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थोड़ा सा आगे, पर आगे जाने की जरूरत!

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रियो से सुरेश नौटियाल, 20 जून 2012

आर्थिक, सामाजिक और पर्यावरणीय पक्षों के आपसी रिश्तों को समझते हुये टिकाऊ विकास की अवधारणा की समझ भी जरूरी है और यह भी कि इस सबके केंद्र में मनुष्य है। लोकतंत्र, और मानवाधिकार के प्रति प्रतिबद्धता व्यक्त करते हुये दस्तावेज में कहा गया है कि तमाम विषयों के साथ-साथ सामाजिक बराबरी, पर्यावरण संरक्षण, लैंगिक समानता, आर्थिक प्रगति, बाल संरक्षण, इत्यादि आवश्यक हैं।

सरकारों के प्रतिनिधियों, सिविल सोसायटी के लोगों और अन्य पक्षों की अनेक बैठकों और अथक प्रयासों के पश्चात संयुक्त राष्ट्र के रियो+20 शिखर सम्मेलन में “द फ्यूचर वी वांट: आवर कॉमन वीजन” नामक जिस दस्तावेज को मंगलवार 19 जून 2012 को आरम्भिक स्तर पर स्वीकृत किया गया उसने एक ओर उम्मीद जगायी है तो दूसरी ओर अनिश्चितता का वातावरण बनाये रखा है। इस दस्तावेज पर बहस पूरी हो गयी है और अब केवल उच्चतम स्तर पर ही इसमें परिवर्तन किया जा सकता है। यह इसलिये कि इस दस्तावेज में परमाणु ऊर्जा, सैन्यीकरण जैसे अनेक ऐसे बिंदु नहीं हैं जो आने वाले समय में टिकाऊ विकास की अवधारणा को प्रभावित करेंगे। कल चर्चा और विभिन्न देशों की भागीदारी के बाद इस दस्तावेज को अंगीकार किया गया। ब्राजील सरकार के प्रतिनिधि मंत्री ने पूर्ण बैठक की अध्यक्षता की और रियो+20 शिखर बैठक के महासचिव ने मुख्य रूप से बात रखी।

20 से 22 जून तक चलने वाली अंतिम बैठक में अब देखना है कि राष्ट्राध्यक्ष और शासनाध्यक्ष इस दस्तावेज पर कैसा रुख अपनाते हैं, अर्थात धरती और तमाम जीवों के स्वाभाविक रिश्ते को बनाये रखने के लिये कुछ करते हैं या कॉर्पोरेट लाभ के लिये सब कुछ दांव पर लगा देते हैं! इस दस्तावेज पर अंतिम रूप से शासनाध्यक्ष और राष्ट्राध्यक्ष गौर करेंगे और फैसला लेंगे।

दुनिया भर से विभिन्न क्षेत्रों के दिग्गज लोगों द्वारा तैयार इस दस्तावेज में 283 बिंदुओं पर शासनाध्यक्षों और राष्ट्राध्यक्षों के अनुमोदन के लिये यह दस्तावेज तैयार किया गया है। इसे कल मंगलवार को दिन भर की चर्चा के बाद स्वीकार किया गया। रियो+20 शिखर बैठक के महासचिव ने कहा कि इस दस्तावेज का मजमून तैयार करने में 80 फीसद भागीदारी सिविल सोसाइटी की रही है। उन्होंने कहा कि कई उतार-चढ़ाव और एक-दूसरे के पक्ष को समझने के बाद यह दस्तावेज सामने आया है। सिविल सोसाइटी के एक वर्ग का कहना है कि लगता है स्टेकहोल्डर्स का एक वर्ग कॉर्पोरेट के आगे फिर से झुक गया है।

टिकाऊ विकास तथा आर्थिक, सामाजिक और पर्यावरणीय स्तरों पर प्रतिबद्धता जताते हुये दस्तावेज में कहा गया है कि गरीबी उन्मूलन धरती पर सबसे बड़ी चुनौती ही नहीं है बल्कि टिकाऊ विकास के लिये गरीबी उन्मूलन का लक्ष्य हासिल करना बहुत जरूरी है। इस संदर्भ में आर्थिक, सामाजिक और पर्यावरणीय पक्षों के आपसी रिश्तों को समझते हुये टिकाऊ विकास की अवधारणा की समझ भी जरूरी है और यह भी कि इस सबके केंद्र में मनुष्य है। लोकतंत्र, और मानवाधिकार के प्रति प्रतिबद्धता व्यक्त करते हुये दस्तावेज में कहा गया है कि तमाम विषयों के साथ-साथ सामाजिक बराबरी, पर्यावरण संरक्षण, लैंगिक समानता, आर्थिक प्रगति, बाल संरक्षण, इत्यादि आवश्यक हैं।

पूर्व में हुये अनेक महत्वपूर्ण समझौतों और घोषणाओं के प्रति कटिबद्धता प्रकट करते हुये दस्तावेज में कहा गया है कि टिकाऊ विकास के एजेंडे को आगे बढ़ाने के लिये राजनीतिक इच्छाशक्ति को ऊर्जावान बनाना आवश्यक है।

दस्तावेज में इस बात को स्वीकार किया गया है कि 1992 में पृथ्वी सम्मेलन के बाद से दुनिया में प्रगति का पथ डांवांडोल वाला रहा है इसलिये पूर्व में की गयी प्रतिबद्धताओं को पूरा करना जरूरी है। यहां यह कहना भी जरूरी है कि आज भी धरती पर हर पांचवां व्यक्ति या एक अरब की आबादी घनघोर गरीबी में जीने को बाध्य है और हर सातवां व्यक्ति या 14 फीसद आबादी कुपोषण की शिकार है। जलवायु परिवर्तन के कारण तमाम देशों और खासकर गरीब मुल्कों पर बुरा प्रभाव पड़ा है और टिकाऊ विकास के लक्ष्यों तक पहुंचना कठिन रहा है। दस्तावेज में सदस्य राष्ट्रों से आग्रह किया गया है कि वे ऐसे एकतरफा उपाय न करें जो अंतरराष्ट्रीय कानूनों अथवा संयुक्त राष्ट्र घोषणापत्र के विपरीत हों।

पृथ्वी और इसके पारिस्थितिक तंत्र के महत्व को स्वीकार करते हुये दस्तावेज में कहा गया है कि वर्तमान और भविष्य की जरूरतों और आने वाली पीढ़ियों को ध्यान में रखते हुये यह कहना आवश्यक है कि प्रकृति के साथ सामंजस्य और सद्भाव बनाये रखना आवश्यक है।

दस्तावेज में स्वीकार किया गया है कि टिकाऊ विकास के प्रोत्साहन में सरकार और विधायी संस्थाओं से लेकर सिविल सोसाइटी और तमाम क्षेत्रों और समुदायों की महत्वपूर्ण भूमिका है। विज्ञान और प्रौद्योगिकी के महत्व को भी इसमें माना गया है। इसके अलावा किसानों, मछुवारों, चरवाहों, वनपालकों, इत्यादि के महत्व को भी टिकाऊ विकास की प्रक्रिया में स्वीकार किया गया है। ग्रीन इकॉनमी अर्थात हरित आर्थिकी को टिकाऊ विकास और गरीबी उन्मूलन अभियान के लिये आवश्यक माना गया है, हालांकि यह बात स्वीकार की गयी है कि प्रत्येक देश की अपनी प्रतिबद्धतायें और जरूरतें हैं।

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