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जल्द मिलेंगी बीज की नयी किस्में

Source: 
पंचायतनामा डॉट कॉम
बिरसा कृषि विश्व विद्यालय के वैज्ञानिकों ने छह फसलों की नौ नयी किस्मों को विकसित किया है। इसे झारखंड राज्य बीज उप समिति ने मंजूरी भी दे दी है। अब इसे केंद्र की स्वीकृति व अधिसूचना जारी किये जाने का इंतजार भर है। केंद्रीय कृषि मंत्रालय के उपायुक्त (गुणवत्ता नियंत्रण) सह सचिव, केंद्रीय बीज समिति, नयी दिल्ली की मंजूरी मिलते ही इन प्रजातियों के बीज उत्पादन का कार्यक्रम खरीफ एवं रबी मौसम में शुरू कर दिया जाएगा। जारी की गयी प्रजातियों में धान की चार, गेहूं, मूंगफली, सोयाबीन, गन्ना व चना की एक-एक किस्में शामिल है। बिरसा कृषि विश्वारविद्यालय के कुलपति डॉ एमपी पांडेय के अनुसार, इन नयी प्रजातियों के उपयोग से किसानों की उपज एवं आमदनी में खासी वृद्धि होगी व राज्य में एक नयी कृषि क्रांति आएगी।

विकसित की गयी किस्म इस प्रकार हैं :


बिरसा विकास सुगंधा 1


धान की यह किस्म 120 से 125 दिन में पक कर तैयार होती है व वर्षा आधारित कृषि के लिए उपयुक्त है। यह सुगंधित बासमती धान प्रभेद झुलसा और भूती चित्ती रोगों और तना छेदक एवं गंधी बग कीड़ों के लिए मध्यम प्रतिरोधी है व इसकी उत्पादन क्षमता 40-45 क्विंटल प्रति हेक्टेयर है।

बिरसा विकास धान 203


लगभग 115-125 दिनों में परिपक्व होती है व इसकी उत्पादन क्षमता 40-45 क्विंटल प्रति हेक्टेयर है। आइआर 64 तथा कलिंगा - 3 के संकरण द्वारा विकसित इस किस्म के चावल लंबे होते हैं तथा वर्षा खेती के लिए पूरे झारखंड के लिए उपयुक्त है। यह झुलसा, भूरी चित्ती रोग, स्पॉट रोग तथा तना छेदक एवं गंधी बग कीटों के लिए मध्यम प्रतिरोधी है।

बिरसा विकास धान 111


झारखंड की टांड़ जमीन से सीधी बोआई के लिए उपयुक्त है तथा केवल 85-95 दिनों में पक कर तैयार हो जाती है। इसके दाने लंबे होते हैं तथा इसकी उपज क्षमता 20 से 25 क्विंटल प्रति हेक्टेयर है। यह किस्म झारखंड की भौगोलिक स्थिति को देखते हुए काफी उपयुक्त है। इससे बहुत सारी अनुपयोगी भूमि पर भी किसान धान की खेती के लिए प्रेरित होंगे, जिसका लाभ राज्य की कृषि उपज बढ़ने के रूप में मिलेगा।

ललाट


धान की किस्म ललाट का दाना लंबा होता है तथा उपज क्षमता 40-45 क्विंटल/हेक्टेयर है। इसका विकास मूलत: ओड़िशा कृषि विश्व विद्यालय द्वारा किया गया और यह पूरे झारखंड के लिए उपयोगी है।

बिरसा सफेद सोयाबीन 2


किस्म करीब 105-107 दिनों में तैयार होती है तथा उपज क्षमता 25 क्विंटल प्रति हेक्टेयर है। इसमें प्रोटीन की मात्रा 40 प्रतिशत तथा तेल की मात्रा 17 प्रतिशत होती है।

बिरसा गेहूं तीन


करीब 110-115 दिनों में तैयार होती है व उपज क्षमता 25-40 क्विंटल प्रति हेक्टेयर है। वर्षा आधारित और अल्प सिंचित अवस्था के लिए उपयोगी किस्म गेरूई और लीफ ब्लाइट रोगों के प्रति अवरोधी है।

बिरसा मूंगफली चार


कन्फेक्शनरी और निर्यात के लिए उपयुक्त बड़े दाने वाली बिरसा मूंगफली चार किस्म की उत्पादन क्षमता 20-22 क्विंटल प्रति हेक्टेयर है तथा यह 115-120 दिनों में परिपक्व होती है। पूर्व में विकसित मूंगफली प्रभेदों की तुलना में इसमें सबसे अधिक तेल की मात्रा (51 प्रतिशत) है तथा यह टिक्का बीमारी के प्रति अवरोधी है।

गन्ना की किस्म बीओ 147


यह एक वर्ष में पक कर तैयार होती है। इसके पौधे की ऊंचाई दो से तीन मीटर होती है। इसमें किसी प्रकार की बीमारी नहीं लगती व उत्पादन क्षमता 700-800 क्विंटल प्रति हेक्टेयर होती है। इसमें सूक्रोज की मात्रा 16 प्रतिशत पायी जाती है व यह टिक्का बीमारी के प्रति अवरोधी है। यह गन्ना के रेड रॉट रोग के लिए अवरोधी है।

बिरसा चना तीन


यह करीब 118-120 दिन में परिपक्व होती है व उपज क्षमता 10-20 क्विंटल/हेक्टेयर है। यह उकठा रोग और सूखा के प्रति अवरोधी है तथा इसमें प्रोटीन की मात्रा 20-21 प्रतिशत है।

मौसम सामान्य रहने की है उम्मीद!


खरीफ की खेती मौसम पर निर्भर करती है। अच्छी और समय पर बारिश होने से फसल अच्छी होती है। नहीं तो किसानों को नुकसान झेलना होता है। हालांकि भारतीय मौसम विभाग ने खरीफ के दौरान बारिश व मौसम की स्थिति को लेकर अबतक अपनी रिपोर्ट या पूर्वानुमान जारी नहीं किया है। बीएयू के एक मौसम विज्ञानी के अनुसार, ऐसे में यह कहना मुश्किल है कि मौसम कैसा रहेगा और खरीफ की खेती कैसी होगी। लेकिन व्यक्तिगत अनुभवों के आधार पर उनका अनुमान है कि इस बार बारिश ठीक -ठाक होगी और खरीफ की खेती अच्छी होगी।

उनके अनुसार, खरीफ की खेती तीन चीजों पर निर्भर करेगी


समय पर मानसून आना, हर जगह बारिश का सामान्य वितरण व खरीफ फसल की खेती के हर महीने में जरूरत के अनुसार बारिश। अगर ये तीनों स्थितियों अनुकूल रहीं तो मानसून 10 से 20 प्रतिशत कम भी हो तो खरीफ की खेती अच्छी होगी। हालांकि उनका कहना है कि मौसम के बारे में कोई भी पूर्वानुमान तुक्केबाजी ही होगी।

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