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आल्प्स के अल्पाज

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पर्वत पर्वत, बस्ती बस्ती पुस्तक से साभार, प्रथम संस्करण 2011

पहाड़ों का दर्द एक सा है


सुबह देखा कि जिस पहाड़ी पर यह मकान है, उसमें चारों ओर पेड़ ही पेड़ हैं। ये मेरी परिचित प्रजाति के थे। पहाड़ी का ढाल काफी ऊपर तक चला गया है। सामने एक चट्टान युक्त पहाड़ है। पहाड़ियों से घिरी चौरस घाटी में साबेरी है। इस शहर का महत्व पर्यटन की दृष्टि से बढ़ गया है। यहां से नदी के दोनों ओर पहाड़ियों का क्रम है। सांबेरी शहर घाटी से लेकर आस-पास की छोटी-छोटी पहाड़ियों तक फैला है। पेड़ों की सघनता वाले इस साफ सुथरे शहर से आगे आल्पस की पहाड़ियां शुरू हो जाती हैं। मन में गुदगुदी जग रही थी। घड़ी की मिनट सुई को बारह पर पहुंचने के लिए पांच मिनट की देरी है। मैंने फिलिप ब्लंचर की ओर देखा, वह मुझे भांप गया। उसने कहा देर से आने का सवाल ही नहीं। देखते ही देखते रेल आ गई, ठीक सात बजे छूट गई। चार मिनट में सबने अपने स्थान ग्रहण कर लिए। हड़बड़ाहट कहीं न थी। 200 किमी. की रफ्तार से भाग रही रेल पेरिस को पीछे छोड़ गई। ग्यारह बजे रात हम सांबेरी स्टेशन पहुंचे। बाहर बूंदाबांदी और ठंड थी। हमे लेने के लिए एक युवती इंतजार में थी। नाम था क्रिस्टीन। उसने नमस्कार कह कर हाथ जोड़े। मैंने सोचा वह हिंदी जानती होगी, पर फिलिप ने बताया कि जब मेरा कार्यक्रम बन रहा था तो उसने दो चार शब्द हिंदी के सीख लिए थे। पेरिस में भी मुझे लगा कि लोग मेरी टूटी-फूटी अंग्रेजी समझने के बजाय हिंदी के भावार्थ को समझने की कोशिश कर रहे थे। वह मुझे अच्छा भी लगा। फ्रांस में फ्रांसीसी को अंग्रेजी के मुकाबले उन्नत भाषा समझा जाता है।

3 अक्तूबर 1988 को रेलवे स्टेशन के बाहर सब कुछ शांत था। सड़कों पर एक साथ कई रोशनियां दौड़ रही थी। कोई शब्द नहीं, बीच-बीच में ये रोशनियां सामने की पहाड़ी में अलग-अलग स्थानों पर बुझ रही थी। क्रिस्टीन कार से हमें चढ़ाई वाले रास्ते से पहाड़ी पर स्थित मकान में ले गई। हमने पत्थरों तथा लकड़ी के फर्श वाले क्रिस्टीन के घर में प्रवेश किया। अंदर बुखारी जल रही थी। कमरा काफी गर्म था। खुली, चूल्हे की आग तापने की आदत तो हमें अपने यहां पड़ी हुई है। ठंड में बुखारी की आग तापने का अलग ही आनंद अनुभव था। थोड़ी देर बाद हरी सब्जी का गर्म-गर्म सूप पीने को मिला। पिछले पांच दिनों से पेरिस में सिर्फ डबलरोटी खा रहे आदमी के लिए यह राहत थी।

सुबह देखा कि जिस पहाड़ी पर यह मकान है, उसमें चारों ओर पेड़ ही पेड़ हैं। ये मेरी परिचित प्रजाति के थे। पहाड़ी का ढाल काफी ऊपर तक चला गया है। सामने एक चट्टान युक्त पहाड़ है। पहाड़ियों से घिरी चौरस घाटी में साबेरी है। इस शहर का महत्व पर्यटन की दृष्टि से बढ़ गया है। यहां से नदी के दोनों ओर पहाड़ियों का क्रम है। सांबेरी शहर घाटी से लेकर आस-पास की छोटी-छोटी पहाड़ियों तक फैला है। पेड़ों की सघनता वाले इस साफ सुथरे शहर से आगे आल्पस की पहाड़ियां शुरू हो जाती हैं। यह प्रवेश द्वार है। यहां सप्ताह में दो बार अपना बाजार लगता है, जिसमें आस-पास के किसान और पशुचारक अपनी उत्पादित वस्तुएँ बिक्री के लिए लाते हैं। इनमें ताजी सब्जी, अनाज, गाय तथा बकरी के दूध से बना पनीर आदि मिलता है। ग्राहकों को आकर्षित करने के लिए जोर-जोर से आवाजें लगाई जाती है।

हाथ से बुनी ऊनी सामग्री के अलावा लकड़ी की नक्कासी का सामान भी मिलता है। अपना बाजार के लिए शहर के बीचों-बीच स्थान सुरक्षित किया गया है। एक दो खोमचों में तख्तियों पर लिखा था- हिमालय की जड़ी, आल्प्स की कड़ी। यानी जैसे हिमाचल की जड़ी बूटियां प्रसिद्ध हैं वैसे ही आल्प्स के दुग्ध पदार्थ। हम वहां पर रुक गए। दालचीनी, फरण, चोरू, मीठा चिरायता एवं तमाम जड़ी-बूटियां साबूत या कुछ पैकेटों में बंद थी। बिक्री भी हो रही थी। पैकेटों पर लिखा था शुद्ध हिमालय से आयातित, सुगंधित, स्वाद और शक्ति से भरपूर, अवश्य आजमाइए। जंगलों से एकत्रित कई कंदमूल तथा नट भी बिक्री हेतु लाए जाते हैं। पता चला कि सामग्री की खरीद हेतु लोग दूर-दूर से आते हैं। पहाड़ और मैदान के संगम पर है यह नगर।

सांबेरी से 40 किमी. दूर ग्रामीण क्षेत्र से आया हुआ भेड़पालक जैकब बताता है कि उसकी 60 बकरियां हैं। वह बाजार में पनीर लाता है। बकरी के दूध के पनीर की मांग भी खूब है। वह सिर्फ तीन घंटे में पनीर बेच कर प्रति सप्ताह एक हजार फ्रांक (लगभग 2000 रु.) कमा लेता है। स्वयं भी ये लोग पनीर का प्रयोग करते हैं। पशुपालन, खेती, सब्जी उत्पादन में जुटा जेकब अपने पेशे से प्रसन्न है। उसे इसके विस्तार में दिलचस्पी नहीं है।

सांबेरी से बाहर निकलते ही हम मोरयान्थ घाटी में थे। कार की चाल 125 किमी. प्रति घंटा थी। सांबेरी से आगे हाईवे को सौ फीट से अधिक चौड़ा करने का कार्य चल रहा था। मार्ग में पड़ने वाले पेड़ भी नष्ट कर दिए थे। बताया गया कि 1990 में फ्रांस के इस इलाके में शीतकालीन ओलम्पिक खेलों का आयोजन होने वाला है। पूर्व तैयारी से यह सड़क बन रही थी। एक संगठन ने इसके औचित्य का सवाल उठाया और जंगल के विनाश को रोकने की अपील भी की।

खुली-चौड़ी घाटी से दोनों ओर आल्प्स की पहाड़ियों से घिरे रास्ते में हम आगे बढ़ रहे हैं। सहजों ग्राम के पास सड़क किनारे एल्यूमीनियम का बड़ा कारखाना है। बताते हैं कि इस कारखाने के जल तथा वायु प्रदूषण के कारण पशुओं की हड्डी खराब हो जाती थी। जंगल भी इसके दुष्प्रभाव से नष्ट होने लगा। एक पर्यावरण संगठन, जिसमें क्रिस्टीन भी हैं, ने इसके दुष्प्रभावों की जांच की मांग की तथा न्यायालय में जाने की भी धमकी दी। जंगलात वालों ने भी विनाश को स्वीकारा और जांच की मांग दोहराई। जांच में पाया गया कि इससे प्रदूषण बढ़ा है। उसे रोकने के प्रयास हुए और अब यह विवाद रुक गया है।

इसी प्रकार सांबेरी में भी एक कारखाने से प्रदूषण बढ़ गया था। जंगलात के एक अधिकारी ने पर्यावरण संगठन को यह सब बताया तो वे जिले के प्रशासनिक अधिकारी (प्रे फे) के पास गए कि इसे न रोकने पर न्यायालय जाएंगे। अधिकारी के बीच बचाव से प्रदूषण रुक गया है। आल्पस के पहाड़ ऊँचे तथा घाटियां संकरी होती जा रही थीं और हम एक निराली घाटी में पहुंच रहे थे। प्रकृति प्रेमियों, पर्वतारोहियों और पर्यटकों को अपनी ओर तेजी से खींचने वाली इस घाटी का सौंदर्य अलौकिक है। चारों ओर हरा-भरा वन, विभिन्न वनस्पतियों से घिरे जंगल और सब्जी, फल-फूलों से लबालब भरे खेत तथा जगह-जगह छोटी पनबिजली इकाईयों का क्रम। पूरी घाटी अनेक जल धाराओं और कारख़ानों से जुड़ी हुई है। एक सदी पहले से यहां बिजली पैदा की जा रही है। यह सस्ती है, इसलिए इधर हर दो चार किमी. में कोई न कोई कारखाना है। पिछले सालों में जल तथा वायु प्रदूषण में असाधारण वृद्धि हुई थी लेकिन रोन-आल्प्स प्रकृति संरक्षण संगठन पहल पर अब इन पर निगरानी रखी जा रही है। यह संगठन 1970 में स्थापित हुआ था।

दोनों ओर की पहाड़ियों पर हरियाली ज्यादा और बस्तियां कम हैं। मोटर मार्ग से सटकर रेलवे लाइन भी है। ओरेले के आस-पास ज्यादा सिमट जाती है। और पहाड़ खड़े से लगते हैं। दाईं ओर के कोणधारी जंगलों के पास रेलवे लाइन है। आसपास के जले जंगलों का कारण रेल इंजन से निकली चिंगारियां से आग लग गई थी। आज भी काले ठूंठ विनाश की याद दिला रहे थे। अब जंगल में हरियाली लौटाने का काम हो रहा है। इसके आगे मोदाब के आसपास भूक्षरण बढ़ा हुआ था। बढ़ते कारखाने का स्पष्ट प्रभाव भी प्रकट हो रहा था।

जल्दी में धन कमाने की होड़ ने कई स्थानों पर बिना सोचे समझे जंगलों का विनाश भी बढ़ाया है। भूक्षरण तथा भूस्खलन तो प्रत्यक्ष देखे ही जा सकते हैं, कई जगहों के अस्तित्व पर भी प्रश्न चिह्न लगा है। ला नोरमा, जहां शीत खेलों के लिए अनुकूल ढाल हैं, में जंगलों को काट कर होटलों तथा रोपवे का निर्माण किया गया है। यह सिलसिला बढ़ता ही जा रहा है। कई छोटी-छोटी घाटियां सांबेरी से बोन्नेवल तक की 145 किमी. की दूरी में फैली हैं। इन दर्जनों घाटियों को खोदा गया है

मोरियान्थ घाटी बर्फ के खेलों के लिए प्रसिद्ध है। स्कीईंग तथा स्केटिंग की यहां रंगत बढ़ जाती है। पर्वतारोहण और साहसिक अभियानों का भी आयोजन होता है। लगभग 1000 से 3600 मीटर ऊंचाई वाली पहाड़ियों के बीच की ढालदार घाटियां इस हेतु बहुत उपयुक्त हैं। ढालों में छोटी-बड़ी नदियां हैं और झीलें भी, जिन्हें सजाया गया है। यह सारा आयोजन व्यापार का रूप ले चुका है। स्थानीय ग्रामीणों ने इसे व्यवसाय बना लिया है। वे पर्वतारोहण का प्रशिक्षण भी देते हैं और पर्वतारोहण के उपकरण भी उनके पास हैं। यह धंधा चार माह चलता है। यूरोप से लाखों लोग यहां आते हैं और हर साल 30 हजार नई चारपाईयों की जरूरत पड़ती है। सुविधापूर्ण होटल बने हैं। पहले यहां परंपरागत शीत खेल होते थे। 1936 के बाद इनका रूप व्यापारिक होने लगा। खेलों की यह परंपरा नार्वे से आई बताई जाती है। आज हजारों लोग इस व्यवसाय से जुड़े हैं। साग-भाजी, दूध-पनीर तथा गोश्त आदि की खपत बढ़ी है। कई परिवारों ने दो-चार कमरे आगंतुकों के लिए रख छोड़े हैं। लकड़ी पर नक्काशी तथा हथकरघे पर बने ऊंनी माल भी आकर्षक हैं।

जल्दी में धन कमाने की होड़ ने कई स्थानों पर बिना सोचे समझे जंगलों का विनाश भी बढ़ाया है। भूक्षरण तथा भूस्खलन तो प्रत्यक्ष देखे ही जा सकते हैं, कई जगहों के अस्तित्व पर भी प्रश्न चिह्न लगा है। ला नोरमा, जहां शीत खेलों के लिए अनुकूल ढाल हैं, में जंगलों को काट कर होटलों तथा रोपवे का निर्माण किया गया है। यह सिलसिला बढ़ता ही जा रहा है। कई छोटी-छोटी घाटियां सांबेरी से बोन्नेवल तक की 145 किमी. की दूरी में फैली हैं। इन दर्जनों घाटियों को खोदा गया है। इसी मार्ग में खेल क्षेत्र केंद्रित हैं। प्रकृतिविद् तथा पर्वतारोही मुख्य से दूर जाते हैं। गर्मियों में मुख्य आल्पस में घूमते हैं। बोन्नेवल इस घाटी का अंतिम गांव है। इसके बाद कोल दे आईसरैन (दर्रा) 2700 मीटर पर है। इसके बाद दूसरी घाटी है। सांबेरी और बोन्नेवल के बीच में मांडेन, ब्रामेन्स, सरडोरस, सोल्लेरस, टर्मिगों आदि है। यहां से बाईं ओर की घाटी से अल्पाज (हिमालय के बुग्याल जैसे क्षेत्र) को रास्ता जाता है। जो बालोन दे ला रोशैनरे के नाम से जाना जाता है। इसके बाद लैन्स ले बोर्ग में एक पहाड़ी को काट-काट कर पगडंडी बनाई गई है। वहां कोल टू मौंट सैनिस के ऊपर एक बड़ी झील लेक टू मौंट सेनिस है। यह रास्ता अल्पाज होकर इटली से तुरिन में मिल जाता है। यहीं पर कुछ आगे वल्सेनिस बस्ती है। झील के लिए यहां से भी रास्ता जाता है। आगे बेस्सान की बस्ती है। जिसके एक ओर रिबां तथा दूसरी ओर एबैरोल नामक सुंदर घाटियां हैं। सभी बस्तियां शीत खेलों के लिए प्रसिद्ध हैं। बोन्नेवल सरआर्क जिसके चारों ओर अल्पाज हैं, पुरानी तरह की बसासत है। लकड़ी, पत्थर और पाथर के मकान हमारे अपने मकानों की याद दिलाते हैं। गोठ में पशु, ऊपरी मंजिल में आदमी रहते हैं। पहले दोनों एक ही मंजिल में रहा करते थे। फूल और आर्किड्स की सजावट है। नये प्रकार के मकान भी बन रहे हैं पर आम लोग इस बदलाव के पक्षधर नहीं हैं। वे अपने भूगोल के अनुरूप मकानों का अर्थ समझते हैं।

इस गांव में पारंपरिक बुनाई और नक्काशी का काम घटा है। इसी तरह हथकरघों की परंपरा भी। फल, सब्जी, उत्पादन के साथ गोपालन बढ़ा है। गायें 18-20 किलो तक दूध देती हैं। देखभाल में कोई कमी नहीं की जाती है। सभी गायें तंदुरुस्त हैं। यहां के पहाड़ों में खेती बीते समय की बात हो गई है। स्थानीय लोगों को कारख़ानों में सम्मानपूर्वक रोज़गार मिल जाने से भी खेती बंद करने में भूमिका निभाई। परिवारों के खेतों में जंगल उग गए हैं। गांवों के अपने सामूहिक जंगल भी हैं। वहां से ग्रामीणों को लकड़ी-चारा इकट्ठा करने का हक है। जंगलों की सुरक्षा पंचायतों द्वारा की जाती है। इसमें सभी की भागीदारी होती है। कभी-कभी चोरी आदि की घटनाएँ भी होती हैं। कुल जनसंख्या का 7 प्रतिशत यहां खेती से जुड़ा है। अनाज जरूरत से ज्यादा हो जाता है।

आलप्स के गाँवों में जगह-जगह बनाए गए स्मारक बताते हैं कि इन गाँवों के लोग पहले या दूसरे विश्व युद्ध में मारे गए। कई गांव पुरुष रहित हो गए थे। तैरमिन्गा के चौराहे पर एक शहीद सैनिक की पत्नी की हृदय विदारक मूर्ति है। इससे युद्ध की भयंकरता का पता चलता है। बहादूरी दिखाने वाले सैनिकों की पत्नी को ही नहीं पूरे परिवार को रोना पड़ता था। लाखों लोगों के मारे जाने की बात प्रकट हो रही थी। लेकिन दुर्भाग्य से प्रथम के बाद दूसरा विश्वयुद्ध और फिर शीतयुद्ध का सिलसिला नहीं टूटा। युद्ध के आयोजकों को रोती हुई औरत से कुछ लेना देना नहीं होता है।

आल्पस में हो रहे कथित विकास और उससे बिगड़ने वाले पर्यारवरण के प्रति यहां कुछ आँखें हर समय सावधान रहती है। इनमें इन पहाड़ों के लिए समर्पित एक संगठन है रोन-आल्प प्रकृति संरक्षण संगठन, जिसने पिछले दो दशकों में अनेक गलतियों को सुधारा है। जब फाईबर ग्लास के कारखाने या बनबाज वायोस्फियर रिजर्व में स्कीईंग मार्ग का निर्माण होने लगा तो संगठन ने आवाज़ बुलंद की और कामयाबी पाई। फिर भी यहां तेजाबी वर्षा हो रही है और इससे जंगल नष्ट हो रहे हैं। औपचारिक संगठनों के अलावा भी अपनी माटी तथा पेड़ों को बचाने का कार्यक्रम गांव तक पहुंचा है। सांबेरी से 120 कि.मी. दूर आल्पस की गोद में एक छोटी नदी की दाईं ढाल पर बसा, ऊपर घने जंगलों और अल्पाजों (बुग्याल) से भरा तथा बाईं ओर भूस्खलन ग्रस्त पहाड़ी वाला ब्रामां गांव है।

चिपको की कहानी सुन कर वे अपनी कहानी बताने को उत्सुक हुए। इस आंदोलन से जुड़े रौव्लियर क्रिस्तोफ से भी मुलाकात हुई। उन्होंने बताया कि गांव के ऊपरी भाग में 400 के.वी. बिजली लाइन बिछाई जाने का प्रस्ताव है। यहां से इटली को बिजली का निर्यात होगा। जंगल के काटे जाने से लोग इसके पक्ष में नहीं हैं और पिछले दो साल से इसका विरोध कर रहे हैं। गांव के ऊपर कैल, सुरही, भोजपत्र तथा चीड़ का सघन जंगल हैं और तीव्र ढाल वाली पहाड़ी के ऊपर आल्पाज हैं, जहां गर्मियों में गांव के पशु चराए जाते हैं। अपने प्राकृतिक अधिकारों में हो रही घुसपैठ के विरोध में ग्रामीणों ने पर्चा भी छापा है। ‘ब्रामा को जीवित रहने दो’ नारा उठा है और इस नाम का संगठन भी बना है। सरपंच ने धमकी दी है कि यदि सरकार ने उनकी बात नहीं सुनी तो वे त्यागपत्र दे देंगे। ग्राम पंचायत के सदस्यों ने भी यही निर्णय लिया है। ग्रामीणों को विश्वास है कि उनकी जीत होगी। दस साल पहले यूरेनियम खनन का कार्य इसी तरह रोकने में सफलता मिली थी।

ग्रामीणों ने ‘ब्रामा को जीवित रहने दो’ पर्चे में परियोजना का विस्तार से विश्लेषण किया है कि इसमें ला बाम और क्लोट क्षेत्र का जंगल कटेगा। प्लान में यह लाइन पुरानी लाइन से जुड़ेगी। जिला समिति के सदस्य और सरपंच गिरार्द का कहना है कि बिजली के गाड़े जाने वाले खम्भे भी घाटी को भद्दा करेंगे और वायोस्फियर रिजर्व को भी क्षति पहुँचेगी। यदि जरूरी हैं तो लाइन कोल दे पेलौसे की ओर से बनाई जाए न कि नाज़ुक और सुंदर मौथान क्षेत्र से। संस्था परियोजना का विरोध करती रहेगी क्योंकि यह जन संपत्ति और पर्यावरण पर ही नहीं अगली पीढ़ी तक दुष्प्रभाव डालेगी। इस संस्था ने आज तक कुछ खोया नहीं है। आगे को यह अधिक सावधान होना चाहती है।

दुनिया के पहाड़ों में लगभग 50 करोड़ लोग रहते हैं। और हर जगह कम या ज्यादा, प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष संकट थे और हैं। ये संकट घटे नहीं हैं। सौ साल पहले तक आल्पस के लोग और पर्यावरण सुरक्षित था। बाहरी आदमी की पहुंच कम थी। अब बिगाड़ का प्रभाव मैदानों तक भी जाने लगा है। ब्रामां के इस अल्पाज तक मोटर सड़क ने इसे हजारों पर्यटकों की पहुंच में ला दिया। जब हम विज्ञान से दूरियाँ कम करवा लेते हैं तो यह नहीं सोच पाते है कि किसी क्षेत्र की दबाव सहने की क्षमता बढ़ा पाना असंभव है। इस क्षेत्र से आगे बाईं ओर इटली की सीमा है तथा तीन सुंदर घाटियां – ब्रामांनेते, इटाचे तथा अम्बीन भी फैली हैं। इनमें चीड़, कैल, सुरई, भोजपत्र, पांपलर, चमखड़ीक के खूब पेड़ हैं। इटाचे घाटी के निचले भाग में शीशी नामक स्थान में ब्रामांवासियों का ल सफे (पशुओं को चराने का क्षेत्र) है। गर्मियों में पशुओं अल्पाज में ले जाते हैं तो 10 जून से जुलाई प्रथम पक्ष तक अल्पाज से लौटते हुए अक्टूबर मध्य से नवंबर तक यहां ल सफे में रहते हैं। ऊंची 1700 मीटर है। शीशी में परंपरागत ढंग से बने घर हैं। निचली मंजिल में गायें बंधी हैं। पहले सबकी गायें थीं, इसलिए ऊपर नीचे जाने में यह पड़ाव था। अब गोपालन घटा है। मैदानों में गोपालन ज्यादा है। ग्रामीणों को घाटी में नौकरी मिल जाने, शीत खेलों से आय हो जाने से शायद गोपालन घटा है। मैं जिस घर में रहा वह पहले गौशाला थी। अब यह आगंतुकों हेतु बना है। भोजनालय, भंडार, शौचालय और स्नानागार भी इसमें जुड़ गए हैं। नीचे की मंजिल में बुखारी है। ऊपर की मंजिल में लकड़ी के तख्त लगे हैं। छोटे सिलिंडरों में भोजन हेतु गैस तथा बिजली उपलब्ध है। मोटर सड़क भी पहुंची है, जो आगे अम्बीन घाटी में चली जाती है। सामने जंगल है और खेतों में भी जंगल उग आए हैं। मकान हमारे दूरदराज के गाँवों की याद दिलाते हैं। पत्थर, पाथर (स्लेट) और लकड़ी। आंगन में अर्किड और फूल। पास में ही हिसालू और किलमोड़े प्रजाति के पौधे। धीरे-धीरे पेड़ पीछे छूट रहे हैं। ऊपर सूखी, खड़ी नंगी चट्टानें हैं। पिछले ढाल में अल्पाज फैला है। 2000 मीटर से ऊपर स्थित इस अल्पाज में एक आकर्षक झील भी है। पैदल रास्ता, जिसमें हम चले, अनेक जगह कठिन था।

यह संयोग था कि हमारे जाने के दिन गायों को जाड़ों के लिए नीचे उतर कर शीशी जाना था। अक्टूबर पहले हफ्ते में पाले से अल्पाज की घास सूख चुकी थी। उत्तराखंड के बुग्यालों में इस मौसम में भी हरियाली मिलती है। पहले मैंने सुना था कि अल्पाज यहां नियंत्रण में हैं, बिगाड़ कम है। लेकिन कुछ लोग बिना देखे ही उत्तराखंड के बुग्यालों की खराबी रोना रोते हैं। मैं उत्तराखंड के रूद्रनाथ, मनपैई, गंगरतोली, ब्रह्मा, बेदनी औली या अन्य बुग्यालों की हालात इनसे बेहतर मानता हूं। मात्र दो तीन अल्पाज देखने से मैं अपनी धारणा किसी पर थोपना नहीं चाहता लेकिन मेरा मन उत्तर मांगता है कि जहां उत्तराखंड की तरह जनसंख्या का दबाव न हो खेती बीते कल की बात हो, पशुओं की संख्या घटी हो फिर भी वहां भूस्खलन, क्षरण क्यों नजर आ रहा है? कदाचित आल्पस में जंगल विनाश लोगों की अनुभूत आवश्कताओं से ज्यादा विलासिता और प्रमोद की नई रंगतों-माल को बनाने के लिए हुआ। जंगल में आग लगना रेल के इंजन से जुड़ा है। वनस्पति और मिट्टी पर संकट गहराता जा रहा है। कारण चाहे अनुभूत आवश्यकता हो या विलासिता पर्यटन और शीत खेलों के आधुनिकीकरण ने इन पहाड़ों का अस्तित्व डगमगाया है।

दुनिया के पहाड़ों में लगभग 50 करोड़ लोग रहते हैं। और हर जगह कम या ज्यादा, प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष संकट थे और हैं। ये संकट घटे नहीं हैं। सौ साल पहले तक आल्पस के लोग और पर्यावरण सुरक्षित था। बाहरी आदमी की पहुंच कम थी। अब बिगाड़ का प्रभाव मैदानों तक भी जाने लगा है। ब्रामां के इस अल्पाज तक मोटर सड़क ने इसे हजारों पर्यटकों की पहुंच में ला दिया। जब हम विज्ञान से दूरियाँ कम करवा लेते हैं तो यह नहीं सोच पाते है कि किसी क्षेत्र की दबाव सहने की क्षमता बढ़ा पाना असंभव है।

गोपालक जोजफ प्यावई ने अल्पाज में ही बताया कि गायें 20 जून को शीशी से अल्पाज में आईं और 8 अक्टूबर को वापस जा रही हैं। जोजफ ने इस बीच पनीर के 1400 पैकेट (ढाई किलो के, मूल्य 45 फ्रांक) बेचे और लगभग एक लाख बीस हजार रुपया (63 हजार फ्रांक) कमाया। 45 गायों के साथ जोजफ और उसकी पत्नी अल्पाज में रहते हैं। बच्चे अवकाश के दिन आ जाते हैं। अल्पाज व्यक्तिगत और सामूहिक भी हैं। जोजफ के मित्र तथा परिवार के लोग बड़े बूढ़ों सहित आए हैं। 5 साल की ऐलीज और 11 साल का बापस्ते एक टीले में खेल रहे हैं। सभी को नीचे जाना है। बर्तन, पनीर आदि स्टेशन बैगनों पर लाद दी हैं। जोजफ गायों की ओर दौड़ कर आवाज़ लगाता है। गायें चौकन्नी होती हैं। भ्वां, भ्वां, भ्वां करती चरना बंद कर उछलने-कूदने लगती हैं। ऐलीज भी आवाज़ लगाती है। जो गायें चरना नहीं छोड़ रही हैं उनके पास कुत्ते भौंक रहे हैं। 5 मिनट के भीतर गायें गौशाला के पीछे पहुंच गईं। सबके गले में बड़ी-बड़ी घंटियां हैं। जोजफ ने 1500 फ्रांक में 15 किलो भारी घंटी बनाई है। सजा कर उसमें रागिन-डी-मौंटे (पहाड़ों की रानी) लिखा है।

उतरते समय इस घंटी को पहनने का सौभाग्य किसी गाय को नहीं मिला क्योंकि अल्पाज से शीशी तक उतार का रास्ता खतरनाक है। शीशी से ब्रामा जाते समय यह घंटी पहनाई जाएगी। जोजफ बताता है कि यदि एक गाय की घंटी दूसरे को पहनाई जाए तो वह नाराज़ होती है।

गायें ढाल में नीचे उतर रही हैं। घाटियां संगीतमय हो गई हैं। कई आवाजें एक साथ गूंजती हैं। तेर! तेर! उदेत! उदेत! (ऊपर-ऊपर, नीचे-नीचे) सुनकर गायें सिर उठाती हैं। एलीज अपनी गाय तुलिप (एक फूल के नाम पर) को पुकार रही है। बपिस्ते की गाय का नाम आजुबेंत (एक चिड़ियां के नाम पर) है। हर गाय का कोई न कोई सुंदर नाम है। गोपालकों को हर गाय का नाम याद है। वे नाम ले ले कर पुकार रहे हैं। ढाल बढ़ गया और मोड़ भी। 2-2, 3-3 गायों के बीच एक आदमी आ गया है। जोजफ सहित सभी सतर्क हो गए हैं। कुत्ते भी चौकन्ने हैं। आल्पस गूंज रहा है। ढाल के बढ़ते के साथ चाल और लय में अंतर आता है। अल्पाज पीछे छूट जाते हैं। ऊंची आवाज़ में दबोल ! (नीचे चलो) दबोत (ऊपर चलो) पुकारा जा रहा है। सीधी ढाल, घुमावदार पगडंडी है। जोजफ गायों को सावधान करता है। ढाल और चट्टानों के बाद जंगल आ जाता है। फिर रौनक लौट आती है। ग्वाले की आवाज़ तो गायें पहचानती हैं। क्या गायों की आवाज़ों को ग्वाले पहचानते होंगे? गायें भी समझ गई हैं कि वे बीच के पड़ाव में जा रही हैं। सभी पीछे छूट गए हैं। गायें दौड़ती-हांफती शीशी ल सफे में पहुंच गई हैं और हम सभी भी।

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