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किस्मत काबू में ग्रीन स्टोव, क्लीन कारोबार

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दैनिक भास्कर (रसरंग), 08 जुलाई 2012
ग्रीन स्टोव के साथ अंकित और नेहाग्रीन स्टोव के साथ अंकित और नेहादिल्ली कॉलेज ऑफ इंजीनियरिंग से ग्रेजुएट अंकित माथुर और नेहा जुनेजा किसी मल्टीनेशनल कंपनी में नौकरी कर ज्यादा पैसा कमा सकते थे। लेकिन दोनों का लक्ष्य सिर्फ पैसा कमाना नहीं था। दोनों ने ऐसा स्टोव बनाया, जो लकड़ी की खपत एक चौथाई कर देता है। यही नहीं, लकड़ी से जलने वाले मिट्टी के चूल्हों के मुकाबले ग्रीन स्टोव धुआं भी 80 फीसदी तक कम फेंकता है।

अंकित और नेहा ने स्टोव का कारोबार शुरू करने से पहले देश के बहुत से गांवों में जाकर वहां इस्तेमाल होने वाले चूल्हों पर बहुत गहराई से रिसर्च किया। इसके बाद उन्होंने ग्रामीण इलाकों में आमतौर पर इस्तेमाल होने वाले मिट्टी के चूल्हों की तर्ज पर ही अपना ग्रीनवे स्मार्ट स्टोव विकसित किया। बस फर्क इतना है कि स्मार्ट स्टोव में मिट्टी की बजाय धातु की तीन परतों का इस्तेमाल किया गया है। अंकित बताते हैं, ‘मिट्टी के चूल्हों में लकड़ी नीचे रखी रहती है, सो हवा और ईंधन का सही तालमेल नहीं हो पाता। इसके उलट ग्रीन स्टोव की जालीदार सतह ईंधन और हवा के बीच सही तालमेल बनाए रखती है। लकड़ी रखने के लिए इसमें स्टैंड लगा हुआ है।’ नेहा कहती हैं, ‘भारत में एक परिवार मिट्टी के चूल्हे के लिए रोज औसतन 8 किलो लकड़ी का इस्तेमाल करता है। जबकि ग्रीन स्टोव पर उतना ही खाना दो से ढाई किलो लकड़ी में ही पक जाता है।

ग्रीन स्टोव का इस्तेमाल करके कोई भी परिवार सालाना करीब 16 क्विंटल लकड़ी बचा सकता है। ग्रीन स्टोव का दूसरा सबसे बड़ा फायदा है कम प्रदूषण गांवों में चूंकि लकड़ी की कमी नहीं होती, सो ईंधन की बचत के बारे में गांव वाले ज्यादा सोचते भी नहीं।’ अंकित और नेहा ने ग्रामीणों को यह समझाकर अपने स्टोव के इस्तेमाल के लिए राजी किया कि इससे घर की दीवारें काली नहीं होंगी। नेहा के मुताबिक ग्रीन स्टोव से मिट्टी के चूल्हे की तुलना में 80 फीसदी तक कम कार्बन निकलता है। ग्रीन स्टोव में ईंधन के तौर पर गोबर के उपलों और सूखे पत्तों का भी इस्तेमाल किया जा सकता है। हालांकि स्टोव के मानक लकड़ी के आधार पर तय किए गए हैं। ग्रामीण भारत के लिए बेहद किफायती साबित हो रहे ग्रीनवे स्मार्ट स्टोव की कीमत 1250 रुपया है।

अंकित और नेहा की जोड़ी सिर्फ 4 महीने में ही भारत और बांग्लादेश में लगभग 5 हजार ग्रीन स्टोव बेचकर लगभग 40 लाख रुपए का कारोबार कर चुकी है। इस साल कंपनी ने हर महीने कम से कम 5 हजार स्टोव बेचने का लक्ष्य रखा है, ताकि सालाना टर्नओवर 5-8 करोड़ तक पहुंच जाए। ग्रीनवे इंफ्रा ग्रामीण कंपनी के स्टोव हरियाणा के फरीदाबाद में बन रहे हैं, पर ऑफिस मुंबई में है। ग्रीन स्टोव राजस्थान और कर्नाटक तक पहुंच चुका है। बांग्लादेश में भी करीब 300 परिवार ग्रीन स्टोव पर पका खाना खा रहे हैं। अंकित और नेहा को बिजनेस चलने से ज्यादा इस बात की खुशी है कि वे देश हित में योगदान दे पा रहे हैं।

नाम : अंकित माथुर
शिक्षा : डीसीई, दिल्ली से ग्रेजुएट आईआईएम- अहमदाबाद से एमबीए कंपनी शुरू करने के वक्त उम्र 27 साल

नाम : नेहा जुनेजा
शिक्षा :डीसीई, दिल्ली से ग्रेजुएट दिल्ली यूनिवर्सिटी से एमबीए कंपनी शुरू करने के वक्त उम्र 27 साल


अगर आप भी उद्यमी बनना चाहते हैं तो नेहा और अंकित की 3 सलाह सुनिए :
• अपना वेंचर शुरू करने के लिए इंतजार न करें। प्रोटोटाइप बनाएं और बिजनेस शुरू कर दें।
• अपने आइडिया पर परिवार और दोस्तों की सहमति हासिल करना आसान नहीं होता।
• कस्टमर्स के साथ ज्यादा से ज्यादा वक्त बिताएं।

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