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यह जो ज़मीन है

Author: 
पंकज चतुर्वेदी
Source: 
जनसत्ता रविवारी, 14 अप्रैल 2013
देश में खेती की ज़मीन पर दोतरफा हमला हो रहा है। कई राज्यों में निरंतर सूखे की वजह से उपजाऊ ज़मीन बंजर हो रही है वहीं दूसरी तरफ सरकारें विकास के नाम पर बलपूर्वक किसानों से ज़मीन छीन रही हैं। कई राज्यों में संघर्ष की स्थिति है, लेकिन नीति निर्माताओं के कान पर जूं तक नहीं रेंग रही। क्या है असली समस्या और क्यों सरकारें अपनी जन कल्याणकारी भूमिका से विमुख होकर कारपोरेट कंपनियों के सहयोगियों-सा बर्ताव कर रही हैं, बता रहे हैं पंकज चतुर्वेदी।

अपने जमीन से बेदखल होते किसानअपने जमीन से बेदखल होते किसानअब तो सुप्रीम कोर्ट ने भी किसानों से ज़मीन अधिग्रहण के मामले में कुछ तल्ख टिप्पणी की है। उससे पहले राजधानी दिल्ली से सटे भट्टा-पारसौल में जब अपनी ज़मीन की सही कीमत लेने पर अड़े किसानों पर पुलिसिया दमन को लेकर सियासी पैंतरेबाजी चल रही थी, तब इलाहाबाद हाईकोर्ट ने क़रीबी ग्रेटर नोएडा के दो गाँवों के ज़मीन अधिग्रहण को यह कहते हुए निरस्त कर दिया कि जिस इरादे से ज़मीन ली गई, उसका उपयोग दूसरे काम के लिए किया जा रहा था। जहां अपार्टमेंट बनाने का काम चल रहा था, वहां एक साल पहले तक खेती होती थी। गांव वालों से औद्योगीकरण के नाम पर औने-पौने दाम पर ज़मीन छीन ली गई और उसे हजार गुना दर पर बिल्डरों को दे दिया गया। गंगा और जमुना के दोआब का इलाक़ा सदियों से देश की खेती की रीढ़ रहा है। यहां की ज़मीन सोना उगलती है। विकास के नाम पर सोने के अंडे देने वाली मुर्गी की कहानी दुहराई जाने लगी। खेतों को उजाड़ कर कंक्रीट के जंगल रोप दिए। मुआवजा बांट दिया और हजारों बेरोजगारों की फौज खड़ी कर दी गई। इससे पहले सिंगूर, नंदीग्राम, पास्को, जैतापुर, भट्टा-पारसौल लंबी सूची है। विकास के नाम पर सरकारों ने उपजाऊ जमीनें छीन लीं, जहां अन्न उगता था। देश में विशेष आर्थिक क्षेत्र बनाए जा रहे हैं, सड़क, पुल, कॉलोनी- सभी के लिए ज़मीन चाहिए और वह भी ऐसी, जिस पर किसान का हल चलता हो। एक बारगी लगता है कि क्या हमारे देश में अब ज़मीन की कमी हो गई है, जो आधुनिकीकरण की योजनाओं के लिए देश की अर्थव्यवस्था का मूल आधार रहे खेत को उजाड़ने पर मजबूर होना पड़ रहा है?

विकास के लिए सड़कें, हवाई अड्डे बन रहे हैं, महानगरों की बढ़ती संख्या और उसमें रहने वालों की ज़रूरतों से अधिक निवेश के नाम पर बनाई जा रही बहुमंजिली इमारतों का ठिकाना भी उर्वर ज़मीन ही है। हजारों घटनाएँ गवाह हैं कि कारख़ानों के लिए ज़मीन जुटाने की फिराक में खेतों को ही उजाड़ा जाता है, तो लोगों का गुस्सा भड़कता है। अगर नक्शे और आंकड़ों को सामने रखें तो तस्वीर तो कुछ और ही कहती है। देश में लाखों-लाख हेक्टेयर ऐसी ज़मीन है जिसे विकास का इंतजार है। अब पका पकाया खाने का लालच तो सभी को होता है, सो बेकार पड़ी ज़मीन को लायक बनाने की मेहनत से बचते हुए लायक ज़मीन को बेकार बनाना ज्यादा सरल और फ़ायदेमंद लगता है।

ग़ौरतलब है कि देश में कुछ 32 करोड़ 90 लाख हेक्टेयर भूमि में से 12 करोड़ 95 लाख 70 हजार बंजर है। भारत में बंजर भूमि के ठीक-ठीक आकलन के लिए अभी तक कोई विस्तृत सर्वेक्षण तो हुआ नहीं, फिर भी केंद्रीय ग्रामीण विकास मंत्रालय का फौरी अनुमान है कि देश में सर्वाधिक बंजर ज़मीन मध्य प्रदेश में है, जो दो करोड़ एक लाख 42 हेक्टेयर है। उसके बाद राजस्थान का नंबर आता है जहां एक करोड़ 99 लाख 34 हेक्टेयर, फिर महाराष्ट्र जहां एक करोड़ 44 लाख एक हजार हेक्टेयर बंजर ज़मीन है। आंध्र प्रदेश में एक करोड़ 14 लाख 16 हजार हेक्टेयर, कर्नाटक में 91 लाख 65 हजार, उत्तर प्रदेश में 80 लाख 61 हजार, गुजरात में 98 लाख 36 हजार, ओडिशा में 63 लाख 84 हजार और बिहार में 54 लाख 58 हजार हेक्टेयर ज़मीन, अपने ज़मीन होने की विशिष्टता खो चुकी है। पश्चिम बंगाल में 25 लाख 36 हजार, हरियाणा में 24 लाख 78 हजार, असम में 17 लाख 30 हजार, हिमाचल प्रदेश में 19 लाख 78 हजार, जम्मू-कश्मीर में 15 लाख 65 हजार, केरल में 12 लाख 79 हजार हेक्टेयर ज़मीन, धरती पर भार बनी हुई है। पंजाब सरीखे कृषि प्रधान राज्य में 12 लाख 30 हजार हेक्टेयर, उत्तर-पूर्व के मणिपुर, मेघालय और नागालैंड में क्रमशः 14 लाख 38 हजार, 19 लाख 18 हजार और 13 लाख 86 हजार हेक्टेयर भूमि बंजर है। सर्वाधिक बंजर भूमि वाले मध्य प्रदेश में भूमि के नष्ट होने की रफ्तार भी सर्वाधिक है। यहां दो दशक में बीहड़ बंजर दोगुने होकर 13 हजार हेक्टेयर हो गए हैं।

धरती पर जब पेड़-पौधों की पकड़ कमजोर होती है तब बरसात का पानी सीधा नंगी धरती पर पड़ता है और वहां की मिट्टी बहने लगती है। ज़मीन के समतल न होने के कारण पानी को जहां भी जगह मिलती है, मिट्टी काटते हुए वह बहता है। इस प्रक्रिया में नालियां बनती हैं और जो आगे चल कर गहरे होते हुए बीहड़ का रूप ले लेती हैं। एक बार बीहड़ बन जाए तो हर बारिश में वह और गहरा होता चला जाता है। इस तरह, के भूक्षरण से हर साल करीब चाल लाख हेक्टेयर ज़मीन उजड़ रही है। इसका सर्वाधिक प्रभावित इलाक़ा चंबल, यमुना, साबरमती, माही और उनकी सहायक नदियों के किनारे के उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, बिहार, राजस्थान और गुजरात है। बीहड़ रोकने का काम जिस गति से चल रहा है उसके मुताबिक बंजर खत्म होने में दो सौ साल लगेंगे, तब तक ये बीहड़ ढाई गुना अधिक हो चुके होंगे।

विकास के नाम पर सोने के अंडे देने वाली मुर्गी की कहानी दुहराई जाने लगी। खेतों को उजाड़ कर कंक्रीट के जंगल रोप दिए। मुआवजा बांट दिया और हजारों बेरोजगारों की फौज खड़ी कर दी गई। इससे पहले सिंगूर, नंदीग्राम, पास्को, जैतापुर, भट्टा-पारसौल लंबी सूची है। विकास के नाम पर सरकारों ने उपजाऊ जमीनें छीन लीं, जहां अन्न उगता था। देश में विशेष आर्थिक क्षेत्र बनाए जा रहे हैं, सड़क, पुल, कॉलोनी- सभी के लिए ज़मीन चाहिए और वह भी ऐसी, जिस पर किसान का हल चलता हो। एक बारगी लगता है कि क्या हमारे देश में अब ज़मीन की कमी हो गई है, जो आधुनिकीकरण की योजनाओं के लिए देश की अर्थव्यवस्था का मूल आधार रहे खेत को उजाड़ने पर मजबूर होना पड़ रहा है? बीहड़ों के बाद, धरती के लिए सर्वाधिक जानलेवा, खनन-उद्योग रहा है। पिछले तीस साल में खनिज-उत्पादन पचास गुना बढ़ा, लेकिन यह लाखों हेक्टेयर जंगल और खेतों को वीरान बना गया है। नई खदान मिलने पर पहले वहां के जंगल साफ होते हैं। फिर खदान में कार्यरत श्रमिकों की दैनिक जलावन की जरूरत पूर्ति के लिए आस-पास की हरियाली होम होती है। इसके बाद खोदाई की प्रक्रिया में ज़मीन पर गहरी-गहरी खदानें बनाई जाती हैं, जिनमें बारिश के दिनों में पानी भर जाता है। वहीं खदानों से निकली धूल-रेत और अयस्क मिश्रण दूर-दूर तक की ज़मीन की उर्वरा शक्ति हजम कर जाते हैं। खदानों के गैरनियोजित अंधाधुंध उपयोग के कारण ज़मीन के क्षारीय होने की समस्या भी बढ़ी है। ऐसी ज़मीन पर कुछ भी उगाना नामुमकिन होता है। हरितक्रांति के नाम पर जिन रासायनिक खादों द्वारा अधिक अनाज पैदा करने का नारा दिया जाता है, वे भी ज़मीन की कोख उजाड़ने की जिम्मेदार रही हैं। रासायनिक खादों के अंधाधुंध इस्तेमाल से पहले कुछ साल तो दोगुनी-तिगुनी पैदावार मिली, फिर उसके बाद भूमि बंजर हो रही है। यही नहीं, जल समस्या के निराकरण के नाम पर मनमाने ढंग से रोपे जा रहे नलकूपों के कारण भी ज़मीन कटने-फटने की शिकायतें सामने आई हैं। सार्वजनिक चरागाहों के सिमटने के बाद रहे बचे घास के मैदानों में बेतरतीब चराई के कारण भी ज़मीन के बड़े हिस्से के बंजर होने की घटनाएँ मध्य भारत में सामने आई हैं। सिंचाई के लिए बनाई गई कई नहरों और बांधों के आस-पास जल रिसने से भी दल-दल बन रहे हैं।

ज़मीन को नष्ट करने में समाज का करीब हर वर्ग और तबका लगा हुआ, वहीं इसके सुधार का ज़िम्मा मात्र सरकारी कंधों पर है। 1985 में स्थापित राष्ट्रीय बंजर भूमि विकास बोर्ड ने 20 सूत्रीय कार्यक्रम के 16वें सूत्र के तहत बंजर भूमि पर वनीकरण और वृक्षारोपण का कार्य शुरू किया था। आंकड़ों के मुताबिक इस योजना के तहत एक करोड़ 17 लाख 15 हजार हेक्टेयर भूमि को हरा-भरा किया गया। लेकिन इन आंकड़ों का खोखलापन सेटेलाइट से खींचे गए चित्रों से उजागर हो चुका है। क्षारीय भूमि को हरा-भरा बनाने के लिए केंद्रीय वानिकी अनुसंधान संस्थान, जोधपुर में कुछ सफल प्रयोग किए गए हैं। यहां आस्ट्रेलिया में पनपने वाली एक प्रजाति झाड़ी का प्रारूप तैयार किया गया है, जिसे गुजरात और पश्चिमी राजस्थान के रेगिस्तानी क्षारीय ज़मीन पर उगाया जा सकता है।

‘साल्ट-बुश’ नामक इस झाड़ी को भेड़ बकरियां खा भी सकती हैं। संस्थान में कुछ दूसरे विदेशी पेड़ों के साथ-साथ देशी नीम, खेजड़ी, रोहिड़ा, बबूल वगैरह को रेतीले क्षेत्रों में उगाने के प्रयोग किए जा रहे हैं। कुछ सालों पहले बंजर भूमि विकास विभाग द्वारा बंजर भूमि विकास कार्य बल के गठन का भी प्रस्ताव था। कहा गया कि रेगिस्तानी पर्वतीय, घाटियों, खानों वगैरह के दुर्गम भूमि की गैरवनीय बंजर भूमि को स्थाई उपयोग के लायक बनाने के लिए यह कार्य-बल काम करेगा। लेकिन यह सब कागज़ों पर बंजर से अधिक साकार नहीं हो पाया।

प्राकृतिक और मानव-जनित कारणों की संयुक्त लापरवाही की वजह से आज खेती, पशुपालन, गोचर, जंगल सभी पर खतरा है। पेयजल संकट गहरा रहा है। ऐसे में केंद्रीय और राज्य सरकार के विभिन्न विभागों के कब्ज़े में पड़ी ढेर सारी अनुत्पादक भूमि के विकास के लिए कोई कार्यवाही नहीं किया जाना एक विडंबना ही है। आज सरकार बड़े औद्योगिक घरानों को तो बंजर भूमि सुधार के लिए आमंत्रित कर रही है, लेकिन इस कार्य में निजी छोटे काश्तकारों की भागीदारी के प्रति उदासीन है। ग़ौरतलब है कि हमारे देश में कोई तीन करोड़ 70 लाख हेक्टेयर बंजर भूमि ऐसी है, जो कृषि योग्य समतल है। अनुमान है कि प्रति हेक्टेयर 2500 रुपए खर्च कर इस ज़मीन पर सोना उगाया जा सकता है। यानी अगर 9250 करोड़ रुपए खर्च किए जाएं तो यह ज़मीन खेती लायक की जा सकती है, जो हमारे देश की कुल कृषि भूमि का 26 फीसद है। सरकारी खर्चों में बढ़ोतरी के मद्देनज़र जाहिर है कि इतनी राशि सरकारी तौर पर एकमुश्त मुहैया हो, पानी नामुमकिन है।

ऐसे में भूमिहीनों को इसका मालिकाना हक दे कर उस ज़मीन को कृषि योग्य बनाना, देश के लिए क्रांतिकारी कदम होगा। इससे कृषि उत्पाद बढ़ेगा, लोगों को रोज़गार मिलेगा और पर्यावरण रक्षा भी होगी। अगर यह भी नहीं कर सकते तो खुले बाजार के विशेष आर्थिक क्षेत्र (सेज) बनाने के लिए अगर ऐसी ही अनुपयोगी, अनुपजाऊ जमीनों को लिया जाए। इसके बहुआयामी लाभ होंगे- ज़मीन का क्षरण रुकेगा, हरी-भरी ज़मीन पर मंडरा रहे संकट के बाद छंटेंगे। जहां बेकार बंजर भूमि अधिक है वहां गरीबी, बेरोज़गारी भी है, नए कारखाने वगैरह लगने से उन इलाकों की आर्थिक स्थिति भी सुधरेगी। बस करना यह होगा कि जो पैसा ज़मीन का मुआवजा बांटने में खर्च करने की योजना है, उसे समतलीकरण, जल संसाधन जुटाने, सड़क-बिजली मुहैया करवाने जैसे कामों में खर्च करना होगा।

जब खेत नहीं होंगे


पिछले सात सालों के दौरान देश के विभिन्न इलाकों के लगभग 35 हजार किसान आत्महत्या कर चुके हैं। अपनी जान देने वालों की कुंठा का कारण कार या मोटर साइकिल न खरीद पाना या मॉल में पिज्जा न खा पानी कतई नहीं था। अधिकांश मरने वालों पर खेती के खर्चों की पूर्ति के लिए उठाए गए कर्जे का बोझ था। किसान का खेत केवल अपना पेट भरने के लिए नहीं होता है, वह आधुनिक अर्थशास्त्र के सिद्धांतों से पूरे देश की तकदीर लिखता है। हमारे भाग्य-विधाता अपने अनुभवों से सीख नहीं ले रहे हैं कि किसान को कर्ज नहीं बेहतर बाजार चाहिए। किसान के लिए खेती घाटे का सौदा बन गई है। पूंजीपति के लिए खेत अपने फायदे का सौदा दिख रहा है। कारपोरेट खेती जैसे जुमले उछाले जा रहे हैं। बड़ी चालाकी से खेती पर मंडरा रहे संकट को नज़रअंदाज़ किया जा रहा है। किसान को कर्ज नहीं सही बीज, सही दाम, फसल सुरक्षा और सम्मान चाहिए। यह बात देश के नीति-निर्धारक जानबूझ कर नज़रअंदाज़ कर रहे हैं। एक तरफ देश की आबादी बढ़ रही है, लोगों की आय बढ़ने से भोजन की मात्रा बढ़ रही है, दूसरी ओर ताज़ातरीन आंकड़ा बताता है कि बीते साल की तुलना में इस बार गेहूं की पैदावार ही दस फीसद कम हुई है। अकेले उत्तर प्रदेश में हर साल लाखों हेक्टेयर लहलहाते खेतों के सड़क, कालोनी और मॉल में बदलने पर समाज अभी बेसुध है, लेकिन यह तय है कि पेट भरने वाला अन्न केवल खेत में ही उगाया जा सकता है, किसी कंक्रीट के जंगल में नहीं।

भारत में कारें बढ़ रही हैं, मोटर साइकिल की बिक्री किसी भी विकासशील देश में सबसे अधिक है, मोबाइल क्रांति हो गई है, शापिंग मॉल कस्बों-गाँवों की ओर जा रहे हैं। कुल मिलाकर लगता है कि देश प्रगति कर रहा है। सरकार मकान, सड़कें बना कर आधारभूत सुविधाएँ विकसित करने का दावा कर रही है। देश प्रगति कर रहा है तो जाहिर है कि आम आदमी की न्यूनतम ज़रूरतों का पूर्ति सहजता से हो रही है। तस्वीर का दूसरा पहलू भारत के बारे में चला आ रहा पारंपरिक वक्तव्य है- भारत एक कृषि-प्रधान देश है। देश की अर्थव्यवस्था का मूल आधार कृषि है। आंकड़े भी यही कुछ कहते हैं। देश की 67 फीसद आबादी और काम करने वालों का 55 फीसद परोक्ष-अपरोक्ष रूप से खेती से जुड़ा हुआ है।

जनवरी-मार्च 2009 की अवधि में देश की विकास दर 5.8 फीसद रही, जिसमें खेती की विकास दर 2.7 रही है। पूरे देश के खेत इस समय देर से या अल्प मानसून की आशंका से जूझ रहे हैं। अंतरराष्ट्रीय मंदी से जूझने का सबसे ताकतवर जरिया बढ़िया खेती ही है, सरकार और समाज में बैठे लोग कार-मोबाइल की बदौलत देश की आर्थिक हालत सुधारने का दिवा-स्वप्न देख रहे हैं।

पहले और दूसरे पहलू के बीच कहीं संवादहीनता है। इसका प्रमाण है कि पिछले सात सालों के दौरान देश के विभिन्न इलाकों के लगभग 35 हजार किसान आत्महत्या कर चुके हैं। अपनी जान देने वालों की कुंठा का कारण कार या मोटर साइकिल न खरीद पाना या मॉल में पिज्जा न खा पानी कतई नहीं था। अधिकांश मरने वालों पर खेती के खर्चों की पूर्ति के लिए उठाए गए कर्जे का बोझ था। किसान का खेत केवल अपना पेट भरने के लिए नहीं होता है, वह आधुनिक अर्थशास्त्र के सिद्धांतों से पूरे देश की तकदीर लिखता है। हमारे भाग्य-विधाता अपने अनुभवों से सीख नहीं ले रहे हैं कि किसान को कर्ज नहीं बेहतर बाजार चाहिए। उसे अच्छे बीज, खाद और दवाएँ चाहिए। कृषि में सुधार के लिए पूँजी से कहीं ज्यादा जरूरत गांव-खेत तक संवेदनशील नीति की है।

नकली खाद, पारंपरिक बीजों की जगह बीटी बीजों की खरीद की मजबूरी, फसल आने पर बाजार में उचित दाम नहीं मिलना, बिचौलियों की भूमिका, किसान के रिस्क-फैक्टर के प्रति प्रशासन की बेरुखी-कुछ ऐसे कारण हैं जिसके चलते आज देश के किसान खेती से विमुख हो रहे हैं। अगर हालात ऐसे ही रहे तो आने वाले कुछ ही सालों में हमें पेट भरने के लिए जरूरी अन्न जुटाने के लिए भी विदेशों पर आश्रित होना पड़ेगा। देश के सबसे बड़े खेतों वाले राज्य उत्तर प्रदेश का यह आंकड़ा अणु बम से ज्यादा खतरनाक है कि राज्य में विकास के नाम पर हर साल 48 हजार हेक्टेयर खेती की ज़मीन को उजाड़ा जा रहा है, मकान, कारख़ानों, सड़कों के लिए जिन जमीनों का अधिग्रहण किया जा रहा है वे अधिकांश अन्नपूर्णा रही हैं। इस बात को भी नज़रअंदाज़ किया जा रहा है कि कम होते खेत एक बार तो मुआवजा मिलने से प्रति व्यक्ति आय का आंकड़ा बढ़ा देते हैं, लेकिन उसके बाद बेरोजगारों की भीड़ में भी इज़ाफा करते हैं यहीं नहीं, इस बजट में मनरेगा के मद में बजट राशि में भारी भरकम वृद्धि की गई है, यह भी खेत विरोधी है।

कहने को तो 2006-07 को कृषि नवीकरण वर्ष घोषित किया गया था लेकिन गहराई से देखें तो इसमें खेती या किसान को प्रोत्साहन की कोई योजना बनी ही नहीं। सारा खेल कुछ वित्तीय संस्थाओं का रहा जो कि किसान को कर्जे के लिए प्रेरित करने या कुछ बीजों और खादों का विपणन करने में जुटी थी।

अपनी जमीनों के लिए विरोध प्रदर्शन करते किसानअपनी जमीनों के लिए विरोध प्रदर्शन करते किसानकिसानों के प्रति अपनी चिंता को दर्शाने के लिए सरकार के प्रयास अधिकांशतः उसकी चिंताओ में इज़ाफा कर रहे हैं। बीज को ही लें, पिछले पांच साल के मामले सामने हैं कि बीटी जैसे विदेशी बीज महंगे होने के बावजूद किसान को घाटा ही दे रहे हैं। ऐसे बीजों के अधिक पैदावार और कीड़े न लगने के दावे झूठे साबित हुए हैं। इसके बावजूद सरकारी अफ़सर विदेशी जेनेटिक बीजों के इस्तेमाल के लिए किसानों पर दबाव बना रहे हैं। हमारे यहां मानव संसाधन प्रचुर है, ऐसे में हमें मशीनों की जरूरत नहीं है, इस तथ्य को जानते-बूझते हुए सरकार कृषि क्षेत्र में आधुनिकता के नाम पर लोगों के रोज़गार के अवसर कम कर रही है। रासायनिक खाद और कीटनाशकों के अंधाधुंध इस्तेमाल के दुष्परिणाम किसान और उसके खेत झेल रहे हैं। इसके बावजूद सरकार चाहती है कि किसान पारंपरिक खेती के तरीके को छोड़ नए तकनीक अपनाएं। इससे खेती की लागत बढ़ रही है और इसकी तुलना में लाभ घट रहा है। पिछले साल मध्य प्रदेश के लाखों किसानों को सरकारी समितियों के माध्यम से नकली बीज और खाद बांटे गए, शिकायतें भी हुईं, वायदे भी हुए लेकिन न तो धोखाधड़ी करने वालों को पकड़ने का मसला और न ही किसानों को मुआवजा देने का मसला सियासत में आया। असल में किसान को लूटने में सभी शामिल हैं।

गंभीरता से देखें तो इस साज़िश के पीछे कुछ वित्त संस्थाएं हैं जो कि ग्रामीण भारत में अपना बाजार तलाश रही हैं। खेती की बढ़ती लागत को पूरा करने के लिए कर्जे का बाजार खोल दिया गया है और सरकार इसे किसानों के प्रति कल्याणकारी कदम के रूप में प्रचारित कर रही है। हकीक़त में किसान कर्ज से बेहाल है। नेशनल सेंपल सर्वे के आंकड़े बताते हैं कि आंध्र प्रदेश के 82 फीसद किसान कर्ज से दबे हैं। पंजाब और महाराष्ट्र जैसे कृषि प्रधान राज्यों में यह आंकड़ा औसतन 65 फीसद है। यह भी तथ्य है कि इन राज्यों में ही किसानों की खुदकुशी की सबसे अधिक घटनाएँ प्रकाश में आई हैं। यह आंकड़े जाहिर करते हैं कि कर्ज किसान की चिंता का निराकरण नहीं हैं। किसान को सम्मान चाहिए और यह दर्जा चाहिए कि देश के चहुंमुखी विकास में वह महत्वपूर्ण अंग है।

किसान भारत का स्वाभिमान है और देश के सामाजिक और आर्थिक ताने-बाने का महत्वपूर्ण जोड़ भी इसके बावजूद उसका शोषण किस स्तर पर है, इसकी बानगी यही है कि देश के किसान को गेहूं का दाम साढ़ छह रुपए किलो मिल रहा है, जबकि आस्ट्रेलिया से मंगवाए जा रहे गेहूं की कीमत दस रुपए से अधिक चुकाई जा रही है। जबकि बाजार में ब्रांडेड आटे का दाम बीस रुपए किलो है। किसान को उसके उत्पाद का सही मूल्य मिले, उसे भंडारण, विपणन की माकूल सुविधा मिले, खेती का खर्च कम हो और इस व्यवसाय में पूँजीपतियों के प्रवेश पर प्रतिबंध-जैसे कदम देश का पेट भरने वाले किसानों का पेट भर सकते हैं। चीन में खेती की विकास की सालाना दर 7 से 9 फीसद है, जबकि भारत में यह पिछले बीस सालों से दो को पार नहीं कर पाई है। अब तो विकास के नाम पर खेत उजाड़ने के खिलाफ पूरे देश में हिंसक आंदोलन भी हो रहे हैं। असल सवाल वही है कि हमें ज़मीन क्यों चाहिए-अन्न उगाने को या फिर खेत उजाड़ कर कारखाने या शहर उगाने को।

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