Latest

पहाड़ के माथे पर हरा तिलक

Author: 
श्रीपद्रे
Source: 
गांधी मार्ग, जुलाई-अगस्त 2012

गांव वाले तो कहते थे महालिंग व्यर्थ की मेहनत कर रहा है। लेकिन महालिंग को गांव के लोगों की आलोचना सुनाई तक नहीं देती थी। असफल होने का डर भी उन्हें नहीं लगता था। हां वे चार बार असफल भी रहे। सुरंग बनाई। लेकिन पानी नहीं मिला। मेहनत बेकार चली गई। लेकिन महालिंग ने हार नहीं मानी। वे लोगों से कहते रहे कि एक दिन ऐसा आएगा जब मैं यहीं इसी जगह इतना पानी ले आऊंगा कि यहां हरियाली का वास होगा।

दक्षिण कन्नड़ के किसान महालिंग नाईक पोथी वाली इकाई-दहाई तो नहीं जानते लेकिन उन्हें पता है कि बूंदों की इकाई-दहाई, सैकड़ा-हजार और फिर लाख- करोड़ में कैसे बदल जाती है। 58 साल के अमई महालिंग नाईक स्कूल कभी गए ही नहीं। उनकी शिक्षा-दीक्षा और समझ खेतों में रहते हुए ही बनी और संवरी थी। इसलिए वर्तमान शिक्षा प्रणाली के वे घोषित निरक्षर हैं। लेकिन दक्षिण कन्नड़ जिले के अडयानडका में पहाड़ी पर 2 एकड़ की जमीन पर जब कोई उनके पानी के काम को देखता है तो यह बताने की जरूरत नहीं रह जाती कि केवल गिटपिट रटंत विद्या ही साक्षरता नहीं होती। असली साक्षरता तो प्रकृति की गोद में प्राप्त होती है और इसमें तो हमारे ये महालिंग नाईक पीएचडी से कम नहीं। पानी का जो काम उन्होंने अपने खेतों के लिए किया है उसमें कठिन श्रम के साथ-साथ दूरदृष्टि और पर्यावरण का एक सुंदर दर्शन साफ झलकता है।

पहले इस पहाड़ी पर केवल सूखी घास दिखाई देती थी। नाईक की इस बात में कुछ भी अतिरेक नहीं है। आसपास के इलाकों में फैली वैसी ही सूखी घास उनकी बात की तस्दीक करती है। महालिंग तो किसान भी नहीं थे। जबसे होश संभाला नारियल और सुपारी के बगीचों में मजदूरी करते थे। मेहनती थे और ईमानदार भी। किसी ने प्रसन्न होकर कहा कि ये लो 2 एकड़ जमीन और इस पर अपना खुद का कुछ काम करो। यह कोई 1970-72 की बात होगी। उन्होंने सबसे पहले वहां एक झोपड़ी बनाई और पत्नी बच्चों के साथ वहां रहना शुरु कर दिया। यह जमीन पहाड़ी पर थी और मुश्किल में बड़ी मुश्किल यह कि ढलान पर थी। एक तो पानी नहीं था और पानी आए भी तो रुकने की कोई गुंजाइश नहीं। फसल के लिए इस जमीन पर पानी थामना बहुत जरूरी था।

पानी रुके इसके लिए पानी का होना जरूरी था। अब मुश्किल यह थी कि पानी यहां तक लाया कैसे जाए? कुआं खोदना हो तो उसके लिए बहुत पैसे चाहिए थे, क्योंकि यहां से पानी निकालने के लिए गहरी खुदाई करनी पड़ती। फिर खतरा यह भी था कि इतनी गहरी खुदाई करने के बाद वह कुआं पानी निकलने से पहले ही बैठ भी सकता था। इसलिए कुएं की बात सोचना संभव नहीं था। तभी अचानक उन्हें पानी की सुरंग का ख्याल आया।

महालिंग नाइक का प्रयास सफल हुआमहालिंग नाइक का प्रयास सफल हुआअब यही एक रास्ता था कि सुरंग के रास्ते पानी को यहां तक लाया जाए। पानी की सुरंग बनाने के लिए बहुत श्रम और समय चाहिए था। दूसरा कोई तो शायद हाथ खड़े कर देता लेकिन महालिंग नाईक ने दूसरों के खेतों पर अपनी मजदूरी भी जारी रखी और अपने खेत पर सुरंग खोदने के काम पर लग गए। वे किसी भी तरह पानी को अपने खेतों तक लाना चाहते थे। उनका सपना था कि उनके पास जमीन का ऐसा हरा-भरा टुकड़ा हो जिस पर वे अपनी इच्छा के अनुसार खेती कर सकें। इस काम में वे अकेले ही जुट गए। काम चल पड़ा लेकिन अभी भी उन्हें नहीं पता था कि पानी मिलेगा या नहीं?

गांव वाले तो कहते थे महालिंग व्यर्थ की मेहनत कर रहा है। लेकिन महालिंग को गांव के लोगों की आलोचना सुनाई तक नहीं देती थी। असफल होने का डर भी उन्हें नहीं लगता था। हां वे चार बार असफल भी रहे। सुरंग बनाई। लेकिन पानी नहीं मिला। मेहनत बेकार चली गई। लेकिन महालिंग ने हार नहीं मानी। वे लोगों से कहते रहे कि एक दिन ऐसा आएगा जब मैं यहीं इसी जगह इतना पानी ले आऊंगा कि यहां हरियाली का वास होगा। नियति ने उनका साथ दिया। पांचवीं बार वे पानी लाने में सफल हो गए। पानी तो आ गया। अब अगली जरुरत थी जमीन को समतल करने की। यह काम भी उन्होंने अपने दम पर अकेले ही किया। उनकी इस मेहनत और जीवट का परिणाम है कि आज वे 300 पेड़ सुपारी और 40 पेड़ नारियल के मालिक हैं। समय लगा, श्रम लगा लेकिन परिणाम न केवल उनके लिए सुखद है बल्कि पूरे समाज के लिए भी प्रेरणा है।

महालिंग नाइक का कृषि फार्ममहालिंग नाइक का कृषि फार्मपांचवीं सुरंग की सफलता के बाद उन्होंने एक और सुरंग बनाई जिससे मिलने वाले पानी का उपयोग घर बार के काम के लिए होता है। सुरंग के पानी को संभालकर रखने के लिए उन्होंने तीन हौदियां बना ली हैं। नाईकजी ने माटी के रखरखाव, पत्थरों का जो काम अकेले किया है उसको करने के लिए आज के समय में कम से कम 200 आदमी चाहिए। एक बार खेत को समतल करने के बाद उस माटी को रोकना बहुत जरूरी था। इस काम के लिए पत्थर चाहिए था। आसपास आधे किलोमीटर में कहीं पत्थर नहीं था। घाटी से काम करके लौटते समय वे प्रतिदिन अपने सिर पर एक पत्थर लेकर लौटते थे। रोज लाए गए एक-एक पत्थर को जोड़-जोड़कर उन्होंने अपने सारे खेतों की मेड़बंदी कर दी। माटी के बहाव का खतरा खत्म हो गया।

महालिंग नाईक अपने से कुछ भी कहने में सकुचाते हैं। कम बोलते हैं। चुपचाप अपने काम में लगे रहते हैं। दूसरों के लिए उदाहरण बन चुके महालिंग नाईक कर्ज लेने में विश्वास नहीं करते। वे मानते हैं कि जितना है, उतने में ही संयमित रूप से गुजारा करना चाहिए। हां एक बार घर बनाने के लिए गांव की बैंक से 1000 रुपए कर्ज लिया था। दक्षिण में कर्ज लेकर अमीर बनने का सपना पालते किसानों के लिए महालिंग चुपचाप बहुत कुछ कह रहे हैं। अगर लोग सुनना चाहें तो। चारों तरफ सूखे से घिरे इस पहाड़ी के माथे पर महालिंग ने पानी और अपनी मेहनत से हरियाली का एक सुंदर तिलक लगा दिया है।

श्री श्रीपद्रे ‘आदिके पत्रिके’ नामक कृषि पत्रिका के मानद संपादक रहे हैं। कन्नड़, मलयालम और अंग्रेजी में ऐसे विषयों पर लिखते हैं, जिन्हें प्रायः अन्य पत्रकार हाथ भी नहीं लगाते।

great Indian a true Indian

great Indian
a true Indian and a farmer.. salute to you and your family man..
jai hind

Post new comment

The content of this field is kept private and will not be shown publicly.
  • Web page addresses and e-mail addresses turn into links automatically.
  • Allowed HTML tags: <a> <em> <strong> <cite> <code> <ul> <ol> <li> <dl> <dt> <dd>
  • Lines and paragraphs break automatically.

More information about formatting options

CAPTCHA
यह सवाल इस परीक्षण के लिए है कि क्या आप एक इंसान हैं या मशीनी स्वचालित स्पैम प्रस्तुतियाँ डालने वाली चीज
इस सरल गणितीय समस्या का समाधान करें. जैसे- उदाहरण 1+ 3= 4 और अपना पोस्ट करें
7 + 0 =
Solve this simple math problem and enter the result. E.g. for 1+3, enter 4.