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मानसून की भविष्यवाणी और चुनौतियां

Author: 
अजित त्यागी, डी.आर. पटनायक
Source: 
योजना, जुलाई 2012
जून से सितंबर के दौरान ग्रीष्मकालीन मानसूनी वर्षा मुख्यतः दो बुनियादी तापीय स्रोतों से घनीभूत होती है – एशियाई भूमि पिंड का अत्यधिक गर्म होना और एशियाई पठार के ऊपर क्षोभमंडल के भीतर संघनित ताप। हिंद महासागर के दक्षिणी उप-उष्णकटिबंधीय क्षेत्र में संघनित आर्द्रता से संसुप्त ताप भूमध्य क्षेत्र से एशिया और अफ्रीका के ऊपर आकर बरस जाता है। अत्यधिक और संसुप्त, दोनों ही तापीय व्यवस्था का धरती और समुद्र के तापमान में योगदान होता है और दबाव में जो अंतर बनता है वही अंततः ग्रीष्मकालीन मानसूनी चक्रण को आगे बढ़ाता है। ग्रीष्मकालीन भारतीय मानसून ग्रीष्मकालीन एशियाई मानसून का ही एक भाग है और इस प्रकार यह उष्णकटिबंधीय चक्रण का एक अनूठा लक्षण है। दक्षिण एशिया का यह क्षेत्र अनूठी भौगोलिक और विलक्षण प्राकृतिक विशिष्टताओं से परिपूर्ण है। यह क्षेत्र भूमध्यरेखा के पड़ोस से लेकर उत्तरी गोलार्द्ध की ऊंचाइयों तक फैला हुआ एक विस्तृत महाद्वीपीय क्षेत्र है। दक्षिणी छोर में ये भूमध्यरेखा के देशांतर में समुद्रों से घिरा हुआ है। इस भौगोलिक संरचना में भूमि और समुद्र में अलग-अलग स्थानों पर तापमान की भिन्न स्थिति के फलस्वरूप उष्मा के सघन संवहन केंद्र सहज ही बन जाते हैं। इसका परिणाम यह होता है कि वर्ष के किसी एक भाग में वर्षामान केंद्रीभूत हो जाती है। वर्षा की यह विलक्षण स्थिति मौसम के कारण हवाओं के प्रवाह में मचने वाली उथल-पुथल का नतीजा होती है। मानसूनी क्षेत्र में रहने वाले करोड़ों लोगों (विशेषकर भारतीय उपमहाद्वीप में) के लिए मानसूनी प्रणाली के कारण वर्षा की मात्रा में आया मौसमी बदलाव, वायु के प्रवाह में बदलाव से अधिक महत्वपूर्ण होता है। लोगों में यह आम धारणा है कि भारत में जीवन मानसून के इर्द-गिर्द घूमता है। मानसून के आने के पूर्व भारतीय मानसूनी क्षेत्र की विशेषता यह होती है कि गर्मी के प्रकोप में जकड़ा होता है। यह क्षेत्र मध्य पाकिस्तान और उससे सटे हुए भारत के उत्तर-पश्चिमी भागों तक फैला होता है। भारत के दक्षिणी छोर (केरल का तटवर्ती क्षेत्र) में मई के अंत में अथवा जून के प्रारंभ में मानसून की वर्षा से मानसून के मौसम की शुरुआत होती है। भारत के अधिकांश भागों में जून से सितंबर के बीच ही अधिकांश वर्षा होती है। ग्रीष्म की मानसूनी ऋतु में अधिकतम वर्षा (लगभग 80 प्रतिशत) होती है। दीर्घकालिक औसत लगभग 89 सेंमी का होता है, जिसमें 10 प्रतिशत की घट-बढ़ हो सकती है। भारत में ग्रीष्मकालीन मानसूनी मौसम में वर्षा की मात्रा में काफी परिवर्तनशीलता दिखाई देती है। प्रायद्वीप के पश्चिमी तट और पूर्वोत्तर क्षेत्र में भारी वर्षा होती है और यहां वर्षा की मात्रा में अधिक अंतर नहीं आता। परंतु देश के उत्तर पश्चिमी भागों में सबसे कम वर्षा होती है और वहां परिवर्तनशीलता भी अधिक होती है। कभी अधिक वर्षा होती है, तो कभी कम।

अखिल भारतीय ग्रीष्मकालीन मानसूनी वर्षा (एआईएसएमआर) के मानचित्रों में औसत और गुणांक में परिवर्तनशीलता को दर्शाया गया है (देखें चित्र 1क और 1ख)।

जून से सितंबर के दौरान ग्रीष्मकालीन मानसूनी वर्षा मुख्यतः दो बुनियादी तापीय स्रोतों से घनीभूत होती है – एशियाई भूमि पिंड का अत्यधिक गर्म होना और एशियाई पठार के ऊपर क्षोभमंडल (धरातल की सबसे नजदीकी वायुमंडलीय परत) के भीतर संघनित ताप। हिंद महासागर के दक्षिणी उप-उष्णकटिबंधीय क्षेत्र में संघनित आर्द्रता से संसुप्त ताप भूमध्य क्षेत्र से एशिया और अफ्रीका के ऊपर आकर बरस जाता है। अत्यधिक और संसुप्त, दोनों ही तापीय व्यवस्था का धरती और समुद्र के तापमान में योगदान होता है और दबाव में जो अंतर बनता है वही अंततः ग्रीष्मकालीन मानसूनी चक्रण को आगे बढ़ाता है। यद्यपि भारत में मानसून के नियमित अभिमन का भरोसा बना रहता है। परंतु विभिन्न कालखंडों के दौरान इसमें काफी उतार-चढ़ाव अर्थात परिवर्तनशीलता देखने को मिलती है। वार्षिक रूप से और मौसम के दौरान मानसूनी वर्षा की मात्रा में परिवर्तन बहुत महत्वपूर्ण होता है।

मानसून, कृषि एवं अर्थव्यवस्था


भारतीय ग्रीष्मकालीन मानसूनी वर्षामान (आईएसएमआर) में जो भारी वार्षिक अंतर होता है, वह इसकी विशिष्टता है। आईएसएमआर की अनियत प्रकृति से कृषि, जल-संसाधन, परिवहन, स्वास्थ्य, विद्युत और लोगों की आजीविका पर प्रभाव पड़ता है। मानसूनी वर्षा में वार्षिक रूप से जो बदलाव देखने को मिलता है, उसके दो चरण उदाहरण हैं- सूखा (कम वर्षा) और बाढ़ (अत्यधिक वर्षा)। 1875 से 2011 के बीच जून से सितंबर के दौरान मानसूनी मौसम की वर्षा में वार्षिक रूप से जो परिवर्तन होता रहा है, वह चित्र-2 में दर्शाया गया है।

जैसा कि चित्र-2 में दर्शाया गया है, 1875 – 2011 की अवधि में ऐसे अनेक वर्ष हैं जब कम अथवा अधिक वर्षा हुई है। अल्प अथवा अधिक वर्षा वाले वर्षों की पहचान मानक परिवर्तन में +1 का वर्षामान परिवर्तन (= 10 प्रतिशत) पर आधारित होता है। दक्षिणी पश्चिमी मानसून फलस्वरूप अधिकांश ग्रामीण जनसंख्या की आजीविका निर्भर होती है अर्थात उसकी जकड़ में है। भारत के कृषि (फसली) क्षेत्र का काफी बड़ा रकबा (लगभग 68 प्रतिशत) कम और मध्यम वर्षा वाले क्षेत्रों में पड़ता है। यदि दक्षिण पश्चिमी मानसून की वर्षा ठीक से नहीं होती तो इसका असर काफी व्यापक क्षेत्र पर पड़ता है। भारत के प्रायद्वीपीय, मध्य और उत्तर पश्चिमी क्षेत्र के अधिकांश भाग समय-समय पर पड़ने वाले सूखे की संभावना से अत्यधिक त्रस्त रहते हैं। इन क्षेत्रों में 1,000 सेंमी से कम वर्षा होती है। जो सूखा 1965-67 और 1979-80 के दौरान आया वह अपेक्षाकृत अधिक वर्षा वाले क्षेत्रों में पड़ा था, जबकि 1972, 1987, 2002, 2004 और 2009 में जो सूखा पड़ा था वह कम वर्षा वाले क्षेत्रों में पड़ा था।

सूखे से अनेक समस्याएं खड़ी होती हैं। देश में उपलब्ध सिंचाई सुविधाएं सीमित हैं और इसलिए जब सूखा पड़ता है तो उससे आंशिक रूप से अथवा पूर्ण रूप से फसलें नष्ट हो जाती हैं। यदि यह सूखा लगातार वर्षों में आता है, तो यह एक राष्ट्रीय विपदा बन जाती है और इससे देश की अर्थव्यवस्था पर काफी दबाव बढ़ जाता है। मौसम विज्ञानी सूखा उस समय होता है जब किसी क्षेत्र में होने वाली वास्तविक वर्षा उस क्षेत्र की जलवायु संबंधी औसत वर्षा के काफी कम होती है। सूखे का देश के आर्थिक, सामाजिक और पर्यावरणीय ताने-बाने पर प्रत्यक्ष और परोक्ष, दोनों प्रकार से प्रभाव पड़ता है। मानसून को असफलता का प्रभाव जिस पर सबसे अधिक दिखाई पड़ता है वह है – कृषि क्षेत्र। इसका प्रभाव उद्योग सहित अन्य क्षेत्रों को भी अपने आगोश में ले लेता है। हाल के वर्षों में सूखे के सबसे बुरे वर्ष 1987 2002 और 2009 के रहे हैं। वर्ष 2002 में जो सूखा पड़ा उससे देश के खाद्यान्न उत्पादन में 13 प्रतिशत की गिरावट आई थी। वर्ष 2009 में पूरे भारत में मौसमी वर्षा में 22 प्रतिशत की कमी दर्ज की गई थी और साधारण सूखे से प्रभावित क्षेत्र (जब वर्षा सामान्य से 26-50 प्रतिशत कम होती है) 59.2 प्रतिशत था। सूखे की इस स्थिति के कारण जीडीपी में 0.5 प्रतिशत की कमी आई थी।

मानसून की भविष्यवाणी


भारतीय उपमहाद्वीप मानसून एक ऐसी मौसमी प्रणाली का हिस्सा है जो जनसंख्या के एक बहुत बड़े भाग को प्रभावित करता है और इसलिए इसकी भविष्यवाणी करना एक चुनौतीपूर्ण समस्या है। कृषि कार्यों, बाढ़ का पूर्वानुमान, जल संसाधन प्रबंधन, खेल, परिवहन आदि जैसी मौसम संवेदी विभिन्न गतिविधियों के लिए अल्पावधि, मध्यम, विस्तृत अवधि और दीर्घकालिक भविष्यवाणियां बहुत आवश्यक हैं। समय के विभिन्न पैमाने पर मानसूनी वर्षा में कमोबेश, मौसम के दौरान विभिन्न जलवायु प्रणालियों की हलचलों पर निर्भर करती है। समय के पैमाने के आधार पर मानसून की भविष्यवाणी को निम्नलिखित चार श्रेणियों में विभाजित किया जा सकता हैः

1. अल्प अवधि – 3 दिनों तक
2. मध्यम अवधि – उष्ण कटिबंधीय क्षेत्र में (लगभग 4 से 7 दिनों तक)
3. विस्तारित अवधि अथवा मौसम के दौरान (8 दिन से 1 माह तक)
4. दीर्घकालिक अथवा मौसमी (एक मौसम)

अखिल भारतीय ग्रीष्मकालीन मानसूनी वर्षा का मध्यमान

अल्प अवधि


भारत में दक्षिणी पश्चिमी मानसून के दौरान मानसूनी हवाओं और सारपरक प्रणालियों के कारण होने वाली भारी वर्षा एक आम बात है। दक्षिणी पश्चिमी मानसून के दौरान यह भविष्यवाणी करना कि किस क्षेत्र में भारी वर्षा होगी, इस समयावधि में की भविष्यवाणियों से जुड़ा एक चुनौतीपूर्ण कार्य है। इस समयावधि में मानसून की भविष्यवाणी के लिए सारपरक चार्ट, उपग्रह-चित्र, रडार की सुचनाएं आदि काफी काम आती है। सारपरक पद्धतियों के अतिरिक्त अंकीय पारदर्श का प्रयोग भी अल्पावधि की मौसम भविष्यवाणी के लिए किया जाता है। वर्तमान में, अल्पावधि में मौसम भविष्यवाणी सेवाएं पारंपरिक सारपरक पद्धतियों पर आधारित होती है। इसमें विभिन्न केंद्रों से प्राप्त एनडब्ल्यूपी उत्पादों का भी सहारा लिया जाता है। मानसून की मौसम प्रणालियों और उनसे जुड़ी वर्षा की मात्रा के बारे में भविष्यवाणी करना एक जटिल विषय है। इसमें स्थलाकृतियों, सारपरक मापन प्राणालियों की सही-सही उत्पत्ति और हलचल तथा मेसो-स्केल कन्वेविटव सिस्टम्स (धरती की सतह से 50 से 80 किमी. ऊपर के वायुमंडल में गैसों की संवहन प्रणाली) की आवश्यकता होती है। विशेषकर समुद्र के ऊपर के ऊपर वाले भाग में वायुमंडल की स्थिति की जानकारी महत्वपूर्ण होती है। पूर्व में मुख्यतः सारपरक पद्धतियों के आधार पर ही उष्णकटिबंधीय मौसम की भविष्यवाणियां की जाती थी। हाल के दिनों में, एनडब्ल्यूपी पद्धतियां अधिक कार्यकुशल हो गई हैं और अब उष्णकटिबंधीय मौसम की भविष्यवाणियों में इनकी भूमिका बढ़ गई है। अंकीय मौसम भविष्यवाणी का जिक्र 1904 के विल्हम ब्यर्कनेस (नार्वे के भौतिकशास्त्री) के शोध कार्यों में मिलता है। आधुनिक मौसम विज्ञान के जनक कहे जाने वाले विल्हम ब्यर्कनेस ने बताया था कि गैर-रेखीय आंशिक विभेदी समीकरणों को हल करने से मौसम की भवष्यवाणी करना संभव है। 1975 के बाद एनडब्ल्यूपी के क्षेत्र में उल्लेखनीय विकास हुआ है। एनड्ब्ल्यूपी पद्धति से अल्पावधि (1 से 3 दिन) की भविष्यवाणी से लेकर युग्म पद्धति के उपयोग से पूरे मौसम की भविष्यवाणी की जाने लगी है। भारत में अल्पावधिक के एनडब्ल्यूपी पैमाने पर 1960 के दशक में संगठित रूप से काम शुरू हुआ। अल्पावधि के मौसम की भविष्यवाणी के लिए मेसो-स्केल पद्धति की शुरुआत भी भारत में 1990 के दशक में हुई थी अल्पावधि की मौसम संबंधी भविष्यवाणी के लिए एनडब्ल्यूपी पद्धति के विकास में भारत के अनेक वैज्ञानिकों ने योगदान किया है।

मध्यम अवधि


तीन दिनों से आगे और 10 दिनों तक की मौसम भविष्यवाणी को मध्यम अवधि मौसम पूर्वानुमान (एमआरएफ) कहा जाता है। यूरोपीय मध्यम अवधि मौसम पूर्वानुमान केंद्र (ईसीएमडब्ल्यूएफ) के अनुसार ‘मध्यम अवधि’ को इस प्रकार परिभाषित किया गया है। कुछ दिनों से आगे वह समयावधि, जिसमें प्रारंभिक स्थितियां अभी भी महत्वपूर्ण होती हैं। इस प्रकार, उष्णकटिबंधीय क्षेत्र में 4 से 7 दिनों की भविष्यवाणी को मध्यम अवधि कहा जा सकता है। मध्यम अवधि मौसम के पूर्वानुमान में मुख्य रूप से धरती के वायुमंडल के तापीय-जलीय-गतिशास्त्र (थर्मोहाइड्रो डायनामिक्स) पर आधारित अंकीय पद्धतियों का उपयोग किया जाता है। इसे वायुमंडल के सामान्य परिसंचरण पद्धति का अध्ययन भी कहा जाता है। उन्नत देशों में उपर्युक्त पैमानों पर मौसम के पूर्वानुमान की गतिकीय पद्धति में 1950 के दशक के बाद जबरदस्त विकास हुआ है। यह प्रगति वायुमंडल के दबाव के अध्ययन की विभिन्न पद्धतियों में आए तकनीकी विकास के फलस्वरूप संभव हो सका है। यूरोप, उत्तरी अमरीका, जापान और ऑस्ट्रेलिया जैसे उन्नत देशों के अनेक शोधकर्ताओं ने मौसम संबंधी प्रतिकृतियों के मौलिक अनुसंधान में महत्वपूर्ण योगदान किया है। भारत में 1988 में मध्यम अवधि मौसम पूर्वानुमान केंद्र (एनसीएमआरडब्ल्यूएफ) की स्थापना के बाद से मध्यम अवधि के मौसम की भविष्यवाणी को आवश्यक बढ़ावा मिला है। एनसीएमआरडब्ल्यूएफ ने 1992 से ग्लोबल एजीसीएम का इस्तेमाल करते हुए पूर्वानुमान के विधियों की रचना शुरू की है। मानसून के मौसम के दौरान सात दिनों के लिए सही-सही मध्यमावधि भविष्यवाणी करना काफी महत्वपूर्ण होता है, क्योंकि इससे मानसून के आगमन और इसकी तमाम गतिविधियों, मात्रा आदि के बारे में बेहतर मार्गदर्शन मिल सकता है। यद्यपि मध्यम अवधि की मौसमी भविष्यवाणी के लिए एक ही एजीसीएम का उपयोग किया जा सकता है, तथापि पूर्वानुमान की गुणवत्ता में सुधार के लिए सांख्यिकीय व्याख्या, एनसेंबुल पूर्वानुमान, बहु-विधि एन्सेंबल आदि जैसी अन्य अनेक प्रणालियों का उपयोग लाभप्रद हो सकता है। मौसम के पूर्वानुमान में त्रुटियों की संभावना न्यूनतम रखने के लिए तमाम वैज्ञानिक पद्धतियों का अनुसरण उपयोगी होता है।

विस्तारित अवधि


भारत में मानसूनी वर्षा में दिन-प्रतिदिन जो परिवर्तन होता है उसकी विशेषता यह है कि उत्तर के मैदानी इलाकों में जब मानसूनी विक्षोभ हावी होता है तब मध्य भारत में भारी वर्षा होती है और जब हिमालयीन क्षेत्र में विक्षोभ घनीभूत होता है तो मध्य भारत में वर्षा नहीं होती अथवा उसमें अंतराल आ जाता है। कृषि फसलों की वृद्धि के लिए निर्णायक समय में वर्षा में लंबे अंतराल से पैदावार में कमी आ जाती है। देश के कृषक समुदाय के लिए दक्षिण पश्चिमी मानसून की वर्षा विस्तारित समय की भविष्यवाणी काफी महत्वपूर्ण होती है। इस मध्यवर्ती अवधि के लिए वर्षा की भविष्यवाणी पौधरोपण और फसल कटाई के लिए निर्णायक होती है। इसलिए वर्षा में अंतराल के बारे में दो-तीन सप्ताह पूर्व की गई भविष्यवाणी कृषि कार्यक्रम तैयार करने (बुवाई, कटाई आदि) और जल प्रबंधन के लिए बहुत महत्व रखती है। समय पर जानकारी मिल जाने से किसान अपने कार्यक्रमों में आवश्यक फेर-बदल कर सकते हैं। मानसूनी वर्षा की सक्रियता/अंतराल की अवधि और आवृत्ति पूरे मौसम के मध्यमान में योगदान करती है और वार्षिक रूप से वर्षा की मात्रा में उतार-चढ़ाव को इंगित करती है। वर्ष 2009 के मानसूनी मौसम में पूरे भारत में दैनिक वर्षा की स्थिति (देखें चित्र-3) से पता चलता है कि पूरै मौसम के दौरान सूखे के तीन लंबे दौर आए थे – पहला जून में, दूसरा जुलाई के अंतिम सप्ताह से लेकर अगस्त के पूर्वाद्ध तक और तीसरा सितंबर के उत्तरार्द्ध में (देखें चित्र-3)। फलस्वरूप, 2009 में मौसमी मानसूनी वर्षा में करीब 22 प्रतिशत की कमी पाई गई। मौसम के दौरान मानसून के विचरण में जो प्रमुख कारक होते हैं, उनमें से एक है – मैडेन जूलियन ऑस्सिलेशन (एमजेओ), जो उष्णकटिबंधीय क्षेत्र में वायुमंडल-सागर युग्म की एक महत्वपूर्ण परिघटना होती है। भारत के ग्रीष्मकालीन मानसून पर इसका जबरदस्त प्रभाव पड़ता है। एमजेओ उष्णकटिबंधीय जलावायु में परिवर्तनशीलता की एक अग्रणी विधि है और यह आमतौर पर 30-60 दिनों की अवधि के लिए होती है।

हाल के दिनों में भारत के विभिन्न अनुसंधान समूहों (आईआईटीएम और अन्य समूह) की ओर से विस्तारित समयावधि के लिए सांख्यिकीय एवं गतिकीय विधियों के आधार पर मानसून की भविष्यवाणी करने के कुछ प्रयास किए गए हैं। सांख्यकीय विधि में उन्होंने 20-90 दिनों के विश्लेषण के अनुभव सिद्ध सही कोणों वाले कार्यकलापों (ईओएफ) के प्रधान घटकों का उपयोग किया है। निर्गामी दीर्घतरंग विकिरण (ओएलआर) की विसंगतियों को ध्यान में रखते हुए करीब 4 पंचकों की भविष्यवाणी की जाती है। यह संवहन गतिविधि का प्रतिनिधित्व करती है। एक पंचक से चार पंचक की अग्रणी समयावधि की ओएलआर विसंगतियों की सदृश्यता पर आधारित और भी विधियां विकसित की गई हैं। इसी प्रकार, मानसूनी मौसम के दरम्यान वर्षा की हलचल की भविष्यवाणी के लिए कुछ और अनुभव/प्रयोग-सिद्ध आदर्श विकसित किए गए हैं। इसे सेल्फ आर्गनाइजिंग मैप (एसओएम) तकनीक कहा जाता है। वर्षा के एसओएम वर्गीकरण में वायु, भू-गर्भित ऊंचाई, विशिष्ट आर्द्रता और मध्यमान समुद्र स्तर दबाव का प्रयोग किया जाता है। इस विधि का आधार यह है कि सभी संकेतकों के गैर-रेखीय संयोजन मौसम के दरम्यान मानसूनी वर्षा के परिवर्तन की जटिलता का प्रतिनिधित्व करते हैं। इस प्रकार मौजूदा वास्तविक समय विधि के आंकड़ों के गतिकीय संकेतकों का प्रयोग कर वर्षा की विसंगतियों की भविष्यवाणी की जा सकती है।

मानसूनइस समयावधि हेतु मानसून की भविष्यवाणी के लिए अन्य विधियां प्रयोग की जाती हैं वे हैं – वायुमंडलीय जीसीएम और युग्म जीसीएम। यद्यपि पिछले कुछ वर्षों में भौतिक विज्ञान और गतिविज्ञान के आदर्श में सुधार के कारण गतिकीय पारदर्शी प्रणाली में उल्लेखनीय सुधार हुआ है, परंतु आज के एजीसीएम ग्रीष्मकालीन भारतीय मानसून में मध्यमान और अंतवार्षिक परिवर्तनशीलता का प्रतिरूप सफलतापूर्वक तैयार नहीं कर सकते। यह भी पाया गया है कि एजीसीएम, भारतीय मानसून की प्रतिकृति तैयार करने में कुशल नहीं है, जोकि समुद्री सतह के तापमान (एसएसटी) की समुचित जानकारी न मिल पाने के कारण हो सकता है। फिर भी, गतिकीय प्रणाली में यथासंभव उत्तम विधि से भविष्यवाणी के लिए विभिन्न प्रकार के सूत्रों का उपयोग किया जाता है, ताकि भविष्यवाणी में त्रुटियां कम से कम हों। इसलिए अब मानसून की मौसमी और अंतवार्षिक भविष्यवाणी के लिए बहु-प्रणाली इन्सेंबल/सुपर इन्सेंबल पर अधिक बल दिया जा रहा है।

दीर्घकालिक भविष्यवाणी (एलआरएफ) सांख्यिकीय मॉडल


इस समयावधि में मानसून की भविष्यवाणी मुख्यतः सांख्यिकीय और गतिकीय मॉडलों के जरिए की जाती है। भारतीय मौसम विभाग (आईएमडी) के प्रमुख रिपोर्टर सर एच.एफ. ब्लानफोर्ड को वर्षा की संभावना का अनुमान लगाने को कहा गया था। ब्लानफोर्ड ने हिमालयीन क्षेत्र में हिमपात के संकेतों का प्रयोग करते हुए 1882 से 1885 के बीच अस्थायी भविष्यवाणीयां की। जून से सितंबर तक की मौसमी मानसूनी वर्षा की भविष्यवाणियों की पहली नियमित श्रृंखला 4 जून 1886 को की गई। तब से मानसून की दीर्घकालिक भविष्यवाणी में अनेक संशोधन हुए हैं। बेहतर भविष्यवाणी के प्रयास सर गिल्बर्ट टी. वाकर के कार्यकाल (1904 –1924) के दौरान भी जारी रहे। भारतीय मौसम विभाग के महानिदेशक सर गिल्बर्ट वाकर ने वस्तुनिष्ठ तकनीक पर आधारित भविष्यवाणी करनी शुरू की। उन्होंने दीर्घकालिक भविष्यवाणियां तैयार करने के लिए सह-संबंध और प्रत्यावर्तन (रिग्रेशन) तकनीकों की शुरुआत की। वाकर यह बात भलीभांति जानते थे कि मौसमी भविष्यवाणी को वैज्ञानिक आधार तभी दिया जा सकता है जब वह सामान्य रूप से स्वीकार्य सिद्धांत पर आधारित हो। पूरे भारत में मानसूनी वर्षा की दीर्घकालिक भविष्यवाणी के लिए संभावित भविष्यवेत्ताओं की पहचान की अपने तलाश में वाकर ने वैश्विक दबाव पद्धतियों में व्यापक उतार – चढ़ाव वाले महत्वपूर्ण परिवर्तनों का पता लगाया जिसे ‘संदर्भ आस्सिलेशन’ (दक्षिणी दोलन) कहा जाता है। मनासून पर इसका भारी प्रभाव होता है।

1988 में, भारतीय मौसम विभाग ने 16 प्राचल शक्ति प्रत्यावर्तन और प्राचल मॉडल की शुरूआत की और देशभर में दक्षिण पश्चिमी मानसूनी वर्षा की भविष्यवाणियां करनी शुरू कीं। शक्ति प्रत्यावर्तन मॉडल के इस्तेमाल से परिमाणात्मक (संख्यात्मक) भविष्यवाणियां तैयार की गई। 2002 में भविष्यवाणी की असफलता के बाद आईएमडी ने 2003 में एक नई दो चरणीय पूर्वानुमान रणनीति शुरू की, जिसके अनुसार मौसम (जून से सितंबर) की पहले चरण की भविष्यवाणी का खुलासा अप्रैल में किया जाता है और उसमें नई जानकारी जून से जारी किया जाता है। ताजी भविष्यवाणी के साथ ही देश के एक जैसे बरसाती क्षेत्रों में मौसम की वर्षा की भविष्यवाणी और जुलाई में देशभर में होने वाली वर्षा की भविष्यवाणी जारी की जाती है। वर्ष 2007 में आईएमडी ने दक्षिण पश्चिमी मानसूनी मौसम में (जून से सितंबर) पूरे देश में वर्षा के बारे में एन्सेहबल तकनीक पर आधारित नई सांख्यिकीय पूर्वानुमान प्रणाली की शुरुआत की।

सांख्यिकीय मॉडल की समस्याएं और गतिकीय मॉडलों का प्रयोग


आईएमडी ने सांख्यिकीय भविष्यवाणी की जो विधि अपनाई, उसमें कुछ सफलता अवश्य मिली परंतु लंबी अवधि की भविष्यवाणी में कोई सुधार नहीं हो सका। इस विधि की अपनी सीमाएं क्योंकि इसमें यह भविष्यवाणी नहीं की जा सकती कि किस स्थान पर कितनी वर्षा होगी। सीमित आंकड़ों के प्रयोग और भविष्यवेत्ताओं के चयन से संबंधित कुछ मौलिक समस्याएं भी है। दूसरी ओर, गतिकीय भविष्यवाणी का पिछले वर्षों में अच्छा-खासा विकास हुआ है और वह इस स्थिति में है जहां युग्म जीसीएम का इस्तेमाल नियमित जलवायु पूर्वानुमान के लिए किया जाता है। वायुमंडलीय मॉडल की तुलना में युग्म मॉडल का मानसून का पूर्वानुमान कौशल बेहतर पाया गया है। ईएनएसओ (एल निनो सदर्न ऑस्सिलेशन) की प्रतिकृति तैयार करने के लिए तीव्र वातावरण और सुस्त समुद्र की सही-सही जुगलबंदी अनिवार्य है। विभिन्न वर्षों के दौरान मानसूनी वर्षा में उतार-चढ़ाव का यही प्रमुख कारक है।

भारतीय ग्रीष्मकालीन वर्षा

आईएमडी में मानसून पूर्वानुमान की वर्तमान स्थिति


आईएमडी को तात्कालिक से लेकर पूरे मौसम की भविष्यवणी करने का दायित्व सौंपा गया है। देश में मौसम और जलवायु की भविष्यवाणी करने की मौजूदा प्रणाली अल्प और मध्यम अवधि की पूर्वानुमान सेवाओं के लिए तो उपयुक्त है, परंतु विस्तृत समयावधि की भविष्यवाणी के बारे में कुछ कमियां हैं।

अल्प एवं मध्यम अवधि पूर्वानुमान


वर्ष 2009 में उच्च कार्यक्षमता वाली कंप्यूटिंग प्रणाली (एचबीपीएस) के शुरू होने के साथ ही एनसीईपी आधारित वैश्विक पूर्वानुमान प्रणाली (जीएफएस टी 382) आईएमडी, दिल्ली में काम करने लगी है। इसमें विश्वभर से प्राप्त आंकड़ों का अध्ययन किया जाता है। वैश्विक मॉडल, वर्तमान में, दिन में दो बार (00 यूटीसी और 12 यूटीसी) पर काम करता है और 7 दिनों के लिए पूर्वानुमान लगाता है और 7 दिनों के लिए पूर्वानुमान लगाता है। 2012 से आईएमडी ने उच्चतर रिजोल्यूशन वाले वैश्विक मॉडल (जीएफएस टी574; लगभग 25 किमी क्षैतिज रिज्योल्यूशन) का प्रयोग करना शुरू किया है। इसके अलावा, अल्पावधि के मौसम की भविष्यवाणी के लिए मैसो-स्केल पूर्वानुमान प्रणाली - (डब्ल्यूआरएफ) को रोज दिन में दो बार प्रचालित किया जाता है। इसे 3 डी –वीआर आंकड़ों के साथ मिलाकर 3 दिन के पूर्वानुमान के लिए 27 किमी, 9 किमी और 3 किमी क्षैतिज रिज्योल्यूशन पर प्रचालित किया जता है। इसके अतिरिक्त 10 अन्य क्षेत्रीय केंद्रों में अति रिज्योल्यूशन मेसो-स्केल मॉडल (डब्ल्यूआरएफ 3 किमी रिज्योल्यूशन पर) प्रचालित किए जाते हैं। इन मॉडलों की भविष्यवाणियां नियमित रूप से आईएमडी की वेबसाइट www.iamd.gov.in पर प्रदर्शित की जाती है।

अल्प और मध्यम अवधि की भविष्यवाणियां (उष्ण कटिबंधीय क्षेत्रों में 7 दिनों तक) वातावरण की प्रारंभिक अवस्था के लिए अति संवेदनशील होती है। इन्हीं से भविष्यवाणियों की शुरुआत होती है। बेहतर प्रारंभिक स्थिति से भविष्यवाणी में भी सुधार आता है। इसलिए इस अवधि में सफल भविष्यवाणी के लिए उच्चतर रिजोल्यूशन आंकड़ों को भी मिलाने की आवश्यकता होती है। आईएमडी में आधुनिकीकरण की जो प्रक्रिया चल रही है, उसमें इस विषय पर भी ध्यान दिया गया है। आंकड़ों के त्रुटिविहीन और निर्बाध प्रवाह के लिए आईएमडी के प्रेक्षण नेटवर्क का विस्तार और डिजिटलीकरण किया जा रहा है। आईएमडी में जारी आधुनिकीकरण कार्यक्रम से अच्छी गुणवत्ता की गहन प्रेक्षण-सूचनाएं (पारंपरिक और अपारंपरिक दोनों) तत्काल मिलने की आशा है। इसके लिए जो उपकरण प्रयोग किए जा रहे हैं उनमें प्रमुख हैं – डॉप्लर मौसम रडार (डीडब्लयूआर), उपग्रह इन्सैट-3 डी रैडियन्स), विंड प्रोफाइलर्स, जीपीएस सोंड (वायुमंडल की स्थिति के अध्ययन का यंत्र) मेसो-नेटवर्क (स्वाचालित मौसम केंद्र) विमान, नौकाएं आदि। उन्नत दूरसंचार प्रणाली के उपयोग से मौसम की भविष्यवाणी अब अधिक प्रभावी हो गई है।

कृषि क्षेत्र की आवश्यकताओं को देखते हुए आईएमडी ने कृषि संबंधित मौसम विज्ञानी परामर्शदात्री सेवा (ऐग्रो मिट्रोलॉजिकल एडवाइजरी सर्विस) का स्तर जलवायु क्षेत्र से बढ़ाकर जिला स्तर कर दिया है। आईएमडी ने एक बड़ा कदम उठाते हुए। 01 जून, 2008 से वर्षा की मात्रा, अधिकतम न्यूनतम तापमान, सापेक्षिक आर्द्रता, सतही वायु (आंधी) और बादलों की स्थिति के बारे में मौसम की जिलावार भविष्यवाणी जारी करना शुरू किया है। ये भविष्यवाणियां पांच दिन तक की अवधि के लिए की जाती हैं। ये भविष्यवाणियां विश्व के प्रमुख एनडब्ल्यूपी केंद्रों की अत्याधुनिक प्रणालियों का उपयोग करते हुए मल्टी मॉडल एन्सेंबल (एमएमई) के जरिए की जाती है। एमएमई का तरीका अपनाने से एनडब्ल्यूपी के काम की विश्वसनीयता और विशुद्धता में सुधार हुआ है। फिर भी काछ सीमाएं बनी हुई है विशेषकर बाढ़ लाने वाली वर्षा की तीव्रता की भविष्यवाणी के बारे में।

विस्तारित अवधि में मानसून की भविष्यवाणी


सांख्यिकीय पद्धति के जरिए विस्तारित समयावधि (7 दिनों से आगे एक माह तक) की भविष्यवाणी में समुद्र की भी भूमिका होती है, इसलिए एक युगल पद्धति की आवश्यकता होती है। इस समयावधि के लिए मौसम की भविष्यवाणी के लिए प्रादर्शों को इंट्रा सीजनल ऑस्सिलेशन (आईएसओ) के आंकड़ों की सही-सही प्रतिकृति तैयार करनी होती है। पिछले एक-दो वर्षों में यह बात सामने आई है कि वायु समुद्र के पारस्परिक संबंधों का कुछ संबंध ग्रीष्मकालीन आईएसओ से भी है और इस समयावधि की सही-सही भविष्यवाणी के लिए मॉडल विकास के चरण में है। चूंकि विस्तारित अवधि में सक्रिय अंतराल की भविष्यवाणी करने वाली आधुनिक गतिकीय प्रणाली अभी आईएमडी में शुरू नहीं हुई है। वह इस अवधि की सही समय पर भविष्यवाणी के लिए अमरीका के नेशनल सेंटर फॉर एनवायरनमेंटल प्रेडिक्शन (एनसीईपी) यूरोपियन सेंटर फॉर मीडियम रेंज वेदर फोरकास्टिंग (ईसीएमडब्लयूएफ) जापान को ट्रोलॉजिकल एजेंसी जैसी प्रतिष्ठित संस्थान से मदद लेकर पूर्वानुमान जारी करता है। इनके इस्तेमाल से दो सप्ताह की भविष्यवाणी की जाती है। आईएमडी ने इन दो सप्ताहों की निश्चयात्मक भविष्यवाणी के अलावा उपर्युक्त अंतरराष्ट्रीय एजेंसियों की मदद से 2010 से मासिक आधार पर भी भविष्यवाणियां जारी करनी शुरू कर दी है। वर्तमान में आईएमडी, पुणे की इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ ट्रापिकल मीटरोलॉजी के साथ मिलकर विस्तारित अवधि के लिए भविष्यवाणी करने के क्षेत्र में काम कर रही है।

मानसून की दीर्घावधि भविष्यवाणी


आईएमडी सांख्यिकीय तकनीकों पर आधारित दीर्घावधि भविष्यवाणी करती रही है। देशभर में और चार भौगोलिक क्षेत्रों (उत्तर पश्चिम भारत, मध्य भारत, पूर्वोत्तर भारत और दक्षिणी प्रायद्वीप) के लिए मौसमी वर्षा का पूर्वानुमान लगाने में सांख्यिकीय दृष्टिकोण के अपनाने से अच्छे नतीजे आए हैं। जुलाई, अगस्त और सितंबर में पूरे देश में वर्षा की मासिक भविष्यवाणी के लिए भी इस तकनीक का प्रदर्शन संतोषजनक रहा है। आईएमडी पूरे देश में मानसून के मौसम के उत्तरार्द्ध में वर्षा के लिए भी भविष्यवाणियां जारी करता है। परंतु यह देखा गया है कि राज्य उपमंडल, जिला आदि जैसे छोटे पैमाने के लिए भविष्यवाणी करने में सांख्यिकीय प्रणाली की अपनी कुछ सीमाएं है। आईएमडी ने भारत की ग्रीष्मकालीन मानसूनी वर्षा की दीर्घकालिक भविष्यवाणी के लिए पुणे में प्रायोगिक गतिकीय पूर्वानुमान प्रणाली स्थापित की है। यह प्रणाली प्रायोगिक जलवायु पूर्वानुमान केंद्र (ईसीपीसी) के मौसमी पूर्वानुमान मॉडल एसएफएम पर आधारित है। एसएफएम मॉडल एजीसीएम का प्रयोग मानसून के दौरान मासिक और मौसमी भविष्यवाणी के लिए किया जाता है। इस प्रायोगिक पूर्वानुमान प्रणाली ने कुछ उपयोगी कौशल दिखाया है परंतु इसमें अभी और सुधार की आवश्यकता है।

मानसून मिशन


पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय ने मानसून की गतिकीय भविष्यवाणी में सुधार के लिए राष्ट्रीय मानसून मिशन के माध्यम से सभी प्रासंगिक संगठनों और शोध-संस्थाओं का सहयोग लिया है। इसे हाल ही में भारत सरकार ने अनुमोदित कर दिया है और यह पांच वर्षों की अवधि के लिए होगा। पुणे स्थित भारतीय उष्णकटिबंधीय मौसम विज्ञान संस्थान (आईआईटीएम) इस कार्यक्रम में सहयोग देगा। इसे मानसून मिशन कार्यक्रम के जरिए प्राप्त मानसूनी पूर्वानुमानों को लागू करने का दायित्व आईएमडी का है। इस मिशन के लिए एनसीईजी-सीएफएस के युगल मॉडल को मुख्य मॉडल के रूप में चुना गया है। मानसून मिशन के मुख्य उद्देश्य इस प्रकार हैः

1. मानसून की भविष्यवाणी के कौशल को सुधारने के लिए शैक्षिक और शोध एवं विकास (आर.एंड डी.) संगठनों तथा परिचालन एजेंसी के बीच कार्यशील सहभागिता का विकास
2. मौसमी और विस्तारित अवधि की पूर्वानुमान प्रणाली, और अल्प एवं मध्यम अवधि की पूर्वानुमान प्रणाली के कौशल में सुधार के लिए अत्याधुनिक गतिकीय मॉडलिंग फ्रेमवर्क स्थापित करना।

भारत में दैनिक वर्षाइस मानसून मिशन के जरिए अल्प, मध्यम, विस्तारित और दीर्घावधि के लिए मानसून के पूर्वानुमान की क्षमता के विकास व विस्तार में मदद मिलेगी। अल्प और मध्यम अवधि में मानसून पूर्वानुमान कौशल में सुधार के लिए उपग्रहों (इन्सैट – 3डी रेडियंस), हवाओं का रुख, जीपीएस सोंड, मेसो नेटवर्क (स्वचालित मौसम केंद्र), विमान आदि से प्राप्त आंकड़ों का समावेशन महत्वपूर्ण होगा। हाल के वर्षों में एन्सेंबल प्रेडिक्शन सिस्टम (ईपीएस) मध्यमावधि मौसम की भविष्यवाणियों में सुधार के लिए एक शक्तिशाली साधन के रूप में ऊभरी है। ईपीएस में अंतिम पूर्वानुमान के लिए एकल मॉडल को प्रारंभिक स्थितियों के अनेक समूहों के साथ प्रयोग किया जाता है। प्रारंभिक विक्षोभों के सृजन के लिए जहां अभी भी व्यापक रूप से सिंगुलर वेक्टर और ब्रेड वेक्टर (बीवी) का प्रयोग किया जाता है, वहीं विभिन्न केंद्रों में बीवी का एन्सेंबल ट्रांसफार्म, एन्सेंबल ट्रांसफार्म कालमैन फिल्टर और एन्सेंबल डाटा एसीमिलेशन का भी उपयोग किया जाता है। इससे आईएमडी को अन्य वैश्विक केंद्रों के ईपीएस आंकड़ों को प्राप्त करना सुगम हो जाएगा और अल्पावधि तथा विस्तारित समयावधि में इपीएस के आंकड़ों के जरिए मानसून की वर्षा की भविष्यवाणी बेहतर ढंग से करने के लिए संभावित पूर्वानुमान प्रणाली (पीएफएस) का विकास और कार्यान्वयन का अवसर मिलेगा। आईएमडी अपने यहां ईपीएस पर कार्यान्वयन के लिए एनसीएमआरडब्ल्यूएफ के साथ समन्वयन करेगा।

विस्तारित और पूरे मौसम की अवधि में मानसूनी वर्षा के पूर्वानुमान के लिए अच्छे युगल मॉडल की आवश्यकता होती है। आईआईटीएम पुणे, इस मिशन के मुख्य मॉडल के तौर पर एनसीईपीएफएस के युगल मॉडल पर काम कर रहा है। आईएमडी, आईआईटीएम के इन प्रयासों का उपयोग विस्तारित और पूरे मौसम की वर्षा के पूर्वानुमान की क्षमता के विस्तार के लिए करेगा।

लेखकद्वय में से क्रमशः प्रथम विश्व मौसम विज्ञान संगठन (डब्ल्यूएमओ) में पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय के स्थायी प्रतिनिधि हैं और कोट्सवार्म प्रोफेसर रह चुके हैं एवं द्वितीय (वैज्ञानिक-डी) नयी दिल्ली स्थित एनडब्ल्यूपी केंद्र में निदेशक हैं।

ई-मेलः
ajit.tyagi@gmail.com,
pattanaik_dr@yahoo.co.in

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