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आंध्र प्रदेश की तीसरी यात्रा फरवरी - 2005

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पर्वत पर्वत, बस्ती बस्ती पुस्तक से साभार, प्रथम संस्करण 2011
चर्चा में पता चला कि उड़ीसा राज्य में संयुक्त वन प्रबंधन के आदेश प्रकाशित होने से काफी पहले से स्वतःप्रेरित वन संरक्षण आंदोलन प्रारंभ हो चुका था। इसके पीछे प्रबंधन के लिए वन संरक्षण समितियां बनी है। इन समितियों के माध्यम से नये वन लगाने, उनका संरक्षण एवं संवर्द्धन तथा उपयोग में पूरे गांव की भागीदारी सुनिश्चित की जाती है। इसमें ऊपरी हस्तक्षेप एवं सरकारी मान्यता भी नहीं है। यह एक तरह से गांव का “ग्राम वन” है। इसके अंतर्गत जंगल समृद्ध बनाए जाते हैं। अब तक इनकी संख्या सात हजार से अधिक बताई गई किंतु वन विभाग इन्हें मान्यता देने में आनाकानी करता है। दिल्ली से मेरे साथ पूर्व वन संरक्षक और अपने विषय में पारंगत श्री दिनेश खंडूरी हैं, जो जंगल और वनवासियों के प्रति संवेदनशील हैं। इसलिए जब पहला राष्ट्रीय वन आयोग गठित हुआ तो उन्हें इस कार्य को देखने की ज़िम्मेदारी सौंपी गई थी। वन आयोग के एक प्रस्ताव के आधार पर मुझे आदिवासियों के जंगल के साथ अंतरसंबंधों को समझना था। जिसके लिए आदिवासी एवं जनजातीय क्षेत्रों में जाकर, उनसे चर्चा करनी थी। इसके लिए उड़ीसा तथा उत्तर-पूर्व के क्षेत्रों और आंध्र प्रदेश के इलाकों की यात्रा की। आंध्र प्रदेश के विशाखापट्नम से कोरापुट, उड़ीसा जाने के लिए एक सौ किलोमीट तक मैदानी भाग से जाना पड़ता है। उसके बाद प्लेटो (पठार) आ जाता है। इस रास्ते को पार करने में तीन घंटे का समय लगा। यहां पर हमारा इंतजार आर. सी.डी.एस. भुवनेश्वर के श्री मनोज पटनायक कर रहे थे। उन्होंने हमारे ठहरने का इंतजाम मंदिर गेस्ट हाऊस में किया था। उन्होंने अगले दो दिनों के कार्यक्रम के बारे में जानकारी दी। कोरापुट जिला मुख्यालय भी है। यहां पर जिलास्तरीय अधिकारियों के अलावा मंडलीय अधिकारियों के दफ्तर भी हैं। यह जिला आदिवासी बहुल है। कोरापुट में एक डोंगर पर भगवान जगनाथ जी का मंदिर है। मंदिर के आसपास, अनेकों तीर्थों की मूर्तियां स्थापित की गई हैं साथ ही अन्य तीन धामों की मूर्तियां भी हैं। मंदिर के चारों ओर का दृश्य भव्य है। यहां से कोरापुट में हरियाली खूब दिख रही थी। बारह वर्ष पहले यहां आया था तो उस समय रूखा-रुखा सा लगा था। बताते हैं कि भगवान जगन्नाथ जी के कोरापुट स्थित मंदिर के साथ आदिवासियों के संबंध निहित हैं।

मनोज पटनायक ने हमारे साथ चर्चा के लिए एक बैठक का आयोजन भी किया था। जिसमें प्रदेश भर से अस्सी के करीब वन सुरक्षा समितियों, ग्राम स्तरीय संस्थाओं तथा आदिवासी संगठनों के प्रतिनिधियों ने भाग लिया था।

चर्चा में पता चला कि उड़ीसा राज्य में संयुक्त वन प्रबंधन के आदेश प्रकाशित होने से काफी पहले से स्वतःप्रेरित वन संरक्षण आंदोलन प्रारंभ हो चुका था। इसके पीछे प्रबंधन के लिए वन संरक्षण समितियां बनी है। इन समितियों के माध्यम से नये वन लगाने, उनका संरक्षण एवं संवर्द्धन तथा उपयोग में पूरे गांव की भागीदारी सुनिश्चित की जाती है। इसमें ऊपरी हस्तक्षेप एवं सरकारी मान्यता भी नहीं है। यह एक तरह से गांव का “ग्राम वन” है। इसके अंतर्गत जंगल समृद्ध बनाए जाते हैं। अब तक इनकी संख्या सात हजार से अधिक बताई गई किंतु वन विभाग इन्हें मान्यता देने में आनाकानी करता है। इस प्रकार वन संरक्षण समितियां एवं विभाग द्वार गठित संयुक्त वन प्रबंधन समितियों के बीच टकराव है। वन संरक्षण समितियों के सदस्यों का कहना था कि संयुक्त वन प्रबंधन समिति के सचिव, एक सरकारी व्यक्ति-फॉरेस्टर हैं। संयुक्त वन प्रबंधन के नियमों के अधीन पातन पर 50 प्रतिशत सरकार को मिलेगा जबकि वन संरक्षण समितियों में ऐसा नहीं है। इस प्रकार उड़ीसा में लोक-पुरुषार्थ से गठित वन समितियां एक आदर्श है, ऐसा हमें लगा।

शाम के समय हम कोरापुट से दूर दयानिधी गुड्डा और गंगा गुड्डा गाँवों में गए। इन गाँवों की पूरी बसासत आदिवासियों की है। उनसे चर्चा हुई तथा उन्हें पिछले वर्षों में जो जंगल बढ़ाया है, उसे भी दिखाया। यह विकासमान जंगल-वन सुरक्षा समिति द्वारा पोषित है। इस गांव के वृद्धों ने बताया कि पहले भी उनके गांव के आसपास सघन वन था। जिससे गांव वालों की दैनिक आवश्यकता की पूर्ति हो जाती थी। उस जंगल के कारण यहां पर उपज भी अच्छी होती थी। लेकिन तीस-पैंतीस साल पहले हमारे यहां एक महिला घूमते हुए आई। उसने कहा कि ये जंगल तुम्हारे हैं। इनको काटो, नहीं तो जंगलात वाले इन जंगलों को काटेंगे। तुम्हारे ऊपर अत्याचार भी करेंगे। वह महिला एक बार नहीं साल-भर तक, कई बार आई और यही कहती रही। फिर क्या था, गांव वाले जंगल को नष्ट करने लगे। जब मैंने पूछा कि वह महिला कहां की थी। उन्होंने बताया कि वह यहां की तो नहीं ही थी। कहीं बाहर से आई होगी। एक भैया ने बताया कि अब लगता है कि वह नक्सलाईट रही होगी। उस दौर में यहां कुछ लड़के भी घूमते थे। नया जंगल कब और क्यों बना रहे हैं के उत्तर में उनका कहना था कि जंगल के नष्ट होने से हमें कई प्रकार की दिक़्क़तों का सामना करना पड़ा। यहां तक कि खेती बाड़ी पर भी असर पड़ा इसलिए फिर से जंगल बनाने की ओर ध्यान दे रहे हैं। अब चाहे कोई, कुछ भी कहे, हम जंगल को सुरक्षित रखेंगे।

अगले दिन हम लोगों ने कोरापुट से सुबह 9 बजे प्रस्थान किया। रास्ते में हम तीन आदिवासी गाँवों में रुके। उनके द्वारा जंगलों के संवर्द्धन के कार्य को देखा एवं संरक्षण की पद्धति से भी परिचित हुए। इस क्षेत्र में महिलाएं काफी जागरूक हैं। वन सुरक्षा के कार्य में उनकी भागीदारी भी अधिक बताई जा रही थी। दयानिधि गुड्डा गांव में आज भी लोग एकत्रित थे। उन्होंने खंड स्तर पर संगठन बनाया है। पता चला कि 14 पंचायतों के 140 गाँवों में वन सुरक्षा समितियां कार्यरत हैं। रास्ते में एक ऐसा गांव भी देखा, जहां बताया गया कि चंदन का जंगल था। कुछ वर्ष पूर्व चंदन के जंगल को वन विभाग वालों ने ठेकेदारों से कटवाया। ठेकेदारों के दुर्व्यवहार एवं जंगल से लोगों की आय न होने से वे नष्ट हो गए। उसके बाद बताया जाता है कि वे चंदन के वृक्षों को पनपने नहीं देते हैं। वहां उनके ठूंठ ही ठूंठ दिखाई दिए।

दिन में हम आर्कू घाटी में पहुंचते हैं। आर्कू घाटी बहुत ही सुंदर है। चारों ओर से छोटी-छोटी पहाड़ियां तथा बीच में मैदान है। यहां कि भू-आकृति मन-मोहक है। यदि पहाड़ियां हरियाली से पट जाए तो इस घाटी पर चार चांद लग जाएंगे। बताते हैं कि पहल इन पहाड़ियों पर भी जंगल थे जो अब नंगे-वृक्ष विहीन हो गए हैं।

यहां पर आदिवासी संग्रहालय है। जिसमें इस क्षेत्र की अलग-अलग आदिवासियों की संस्कृति, कला, स्थापत्य कला, रहन-सहन, शिकार, वेशभूषा आदि को बहुत प्रभावी ढंग से रखा गया है। यह उत्कृष्ट संग्रहालयों में एक है। बताया गया कि इसमें यह महत्वपूर्ण सत्य भी देखने को मिलता है कि जंगल की उपादेयता में वे किस प्रकार समझ और सावधानी से उपयोग करते थे। उनके साथ अंतर्संबध बिना उसके, उनका जीवन अधूरा है। यह सब समझने की बात है। यहां पर पर्यटक बड़ी संख्या में आने लगे हैं। संग्रहालय की स्मृति को संजोकर लाते हैं।

पाडेरू के आसपास के दो और गाँवों में रुके। वहां लोगों ने हमारा परंपरागत ढंग से स्वागत किया। गांव के महिला-पुरूष सभी एकत्रित थे। यहां पर हमारे आने की पहले से सूचना थी। टिटिंगा वालसा पाडेरू मंडल के अंतर्गत है। गांव के ऊपरी भाग की एक पहाड़ी पर दूर से ही हरियाली दिख रही है। इस पहाड़ी पर प्राकृतिक जंगल खड़ा हो गया है। बीच-बीच में कुछ लोकोपयोगी वृक्षों का रोपण किया गया है। गांव की महिलाएं अपने जंगल को दिखाने ले गई। जंगल की सुरक्षा के बारे में भी उन्होंने विस्तार से जानकारी दी। यहां पर वन विभाग के वरिष्ठ अधिकारी मिलने आए थे। उन्होंने जानकारी दी कि इस क्षेत्र में कई गाँवों में समुदाय वन प्रबंध समितियां हैं। पहले तो इसका नाम और काम संयुक्त वन प्रबंधन के तहत था किंतु कुछ अरसे से यह कार्य पूरी तरह से समुदाय को सौंप दिया जाएगा। वन विभाग का हस्तक्षेप समाप्ति की ओर है। तकनीकी एवं आर्थिक सहयोग जारी रहेगा। वन विभाग रिजर्व फॉरेस्ट तक सीमित रहेगा, यह सुनकर लगा तो अच्छा पर यह व्यवहार में कितना उतरा है, इसे जानने के लिए मैं बहुत उत्सुक था। मुझे मालूम है कि जंगलों के बीच जंगलों पर अवलंबित लोगों पर अधिकांश अत्याचार एवं उनके कष्ट जंगल की व्यवस्था के कारण हो रहे हैं। उन्हें स्वामित्व एवं अधिकार देने को प्रबंध तंत्र तैयार नहीं है।

आंध्रप्रदेश के इस क्षेत्र की मेरी यह तीसरी यात्रा थी। दो दशकों के अंतराल में यहां के सामाजिक ताने-बाने में क्या कोई परिवर्तन या सुधार हुआ है? शोषण एवं तनाव में कमी आई हैं? यहां की हरियाली में घटोत्तरी या बढ़ोत्तरी हुई है?

दोपहर के बाद हम आर्कू से 12 किमी. दूर गेटू वालसा गांव में वन सुरक्षा समिति के कार्य को देखने गए। जंगल देखने के बाद गांव वालों से चर्चा की। यहां पर महिलाएं अधिक सक्रिय हैं। प्रबंध समिति में भी 15 सदस्यों में से 8 महिलाएं हैं। यह भी बताया गया कि इस भूमि पर पहले से पोडू (झूम) किया जाता था। अब जतन से इस क्षेत्र का संवर्द्धन किया जा रहा है। रोपे गए पौधों के अलावा पुराने ठूठों पर कलियां फूट रही हैं। दैनिक उपयोग की वस्तुएँ तो मिलती रहती हैं। लेकिन ग्रामीण चाहते हैं कि इस जंगल के नीचे काली मिर्च या कॉफी जैसी सहयोगी लता एवं पौधों के रोपण से इस पर अवलम्बित लोगों की आर्थिकी में भी सुधार आ सकता है लेकिन फिलहाल तो इस कारण इस क्षेत्र की मिट्टी में सुधार बताया जा रहा है। पानी के स्तर में भी बढ़ोत्तरी हुई है। साथ ही पेड़ को आधार मान कर कई और कार्य भी यहां हुए हैं और इस कारण पीने एवं सिंचाई का प्रबंध भी किया गया है। साथ ही लोगों को खेती के सुधारे हुए औजार एवं अच्छी प्रजाति के फलदार पौध भी गांव में पहुंचे हैं। सबसे बड़ी बात यह है कि लोगों में जंगल को विकसित करने का आत्मविश्वास बढ़ा है। मुख्य रूप से महिलाओं में तो यह स्पष्ट दिखाई दिया।

उस दिन हमारा रात्रि विश्राम का कार्यक्रम आर्कू में ही था। मैंने देखा कि यहां कई वरिष्ठ अधिकारी आए हैं जिसमें अतिरिक्त प्रमुख वन संरक्षक, मुख्य वन संरक्षक सहित आधा दर्जन अधिकारी थे किंतु वे सभी सरकारी गाड़ी के बजाय प्राइवेट गाड़ियों में ही चल रहे थे। मुझे लगा कि क्या अभी इन क्षेत्रों में पहचान छिपाने की आवश्यकता है। एक कर्मचारी ने इसकी पुष्टि भी की कि पी.डब्लू. जी. का जाने अनजाने भय तो है ही। इसलिए यह सावधानी तो रखनी ही पड़ती है।

अगले दिन 10 बजे के बाद हमने आर्कू से प्रस्थान किया। आर्कू के बाद भी चालीस-पचास किलोमीटर के बीच में एक से एक बढ़कर घाटियां हैं। कहीं-कहीं जंगल भी विद्यमान है, जिसके कारण इन घाटियों की सुंदरता बढ़ जाती है। तलाऊ खेत भी देखने को मिले।

रास्ते में पाडेरू, जो कि एजेंसी मुख्यालय है, में रुक गए। पाडेरू का पिछले पंद्रह बरसों में बहुत विस्तार हो गया है। यहां बहुत बड़े बाजार का फैलाव हो गया है। बड़ी-बड़ी इमारतें खड़ी हो गई हैं। मुझे तो पहले से पाडेरू को पहचानने में भी दिक्कत हुई। यहां पर सभी प्रकार का सामान मिल जाता है। मुख्य रूप से आदिवासियों की आवश्यकता से संबंधित सामान से दुकानें भरी हुई हैं। भीड़ भी बहुत बढ़ गई है। मैंने चाहा कि मैं अकेले में बाजार में जाऊं किंतु मुझे सुरक्षा की दृष्टि से नहीं जाने दिया गया। पाडेरू में ट्राईबल डेवलपमेंट एजेंसी के परियोजना अधिकारी मिलने आए थे। वे मसूरी प्रशासनिक अकादमी से परिचित निकले। उनसे आदिवासी जीवन में हो रहे परिवर्तन के बारे में चर्चा की।

वन विभाग ने इस सेंचुरी को समुदाय आधारित ईको-टूरिज़्म के अंतर्गत विकसित करने का निर्णय लिया है। ऐसी वनाधिकारियों ने जानकारी दी। इसके अंतर्गत इस सेंचुरी से जुड़े ग्रामीणों की वन सुरक्षा समिति बनाई गई है। इस समिति को अभ्यारण्य के संरक्षण, प्रबंधन एवं आय आदि संग्रह एवं व्यय करने का अधिकार देने की बात कही जा रही है। इस प्रकार आंध्र प्रदेश की यात्रा के दौरान देखा कि यहां पर वन विभाग तथा वन संरक्षण समितियों के बीच सामंजस्य प्रतीत होता है तथा दोनों एक दूसरे से मिल कर करम करने लगे हैं।

पाडेरू के आसपास के दो और गाँवों में रुके। वहां लोगों ने हमारा परंपरागत ढंग से स्वागत किया। गांव के महिला-पुरूष सभी एकत्रित थे। यहां पर हमारे आने की पहले से सूचना थी। टिटिंगा वालसा पाडेरू मंडल के अंतर्गत है। गांव के ऊपरी भाग की एक पहाड़ी पर दूर से ही हरियाली दिख रही है। इस पहाड़ी पर प्राकृतिक जंगल खड़ा हो गया है। बीच-बीच में कुछ लोकोपयोगी वृक्षों का रोपण किया गया है। गांव की महिलाएं अपने जंगल को दिखाने ले गई। जंगल की सुरक्षा के बारे में भी उन्होंने विस्तार से जानकारी दी। इसके पास के ही दो और गाँवों में लोगों ने अपने जंगल को दिखाने के लिए हमें रोका। इन गाँवों को मैं पहले भी देख चुका था। तब लोग इस प्रकार से मुखरित नहीं थे। न ही वे सामूहिक रूप से मिले थे। चर्चा के दौरान मैंने वहां खड़े लोगों से पूछा कि क्या इन गाँवों में पीपुल्स वार ग्रुप के लोग भी आते हैं। इस बारे में किसी ने कुछ नहीं कहा। न कोई उत्तर दिया। लेकिन बाद में मुझे बताया गया कि जो लोग चर्चा में शामिल थे उनमें ही कोई उनका समर्थक हो सकता है। यह समस्या तो है पर रचनात्मक कार्यों से उतना प्रभाव नहीं है।

आगे हम घाट की तरफ बढ़ रहे थे। जंगल यहां कुछ घने हैं। कई जगह विशाल वृक्ष भी दिखे। बांस भी यदा-कदा दिख रहे थे। गाँवों के आसपास इमली, कटहल आदि के पेड़ दूर से ही पहचाने जाने लगते हैं। इस प्रकार हम दो गांवों में और रूके तथा सायं विशाखापट्नम में रुके।

अगले दिन हम लोग विशाखापट्नम शहर से लगे हुए कमलबकोंडा वन्य जीव विहार देखने गए। यह सेंचुरी 7139 हेक्टेयर में फैली हुई है। इसमें कई प्रजाति के जंगली जानवरों के अलावा जंगली पक्षियों की प्रजातियां भी बहुतायत में हैं। साथ ही कई प्रजाति की वनस्पतियां हैं। शहर के नज़दीक होने से इसमें देखने वालों की भारी भीड़ रहती है।

वन विभाग ने इस सेंचुरी को समुदाय आधारित ईको-टूरिज़्म के अंतर्गत विकसित करने का निर्णय लिया है। ऐसी वनाधिकारियों ने जानकारी दी। इसके अंतर्गत इस सेंचुरी से जुड़े ग्रामीणों की वन सुरक्षा समिति बनाई गई है। इस समिति को अभ्यारण्य के संरक्षण, प्रबंधन एवं आय आदि संग्रह एवं व्यय करने का अधिकार देने की बात कही जा रही है। इस प्रकार आंध्र प्रदेश की यात्रा के दौरान देखा कि यहां पर वन विभाग तथा वन संरक्षण समितियों के बीच सामंजस्य प्रतीत होता है तथा दोनों एक दूसरे से मिल कर करम करने लगे हैं।

पोडू के क्षेत्रफल में कमी आई है। आदिवासी इसमें पेड़ों की खेती की ओर प्रवृत्त हुए हैं तथा वन सुरक्षा समितियों के माध्यम से वनों की सुरक्षा में आगे आए हैं। जिन वनों का अत्यधिक कटान हुआ था, उनमें अब सुधार आ रहा है। पुरानी जड़ों पर कोपलें फूट रही हैं और पहाड़ी पर हरियाली दिखाई दे रही है।

विशाखापट्नम में दोपहर तक ईष्ट दोगावरी और विशाखापट्नम जिलों के वन सुरक्षा के कार्य से संबंध कार्यकर्ताओं की गोष्ठी में यहां पर हो रहे कार्यों की अधिक जानकारी हासिल करने का प्रयत्न किया। शाम को समुद्र दर्शन किया। सिहांचल में भगवान नरसिंहम के दर्शन किए। अंत में पूर्णागिरी तक गए। वहां से शहर एवं समुद्र का भव्य दर्शन किया। यहां पर हरियाली अन्य शहरों के मुकाबले अधिक दिख रही थी।

विशाखापट्नम से वापस लौटने से पहले मेरे मन में बार-बार यह सवाल उठते रहे कि क्या सचमुच वन विभाग के लोग आदिवासियों के प्रति संवेदनशील हो गए हैं? क्या इस सारे कार्यक्रम में सातत्य बना रहेगा? क्या यह कार्यक्रम लोक कार्यक्रम बन सकेगा? आदि।

पिछली दो शताब्दियों से वनवासियों को अपने परंपरागत अधिकारों से वंचित करने के कई प्रयास किए गए। इसमें राष्ट्रीय स्तर से लेकर ग्राम स्तर तक के प्रयत्न जग-जाहिर हैं। इसका प्रभाव हमारे जंगलों पर पड़ा। जंगलों में कमी आई तो उसके दुष्परिणाम जंगलों पर अवलंबित लोगों को ही झेलना पड़ा। इसलिए जो कारक और परिणाम-भोक्ता हैं उनको ही इसके केंद्र में प्रतिष्ठापित किया जाना चाहिए।

यदि हम अपनी सोच में इस प्रकार का बदलाव करते हैं तो वन और वनों के बीच रहने वाले लोगों के जीवन में सुखद बदलाव आ सकता है।

लेकिन इस बदलाव को न आने देने के लिए कतिपय बुद्धिजीवी आज भी सक्रिय हैं। यह अनुभव मुझे कई बार हुआ तथा सुनने एवं देखने को मिला। मुख्य रूप से जब भारत सरकार ने 20 साला कार्ययोजना फॉरेस्ट्री-सेक्टर के लिए बनाने हेतु मेरी अध्यक्षता में समिति गठित की थी उस समय तथा जब राष्ट्रीय वन आयोग के सदस्यों ने अनुसूचित जाति के वनाधिकारों को मान्यता संबंधी अधिनियम के खिलाफ न केवल प्रधानमंत्री को पत्र लिखा अपितु कई संस्तुतियां भी की। जिसका मैंने नम्रतापूर्वक विरोध करते हुए संस्तुतियों से असहमति जताई तथा अपनी ओर से अलग से वन-आयोग की संस्तुतियां पर असहमति का नोट दर्ज कराया, जो इस प्रकार है:

वन एवं वनवासी (जिन्हें आज हम अनुसूचित जन जाति के रूप में पुकारते हैं) को वनों की व्यवस्था में प्रमुखता दी जानी जरूरी है। अनुसूचित जाति के वनाधिकारों को मान्यता संबंधी अधिनियम में इस पर ध्यान दिया गया है और इसे कानूनी जामा पहनाया जाना न केवल जरूरी है, बल्कि वनों के संरक्षण और संवर्द्धन के व्यापक हित इससे जुड़े हुए हैं।
यह आशंका सही नहीं है कि इस अधिनियम से वनों को कोई नुकसान होने वाला है बल्कि वनों से जीविका प्राप्त करने वाली जनजातियों, समुदायों को वन संरक्षण से स्थायी रूप से जोड़ कर वनों का हित अधिक प्रभावी ढंग से संरक्षित किया जा सकता है।
वनों की हर प्रकार की व्यवस्था, चाहे वह वनों, वन्य जीवों अथवा जैव विविधता संरक्षण के विषय में ही क्यों न हो, वनों के बीच अथवा उसके समीप रहने वाले समुदायों को विश्वास में लेकर तथा उनकी सहभागिता से किया जाना अधिक प्रभावकारी तथा लाभकारी है। उनकी संरक्षण, उपयोग व प्रबंधन परंपरा का लाभ लिया जा सकता है।
लोकतांत्रिक व्यवस्था में हमें ग्राम सभाओं और पंचायती राज व्यवस्था के प्रति विश्वास तथा सम्मान का भाव दर्शाना होगा। उन पर अविश्वास करके अथवा संदेह की दृष्टि रखकर तथा अन्य संस्थाओं पर भरोसा जता कर हम अपनी महान लोकतांत्रिक परंपराओं को मज़बूती नहीं दे सकते हैं। पंचायतों व पंच परमेश्वर की भावना को बढ़ाने के बजाए हम थोपी गई न्यायाधिकरण व्यवस्था में विश्वास करने की मजबूरी से ग्रस्त जैसे हो गए हैं। इस सोच को बदले जाने की जरुरत है।
भारत गाँवों का देश है तथा गाँवों की व्यवस्था वनों तथा अन्य प्राकृतिक संसाधनों पर अधिक अवलंबित है। ग्राम वन की अवधारणा को इसीलिए हम विकास के एक मुख्य घटक के रूप में देखते हैं।
सम्मानपूर्वक जीविका का अधिकार प्राकृतिक न्याय का सबसे पहला और बड़ा सिद्धांत है। इसे हमारे संविधान ने भी सर्वोच्च प्राथमिकता दी है। वनवासियों के जीविका के अधिकारों का उल्लंघन प्राकृतिक न्याय व संवैधानिक व्यवस्था के प्रतिकूल है। इसलिए जब तक वनवासियों के न्यायसंगत एवं व्यावहारिक पुनर्स्थापना की व्यवस्था नहीं हो जाती, तब तक उन्हें विस्थापित करने की किसी भी कार्यवाही का विरोध किया जाना चाहिए।
हमारे अनुभव हैं कि लोगों को संसाधनों के संरक्षण के कार्यक्रम बनाने में जुटाया जाना चाहिए। इस संबंधी उनकी क्षमता का विकास करने का दायित्व सरकार ले। लोग अपने परिवेश, परंपरा और आवश्यकता के अनुरूप कार्य योजनाएं बनाएं तथा व्यवस्था-तंत्र आवश्यकतानुसार उनकी मदद करे। उन्हें विज्ञान व तकनीकी के सरल व सस्ते ऐसे विकल्प उपलब्ध कराए जाए, जिन्हें वे आसानी से ग्रहण व आत्मसात कर सकें।

इस प्रयोग से लोगों का सुषुप्त मनोबल जागृत होगा। उनका पुरुषार्थ और स्वाभिमान जागेगा ताकि एक उद्देश्यपूर्ण प्रयास की दिशा में बढ़ने के गौरव की अनुभूति उन्हें होगी। जबकि आज यही कार्य सरकारी तंत्र के माध्यम से उन्हीं के द्वारा होता है। लेकिन उनमें उनकी हैसियत मजदूर, दलनायक या टेकेदार से अधिक नहीं होती। इसके अलावा वर्तमान सरकारी कार्य-संस्कृति में लोक संगठनों की उपेक्षा एक सामान्य बात है।

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