पानी पीजिए जरा संभल कर

Submitted by Hindi on Wed, 06/27/2012 - 10:08
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Source
नेशनल दुनिया, 22 जून 2012
जल है तो कल है, जीवन का हर पल है- यह बात उतनी ही अगम्य और अचूक है जितनी कि ईश्वर के प्रति हमारी आस्था, धार्मिकता और अटल विश्वास। प्रकृति प्रदत्त वरदानों में हवा के बाद जल की महत्ता सिद्ध है। जल पर हम जन्म से लेकर मृत्यु तक आश्रित हैं। वैदिक सास्त्रों के अनुसार जल हमें मोक्ष भी प्रदान करता है। कवि रहीम के शब्दों में जल महत्ता इन पंक्तियों से स्पष्ट है -

“रहिमन पानी राखिए, बिन पानी सब सून।
पानी गए न उबरे, मोती मानुष चून”

हैजा (कॉलरा)


पानी या जल की गंदगी के कारण होने वाले रोगों में हैजा (कॉलरा) ‘विवरियों कॉल्री नामक जीवाणुओं द्वारा उत्पन्न होता है। ये जीवाणु मनुष्य की छोटी आंत का संक्रमण करते हैं, जिसके कारण रोगी में दस्त की शिकायत हो जाती है। लगभग 90 प्रतिशत रोगियों में यह रोग केवल दस्त तक ही सीमित रहता है, परंतु कुछ लोगों में यह जानलेवा सिद्ध हो सकता है। इस रोग में रोगी को बहुत ज्यादा मात्रा में दस्त आते हैं, जिनकी संख्या 40-50 प्रतिदिन तक हो सकती है। आमतौर पर रोगी को दर्द की शिकायत नहीं होती। दस्त के साथ-साथ उल्टी आनी भी शुरू हो जाती है।

इस प्रकार रोगी के शरीर में पानी और लवणों की कमी हो जाती है। शरीर में हो रही पानी की कमी का पता आदमी इस प्रकार लगा सकता है कि रोगी की आंखे अंदर धंस जाती हैं। गाल पिचक जाते हैं, त्वचा की लचक समाप्त हो जाती है, पेट अंदर धंस जाता है, शरीर का तापमान सामान्य से कम हो जाता है, नब्ज धीमी हो जाती है। इस अवस्था में रोगी का रक्तचाप भी रिकार्ड नही हो पाता। पैरों तथा पेट की मांसपेशियों में खिंचाव तथा दर्द का अनुभव होता है। पेशाब कम आता है। और जैसे-जैसे बीमारी बढ़ती है, पेशाब आना बिल्कुल बंद हो जाता है। अंत में गुर्दे काम करना बंद कर देते हैं। इस अवस्था में ‘अक्यूट रीनल फेल्योर’ कहा जाता है। अगर इस अवस्था में भी उपचार न हो तो रोगी मूर्छित हो जाता है और अंत में पानी की कमी (डिहाइड्रेशन) के कारण शरीर में अम्लीय मात्रा ज्यादा हो जाने (एसिडॉसिस) के कारण तथा लवण पदार्थों का संतुलन बिगड़ जाने (डिसइलेक्ट्रो लाइटीमिया) के कारण रोगी की मृत्यु हो जाती है।

हैजा के अतिरिक्त कुछ अन्य अतिसार रोग भी दूषित जल के माध्यम से फैलते हैं। ऐसे रोगों का मुख्य लक्षण भी दस्त ही होता है। ये अतिसार रोग हमारे देश की स्वस्थ्य संबंधी एक बड़ी समस्य है। इसका अनुमान इस तथ्य से लगाया जा सकता है कि भारत में प्रतिवर्ष लगभग 10 लाख बच्चे (5 वर्ष से नीचे की आयु वर्ग के) इसी रोग से मरते हैं। इस रोग की उत्पत्ति के लिए जिम्मेदार जीवाणुओं में कम्पाइलोवेक्टर जेजुनी, इस्करीकिया कॉलाई, शाइगैल तथा साल्मोनैला आदि मुख्य है। विषाणुओं में रोटा, वायरस, एस्ट्रो वायरस, एडीना वायरस, एंटीरो वायरस आदि प्रमुख हैं। अन्य वर्ग के अंतर्गत ऐटअमीबा हिस्टोलिटिका, जियारडिया, ट्रिचुरियासिस तथा अन्य आंत कृमि आते हैं।

इस रोग का संक्रमण किसी भी आयुवर्ग के व्यक्ति में हो सकता है। जिन बच्चों को बोतल से दूध पिलाया जाता है, उनमें अतिसार होने की संभावना और भी ज्यादा बढ़ जाती है। इसका मुख्य कारण यह है कि साधारणतः बोतल ठीक ढंग से साफ नहीं हो पाती, जिसके कारण अतिसार रोग उत्पन्न करने वाले जीवाणु उसमें पनपते रहते हैं। दूध के माध्यम से ये जीवाणु बच्चे के शरीर में पहुंचकर संक्रमण करते हैं। पतले दस्त आना अतिसार रोग का मुख्य लक्षण है। ये दस्त पानी की तरह पतले होते हैं और बार-बार आते हैं। इस अवस्था को ‘डायरिया कहा जाता है। कई बार इन दस्तों में खून भी पाया जाता है। इस अवस्था को खूनी पेचिश या ‘डाइसैटरी कहा जाता है। दस्तों के साथ-साथ रोगी को बुखार आना, उल्टी होना, सिर दर्द, भूख न लगना तथा कमजोरी की शिकायत भी सकती है। आमतौर पर यह अवस्था 3 से 7 दिन के लिए होती है। अगर समय पर उपचार न किया जाए तो स्थिति और बिगड़ सकती है।

टाइफाइड


टाइफाइड को मियादी बुखार या मोतीझरा भी कहा जाता है। यह भी एक संक्रमक रोग है जो सालमोनैला टायफी नामक जीवाणुओं द्वारा उत्पन्न होता है। इस रोग के कीटाणु दूषित जल तथा भोजन के माध्यम से एक स्वस्थ मनुष्य तक फैलते हैं। रोगी का मल व मूत्र इस रोग के संक्रमण के मुख्य स्रोत हैं। टाइफाइड रोग किसी भी आयु वर्ग के व्यक्ति को हो सकता है, परंतु इसके संक्रमण का साधारणतः 10 से 30 वर्ष के लोग होते हैं। जिन लोगों के शरीर की प्रतिरोधक क्षमता ज्यादा होती है, उनमें यह रोग केवल साधारण ज्वर के रूप में होता है, जो एक सप्ताह या इससे अधिक समय के लिए हो सकता है। बुखार की मात्रा दिन-प्रतिदिन बढ़ती जाती है और यदि इस बुखार को ग्राफ पेपर पर अंकित करें तो सीढ़ियों की तरह लगता है। टाइफाइड के जीवाणु मस्तिष्क का संक्रमण करके मस्तिष्क ज्वर भी उत्पन्न कर सकते हैं। इस रोग का उपचार यदि ठीक ढंग से न किया जाए तो रोगी की मृत्यु भी हो सकती है।

पीलिया


पीलिया जिगर के संक्रमण से उत्पन्न एक ऐसा रोग है, जो दूषित जल और भोजन के सेवन से पैदा होता है। डॉक्टरी भाषा में इसे हैपाटाइटिस-ए कहा जाता है। इस रोग का मूल कारण एक वायरस है। भारत में शुद्ध पेयजल वितरण व्यवस्था की कमी और सेनीटेशन का समुचित प्रबंध न होने के कारण यह रोग बहुत अधिक संख्या में पाया जाता है। इस रोग का संक्रमण किसी भे आयु वर्ग के व्यक्ति में हो सकता है। जब यह रोग वृद्ध व्यक्तियों को अपना शिकार बनाता है, तब इसकी गंभीरता ज्यादा होती है।

बचाव


थोड़ी सी सावधानी बरत कर हम इन रोगों से बच सकते हैं। सबसे पहले पानी को उबाल कर पिएं। नदी, तालाब, पोखर व कुएं का पानी न पिए। जो हैंड पंप, तालाब, पोखरों या नदियों के किनारे स्थित हैं तथा कम गहराई पर खुदे हैं उनका पानी भी स्वास्थ्य के लिए हानिकारक हो सकता है। बाजार में बिक रही बर्फ कभी न खाएं और न ही इसे पानी में डालकर पिएं। पानी की ‘फिल्टर करके भी पिया जा सकता है। कच्चे दूध का सेवन न करें, दूध को उबालकर ही पीना चाहिए। बाजार में बिक रहे कटे फल कभी न खाएं।

जीवन रक्षक घोल


अगर दस्त की शिकायत हो जाती है तो तुरंत जीवन रंक्षक घोल का सेवन प्रारंभ करें। ये घोल दस्त में अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। एक रिपोर्ट के अनुसार जीवन रक्षक गोल दस्त में पानी की कमी के कारण हो रही लगभग 10 लाख मृत्यु को प्रति वर्ष बचा पाने में सफल रहा है। इस घोल का उद्देश्य शरीर में हो रही पानी व लवणों की कमी को पूरा करना है। जीवन रक्षक घोल के पैकेट सभी सरकारी अस्पतालों और स्वास्थ्य केंद्रों पर मुफ्त मिलते हैं।

लेखक राष्ट्रीय पुरस्कार प्राप्त होम्योपैथिक चिकित्सक एवं होम्योपैतिक पत्रिका ‘द हेरिटेज’ के प्रधान सम्पादक हैं।

Comments

Submitted by Khemraj sonwani (not verified) on Sun, 09/04/2016 - 13:07

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There's lacking in the diagnostic test of cholera epidemic in India statewide. Therefore we are unable to confirm outbreaks in time.

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