खोदते-खोदते खो देंगे गोवा

Submitted by Hindi on Mon, 02/04/2013 - 15:27
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हिन्दुस्तान, नई दिल्ली, जुलाई 5, 2007, सुनीता नारायण की पुस्तक 'पर्यावरण की राजनीति' से साभार
ग्रामीणों की सिर्फ एक ही मांग है कि खदान को बंद किया जाए। मैंने न लोगों से पूछा कि बिना उनकी स्वीकृति के खदान चालू करने का आदेश किसने दिया। ये कौन सी कंपनियां हैं और किसकी ज़मीन की खुदाई की जा रही है। वहां मैंने जाना कि इस शिक्षित राज्य में इन खदानों की खुदाई पूरी गोपनीयता से की जा रही है।हम भारी खदान और रमणीय जलाशय के बीच खड़े थे। स्थानीय सामाजिक कार्यकर्ताओं ने मुझे बताया कि लौह-अयस्क वाली यह खदान सलाउलिम जलस्रोत के प्रवाह क्षेत्र में है। यह दक्षिणी गोवा का एकमात्र जल-स्रोत है। अचानक, जैसे ही मैंने वहां की तस्वीरें लेनी शुरू की, कुछ लोगों ने हमें घेर लिया। एक जीप में भरकर सभी लोग आए थे। उन लोगों ने बताया कि वे खनन प्रबंधन के आदमी हैं और चाहते हैं कि आप लोग इस जगह को छोड़ दें।

इस बात पर हम लोगों के कहा कि जिस रास्ते से हम आएं हैं, वह आम रास्ता है और कहीं भी ऐसा निशान नहीं था, जिससे हम समझ सकते कि हम लोग किसी के निजी इलाके में प्रवेश कर रहे हैं। लेकिन वे लोग कुछ भी सुनने के मूड में नहीं थे। उन लोगों ने हमारी जीप की चाबी छीन ली और चोट पहुंचाने के लिए पत्थर उठा लिया। साथ ही गाली-गलौज करने लगे। जब तक मामला अधिक तूल पकड़ता, हमलोगों ने तत्काल जगह छोड़ देने का निश्चय किया।

इसके बाद मैं पूरी तरह घबरा गई थी। यह वही गोवा था, जो अपनी रेतीले समुद्री तट और हरी-भरी पहाड़ियों के कारण सबसे शांत और रमणीय स्थल है। यह वहीं स्थान था, जहां विभिन्न उद्योगपतियों डेम्पो, सलगांवकर व खनिज उद्योग में अपनी पहचान रखने वाले तिम्बलो परिवार ने वहां शिक्षा, संस्कृति और बेहतर प्रबंधन शासन को लेकर मुख्य भूमिका निभाई है।

इस स्थान की खुदाई करने की इजाज़त क्यों दे दी गई, जिसके बगल में राज्य को मिलने वाले पानी का महत्वपूर्ण स्रोत है? खदानों के नज़दीक या आसपास के इलाकों में उनके मालिकों के नाम की पट्टी तक नहीं लगी है। राज्य प्रशासन यह सब अपनी आंखों के सामने क्यों होने दे रहा है? इस स्वर्ग को क्या हो गया है, जहां लोगों के साथ इस तरह से दुर्व्यवहार किया जा रहा है? मुझे इन सवालों का जवाब जल्द ही मिल गया।

अगले गांव कोलबां में मैं फिर लोगों से घिर गई। ये गांव की महिलाएं थीं। हम लोग एक पहाड़ी की सबसे ऊंची उस चोटी पर खड़े थे, जहां से नारियल और काजू के पेड़ से घिरे गांव आसानी से देखे जा सकते थे। परंतु वहां बुल्डोज़र, यांत्रिक बेलचे और ट्रक लगातार काम कर रहे थे। पहाड़ को तोड़ा जा रहा था, मिट्टी को बेलचे से उठाने के अलावा बेकार बाकी पत्थरों को हटाकर खनिज निकाला जा रहा था। एक आंदोलनकारी महिला ने बताया कि कुछ दिन पहले ही यहां की खदान की खुदाई शुरू की गई है, लेकिन धारा के बहाव को पहले से ही रोक दिया गया था। हरी-भरी वादियों में लाल धूल एकदम विषम दृश्य उत्पन्न कर रही थी।

लोग मुझे अपने गावों तक ले गए, जहां उन लोगों ने कचरे से भरे अपने खेतों को दिखाया। उन लोगों ने खदान का कचरा और उससे निकलने वाले लाल रंग के कीचड़ को जलाशयों में बहाने का स्थान भी दिखाया। वे लोग मुझे अपने उन घरों में भी ले गए जिनकी दीवारें टूट चुकीं थीं।

लोगों का कहना था कि यह खदानों में विस्फोटक के कारण हुआ है। घर की मालकिन देवकी ने बताया है कि जब इस मामले में उसने शिकायत की तो सुपरवाइजर ने दमकी दी कि यदि उसने दोबारा इस मामले में आंदोलन किया तो वे लोग उसके घर को तोड़ देंगे।

ग्रामीणों की सिर्फ एक ही मांग है कि खदान को बंद किया जाए। मैंने न लोगों से पूछा कि बिना उनकी स्वीकृति के खदान चालू करने का आदेश किसने दिया। ये कौन सी कंपनियां हैं और किसकी ज़मीन की खुदाई की जा रही है। वहां मैंने जाना कि इस शिक्षित राज्य में इन खदानों की खुदाई पूरी गोपनीयता से की जा रही है।

मान लिया जाता था कि सशर्त इनवायरन्मैंटल क्लीयरेंस ले लिया गया है। खुदाई सामुदायिक ज़मीन पर हो रही है, जो मुख्यतः स्थानीय समुदायों के हाथों में है या जिसे सिर्फ खेती के लिए लीज पर लिया जा सकता है लेकिन यह रियायतें पुर्तगाल सरकार द्वारा थीं और बाद में उसे भारत सरकार द्वारा लीज में बदल दिया गया। उसके बाद इन पाबंदियों का कोई अर्थ नहीं है।

गांव वालों ने बताया कि यहां मालिकाना हक भी साफ नहीं है। हीरालाल खोड़ीदास के पास लीज पर जमीन है, लेकिन उस खदान पर गोवा की सबसे बड़ी खदान कंपनी ‘सोसिडेड फॉरमेंटो’ का अधिकार है। इस कंपनी का एजेंट रैसू नाइक ने इसका कांट्रेक्ट गांव के पूर्व सरपंच गुरुदास नायक को दे रखा है।

दूसरे गांव, क्वीनामोल में, कमोवेश मामला वैसा ही था। खनिक गुंडे थे। गांव वाले गुस्से में थे। अंतर सिर्फ इतना था कि इस इलाके की खदान काफी पुरानी है। पहले मैंगनीज की खुदाई की गई और अब लौह अयस्क निकाला जा रहा था। इस दौरान खदान से निकला कचड़ा खुले मैदान को आच्छादित कर रहा था और जलाशयों को भर रहा था। खदानों को वहां के नेता चंद्रकांत नाइक के हाथों लीज पर दे दिया गया था। लेकिन इसकी देखभाल एक भंडारी कर रहा था। किसी ने भी उसके बारे में हमें अधिक जानकारी नहीं दी।

यह हाल उन सभी गांवों का था, जिस-जिस गांव से हमलोग गुजरे। ये गांव रोजी-रोटी और पैसे के मामले में न तो असहाय हैं और न ही घोर संकट के दौर से गुजर रहे हैं। यह काफी समृद्ध इलाका है, जहां खेती से होने वाला उत्पादन आर्थिक धन का आधार है। यह सही है कि धीरे-धीरे ये सारे खेत खत्म हो जाएंगे। मैं अब यह समझ सकती हूं कि चीन में अयस्क की मांग और उससे बढ़ते खनिज के दाम किस कदर स्थानीय अर्थव्यवस्था को प्रभावित कर रहे हैं।

फिर विछुंद्रम गांव में मैंने भविष्य देखा। इस इलाके में हमारी गाड़ी पहाड़ियों की चोटी की ओर नहीं बढ़ पाई। रास्ते पर भारी-भरकम पत्थर रखकर नाकेबंदी की गई थी। ऐसे रास्ते से ही सरकारी जंगल की ज़मीन से खनिकों को दूर रखा जा सकता था। यह इलाका ग्रामीणों के खेतों से घिरा था और जहां सिंचाई के लिए पानी मौजूद था। सूर्य की रोशनी में उनके खेतों की हरियाली खूब झलक रही थी।

मेरे दिमाग में सारी तस्वीरें घुमड़ रही थी। उस शाम जब मैं शहर लौटी, टीवी पर सरकार द्वारा ज़मीन अधिग्रहण के विरोध में पश्चिम बंगाल के नंदीग्राम के विद्रोह को देखा। दूसरी ओर, अभी-अभी मैंने करीब एक लाख नंदीग्राम को तैयार होते देखा था। मैं आश्चर्यचकित थी कि हमलोग किस दिशा में जा रहे हैं।

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