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कोप 15: कोपेनहेगन में क्या हुआ ......

बालेन्दु दाधीच/ विस्फोट.कॉम

कोपेनहेगन के बाद जलवायु परिवर्तन के मुद्दे पर भारत और चीन उन जी-77 देशों से छिटक कर अलग हो गए हैं जिनके साथ अपने साझा हितों की लड़ाई वे पिछले कुछ वर्षों से लड़ रहे थे। अफ्रीकी देशों की ओर से इस पर भावुकतापूर्ण एवं कटु प्रतिक्रियाएं आई हैं, वे आहत महसूस कर रहे हैं। वे न सिर्फ स्वयं को बातचीत की प्रक्रिया से अलग रहने से नाराज हैं बल्कि उनका यह भी मानना है कि तापमान में दो डिग्री तक की वृद्धि को स्वीकार्य मानकर उनके साथ अन्याय किया गया है। इतनी वृद्धि से उन देशों पर कई प्राकृतिक आपदाएं टूट पड़ेंगी। यह लक्ष्य हद से हद डेढ़ डिग्री तक होना चाहिए था। भले ही विकासशील देशों और कई पश्चिमी देशों की मांग के विपरीत इसमें कार्बन उत्सर्जन घटाने की किसी विस्तृत समय-सारिणी की व्यवस्था नहीं है इसकी बदौलत कोपेनहेगन शिखर सम्मेलन का समापन उस किस्म की नाकामी में नहीं हुआ जिसकी आशंका थी। वहां से लौटते नेताओं के हाथ में जो दस्तावेज है वह भविष्य का प्रतीकात्मक और अबाध्यकारी दस्तावेज है।

जलवायु परिवर्तन के मुद्दे पर अमेरिका, भारत, चीन, ब्राजील और दक्षिण अफ्रीका (बेसिक देश) के बीच हुआ अबाध्यकारी समझौता भले ही विकासशील देशों को पसंद न आया हो, लेकिन चलिए पहले से ही नाकाम माने जा चुके कोपेनहेगन शिखर सम्मेलन का कुछ तो हासिल रहा! अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा के निजी हस्तक्षेप और भारत-चीन रणनीतिक कलाबाजियों के कारण संभव हुए इस समझौते का फौरी लक्ष्य है- दुनिया के तापमान को दो डिग्री सेल्सियस से अधिक नहीं बढ़ने देना।

समझौते की पृष्ठभूमि में एक अहम बात यह है कि भारत जिस विकासशील ब्लॉक के साथ पारंपरिक रूप से खड़ा रहता आया था, जिसकी तकलीफों और आकांक्षाओं को वह निर्गुट शिखर से लेकर संयुक्त राष्ट्र तक में अभिव्यक्त करता था, नए जमाने की महत्वाकांक्षाओं के चलते वह उनसे धीरे-धीरे अलग हट रहा है। विकास की दौड़ और बाजार की होड़ में उसके लक्ष्य भी विकासशील देशों से अलग हो रहे हैं, रणनीतियां भी और नीतियां भी। हम सैंकड़ों गरीब एवं अशक्त मित्रों का साथ छोड़कर कुछ धनी एवं शक्तिशाली देशों के मित्र बनने की प्रक्रिया में हैं। आगे बढ़ना जरूरी है लेकिन इस प्रक्रिया में यह सुनिश्चित किए जाने की जरूरत है कि हम ऐसे नव-धनाढ्यों की तरह बर्ताव न करने लगें जिन्हें दूसरों की रोजी-रोटी से ज्यादा अपने ऐशो-आराम की फिक्र हो। हमारा लक्ष्य आंकड़ों की बाजीगरी और धनपतियों के सानिध्य में नहीं बल्कि उस दुनिया के भविष्य की रक्षा में निहित होना चाहिए जिस पर बड़े और छोटे, सभी देशों का समान अधिकार है। अपने लक्ष्यों की ओर बढ़ने के साथ-साथ धरती के हितों को बचाना भी बेहद जरूरी है क्योंकि अगर वह नहीं है तो हम भी नहीं हो सकते।

लेकिन हकीकत यही है कि जलवायु परिवर्तन के मुद्दे पर भारत और चीन उन जी-77 देशों से छिटक कर अलग हो गए हैं जिनके साथ अपने साझा हितों की लड़ाई वे पिछले कुछ वर्षों से लड़ रहे थे। अफ्रीकी देशों की ओर से इस पर भावुकतापूर्ण एवं कटु प्रतिक्रियाएं आई हैं जो बेसिक देशों के नजरिए से आहत महसूस कर रहे हैं। वे न सिर्फ स्वयं को बातचीत की प्रक्रिया से अलग रहने से नाराज हैं बल्कि उनका यह भी मानना है कि तापमान में दो डिग्री तक की वृद्धि को स्वीकार्य मानकर उनके साथ अन्याय किया गया है। इतनी वृद्धि से उन देशों पर कई प्राकृतिक आपदाएं टूट पड़ेंगी। यह लक्ष्य हद से हद डेढ़ डिग्री तक होना चाहिए था। दूसरे क्योतो प्रोटोकॉल की अवधि बढ़ाने या सन 2010 में कोई अन्य अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बाध्यकारी समझौता करने की दिशा में कोई कदम नहीं उठाए गए हैं। क्योतो प्रोटोकॉल के प्रावधान कानूनी रूप से बाध्यकारी हैं लेकिन वह अगले सन 2012 में निष्प्रभावी हो जाएगा।

कहा जाता है कि अगर दुनिया का हर व्यक्ति आम अमेरिकी जैसी ऐश्वर्य की जिंदगी जीना चाहे तो उनकी मांग पूरी करने के लिए कम से कम पांच धरतियों की जरूरत पड़ेगी। पश्चिमी देशों ने धरती के संसाधनों का कितना अथाह दोहन किया है, यह इससे जाहिर है। दुनिया में फैलते हानिकारक धुआं का तीन चौथाई हिस्सा उन्हीं की देन है, और उन पर अंकुश लगाए बिना धरती को बचाने की मुहिम कामयाब नहीं हो सकती। महज पर्यावरण का मुद्दा नहीं

जलवायु परिवर्तन का मुद्दा एक पर्यावरणीय विषय भर नहीं है। वह एक बड़ा सामाजिक मुद्दा, उससे बड़ा राजनैतिक मुद्दा और बहुत बड़ा व्यापारिक मुद्दा भी है। स्वास्थ्य, विश्व-शांति और प्रकृति से जुड़े और न जाने कितने मुद्दे उसके भीतर समाहित हैं। जब स्वयं दुनिया का ही अस्तित्व खतरे में हो तो किसी भी विश्व शक्ति, क्षेत्रीय महाशक्ति और अशक्ति के लिए त्वरित महत्व का कोई और मुद्दा उससे अधिक महत्वपूर्ण नहीं हो सकता। कार्बन उत्सर्जनों, बिजली की खपत और वनों के काटे जाने के कारण दुनिया का तापमान जिस तेजी से बढ़ रहा है उसकी अमेरिका, यूरोप और अन्य विकसित देशों ने कितने ही दशकों से उपेक्षा की है। वे अपना कूड़ा-करकट यहां-वहां फैलाते चले गए। वे अपने ऐशो-आराम के लिए धरती की छाती खोदते चले गए। वे अपने कल-कारखानों से धन कमाते चले गए। वे फैक्ट्रियों और वाहनों की असंख्य धौंकनियों से धरती के वातावरण में धुआं झोंकते चले गए।

कहा जाता है कि अगर दुनिया का हर व्यक्ति आम अमेरिकी जैसी ऐश्वर्य की जिंदगी जीना चाहे तो उनकी मांग पूरी करने के लिए कम से कम पांच धरतियों की जरूरत पड़ेगी। पश्चिमी देशों ने धरती के संसाधनों का कितना अथाह दोहन किया है, यह इससे जाहिर है। दुनिया में फैलते हानिकारक धुआं का तीन चौथाई हिस्सा उन्हीं की देन है, और उन पर अंकुश लगाए बिना धरती को बचाने की मुहिम कामयाब नहीं हो सकती। भारत भले ही कोपेनहेगन समझौते के जरिए उनके करीब दिखाई दे रहा हो, उसे विकासशील देशों द्वारा उठाए जा रहे इस बुनियादी मुद्दे को नहीं भूलना चाहिए। और वह मुद्दा यह है कि जिन देशों ने धरती को इस स्थिति में पहुंचाया है, उन्हें ही मरम्मत के सामान मुहैया कराने होंगे और इसका खर्चा उठाना होगा। यह खर्चा अथाह है। दूसरे, जिन देशों को तापमान-वृद्धि का फल भुगतना पड़ेगा उन्हें लोगों के बेघर होने और शहरों के डूबने से भी बहुत बड़ी आर्थिक हानि उठानी पड़ेगी। विकसित देश तो यह खर्च उठा लेंगे लेकिन बांग्लादेश, श्रीलंका और मालदीव जैसे देशों का क्या होगा? उनके पांवों तले से धरती खींच लेने का काम किसी और ने किया और परिणाम भुगतने के लिए उन्हें अकेले भंवर में छोड़ दिया जाए?

दोष किसका, भुगते कौन?

जाहिर है, धनी देश दुनिया को खतरे में डालकर गरीब देशों पर उसे बचाने का दबाव बनाएंगे तो नतीजा सिफ़र ही आएगा। उन्हें खुद अपने कार्बन उत्सर्जनों पर अंकुश लगाना होगा और दूसरों को ऐसा करने के लिए आर्थिक तथा तकनीकी मदद मुहैया करानी होगी। लगता है, इस बारे में अमेरिका को अपने दायित्वों का कुछ तो अहसास हुआ है। अमेरिका और बेसिक देशों के समझौते में व्यवस्था है कि तापमान-वृद्धि पर अंकुश लगाने के लिए सन 2020 तक सौ अरब डालर प्रति वर्ष की रकम जुटाई जाएगी। यह धन अब तक हुए नुकसान की मरम्मत और नए प्रदूषण रोकने के लिए जरूरी वैकल्पिक तकनीकों के प्रयोग पर खर्च होगा। कहा जा रहा है कि इस प्रावधान को सुनिश्चित करने में चीन की अहम भूमिका है और इसमें से अधिकांश रकम विकासशील तथा अविकसित देशों को मिलेगी। उम्मीद है कि इन प्रयासों के जरिए धरती के तापमान को अब दो डिग्री से अधिक नहीं बढ़ने दिया जाएगा। यह देखने की बात है कि क्या दुनिया के सभी देशों को जोड़े बिना और साझा समयबद्ध लक्ष्य तय किए बिना ऐसा हो सकेगा।

लेकिन यह करार महज एक राजनैतिक दस्तावेज है। यह कानूनी रूप से बाध्यकारी नहीं है और इसे कोपेनहेगन सम्मेलन में पारित करवाने की अनिवार्यता नहीं थी। इसी बात पर यूरोपीय देशों को आपत्ति है जिन्होंने खुद अपने बीच कार्बन उत्सर्जन नियंत्रण संबंधी बाध्यकारी समझौता कर रखा है। वे चाहते हैं कि कहीं धरती बचाने की मुहिम में वे अकेले न खड़े हों जबकि बाकी देश महज खाना-पूरी में लगे हों। ओबामा से उम्मीद लगाई गई थी कि वे सन 2010 में एक अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बाध्यकारी समझौता सुनिश्चित करेंगे। मौजूदा करार उस बारे में कोई आश्वासन नहीं देता। हां, इसके जरिए दुनिया की अहम अर्थव्यवस्थाओं ने जलवायु संरक्षण के लिए अपनी जिम्मेदारियों को जरूर स्वीकार किया है। फिर सन 1997 में हुए क्योतो प्रोटोकॉल के बाद पहली बार पर्यावरण संरक्षण के लिए कोई अंतरराष्ट्रीय समझौता हुआ है।