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नए जमाने का जॉब है नेचुरल रिसोर्स मैनेजर

Author: 
अशोक सिंह
Source: 
नेशनल दुनिया, 06 अगस्त 2012
प्राकृतिक संपदाओं की सीमित उपलब्धता की ओर हाल में ध्यान गया है और सरकारी तंत्र के साथ आम लोगों में इनके संरक्षण के प्रति जागरुकता पैदा हुई है। अतः सरकारी विभागों में भी विशेषज्ञों की नियुक्तियां हो रही हैं।

इस प्रोफेशन में ऐसे युवाओं को ही जाना चाहिए जो कि प्रकृति और वन्य प्राणियों के प्रति संवेदनशील हैं। प्राकृतिक संसाधनों के समुचित इस्तेमाल के बारे में वे जागृत हों। यही नहीं, उनमें जंगलों, खनिज खदानों, नदियों, पहाड़ों के अलावा खेतों और खलिहानों में रहकर इस तरह के काम करने की क्षमता हो तथा जो प्रकृति द्वारा प्रदत्त इस धरोहर को सहेजने में विश्वास रखते हों।

नेचुरल रिसोर्स यानी प्राकृतिक संसाधन की कमी की स्थितियां विश्व भर के विभिन्न देशों में देखने में आ रही हैं। इसमें जलवायु, हवा, पानी, जंगल, वन्य प्राणी, खनिज, पर्यावरण सहित अन्य प्राकृतिक संसाधन आदि शामिल हैं। विशेषज्ञों की मानें तो अगर इसी रफ्तार से इन बहुमूल्य संसाधनों का निर्बाध दोहन जारी रहा तो आने वाली पीढ़ियों का अस्तित्व ही खतरे में पड़ सकता है। हजारों वर्षों से मानव अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए प्रकृति द्वारा सुलभ तमाम प्राकृतिक संपदाओं का बिना सोच-विचार के सिर्फ इस्तेमाल ही नहीं कर रहा है, बल्कि प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से नष्ट भी कर रहा है। इनके संरक्षण और इनकी सीमित उपलब्धता की ओर तो हाल के वर्षों में ही ध्यान गया है और सरकारी तंत्र के साथ आम लोगों में भी इन बहुमूल्य संपदा के संरक्षण के प्रति जागरुकता पैदा हुई है। इसीलिए सरकारी विभागों और निजी क्षेत्र की संस्थाओं में भी ऐसे एक्सपर्ट्स की नियुक्तियां हो रही हैं जो इन संपदाओं को संरक्षित रखने में सकारात्मक भूमिका निभा सकें। इस मामले में विश्व भर में यह बदलाव देखने में आ रहा है।

अकादमिक पृष्ठभूमि


इस प्रोफेशन में प्रवेश पाने के लिए सबसे उपयुक्त शैक्षिक योग्यता तो नेचुरल रिसोर्स मैनेजमेंट में मास्टर्स डिग्री का होना कहा जा सकता है। इस तरह के कोर्स में एमबीए अथवा एमएससी स्तर की डिग्रियों को शामिल किया जा सकता है। इसके अलावा कई संस्थानों में नैचुरल रिसोर्स मैनेजमेंट में पोस्ट ग्रेजुएट डिप्लोमा कोर्सेस भी उपलब्ध हैं। फॉरेस्ट्री आदि की डिग्री भी कारगर कही जा सकती है।

पर्सनॉलिटी


इस प्रोफेशन में ऐसे युवाओं को ही जाना चाहिए जो कि प्रकृति और वन्य प्राणियों के प्रति संवेदनशील हैं। प्राकृतिक संसाधनों के समुचित इस्तेमाल के बारे में वे जागृत हों। यही नहीं, उनमें जंगलों, खनिज खदानों, नदियों, पहाड़ों के अलावा खेतों और खलिहानों में रहकर इस तरह के काम करने की क्षमता हो तथा जो प्रकृति द्वारा प्रदत्त इस धरोहर को सहेजने में विश्वास रखते हों।

रोजगार


ऐसे ट्रेंड लोगों को पर्यावरण एवं वन मंत्रालय, जल संसाधन एवं कृषि विभागों और प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण तथा उनके विकास कार्यकलापों से संबद्ध संगठनों, भूगर्भ सर्वेक्षण एजेसिंयों, भू सुधार संस्थाओं, वन्य प्राणीगृहों आदि में रोजगार मिल सकते हैं। चाय और फल बागान, रिफाइनरीज आदि से संबंधित व्यावसायिक संगठनों में भी इनकी नियुक्तियां की जाती है। इसके अलावा कंसलटेंट्स और एक्सपर्ट्स के तौप पर भी इनकी सेवाएं ली जाती हैं।

प्रमुख संस्थान


• बिरसा एग्रीकल्चरल यूनिवर्सिटी, रांची (झारखंड)
• दून यूनिवर्सिटी, देहरादून, (उत्तराखंड)
• इंडियन इंस्टिट्यूट ऑफ फॉरेस्ट मैनेजमेंट, देहरादून (उत्तराखंड)
• आईपी यूनिवर्सिटी, दिल्ली
• छत्तीसगढ़, यूनिवर्सिटी, छत्तीसगढ़

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