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मनरेगा को भ्रष्टाचार से मुक्ति जरूरी

Author: 
बिरो माहला
Source: 
चरखा फीचर्स, नवंबर 2012
मनरेगा, कामयाब योजना के बावजूद भ्रष्टाचार का एक बड़ा केंद्र बन चुका है। कई बार अलग-अलग ऐजेंसियां इस संबंध में अपनी रिपोर्टें दे चुकी हैं। 100 दिनों के बदले 70-80 दिन का ही काम दिया जाता है, कभी-कभी पूरा पैसा नहीं दिया जाता है। फर्जी मस्टरोल की शिकायतें तो कभी मृत आदमी के नाम पर पैसा निकाल लेने की शिकायतें अक्सर सुनाई देती रहती हैं। सरकार मनरेगा को भ्रष्टाचार मुक्त बनाने के लिए पहल कर रही है लेकिन जैसा कि पहले भी अक्सर कहा जाता रहा है कि कानून बनने से पहले ही उसका तोड़ निकाल लिया जाता है ठीक ऐसा ही कुछ मनरेगा मे होता आ रहा है। कुछ दिनों पहले विपक्षी भाजपा के वरिष्ठ नेता लालकृष्ण आडवाणी ने संयुक्त राष्ट्र संघ में सामाजिक विकास पर आयोजित सत्र को संबोधित करते हुए केंद्र की यूपीए सरकार की महत्वाकांक्षी योजना मनरेगा की जमकर तारीफ की। उन्होंने इसे कम अवधि के लिए विश्व का सबसे बड़ा रोजगार बताया। इस योजना के कारण देश की 53 मिलियन जनता को साल में कम से कम 100 दिनों का रोजगार अवश्य प्राप्त हो जाता है। उन्होंने कहा कि यह एक ऐसी योजना है जिसमें आसानी से महिलाओं को भी रोजगार प्राप्त हो जाता है। इस योजना से न सिर्फ ग्रामीणों को काम मिल रहा है बल्कि गांव का बुनियादी ढांचा भी मजबूत हो रहा है। आडवाणी जी का यह बयान काफी मायने रखता है। बात यह नहीं है कि मनरेगा की तारीफ किसी अंतरराष्ट्रीय मंच पर की गई है बल्कि ध्यान देने वाली बात यह है कि इसकी तारीफ करने वाला व्यक्ति विपक्ष का वरिष्ठ नेता है। जो अपने आप में इस योजना की सफलता को बयां करता है। यह इस बात की तरफ इशारा है कि केंद्र की यूपीए सरकार द्वारा ग्रामीण क्षेत्रों के लिए रोजगार उपलब्ध करवाने का जो खाका तैयार किया गया था वह जमीनी स्तर की हकीकत को ध्यान में रखकर तैयार किया गया था।

अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत को तेजी से उभरता हुए विकासशील देश के रूप में देखा जाता है। पटना और रायपुर जैसे छोटे शहरों में भी तेजी से पांव पसारते मॉडल, सड़कों पर फर्राटे से दौड़ती महंगी गाड़ियां और गगनचुंबी इमारतों को देखकर यही लगता है कि देश में शहरीकरण पूरी तरह से हावी हो चुका है। लेकिन सिक्के का दूसरा पहलू यह भी है कि अभी भी हमारे देश की 65 प्रतिशत आबादी गांव में रहती है। जो विकास की इन सभी प्रक्रियाओं से कोसों दूर है। जहां विकास की अधिकतर योजनाएं या तो पहुंच ही नहीं पाती हैं या फिर पहुंचते-पहुंचते दम तोड़ने लगती हैं। जहां खेती का मौसम खत्म होते ही लोग दिल्ली और मुबंई का पलायन करने लगते हैं क्योंकि उन्हें अपना और अपने परिवार की भूख को शांत करना होता है। ऐसे देश में मनरेगा एक संजीवनी से कम नहीं है। इस योजना ने रोजगार के लिए अंतरराज्यीय पलायन पर बहुत हद तक काबू पाया है। लोगों को जहां घर पर ही रोजगार मुहैया करवाया है वहीं इसमें लिया जाने वाला काम महिलाओं को भी रोजी-रोटी से जोड़ने में मददगार साबित हुआ है। यह गांव के विकास की एक ऐसी योजना है जिसमें सामूहिक योगदान होता है।

आर्थिक रूप से कमजोर देश के पिछड़े राज्यों विषेशकर बिहार, झारखंड और छत्तीसगढ़ समेत पूर्वोत्तर राज्यों में मनरेगा काफी कारगर साबित हुआ है। इन राज्यों में राजनीतिक इच्छाशक्ति की कमी और आर्थिक ढांचा कमजोर होने के कारण निवेश भी कम हुए हैं। जहां आर्थिक ढांचा कमजोर होगा वहां रोजगार की कमी सबसे बड़ी समस्या होती है। रोजगार के कमी ही लोगों को पलायन करने पर मजबूर करती है। धान का कटोरा कहा जाने वाला छत्तीसगढ़ का इस संबंध में विशेष रूप से उल्लेख करना जरूरी है। क्योंकि यह राज्य एक तरफ जहां आर्थिक रूप से पिछड़ा है वहीं नक्सल प्रभावित होने के कारण यहां निवेश भी अन्य राज्यों की तुलना में कम हुए हैं। ऐसे में मनरेगा यहां के ग्रामीण क्षेत्रों के लोगों के लिए वरदान ही साबित होता रहा है। 132 रूपए प्रतिदिन मजदूरी के साथ सौ दिनों का रोजगार राज्य के पिछड़े इलाकों के लिए कारगर साबित हुआ है। राज्य में लागू यह एक ऐसी सरकारी योजना है जिसका स्वंय नक्सली भी बहुत कम विरोध करते हैं। राजधानी रायपुर से तकरीबन 127 किमी दूर पहाड़ों की गोद में बसा बैजनपूरी गांव इसका एक उदाहरण है। करीब दो हजार की आबादी वाले इस गांव के लोगों को मुख्य रोजगार कृषि है। गांव के सरपंच जीवन लाल कैमरो बताते हैं कि पहले खेती किसानी का मौसम खत्म होने के बाद लोगों के सामने रोजी-रोटी की समस्या बनी रहती थी। घर चलाने और फसल पकने तक लोग रोजगार की तलाश में अक्सर दूसरे राज्यों में पलायन कर जाते थे। लेकिन मनरेगा के लागू होने के बाद पलायन की संख्या में काफी गिरावट आ चुकी है।

भ्रष्टाचार के भेंट चढ़ता मनरेगाभ्रष्टाचार के भेंट चढ़ता मनरेगाइतनी कामयाब योजना के बावजूद मनरेगा भ्रष्टाचार का एक बड़ा केंद्र बन चुका है। कई बार अलग-अलग ऐजेंसियां इस संबंध में अपनी रिपोर्टें दे चुकी हैं। 100 दिनों के बदले 70-80 दिन का ही काम दिया जाता है, कभी-कभी पूरा पैसा नहीं दिया जाता है। फर्जी मस्टरोल की शिकायतें तो कभी मृत आदमी के नाम पर पैसा निकाल लेने की शिकायतें अक्सर सुनाई देती रहती हैं। ऐसा नहीं है कि सरकार इस योजना को भ्रष्टाचार मुक्त बनाने के लिए कोई पहल नहीं कर रही है। इसके लिए कई स्तरों पर काम किया गया। सोशल ऑडिट और रोजगार पाने वालों के खातों में सीधे पैसा डालने जैसे कई उपाय किए जा रहे हैं। लेकिन जैसा कि पहले भी अक्सर कहा जाता रहा है कि कानून बनने से पहले ही उसका तोड़ निकाल लिया जाता है ठीक ऐसा ही कुछ मनरेगा मे होता आ रहा है। कुछ महीने पहले ही मनरेगा समीक्षा रिपोर्ट जारी करते हुए स्वंय प्रधानमंत्री भी इसमें होने वाले भ्रष्टाचार से आहत दिखे। उन्होंने साफ शब्दों में कहा कि जिस तरह से यह योजना कार्य कर रही है उससे वह संतुष्ट नहीं हैं। प्रश्न यह उठता है कि ग्रामीण क्षेत्रों के विकास में सहायक इस योजना को भ्रष्टाचार से मुक्त रखने के लिए अब तक कोई ठोस योजना क्यूं नहीं बन पा रही है? इसका सरल जवाब स्वयं इस योजना में मिल सकता है। जिसकी शुरुआत इसकी संरचना को मजबूत, जवाबदेह और पारदर्षी बनाकर की जा सकती है।

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