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पर्यावरण की चिंता में है सबकी चिंता

Author: 
सुनीता नारायण
Source: 
दैनिक भास्कर, नई दिल्ली, मार्च 31, 2008, सुनीता नारायण की पुस्तक 'पर्यावरण की राजनीति' से साभार
राष्ट्रीय ग्रामीण रोज़गार गारंटी योजना की मूल भावना में कोई कमी नहीं है। लेकिन कार्य संपादन के स्तर पर इसमें कमी है। इसे अति शीघ्र ठीक किए जाने की आवश्यकता है। पर्यावरणीय पुनर्चक्रीकरण के देवता भी यही चाहते हैं कि विस्तृत कार्ययोजना बने। अस्सी के दशक के मध्य में पर्यावरणविद अनिल अग्रवाल जब ‘महाराष्ट्र की रोजगार गारंटी योजना’ के सूत्रधार की खोज में निकले तो मैं भी उनके साथ हो ली। इस खोज में हमने स्वयं को सचिवालय में फाइलों से अटे धूलभरे दफ्तर में पाया। वहां हमारी मुलाकात श्री वीएस पागे से हुई। वे छोटी कद-काठी के बहुत ही मृदुभाषी इंसान थे। उन्होंने हमें बताया कि सन् 1972 में जब राज्य में भीषण सूखा पड़ा था और लोग पलायन पर मजबूर थे, तब वहां एक ऐसी कार्य योजना तैयार की गई, जिसकी मूल-भावना थी ग्रामीण इलाकों में रोज़गार पैदा कर भुगतान के लिए बड़े शहरों के व्यवसाइयों पर दायित्व डालना। ये रोज़गार कानून गारंटी से युक्त थे। यह पहल गरीबी को हटाने के ध्येय को लेकर निर्मित रोज़गार अधिकार संपन्नता की ओर पहला कदम था। चूंकि काम स्थानीय स्तर पर ही उपलब्ध था, अतः लोगों को रोज़गार की तलाश में शहरों की ओर नहीं भागना पड़ा। संकट के ऐसे दौर में रोजगार निर्माण की इस पहल से तो अनिल न केवल उत्साहित ही थे, बल्कि एक और बड़ा पर्यावरण पुनर्निमाण का लाभ वे इसमें देख पा रहे थे। इसी दौरान हम अन्ना हजारे से मिलने रालेगांव सिद्धि गए थे। वहां उनके निर्देशन में पहाड़ियों की परिधियों में पानी रोकने और ज़मीनी जल-पुनर्भरण के उद्देश्य से छोटी खाइयां निर्मित की जा रही थीं। वहां हमें प्याज की भरपूर पैदावार देखने को मिली, इसकी वजह थी सिंचाई की बढ़ी हुई मात्रा। पागे साहब भी अनिल के इसमें निहित पर्यावरण लाभ के विचार से सहमत तो थे, किंतु उन्होंने बताया कि चूंकि योजना संकट के दौर का सामना करने के लिए बनाई गई थी, अतः जिला प्रशासन ने ज्यादातर मामलों में पत्थर तोड़ने, सड़कें बनाने और सार्वजनिक निर्माण के कार्य करवाकर अपना कर्तव्य पूरा कर लिया।

अगले कुछ वर्षों में इस श्रमधन का उपयोग प्राकृतिक सम्पत्तियों के निर्माण में किए जाने के विचार ने महाराष्ट्र में जोर पकड़ा, अब मिट्टी और पानी को बचाने की ओर ध्यान केंद्रित हुआ। इस दिशा में चेक-डैम निर्माण, खेतों में मिट्टी उपचार, पहाड़ियों में खाई रचना और पौधरोपण के कार्य होने लगे। महाराष्ट्र रोजगार योजना की तर्ज पर बनाए गए केंद्रीय रोजगार कार्यक्रम ने भी अनुसरण करते हुए कुछ मामलों में पर्यावरण पुनःनिर्माण की गरज से एक न्यूतम प्रतिशत पौधरोपण पर ही खर्च करने की व्यवस्था अनिवार्य कर दी।

इसी दौर में देश ने जीवित रहने वाले सार्थक पौधरोपण या ऐसे तालाब निर्मित करने का कौशल भी सीखा, जो हर बारिश में गाद से न भर जाएं। प्रशासक एनसी सक्सेना ने आकलन किया कि रोपा गया हर पौधा अगर जीवित रह पाए तो हर गांव इतने पेड़ होंगे कि प्रत्येक गांव के नजदीक अच्छा खासा जंगल होगा, जो कि अब तक वास्तव में सिर्फ कागजों तक ही सीमित था। अनिल ने बाद में लिखा भी था कि ये सब किस तरह अनुत्पादक रोजगार निर्माण में सिद्धहस्त हो चुके हैं – जिसके अंतर्गत हर वर्ष सिर्फ पौधरोपण होता है, जो कि प्रतिवर्ष रोपों के पशुओं द्वारा खा लिए जाने या मर जाने के कारण उन्हीं गड्ढ़ों को बार-बार खुदवाए जाने से शाश्वत होता जा रहा था। इस प्रशासकीय खेल ने ग्रामवासियों को नई चेतना दी कि वे नाजुक प्राकृतिक संपत्ति पर अपना स्वामित्व समझ सकें। स्थानीय लोगों की राय ली जाने लगी। इसके फलस्वरूप उन्हें इसके सीधे फायदे भी मिलने लगे। चरनोई पेड़-पौधे, जलस्रोत आदि पुनर्जीवित हुए। प्रशासकीय अमला – वन-विभाग, कृषि-विभाग व सिंचाई विभाग- गांवों के लिए जो योजनाएं बनाता था, वे उतनी उपयोगी नहीं होती थीं। यह वह दौर था, जब विकास के लिए प्रयोगधर्मिता की शुरूआत हुई। मध्य प्रदेश में गाँवों में वाटर शेड्स बाने के लिए मात्र एक एजेंसी को माध्यम बनाने का प्रयोग हुआ। इस दौर के ही अध्ययनों से खुलासा हुआ कि भूमि और जलस्रोतों के बेहतर उपयोग के द्वारा गावों में आर्थिक उन्नति के द्वार खुल सकते हैं।

लेकिन आज मैं इन बातों को फिर क्यों याद कर रही हूं? सीधी-सी बात है। ‘राष्ट्रीय ग्रामीण रोज़गार गारंटी’ भी इसी भावना में तैयार की गई है और इसमें पिछली योजनाओं की अपेक्षा बेहतर प्रावधान किए गए हैं जैसे प्राकृतिक सम्पत्तियों के निर्माण (मिट्टी और जल के बचाव) पर खर्च के महत्व को प्रतिपादित किया जाना और इस हेतु ग्रामीण स्तर पर योजना बनाने को अनिवार्य किया जाना एवं चुनी हुई पंचायतों को लोकनिर्माण कार्यों के लिए शासकीय विभागों से वरीयता देते हुए उत्तरदायी बनाना। लेकिन योजना प्रारंभ होने के दो वर्ष बाद भी एक सवाल मुंह बाए खड़ा है। क्या इससे स्थितियों में वास्तव में कोई परिवर्तन हुआ है?

इसी दौरान मैने सुंदरबन शेर अभ्यारण्य के नजदीक स्थित एक गांव में देखा कि ‘रोजगार गारंटी योजना’ के अंतर्गत खोदी जा रही एक नहर ने ग्रामीण अर्थव्यवस्था को किस तरह प्रभावित किया है। स्थानीय मछुआरों को अब मछली पकड़ने के लिए अवैध तरीकों पर निर्भर नहीं रहना पड़ रहा था। इसकी वजह से अब कृषक भी एक अतिरिक्त फसल ले पा रहे थे। योजना की इस उपादेयता उत्साहित होकर मैंने पूछा कि क्या इसकी रूपरेखा पंचायत ने बनाई थी? जवाब नकारात्मक था। स्थानीय निवासियों का कहना था कि अगर पंचायत के द्वारा काम हो रहा होता तो हमें भुगतान मिलने में कठिनाई होती क्योंकि पंचायतों के लिए भुगतान की जिला अधिकारियों द्वारा स्वीकृति करवाया जाना आवश्यक है, जिसके लिए अधिकतम कार्य पूर्णता का विस्तृत सबूत चाहते हैं। गर्मियों में राजस्थान यात्रा के दौरान मैंने महिलाओं के एक झुंड को ‘ग्रामीण सौ दिनी योजना’ (स्थानीय लोग इसे यही कहते हैं) के अंतर्गत कार्य पर लगे पाया। वे तपते सूरज के नीचे तालाब की खुदाई कर रही थीं। देख-रेख कर रहे इंजीनियर ने बताया कि पंचायत की सलाह पर तालाब में जमी मिट्टी को हटाकर दीवारों का निर्माण किया जाना है। हर महिला एक चौकोर गड्ढ़ा खोद रही थी। कारण पूछने पर सुपरवाइजर ने बताया कि इसी तरह से खुदाई के निर्देश मिले हैं। इसके पीछे कारण है एक वैज्ञानिक अध्ययन, जिसके मुताबिक एक व्यक्ति एक दिन में कितने क्यूबिक मीटर खोदता है इसका अंदाजा हो जाता है। उन महिलाओं को चौकोर गड्ढ़े का लक्ष्य दे दिया जाता है और काम और मजदूरी का हिसाब उसी के द्वारा लगाया जाता है। मौके पर मौजूद मजदूर महिलाओं का कहना था कि इस कवायद का मकसद सिर्फ यह है कि हमें सप्ताह या पंद्रह दिनों की अपनी मजदूरी का अंदाजा न लग पाए क्योंकि कार्य का आकलन व्यक्ति के रूप में किया जाएगा। मैंने महसूस कि दिल्ली में बैठे आका अकर्मण्यता और भ्रष्टाचार से निबटने के चक्कर में व्यावहारिकता को भूल जाते हैं। किसी के पास इस सवाल का जवाब नहीं था कि इन चौकोर गड्ढ़ों से क्या तालाब बन पाएगा? किसी को इस बात की फिक्र नहीं थी कि तालाब तक पानी लाने वाली नहरों की गाद निकाली भी गई है या नहीं। या कि इस सौ दिनी योजना में काम पूरा हो भी पाएगा या नहीं। इसी दौरान मैने सुंदरबन शेर अभ्यारण्य के नजदीक स्थित एक गांव में देखा कि ‘रोजगार गारंटी योजना’ के अंतर्गत खोदी जा रही एक नहर ने ग्रामीण अर्थव्यवस्था को किस तरह प्रभावित किया है। स्थानीय मछुआरों को अब मछली पकड़ने के लिए अवैध तरीकों पर निर्भर नहीं रहना पड़ रहा था। इसकी वजह से अब कृषक भी एक अतिरिक्त फसल ले पा रहे थे। योजना की इस उपादेयता उत्साहित होकर मैंने पूछा कि क्या इसकी रूपरेखा पंचायत ने बनाई थी? जवाब नकारात्मक था। स्थानीय निवासियों का कहना था कि अगर पंचायत के द्वारा काम हो रहा होता तो हमें भुगतान मिलने में कठिनाई होती क्योंकि पंचायतों के लिए भुगतान की जिला अधिकारियों द्वारा स्वीकृति करवाया जाना आवश्यक है, जिसके लिए अधिकतम कार्य पूर्णता का विस्तृत सबूत चाहते हैं। यह कार्यवाही इतनी जटिल है कि या तो भुगतान प्राप्त ही नहीं होता या होता भी है तो बहुत कम। इस कार्य को वन विभाग के माध्यम से संपन्न करवाया जा रहा है जिसके पास योजना बनाने और उसे संपन्न कराने के अधिकार हैं।

राष्ट्रीय ग्रामीण रोज़गार गारंटी योजना की मूल भावना में कोई कमी नहीं है। लेकिन कार्य संपादन के स्तर पर इसमें कमी है। इसे अति शीघ्र ठीक किए जाने की आवश्यकता है। पर्यावरणीय पुनर्चक्रीकरण के देवता भी यही चाहते हैं कि विस्तृत कार्ययोजना बने।

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