्वच्छ कैसे होगी। इस तरह प्रधानमंत्री ने गंगा की दुर्दशा के लिए राज्यों के रवैए को दोषी ठहराया। उन्होंने तो राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्डों को बिल्कुल नाकामयाब ही साबित कर दिया। इस बात की चर्चा नहीं की कि स्वयं वे गंगा के लिए अब तक कितना वक्त निकाल पाए हैं, खैर!

यदि प्रधानमंत्री के वक्तव्य को ही वस्तुस्थिति मान ले तो गंगा की दुर्दशा भयावह स्थिति में पहुंच गई है। मौजूदा व्यवस्थाएं एवं ढांचे उसे दुरुस्त करने में असफल साबित हो रहे हैं, राज्य सरकारें उपेक्षा कर रही हैं। दूसरे शब्दों में, गंगा को स्वच्छ और निर्मल बनाना है तो फिर इन ढांचे की नए सिरे से पुनर्रचना करने की आवश्यकता है। इसके लिए राजनीतिक नेतृत्व को अपना नजरिया और रवैया दोनों बदलना होगा। प्रधानमंत्री ने स्वयं गंगा के संदर्भ में आपात स्थिति स्वीकार करते हुए कहा कि समय हमारे पक्ष में नहीं है। हमें त्वरित कार्रवाई करनी है, तो एक ओर आपात स्थिति और दूसरी ओर उन्हीं के मूल्यांकन में विफल ढांचे। फिर ऐसी स्थिति में हो क्या सकता है? गंगा उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंड एवं प. बंगाल से होकर गुजरती है। इनमें पश्चिम बंगाल को छोड़कर चार राज्यों के मुख्यमंत्री स्वयं बैठक में उपस्थित थे। पश्चिम बंगाल का प्रतिनिधित्व वित्त मंत्री अमित मित्रा ने किया। पर आश्चर्य की बात है कि किसी मुख्यमंत्री के पास गंगा नदी की सही कल्पना तथा उसकी स्वच्छता और निर्मलता के लिए कोई रूपरेखा नहीं थी। ऐसा लगा जैसे सब प्रधिकरण की बैठक की औपचारिकता की पूर्ति करने आए थे। वित्त मंत्री प्रणब मुखर्जी, पर्यावरण मंत्री जयंती नटराजन, जल संसाधन मंत्री पवन कुमार बंसल भी बैठक में थे। पर उन्होंने भी ऐसी कोई बात नहीं कही, जिससे यह लगे कि गंगा को बचाने की इनके अंदर ईमानदार उत्कंठा है और इसकी भयावहता की कोई कल्पना भी इन्हें है।

गंगा के लिए तपस्यारत स्वामी ज्ञानस्वरुप सानंदगंगा के लिए तपस्यारत स्वामी ज्ञानस्वरुप सानंदध्यान रखने की बात है कि अविरल प्रवाह और निर्मल धारा की जो मांग गंगा आंदोलन से जुड़े संगठन कर रहे हैं, उसमें अविरल प्रवाह तो प्रधानमंत्री ने कुछ कहा ही नहीं। अविरल प्रवाह का अर्थ है, गंगा को बांधों से मुक्त करना। इस पर सरकार की नीति के बारे में न प्रधानमंत्री ने कुछ कहा, न किसी मंत्री ने कुछ कहा। हां, उत्तराखंड के मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा ने जब बड़े बांधों की आवश्यकता पर बोलना आरंभ किया तो प्रधानमंत्री ने उन्हें रोक दिया। ऐसा लगता है कि स्वामी ज्ञानस्वरूप सानंद के अनशन से उत्पन्न स्थिति का ध्यान रखते हुए ही प्रधानमंत्री ने ऐसा किया। यह स्वाभाविक था कि जिस पृष्ठभूमि में बैठक हुई, उसमें ऐसी कोई बात करना जिससे विवाद उत्पन्न हो और परिस्थितियां बिगड़ जाए, यह किसी दृष्टि से बुद्धिमता की बात नहीं होगी। किंतु यह स्वयं समझने वाली बात है कि अगर प्रधानमंत्री या किसी मुख्यमंत्री ने नए बांध न बांधने या फिर बांधों की परियोजनाओं को रोकने की बात नहीं की तो फिर वे अविरलता के पक्ष में नहीं है और बगैर अविरल धारा के गंगा निर्मल हो ही नहीं सकती। प्राधिकरण की तीसरी बैठक ही इस बात का प्रमाण है कि गंगा को राष्ट्रीय नदी घोषित करने तथा प्राधिकरण के गठन से जो उम्मीद जगी थी, वह व्यावहारिक नहीं थी।

यह बात ठीक है कि मुक्ति आंदोलनों के दबाव में प्रधानमंत्री ने स्वयं पहल की। प्राधिकरण बनाकर गंगा और नदियों से जुड़े लोगों को अपने साथ सीधे जोड़ा। लेकिन अन्य सरकारी प्राधिकरणों की तरह इस पर भी नौकरशाही दृष्टीकोणों और तौर-तरीकों का वर्चस्व बना रहा। गंगा से जुड़े कुछ लोग इसमें आ अवश्य गए, पर अधिकारियों की नजर में उनकी बातें बहुत व्यावहारिक नहीं थी। अगर आप अकेले में उनसे बातें करिए तो वे कहेंगे, “उनमें भावुकता का तत्व ज्यादा रहता है, व्यावहारिकता का कम।” यह बात ठीक है कि प्राधिकरण में जुड़े कुछ गंगा विशेषज्ञों का अपना एनजीओ है। इस नाते उनका एजेंडा भी है। पर प्राधिकरण के सामने गंगा संकट की समग्र स्थिति आई। गंगा मुक्ति आंदोलनों, उनसे जुड़े अलग-अलग सत्याग्रहों, अनशनों, यात्राओं, गोष्ठियों, सेमिनारों आदि के द्वारा भी सारी बातें समय-समय पर आती रहीं। अगर उन सबका संज्ञान लेकर एक निश्चित समय सीमा का मास्टर प्लान यानी पूर्ण योजना बनाकर उस पर अमल आरंभ किया जाए तो गंगा को मुक्त किया जा सकता है। पर ऐसा हुआ ही नहीं। सच यह है कि प्राधिकरण में दूरगामी योजना की बातें कम उठी। महत्वपूर्ण नीतियों से जुड़े पहलुओं से बचने की रणनीति अपनाई गई। स्व. राजीव गांधी द्वारा आरंभ ‘गंगा कार्य योजना’ क्यों उम्मीदों पर खरी नहीं उतरी। इसके निर्मम विश्लेषण के बगैर रास्ता कहां से निकल सकता है। इसलिए प्राधिकरण के एजेंडे में सबसे पहला विषय तो यही होना चाहिए था। उसके बाद गंगा नीति और योजना का स्थान था।

यह कौन-सी नीति है कि पहले आप गंगा की धारा में जहर डालो और फिर उसे शुद्ध करने के लिए परियोजनाएं लाओ। उस पर भारी-भरकम खर्च करते रहिए। होना तो यह चाहिए कि गंगा में जहर ही नहीं जाए। अगर जहर जाएगा ही नहीं तो फिर सफाई की ऐसी भारी योजना की स्थायी आवश्यकता कहां से रह जाएगी। आखिर उद्योगों का कचरा गंगा में जाता रहेगा, मल-मूत्र प्रवाहित होता रहेगा तो वह निर्मल होगी ही नहीं।

प्रधानमंत्री ने अपने भाषण में जो कुछ कहा वह सही है। आप किसी भी शहर के गंगा योजना संबंधी ढांचे को देख लीजिए, कहीं भी यह शत-प्रतिशत सुचारू रूप से कार्य करता नहीं मिलेगा। एसटीपी तक आपको चलता हुआ मिल जाए तो गनीमत है। यानी किसी शहर की गंदगी पूरी तरह शोधित होकर गंगा में नहीं जाती है। ऐसा नहीं है कि यह संभव नहीं हो सकता। हो सकता है, किंतु इसके लिए उन ढांचों की पुनर्रचना करनी होगी। सरकार एवं नागरीक दोनों के सतत सहकार से इसका संचालन हो ऐसी स्वचालित व्यवस्था भी खड़ी करनी होगी। इसके लिए नीतियां तो राष्ट्रीय स्तर पर ही बन सकती हैं। मार्ग निर्देश भी केंद्र की ओर से आ सकता है। अगर उद्योगों से निकलने वाला जहरीला कचरा नदी में जाता रहेगा तो वह सड़न का शिकार होता ही रहेगा। प्रधानमंत्री का यह कहना आंकड़ों के अनुसार ठीक हो सकता है कि गंगा में जो गंदगी जाती है, उसमें उद्योगों का योगदान 20 प्रतिशत ही है। हालांकि यह सरकारी आंकड़ा है। आप हम जानते हैं, प्रदूषण संबंधी सरकारी महकमा आंकड़ों की बाजीगरी में कितना माहिर है। फिर भी यदि इतना है तो यह कम नहीं है। आखिर यह ज्यादा विषैले हैं। प्रधानमंत्री की अध्यक्षता वाले प्राधिकरण के तीन साल होने पर भी यदि प्रदूषण नियंत्रण के क्षेत्र में कोई प्रगति नहीं हुई तो आगे इस बाबत क्या उम्मीद की जाए?

जरा सोचिए, यह कौन-सी नीति है कि पहले आप गंगा की धारा में जहर डालो और फिर उसे शुद्ध करने के लिए परियोजनाएं लाओ। उस पर भारी-भरकम खर्च करते रहिए। होना तो यह चाहिए कि गंगा में जहर ही नहीं जाए। अगर जहर जाएगा ही नहीं तो फिर सफाई की ऐसी भारी योजना की स्थायी आवश्यकता कहां से रह जाएगी। आखिर उद्योगों का कचरा गंगा में जाता रहेगा, मल-मूत्र प्रवाहित होता रहेगा तो वह निर्मल होगी ही नहीं। इतिहास में पहली बार 1932 में अंग्रेज कमीश्नर हॉकिंस ने वाराणसी के एक गंदे नाले को गंगा से जोड़ने का आदेश दिया था। वहीं से गंदगी के नदी में जाने की शुरुआत हो गई। जाहिर है, यह व्यवस्था केवल 80 वर्ष पुरानी है। इसका अंत हो सकता है, किंतु अंत की जगह आज गंगा के साथ उसकी सहायक नदियां काली, कृष्णी, गोमती, दामोदर, पांडु, पांवधोई, मंदाकिनी, यमुना, सई, आमी आदि भी दूषित होकर छटपटा रही हैं। इन सबको प्रदूषण मुक्त करने का संघर्ष चल रहा है। इनसे संबंधित मांगे सरकार के सामने हैं।

यानी गंगा और उससे मिलने वाली सभी नदियों को प्रदूषित करने वाले चमड़ा, कागज आदि उद्योगों के बारे में पुनर्विचार किया जाए। उन्हें नदी से कम से कम 50 कि.मी. दूर हटा दिया जाए। इस मांग को स्वीकार करने में राज्य सरकारों के हाथ-पांव फूल रहे हैं। दुर्भाग्यवश, सरकारों का नजरिया यह है कि उद्योगों के बगैर विकास नहीं हो सकता और उनको स्थानापन्न करने से समस्याएं बढ़ेंगी। वे यह नहीं सोचते कि अगर नदियां मर गई तो पूरी सभ्यता ही नष्ट हो जाएगी। इसी प्रकार गंगा प्रदूषण मुक्ति के नाम पर चलने वाली 10 करोड़ से ज्यादा की एसटीपी या एटीपी परियोजनाओं को तब तक रोका जाए जब तक इनकी समीक्षा नहीं हो जाती। समीक्षा के साथ इसका विकल्प भी सामने आ जाएगा और इन प्रदूषकों को गंगा ने गिराने की जगह शोधन के बाद दूसरी दिशाओं में ले जाकर खर्च किया जा सकता है।

इतने पर भी उपयुक्त लाभ नहीं मिलेगा, जब तक कि गंगा की धारा को निर्बाध न बनाया जाए यानी वह अविरल बहे। गंगा को बांधने का काम भी अंग्रेजों के समय आरंभ हुआ। 1839 में अंग्रेज प्रो. बी.टी. काले की योजना के अनुसार 1848 में ऊपरी (हरिद्वार) और 1873 में निचली गंग नहर (नरोरा) का निर्माण आरंभ हुआ। उसके बाद जब 1912 में हरिद्वार के भीमगौड़ा बांध की योजना कार्यरूप लेने लगी तो लोगों ने व्यापक विरोध आरंभ किया। उस विरोध आंदोलन के परिणामस्वरूप 26 सितंबर, 1916 को यह शासनादेश जारी करना पड़ा कि गंगा का निकास-द्वार यथावत रहेगा, मुक्त-द्वार कभी बंद नहीं होगा। जो नई आपूर्ति धारा बनी है उसमें पक्की दीवार नहीं होगी। उसे नहर तो पुकारा नहीं ही जाएगा, नहर जैसा उसका स्वरूप भी नहीं होगा।

अंग्रेजों ने अपना वायदा भले निभाया। आजाद भारत के नुमाइंदों के लिए तो गंगा का पानी भी एक वस्तु हो गई जिसका जिस तरह चाहो आर्थिक दुरुपयोग करो। 1979 की टिहरी बांध से जिस दुष्चक्र की शुरुआत हुई उसका अंत होने का नाम ही नहीं ले रहा है। संघर्ष दर संघर्ष, दरख्वास्त दर दरख्वास्त, बैठकें दर बैठकें, अनशन, सत्याग्रह, यात्राएं सब बेकार। उत्तराखंड सरकारों को तो लगता रहा है कि अगर बांध नहीं, तो शायद उनका अस्तित्व ही नहीं। यह विनाशकाले विपरीत बुद्धि ही है। जब पनबिजली परियोजनाएं नहीं थीं तब भी उस क्षेत्र का अस्तित्व था। प्रकृति से उतना ही लेना चाहिए जिससे संतुलन बना रहे। त्रासदी झेलने को मजबूर कर देने में नहीं है।

नहर बनते ही आप मनमाना पानी छोड़ते और रोकते हैं जिनसे पानी स्थिर होता है गाद बनती है। वह नदी रहता ही नहीं, जमा रुका पानी सड़ता है और उसमें जब शहरों का मल, उद्योगों का कचरा मिलता है तो उसकी क्या दशा होती है यह बताने की आवश्यकता नहीं। इसलिए गंगा मुक्ति अभियानों की यह मांग बिल्कुल वाजिब है कि गंगा और उसे पंचप्रयाग बनाने वाली सहायक नदियों अलकनंदा, मंदाकिनी, नंदाकिनी, पिंडर, विष्णुगंगा पर निर्माणाधीन सभी परियोजनाएं बंद व निरस्त हों। प्राधिकरण की बैठक में यह मांग की गई थी इनकी समीक्षा हो और समीक्षा तक इन्हें बंद रखा जाए। इस पर कोई आश्वासन नहीं मिला। यह मांग तो गंगा सहित इन नदियों की धारा को निर्बाध बनाने कि दिशा का पहला कदम है।

प्रधानमंत्री की अध्यक्षता में राष्ट्रीय गंगा बेसिन प्राधिकरण की तीसरी बैठकप्रधानमंत्री की अध्यक्षता में राष्ट्रीय गंगा बेसिन प्राधिकरण की तीसरी बैठकयदि सरकार इसे ही स्वीकार करने से घबरा रही है तो आगे क्या होगा। इसी तरह नरोरा से हमेशा 100 घनमीटर पानी का प्रवाह सुनिश्चित करने की मांग गंगा के प्रवाह को बनाए रखने के लिए है। कुंभ और माघ मेले के दौरान 200 घनमीटर प्रति सेकेंड जल प्रवाह की मांग भी ऐसा ही है। ये सारे तात्कालिक मांग हैं। जब गंगा का प्रवाह अविरल हो जाएगा इसकी आवश्यकता ही नहीं रहेगी। सरकारों को हिम्मत दिखानी होगी और लोगों को भी विकास के गलत नजरिए में बदलाव कर इसे स्वीकार करना होगा। वस्तुतः देवप्रयाग से लेकर गंगा की सभी धाराओं पर तथा देव प्रयास से नीचे गंगा के मूल प्रवाह, नदी भूमि, बाढ़ क्षेत्र सभी को पर्यावरण की दृष्टि से संवेदनशील घोषित करना होगा। साथ ही इन क्षेत्रों को निर्माण परियोजनाओं से निषीद्ध बनाना होगा।

ध्यान रखने की बात है कि कुछ आश्वासन सरकार ने ही दिए थे। मसलन,
1. मंदाकिनी पर सिंगोली-भटवारी भगीरथी पर कोटली भेलाए, अलकनंदा पर विष्णुगाद-पीपकोटी और अलकनंदा बद्रीनाथ तथा पिंडर पर देवसरी परियोजना वन एवं पर्यावरण की स्वीकृति के लिए जो मानदंड हैं उनका पालन न करने का दोषी पाई गई हैं। इसलिए उनका काम रोकने का आदेश जारी होगा। इसकी जांच के लिए जो कमेटी बनेगी उसकी जांच रिपोर्ट एक सप्ताह के भीतर आ जाएगी।

2. भगीरथी, अलकनंदा, मंदाकिनी, नंदाकिनी, पिंडर, विष्णुगंगा और धौलीगंगा समेत गंगा की सभी सहायक नदियों पर बिजली परियोजनाओं को वन एवं पर्यावरणीय मंजूरी नहीं दी जाएंगी। इसके लिए सरकार अधिसूचना जारी करेगी।

3. जिन आधारभूत मानदंडों के आधार पर श्रीनगर परियोजना को वन एवं पर्यावरणीय मंजूरी दी गई थी,उन मानदंडों का उल्लंघन करने के कारण 30 जून, 2011 को वन एवं परियोजना मंत्रालय द्वारा काम रोकने का आदेश दिया था। मंत्रालय इस आदेश का पालन कराएगा। परियोजना का काम रोकेगा। ऐसे कुछ और भी आश्वासन सरकार की ओर से गंगा आंदोलनकारियों को दिया गया था।

इन आश्वासनों को यदि लागू किया गया तो गंगा मुक्ति और उसके साथ सहायक नदियों की आजादी की शुरुआत हो जाएगी। इसके साथ जो अन्य मांगे हैं उस दिशा में भी कदम उठाया जा सकता है। वस्तुतः यह सब हो सकता है बशर्ते सरकारें इच्छाशक्ति दिखाएं और विकास का दृष्टिकोण बदले। जनता को भी इस दिशा में जागृत करना आवश्यक होगा, अन्यथा जिस ढंग से उत्तरकाशी में प्रो. गुरुदास अग्रवाल पर लोगों ने हमला किया वह इस बात का प्रमाण था कि स्थानीय लोगों में भी उनकी संख्या काफी है जो मानते हैं कि बांध और बिजली परियोजनाओं से ही उनका विकास हो सकता है।

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