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जल प्रबंधन में राज्यों के अधिकारों में दखल नहीं : प्रधानमंत्री

Author: 
जनसत्ता ब्यूरो
Source: 
जनसत्ता, 29 दिसंबर 2012
भूजल स्तर में आने वाली गिरावट के संदर्भ में प्रधानमंत्री ने कहा कि इसके अत्यधिक महत्व के बावजूद इसे निकालने और इसके इस्तेमाल में तालमेल से जुड़ा कोई नियमन नहीं है। उन्होंने कहा कि भू-जल के दुरुपयोग को कम से कम करने के लिए हमें इसे निकालने में बिजली के इस्तेमाल के नियमन के कदम उठाने होंगे। नई दिल्ली, 28 दिसंबर 2012। राज्यों के अधिकारों में हस्तक्षेप नहीं करने के प्रधानमंत्री के आश्वासन के बीच शुक्रवार को राज्यों ने असहमति जताने के बावजूद राष्ट्रीय जल नीति को स्वीकार कर लिया। कई राज्य सरकारों ने चिंता जताई थी कि नीति में प्रस्तावित कानूनी रूपरेखा उनके संवैधानिक अधिकारों का उल्लंघन है। प्रधानमंत्री का यह आश्वासन इन्हीं आशंकाओं को दूर करने की कोशिश थी।

प्रधानमंत्री ने राष्ट्रीय जल संसाधन परिषद के छठें सम्मेलन का उद्घाटन करते हुए कहा कि केंद्र सरकार किसी भी तरह से राज्यों के संवैधानिक अधिकारों या जल प्रबंधन को केंद्रीयकृत करने के लिए हस्तक्षेप नहीं करना चाहती। उन्होंने कहा कि मैं प्रस्तावित राष्ट्रीय कानूनी रूपरेखा को उचित दृष्टिकोण से देखने की जरूरत पर जोर देना चाहूंगा। सम्मेलन में ही राष्ट्रीय जल नीति को स्वीकार किया गया। जल संसाधन मंत्री हरीश रावत ने सम्मेलन के बाद कहा कि नीति का मसविदा दोबारा तैयार नहीं किया जाएगा। राज्यों की चिंताओं को दूर करने के लिए कुछ संशोधन किए जाएंगे।

नीति के मुताबिक यह बात मान्य है कि राज्यों को पानी के संबंध में उचित नीतियाँ, कानून और नियम बनाने का अधिकार है लेकिन जल पर सामान्य सिद्धांतों की व्यापक राष्ट्रीय कानूनी रूपरेखा बनाने की जरूरत महसूस की गई ताकि प्रत्येक राज्य में जल प्रबंधन पर जरूरी विधेयक का रास्ता साफ हो और पानी को लेकर स्थानीय हालात से निपटने के लिए सरकार के निचले स्तरों पर जरूरी अधिकार हस्तांतरित किए जा सकें। जलीय क़ानूनों के लिए कानूनी रूपरेखा का सुझाव देने के साथ नीति में सभी राज्यों में जल नियामक प्राधिकरण (डब्लूआरए) बनाने का भी प्रस्ताव है जो पानी के मूल्य तय कर सकें।

इस साल के शुरू में जुलाई महीने में सार्वजनिक किए गए इस नीति के मसविदे में जल से जुड़े मसलों पर एक राष्ट्रीय कानूनी रूपरेखा बनाने का प्रस्ताव है। तभी से राज्य सरकारें इस प्रस्ताव का विरोध कर रही थीं।

भूजल स्तर में आने वाली गिरावट के संदर्भ में प्रधानमंत्री ने कहा कि इसके अत्यधिक महत्व के बावजूद इसे निकालने और इसके इस्तेमाल में तालमेल से जुड़ा कोई नियमन नहीं है। उन्होंने कहा कि भू-जल के दुरुपयोग को कम से कम करने के लिए हमें इसे निकालने में बिजली के इस्तेमाल के नियमन के कदम उठाने होंगे। उन्होंने कहा कि तीव्र आर्थिक वृद्धि और शहरीकरण जल की मांग और आपूर्ति के बीच के फासले को बढ़ा रहे हैं। इसकी वजह से देश का जल-दाब सूचकांक खराब हो रहा है।

उन्होंने कहा कि मौजूदा हालात में हमारे सीमित जल संसाधनों का न्यायपूर्ण प्रबंधन और हमारी पद्धतियों में बदलाव की अहम जरूरत है। इसलिए हमें जरूरत है कि हम राजनीति, विचारधाराओं और धर्म से जुड़े मतभेदों से ऊपर उठें और किसी परियोजना तक सीमित रहने के बजाय जल प्रबंधन के लिए एक व्यापक पद्धति अपनाएं। प्रधानमंत्री ने कहा कि नदी क्षेत्र स्तर पर जलीय संसाधनों के लिए समग्र योजना, जल संरक्षण, नदियों के मार्गों का संरक्षण, जलस्तर के पुर्नसंचयन व टिकाऊ प्रबंधन और जल प्रयोग क्षमताओं में सुधार कुछ ऐसे मसले हैं, जिन पर हमें तत्काल ध्यान देना है।

मनमोहन सिंह ने कहा- हमें अपनी सिंचाई पद्धतियों को सीमित अभियांत्रिकी पर निर्भर रखने के बजाय ज्यादा बहुरूपीय और भागीदारी वाली पद्धतियों की ओर ले जाना होगा। सिंचाई की मौजूदा सुविधाओं और विकसित की गई क्षमताओं के बीच की दूरी कम करने के लिए प्रोत्साहन की जरूरत है। उन्होंने जल की कीमत को तय करने के लिए पारदर्शी और भागीदारी वाली प्रक्रिया अपनाने पर भी जोर दिया। उन्होंने कहा कि जल संसाधनों के प्रबंधन में स्थानीय समुदायों की सक्रिय रूप से भागीदारी जरूरी है।

केंद्र की जल नीति पर बिफरे राज्य


बंगाल सरकार की और से जारी बयान में कहा गया कि राष्ट्रीय जल नीति में स्पष्ट तौर पर घोषणा होनी चाहिए कि खाद्य सुरक्षा, पेयजल और अन्य उद्देश्यों से आम नागरिक को जल मुहैया कराना सरकार की ज़िम्मेदारी है। खाद्य सुरक्षा तय करने के लिए राज्य सरकार ने मांग की कि जल क्षेत्र में नई परियोजनाओं और पूर्ण हो चुकी बड़ी जल परियोजनाओं के वित्त पोषण में केंद्र को अधिक सक्रिय भूमिका निभानी चाहिए। छत्तीसगढ़ ने जल प्रबंधन को लेकर राष्ट्रीय स्तर पर कानूनी ढाँचा बनाने का विरोध करते हुए शुक्रवार को कहा कि इस तरह का कोई भी कानून राज्यों को बनाना चाहिए न कि केंद्र को। छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री रमन सिंह की ओर से राष्ट्रीय जल संसाधन परिषद की बैठक के भाषण में कहा गया कि यह बात अहम है कि जल से जुड़े कानून राज्यों के स्तर पर बनें ताकि इस संबंध में विधिक अधिकार पूर्णतया राज्यों के ही पास हों। सिंह के भाषण को बैठक में राज्य के जल संसाधन मंत्री राम विचार नेताम ने पढ़ा।

बैठक में झारखंड के मुख्यमंत्री अर्जुन मुंडा ने कहा कि इस विषय पर कोई केंद्रीय नीति बनाने की जरूरत नहीं है क्योंकि ऐसा करना संवैधानिक प्रावधानों के अनुरूप नहीं होगा। झारखंड को अपर्याप्त जल आपूर्ति का मुद्दा उठाते हुए मुंडा ने कहा कि ऐसा तब हो रहा है जब दामोदर-बाराकर नदी घाटी और मयूराक्षी नदी घाटी के बड़े क्षेत्र इसी आदिवासी राज्य में पड़ते हैं। मुख्यमंत्री ने ऐसे प्रावधानों की समीक्षा की मांग की जिनकी वजह से राज्य को अपर्याप्त जल मिल पा रहा है।

उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने कहा कि केंद्र सरकार को कानून बनाने का काम राज्यों पर छोड़ना चाहिए। प्रदेश के लोक निर्माण मंत्री शिवपाल सिंह यादव ने अखिलेश यादव का भाषण राष्ट्रीय जल संसाधन परिषद की बैठक में पढ़ा। उन्होंने कहा-राष्ट्रीय जल नीति 2012 के मसौदे में सम्मिलित किए गए सार्थक और बहुआयामी सरोकारों में से अधिकांश प्रस्तावों से मैं उत्तर प्रदेश राज्य की और से सहमति व्यक्त करता हूं। संविधान में संघीय ढांचे की व्यवस्था में जल को राज्य का विषय अंकित किया गया है। राज्यों को उनकी विशिष्ट आवश्यकताओं के अनुरूप नीति तय किए जाने का अधिकार है।

पंजाब के मुख्यमंत्री प्रकाश सिंह बादल ने कहा कि राष्ट्रीय जल नीति में किस तरह का संशोधन मौजूदा संवैधानिक प्रावधानों के तहत होना चाहिए। पंजाब कृषि प्रधान राज्य है. इसलिए वह कानून बनाकर नदी घाटियों के लिए समेकित योजना व प्रबंधन और नदी घाटी प्राधिकरण बनाने की अवधारणा के खिलाफ है।

दूसरी और हरियाणा ने कहा कि जल संरक्षण के उपायों को प्रोत्साहित करने के लिए राष्ट्रीय निधि बननी चाहिए। उसने पंजाब की इस बात को भी मानने से इनकार कर दिया कि नदियों का जल साझा कर रहे पड़ोसी राज्यों को बाढ़ प्रबंधन की लागत भी साझा करनी चाहिए। राज्य के मुख्यमंत्री भूपेंद्र सिंह हुड्डा ने कहा कि हरियाणा को भुगतना पड़ा है क्योंकि इसे सतलज यमुना लिंक नहर से पानी नहीं मिला। सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बावजूद ऐसा नहीं हुआ और न ही उसे रावी-ब्यास नदियों का उसका हिस्सा मिला।

बंगाल सरकार की और से जारी बयान में कहा गया कि राष्ट्रीय जल नीति में स्पष्ट तौर पर घोषणा होनी चाहिए कि खाद्य सुरक्षा, पेयजल और अन्य उद्देश्यों से आम नागरिक को जल मुहैया कराना सरकार की ज़िम्मेदारी है। खाद्य सुरक्षा तय करने के लिए राज्य सरकार ने मांग की कि जल क्षेत्र में नई परियोजनाओं और पूर्ण हो चुकी बड़ी जल परियोजनाओं के वित्त पोषण में केंद्र को अधिक सक्रिय भूमिका निभानी चाहिए। ममता बनर्जी के नेतृत्व वाली सरकार ने कहा कि राष्ट्रीय जल नीति को अंतिम रूप देते समय केंद्र सरकार को जल संरक्षण, विकास व प्रबंधन को लेकर राज्य सरकारों के नजरियों पर भी विचार करना चाहिए।

बिहार के जल संसाधन मंत्री विजय कुमार चौधरी ने कहा-जहां तक जल के वितरण और नियंत्रण का सवाल है, बिहार कोई केंद्रीय कानून बनाने या कोई केंद्रीय संस्थान बनाने का पक्षधर नहीं है क्योंकि संविधान में जल राज्य का विषय है। अगर केंद्रीय कानून या संस्थान बना तो यह राज्यों के अधिकारों का हनन होगा। बिहार को जल से जुड़ी नीतियों के लिए राष्ट्रीय ढांचे से कोई दिक्कत नहीं है लेकिन यह केवल सुझावकारी होना चाहिए न कि किसी कानून के रूप में।

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