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वन मिटा सकते हैं गरीबी

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सर्वोदय प्रेस सर्विस, जुलाई 2012

संयुक्त वन प्रबंधन का राष्ट्रीय स्तर पर कोई कानूनी ढांचा नहीं हैं, जिसके कारण स्थानीय ग्रामीण समुदायों में यह पूर्ण विश्वास नहीं है कि वनों के संरक्षण एवं विकास में लगाई गई उनकी मेहनत का पूरा-पूरा लाभ उन्हें 30-40 वर्षों के बाद उन्हें सुनिश्चित रूप से मिल पाएगा। यदि हम इन गांवों में मात्र 50-50 हेक्टेयर का भी ठीक-ठीक प्रबंध करें तो 30 सालों के चक्र पर हर गांवों को 10 लाख रुपये की डिस्काउंटेड आमदनी पर मिल सकेगी। ऐसा करने से किसी भी सरकार का गरीबों के प्रति उनके झुकाव स्पष्ट रूप से स्थापित हो सकता है।

वन किसी भी राष्ट्र के सबसे महत्वपूर्ण प्राकृतिक संसाधनों में से एक हैं और इसी कारण वन संबंधी कुछ ना कुछ अनौपचारिक एवं औपचारिक नीतियां एवं कानून ऐतिहासिक समय से चले आ रहे हैं। नए जमाने में जब से राष्ट्र एवं राज्य की अवधारणा बनी है, इन ऐतिहासिक नीतियों एवं कानूनों को विज्ञान आधारित पहचान दी जाने लगी है और उन्हें पूर्ण रूप से औपचारिक स्वरूप भी दिया जाने लगा है। किन्तु ये तत्कालीन संप्रभुओं की राजनीतिक एवं आर्थिक प्राथमिकताओं को देखकर बनाये गये थे, सामान्यजन के लिए नहीं। ये तब भी अप्रांसगिक थे और आज भी अप्रासंगिक हैं। यही अप्रासंगिकता वनों के समुचित संरक्षण एवं विकास को कोई भी ठोस दिशा देने से रोकती रही है। एशिया एवं शेष विश्व के अधिकांश देशों में इसी कारण वनों का हृास लगातार जारी है। भारत एवं चीन जैसे कुछ ही देश ऐसे हैं, जिनमें वन क्षेत्र की थोड़ी बहुत बढ़ोतरी हाल के वर्षों में आंकी गई है।

हालांकि ऐसी बढ़ोतरी पर समाजशास्त्री एवं तकनीकी वानिकी विशेषज्ञ दोनों मिलकर लगातार प्रश्नचिन्ह लगाते रहे हैं। क्या यह बढ़ोतरी वैसी वनस्पति एवं सम्पदा की हो रही है, जो स्थानीय लोगों के लिए उपयोगी हैं, जो उनकी दिनों दिन की मूलभूत आवश्यकताओं को पूरा करने में सक्षम है, या क्या यह बढ़ोतरी स्थानीय लोगों को रोजगार के साधन बढ़ाकर उनकी आर्थिक प्रगति का कोई स्तंभ बन सकती है? उत्तर सरल नहीं है क्योंकि यह विषय दुरुह एवं गंभीर है लेकिन तत्काल निदान की मांग भी करता है। यह एक सरल कार्य नहीं होगा और ना ही इसके लिए कोई एक सा राष्ट्रीय अथवा अंतर्राष्ट्रीय तरीका हो सकता है। हमें इनके लिए स्थानीय उपाय ढूंढने होंगे, जो स्थानीय तौर पर प्रासंगिक हों। इस परिप्रेक्ष्य में ऐसे नये वानिकी संस्थानों को बनाना आवश्यक होगा, जो स्थानीय लोगों की जरूरतों एवं उनकी आकांक्षाओं को पूरा कर सकें। संस्थान से मेरा तात्पर्य संस्था तथा संस्था को चलाने वाले नियम, परम्परा आदि सभी को मिलाकर है।

मेरे विचार से इन विभिन्न वानिकी संस्थानों के बीच में एक साझा तथ्य जो इन सभी को जोड़ सकता है, वह ‘प्रजातांत्रिक वानिकी संस्था’ की धारणा। किन्तु अधिकांशतः विश्वभर में ये प्रजातांत्रिक संस्थाएं एवं व्यवस्थाएं अनौपचारिक स्तर पर कार्यरत रहती हैं तो उनका प्रभाव क्षेत्र बहुत ही छोटा रहता है एवं छोटे से छोटे विवाद होने पर यह तुरंत बिखरने लगती हैं। वैसे हमारे देश में उत्तराखण्ड राज्य की वन पंचायत जो तत्कालीन औपनिवेशिक राज्य से लोहा लेते हुए अपने पैरों पर खड़े रही, स्वतंत्र भारत में भी उन्हें सीमित औपचारिक मान्यता ही दी गई है। लेकिन ऐसी संस्थाओं की देशव्यापी राजनीतिक परिदृश्य के अंतर्गत क्या भूमिका होगी, यह स्पष्ट नहीं है।

समस्या से निपटने हेतु मेरा सुझाव है कि देश की तीन चौथाई से अधिक अत्यंत निर्धन जनता झारखण्ड, ओडिशा, छत्तीसगढ़, मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र, आंध्रप्रदेश राज्य के आदिवासी बहुल इलाकों में रहती है। यह इलाका वन बहुल है एवं स्थानीय निवासी वनों पर अत्यधिक निर्भर हैं। अब पूर्णतः साबित हो चुका है कि भूमि उपयोग के रूप में वानिकी सबसे अधिक लाभकारी है अतः गरीबी हटाने के लिए स्थानीय ग्रामीण समुदाय को उनके वन संसाधनों के प्रबंध एवं उपयोग के लिए पूर्ण स्वायत्तता दी जानी अत्यंत आवश्यक है। उदाहरण के तौर पर भारत में ऐसे 1,73,000 गांव हैं, जिनमें वन भूमि उपलब्ध है। गत 15 सालों से सरकार का भी संयुक्त वन प्रबंधन कार्यक्रम चल रहा है एवं कई स्थानों पर संयुक्त वन प्रबंधन के अधीन उल्लेखनीय कार्य भी हुए हैं। किन्तु यह संभव नहीं है कि ऐसी प्रबंधन संस्थाएं गरीबी जैसे गंभीर एवं दुरूह विषय को अपने स्तर पर ही हल कर सकें। इसके कई कारण हैं पहला, संयुक्त वन प्रबंधन कार्यक्रम अधिकांशतः सरकारी पहल एवं धन पर निर्भर है एवं सरकारी पहल तथा प्रस्ताव के कारण स्थानीयजनों के प्रयास तथा पहल पृष्ठभूमि में रह जाते हैं। दूसरा, संयुक्त वन प्रबंधन का राष्ट्रीय स्तर पर कोई कानूनी ढांचा नहीं हैं, जिसके कारण स्थानीय ग्रामीण समुदायों में यह पूर्ण विश्वास नहीं है कि वनों के संरक्षण एवं विकास में लगाई गई उनकी मेहनत का पूरा-पूरा लाभ उन्हें 30-40 वर्षों के बाद उन्हें सुनिश्चित रूप से मिल पाएगा।

यदि हम इन गांवों में मात्र 50-50 हेक्टेयर का भी ठीक-ठीक प्रबंध करें तो 30 सालों के चक्र पर हर गांवों को 10 लाख रुपये की डिस्काउंटेड आमदनी पर मिल सकेगी। ऐसा करने से किसी भी सरकार का गरीबों के प्रति उनके झुकाव स्पष्ट रूप से स्थापित हो सकता है। नागरिक समाज का एक बड़ा तबका वन व्यवस्था में आवश्यक परिवर्तन मांग करता रहा है। उनके अनुसार भारतीय वन कानून को या तो पूर्ण रूप से बदलना या समाप्त कर देना चाहिए क्योंकि वे इस कानून को भारत के औपनिवेशिक इतिहास का एक हिस्सा मानते हैं एवं समझते हैं कि इसी कानून के चलते वन प्रबंध में जो कमांड एवं नियंत्रण व्यवस्था है तथा जिनके चलते वन प्रबंध में लोकमत से दूरी अक्षुण्ण रह रही है। सबूत के तौर पर भारतीय वन अधिनियम के अध्याय-।। जो रिजर्व फॉरेस्ट के बारे में है, का उदाहरण लें, जिसमें किसी भी गैर सरकारी व्यक्ति द्वारा किसी रिजर्व फॉरेस्ट में कार्य करने के लिए सरकारी अनुमति को आवश्यक बताया गया है।

हमेशा की तरह सरकारी वन विभाग नागरिक समाज की इस प्रकार की मांग को अपने अस्तित्व पर ही खतरे के रूप में देखता है और ऐसी मांगों को सिरे से खारिज करने के प्रयास में जुट जाता है। किन्तु हम यह भूल जाते हैं कि भारतीय वन अधिनियम के अध्याय 3 में ‘ग्राम वन’ की स्पष्ट एवं सुदृढ़ व्यवस्था की गई है, जिसके अधीन सरकार रिजर्व फॉरेस्ट को ग्राम वन के रूप में घोषित करते हुए उनका पूर्ण प्रबंध स्वायत्त रूप से करने के लिए ग्राम समुदाय को प्राधिकृत कर सकती है। वर्तमान में अध्याय-3 मात्र रिजर्व फॉरेस्ट पर ही लागू होता है। किन्तु भारतीय वन कानून में एक छोटा संशोधन कराकर बड़ी आसानी से इस अध्याय को अन्य लोकभूमि जैसे संरक्षित वन गोचर, सामुदायिक भूमि आदि पर लागू किया जा सकता है।

इसी प्रकार, वन एवं वन उत्पादों की बढ़ती महत्ता के मद्देनजर भारतीय वन अधिनियम तथा ग्राम वन न केवल वन उपयोग वाले 1,73,000 गांव में ही नहीं बल्कि भारत के सभी 6 लाख गांवों में उपलब्ध विभिन्न प्रकार की लोक भूमियों पर लागू होंगे। इन्हें वन पंचायत जैसे प्रजातांत्रित वन संस्था के अधीन किया जा सकता है ताकि स्थानीय भागीदारी से एवं स्थानीय लोगों के लिए वन भूमि संसाधनों का त्वरित विकास प्रबंध एवं उपयोग किया जा सके। भारतीय के संविधान के तहत मतदान द्वारा चयनित पंचायती राज संस्थाओं को सामाजिक एवं कृषि वानिकी का जिम्मेदार बनाया गया है। यह आवश्यक है कि इसके लिए उत्तराखण्ड जैसे वन पंचायती संस्थाओं का निर्माण कर ग्राम वन उन्हीं के अधीन किए जाए। ऐसा करना इसलिए भी समीचीन है कि मतदान द्वारा चयनित पंचायती राज संस्थाओं का परिक्षेत्र बहुधा प्रशासनिक कारणों से परिसीमित है एवं यह आवश्यक नहीं है कि ऐसा क्षेत्र उस भूभाग की प्राकृतिक सीमाओं से पूर्ण रूप से मेल खाता ही हो।

यदि सरकार देश के हर गांव में एक ग्राम वन बनाती है एवं उसका उत्तरदायित्व पूर्ण रूप से वन पंचायत को देती है तो इस प्रकार न केवल निर्धनता की समस्या पर अंकुश लगाया जा सकेगा बल्कि देश का चहुंमुखी विकास भी हो सकेगा एवं पर्यावरणीय लाभ के चलते लोक स्वास्थ्य, जल एवं भूमि प्रबंध, वायु प्रदूषण, स्थानीय जलवायु परिवर्तन आदि पर होने वाले खर्चों में भी कमी आएगी।

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