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पेड़ कटे, तो मांगें वन विभाग से हिसाब

Source: 
पंचायतनामा डॉट कॉम

स्वस्थ पर्यावरण आपका अधिकार है। सरकार हो या आम आदमी, किसी को इस अधिकार को छीनने का हक नहीं है। इस मामले में हर नागरिक का अधिकार एक बराबर है। सब का कर्तव्य भी है कि वह पर्यावरण की हिफाजत करे। अगर इसमें कहीं अतिक्रमण हो रहा है, तो एक सजग नागरिक की हैसियत से आप उसे रोकने की पहल कर सकते हैं। अगर सरकार का कोई विभाग ही इसको ऐसा कर रहा है, तो भी आप चुप न रहें और उससे इस पर सवाल पूछें। चाहे पेड़ कट रहे हों या नदियों का अतिक्रमण को रहा हो या फिर सार्वजनिक जलस्रोत का। आप फौरन कलम उठायें और संबंधित विभाग के अधिकारी से उसका हिसाब मांगें। इसके लिए सूचना का अधिकार बड़ा हथियार आपको मिला हुआ है। आप इस हथियार का इस्तेमाल करें और सरकार के संबंधित विभाग से सूचना मांगें। हर विभाग में जन सूचना पदाधिकारी हैं। आप दस रुपये के सूचना शुल्क के साथ अपना सूचना का अनुरोध-पत्र उन्हें हाथों-हाथ सौंप सकते हैं या फिर निबंधित डाक से भेज सकते हैं। देश भर में पर्यावरण, जंगल, नदी, पहाड़ आदि बचाने के लिए सामाजिक कार्यकर्ता सूचनाधिकार का इस्तेमाल कर रहे हैं। सूचना मांगने पर अगर 30 दिनों में जवाब नहीं मिले या आधी-अधूरी सूचना मिले, तो प्रथम और फिर द्वितीय अपील भी कर सकते हैं। हम इन्हीं विषयों पर बात कर रहे हैं।

बिहार हो या झारखंड, पेड़ों की कटाई बड़े पैमाने पर जारी है। निजी और सार्वजनिक ही नहीं, वन भूमि पर भी वृक्षों को अंधाधुंध काटा जा रहा है। इसका सीधा असर पर्यावरण पर पड़ रहा है। बिहार में केवल 7.1% (6,767.14 वर्ग किमी) जंगल बचे हैं। झारखंड में 29.61% वनभूमि है। वन संवर्धन के तमाम प्रयास और खर्च के बाद भी वन घट रहे हैं। यह स्थिति गंभीर है। हाल के वर्षों में विकास के लिए लाखों पेड़ काटे गये हैं। पेड़ अब भी कट रहे हैं। कानूनी भाषा में कहा जाता है कि पर्यावरण मंत्रालय भारत सरकार एवं राज्य प्रदूषण नियंत्रण संस्थान से पर्यावरण स्वच्छता प्रमाण-पत्र प्राप्त कर लिया गया है, लेकिन आपके स्वस्थ पर्यावरण के अधिकार की गारंटी इसमें नहीं है। अगर पेड़ कट रहे हैं, तो उस अनुपात में नये पेड़ लगने भी चाहिए। निजी जमीन पर लगे पेड़ की कटाई के लिए भी अनुमति जरूरी है, लेकिन ऐसा हो नहीं रहा है। इसलिए एक-एक पेड़ की हिफाजत के लिए लोगों को आगे आना चाहिए। जहां भी पेड़ कटे, वहां देखें कि यह कितना वैध है। जब भी पेड़ों पर कुल्हाड़ी उठे, आप कलम उठाएं और वन प्रमंडल पदाधिकारी से इस बाबत सूचना मांगें। आप यह भी सूचना मांगें कि जितने पेड़ हाल के वर्षों में काटे गए हैं उसका डाटा दें।

आप राज्य मुख्यालय से भी सूचना मांग सकते हैं :


जन सूचना पदाधिकारी, वन एवं पर्यावरण विभाग, बिहार, पटना

नदियों का रोकें अतिक्रमण


राज्य में कई नदियों का अतिक्रमण कर लिया गया है। नदियों में खुलेआम कूड़ा और निर्माण कार्य के अवशेष फेंके जा रहे हैं। कई छोटी कंपनियों, धान मिलों और पत्थर खदानों के अवशेष, राख और चूर्ण नदियों में बहाये जा रहे हैं। इस कारण कई नदियों की प्रवाह रूक गया है। यह सीधे तौर पर हमारे पर्यावरण को प्रभावित करता है। किसी भी व्यक्ति या कंपनी को नदियों में कचरा या गंदगी बहाने का अधिकार नहीं है। आप कहीं भी ऐसा होता देखें, तो उसे रोकने की पहल करें। अगर नदी वन क्षेत्र में है, तो वन एवं पर्यावरण विभाग से और अगर यदि वन क्षेत्र से बाहर है, तो आप अंचल अधिकारी से इस संबंध में सूचना मांगें। उनसे उस नदी में कचरा बहाने या फेंकने को रोकने के लिए की गयी कार्रवाई के बारे में सूचना मांगें। आप यह भी कर सकते हैं कि ऐसे मामले की व्यक्तिगत या सामूहिक रूप से लिखित शिकायत कर कार्रवाई की मांग करें। कार्रवाई नहीं होती है, तो कुछ दिन इंतजार करने के बाद सूचना का अधिकार अधिनियम के तहत उस आवेदन पर की गयी कार्रवाई की जानकारी मांगें। चूंकि मामला पर्यावरण से जुड़ा है। इसलिए आप सीधा पर्यावरण विभाग से भी सूचना मांग सकते हैं। सभी जिलों में पर्यावरण संरक्षण समिति है। इसके अध्यक्ष जिले के उपायुक्त होते हैं। आप समिति से भी इसकी सूचना मांग सकते हैं। इसके लिए उपायुक्त कार्यालय में भी सूचना का अनुरोध-पत्र दे सकते हैं।

कहां गये तालाब, बताये विभाग


बड़ी संख्या में ऐसे तालाब गायब हो गये हैं, जो सार्वजनिक उपयोग के लिए थे। ऐसा गांवों में भी हुआ है और शहरों में भी। यह सिलसिला अब भी जारी है। ये तालाब मत्स्य विभाग, कृषि विभाग, अंचल कार्यालय, वन विभाग और नगर निगम या नगर पर्षद के थे। इनका उपयोग मत्स्य पालन, सिंचाई और नहाने-धोने के लिए होता था। इन तालाबों के गायब होने में सरकारी अधिकारियों और कर्मचारियों की भी भूमिका रही है। तालाब की जगह मैदान बना दिये गये हैं और उन पर मकान बन गये हैं। ऐसी जमीन की खरीद-बिक्री पर सरकारी मुहर तक लगती है और जमीन का म्यूटेशन तक हो रहा है। मकान के नक्शे पास हो रहे हैं। यह बेहद गंभीर विषय है। अगर पूरे मामले की परतों को हटाया जाये, तो छोटे-बड़े कई अधिकारी-कर्मचारी कानून के लपेटे में आयेंगे। सबसे गंभीर बात यह है कि ऐसे तालाबों के समाप्त होने का सीधा असर जलस्तर और पर्यावरण पर पड़ा है। यह आपके अधिकार का अतिक्रमण है। आप सूचनाधिकार के जरिये इस तरह के मामलों को उजागर करें। पहले पता करें कि तालाब का स्वामी कौन सरकारी विभाग है। फिर उस विभाग से ऐसे तालाब के बारे में सूचना मांगें। अगर तालाब को भर कर उस पर मकान बनाये गये हैं, तो अंचल कार्यालय से उस जमीन के म्यूटेशन से संबंधित कागजात की मांग करें। उनमें मिली गड़बड़ी से बड़े अधिकारियों को अवगत करायें और कार्रवाई के लिए पहल करें। आपकी इन कोशिशों से अगर तालाबों का अस्तित्व बच जाता है, तो पर्यावरण संरक्षण में आप बड़ी भूमिका निभा सकेंगे।

पहाड़ की चोरी रोकें


राजमहल की पहाड़ी सहित झारखंड-बिहार के कई पहाड़ों की दिन-रात चोरी हो रही है। यह चोरी संगठित रूप से हो रही है। पत्थर उत्खनन के नाम पर पहाड़ों को बारूद से तोड़ा जा रहा है और उसके पत्थरों को क्रशर मशीनों में पीसा जा रहा है। यह काम वन भूमि पर भी हो रहा है। इसमें छोटे और बड़े स्तर के अधिकारियों व कर्मचारियों की भी मिलीभगत है।

खनन विभाग, वन व पर्यावरण विभाग और स्थानीय प्रशासन पहाड़ों की चोरी को देख कर भी मौन है। स्थिति इतनी गंभीर है कि कोई अधिकारी या राजनीतिक दल इस विषय में कुछ बोलने को तैयार नहीं है, जबकि पर्यावरण पर सबसे ज्यादा कुप्रभाव पहाड़ों के टूटने का पड़ा है। सोचिए, हम पेड़ लगा सकते हैं, लेकिन लगा नहीं रहे हैं। हम पहाड़ उगा नहीं सकते, लेकिन उसे या तो तोड़ रहे हैं या फिर टूटता देख रहे हैं। आप सजग नागरिक होने की जिम्मेवारी को पूरा करने के लिए इस मुद्दे को उठा सकते हैं।

आप वन एवं पर्यावरण विभाग, खनन विभाग और स्थानीय प्रशासन से पहाड़ों को तोड़ने की बाबत सूचना मांग सकते हैं। आपकी यह पहल बड़े परिणाम ला सकती है।

safeda

Safede : kya safeda retili jamin me tyar ho skta h sir ji

Hota skta h to kis time lagta h

Mujko 1.25 kile me lagane h or koi sakim wagra ho to btao

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