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भूस्खलन और बाढ़ की त्रासदी के सबक

Author: 
खड्गसिंह वल्दिया
Source: 
जनसत्ता (रविवारी), 14 जुलाई 2013
उत्तराखंड की तबाही में हुई जान-माल की क्षतिपूर्ति असंभव है। मगर इससे सबक लेकर विचार तो किया ही जाना चाहिए कि ऐसी आपदाओं से बचाव के उपाय क्या हो सकते हैं। नदियों के प्राकृतिक रास्तों में अतार्किक निर्माण की वजह से वहां त्रासदी ने ज्यादा विकराल रूप धारण कर लिया। इसके भौगोलिक और वैज्ञानिक कारणों की पड़ताल कर रहे हैं खड्गसिंह वल्दिया।

दो ढालों के बीच नदी की चौड़ी घाटी उसका स्वाभाविक मार्ग है। उसे ‘फ्लड-वे’ कहते हैं। उस प्राकृतिक चौड़े मार्ग पर कभी भी बाढ़ का पानी बह सकता है। अपने फ्लड-वे यानी प्राकृतिक मार्ग में नदी अपनी धारा बदलती रहती है, पुरानी वाहिकाओं को छोड़कर नई वाहिकाएं बना लेती है। नदी कभी दाएं किनारे बहती है, कभी बाएं और कभी बीच में। बाढ़ की स्थिति में तो अपनी धारा बदलती ही है। अनेक स्थलों पर नदियां अपना बहाया हुआ मलबा जमा कर देती हैं। कच्चे मलबे के अंबार बढ़ते चले जाते हैं और वेदिकाओं में बदलती जाती है। स्थानीय बोली में ऐसी वेदिकाओं को ‘बगड़’ कहते हैं।उत्तुंग केदारनाथ, चौखंबा (बदरीनाथ), त्रिशूल, नंदादेवी और पंचचूली शिखरों वाले वृहद हिमालय (या हिमाद्रि) की विकट दक्षिणी ढाल सदा से भारी वर्षा की मार झेलती रही है। लेकिन पिछले सात-आठ सालों से अतिवृष्टि और भूस्खलनों की न थमने वाली आपदाओं से पिट रही है और बार-बार क्षत-विक्षत हो रही है। सीमित क्षेत्रों में अल्प अवधि में होने वाली अतिवृष्टि (बादल फटने) के कारण वृहद हिमालय की तलहटी की पट्टी के हजारों गांव बार-बार प्राकृतिक विपदाओं की त्रासदी भोग रहे हैं। संयोग से यही वह पट्टी है, जो जब-तब भूकंपों से डोलने लगती है और टूटते हैं पहाड़, सरकती हैं ढालें, और धंसती है धरती। 2009 में जिला पिथौरागढ़ के मुनस्यारी-तेजम क्षेत्र में और 2010 और 2012 में गढ़वाल की भागीरथी और अलकनंदा घाटियों में प्रकृति के अकल्पनीय प्रकोप को कभी भुलाया नहीं जा सकता। मौसम विज्ञानी वर्षों से कह रहे हैं कि आबोहवा में बदलाव के कारण अब देश में मानसूनी वर्षा असमान रूप से होगी और अतिवृष्टि और अनावृष्टि का दुश्चक्र चलेगा। हिमालय के उत्तराखंडी अंचल में भी पिछले सात-आठ-सालों से यही हो रहा है। लंबे अंतरालों तक सूखा पड़ने के बाद वर्षा होती है, तो अविराम मूसलाधार पानी बरसता है। उफनती-उमड़ती नदियां विनाशक बन जाती हैं।

मूसलाधार वर्षा के आघात और उमड़ती उन्मादिनी नदियों के कटाव के कारण पर्वतीय ढालें टूट-टूट कर फिसल या धंस रही हैं। भूस्खलनों की विभीषिका थमती ही नहीं है। प्रश्न उठता है कि वृहद हिमालय के दक्षिण के कटिबंध में इतने बड़े पैमाने पर भूस्खलन क्यों हो रहे हैं। वृहद हिमालय की दक्षिणी ढाल और उससे लगी आबाद लघुहिमालयी अंचल की पट्टी एक नहीं, तीन बड़े भ्रंशों (दरारों) से कटी हुई हैं। ये झुकी हुई दरारें (थ्रस्ट) हिमालय के एक छोर से दूसरे छोर तक सैकड़ों किलोमीटर तक फैली हैं। लगभग समांतर इन तीन झुकी हुई दरारों को संयुक्तरूप से ‘मेन सेंट्रल थ्रस्ट जोन’ कहते हैं। कोई भी दरार अकेली नहीं होती, उसके समांतर या उससे जुड़े हुए अनेक भ्रंश होते हैं।

इस अंचल के अधिसंख्य भ्रंश सक्रिय हैं। इसका आशय यह है कि इन भ्रंशों पर जब-तब भूखंड विस्थापित होते हैं, उन पर चट्टानें आगे-पीछे दाएं-बाएं, ऊपर-नीचे सरकती हैं। इस प्रकार की बारंबार घटना के कारण धरती जीर्ण-शीर्ण हो गई है, चट्टानें टूट गई हैं और कहीं-कहीं चूर-चूर भी हो गई हैं। कहना न हगा कि कमजोर चट्टानों वाली पहाड़ी ढालें अस्थिर हैं।

घनघोर वर्षा की मार पड़ते ही कमजोर चट्टानें टूटती हैं, गिरती हैं, फिसल जाती हैं और शुरू हो जाता है भूस्खलनों का दौर-दौरा। भूविज्ञानी इस विषय पर लिखते और बोलते रहे हैं। उनके अगणित आलेखों में सचित्र भली-भांति समझाया गया है कि इन पट्टियों और क्षेत्रों में आपदा की आशंका सदैव बनी रहती है। बांध बनाने, सुरंगे छेदने, भवन बनाने, गांव बसाने जैसी सारी योजनाओं में उपरोक्त तथ्यों पर विशेष ध्यान दिया जाना चाहिए था।

दरारों से कटे-फटे, भारी वर्षा की मार से पिट रहे, और बारंबार भूस्खलनों से आक्रांत कटिबंधों और क्षेत्रों में भूवैज्ञानिक और पर्यावरणी परिस्थितियों की परवाह किए बिना सड़कें बनीं और बन रही हैं, वह भी अक्सर अवैज्ञानिक तरीकों से। ढालों के कटाव से उत्पन्न मलबे की अपरिमेय मात्रा ढालों पर फेंक दी जाती है तो ढालें अस्थिर हो जाती हैं, नदी-नालों का प्रवाह भी थम जाता है, बाधित होता है। ये सड़कें काटती हुई जाती हैं रास्तों के सक्रिय भ्रंशों को, उनसे संबंधित खंडित-क्षीण चट्टानों को और ढलानों पर भूस्खलनों के मलबे के ढेरों को। सड़कों के काटने के फलस्वरूप चट्टानें बेहद कमजोर हो गई हैं।

अदृढ़ मलबों के ढेर तो और अधिक अस्थिर हो गए हैं। सतह पर बहता पानी तो उन्हें काटता ही है, मलबों के अंदर समया जल भी, भीतर ही भीतर उत्पात करता है। नतीजतन, मलबों के ढेर टूट कर, फिसल कर, धंस कर विपदाजनक परिस्थितियां उत्पन्न कर रहे हैं। सड़कों पर दौड़ते भारी वाहनों के बोझ ही नहीं उनके द्वारा उत्पन्न छोटे-छोटे लाखों सूक्ष्म भूकंपों से स्थिति और विकट हो गई है। मलबों के पंखाकार ढेरों पर बसे गांवों की दशा भी ऐसी ही है। उनकी धरती भी खिसक रही है, धंस रही है। इस बार तो सैकड़ों स्थानों में ऐसी घटना हुई और गांव उजड़ गए।

दुर्भाग्य से भूस्खलनों के मलबों से पानी की निकासी के कोई उपाय नहीं किए जा रहे हैं। उन पर एक-दो नालियां बना देने से उनका टूटना-कटना नहीं रुक सकता। मलबें के ढेरों के शीर्ष से लेकर उनके तले तक निकासी की नालियों का जाल ही कारगर हो सकता है। जहां कहीं पहाड़ी ढाल की ओर नालियां बनाई भी गई हैं वे आमतौर पर पत्थर-मिट्टी और कचरे से भरी रहती हैं। उन्हें साफ करने की कोई कोशिश नहीं होती। वर्षाकाल में भी नहीं होती। ढालों पर छोटे-बड़े नाले-गधेरे सभी देखते हैं। किसी-किसी में पानी बहता है, लेकिन अनेक केवल बरसात में ही सक्रिय होते हैं। अतिवृष्टि के दौरान उफनते नाले-गधेरे विनाश ढाते हैं। कई स्थानों पर सड़कों के किनारे इनके बिछाए-जमा किए मलबों के ऊपर दुकानें खुल गईं, घर बन गए, होटल खड़े हो गए। अतिवृष्टि में ये नाले अपने प्राकृतिक रास्ते में फिर मलबा डालेंगे ही, अपने पथ पर बनाई रचनाएं, हटाएंगे ही। ऐसा ही हो रहा है सड़कों पर और कुछ गांवों में भी।

दो ढालों के बीच नदी की चौड़ी घाटी उसका स्वाभाविक मार्ग है। उसे ‘फ्लड-वे’ कहते हैं। उस प्राकृतिक चौड़े मार्ग पर कभी भी बाढ़ का पानी बह सकता है। अपने फ्लड-वे यानी प्राकृतिक मार्ग में नदी अपनी धारा बदलती रहती है, पुरानी वाहिकाओं को छोड़कर नई वाहिकाएं बना लेती है। नदी कभी दाएं किनारे बहती है, कभी बाएं और कभी बीच में। बाढ़ की स्थिति में तो अपनी धारा बदलती ही है। अनेक स्थलों पर नदियां अपना बहाया हुआ मलबा जमा कर देती हैं। कच्चे मलबे के अंबार बढ़ते चले जाते हैं और वेदिकाओं (टैरेस) में बदलती जाती है। स्थानीय बोली में ऐसी वेदिकाओं को ‘बगड़’ कहते हैं। सपाट सतह वाली ये वेदिकाएं भी नदी के प्राकृतिक पथ फ्लड-वे के ही भाग हैं, उनसे अलग नहीं। इन परिस्थितियों को देखते हुए ज्यादा सही होता कि अगल सड़कों पर कलवर्टों-रपटों के बजाय डेढ़-दो मीटर चौड़े (स्पान) पुल बनाए जाते, क्योंकि कलवर्ट मलबों से लदे जल-प्रवाह को झेल नहीं सकते। मलबों को बहा ले जाने की उनमें क्षमता नहीं होती। यह समझना जरूरी है कि ढाल से उतरते नाले जब-तब बड़ी मात्रा में मलबा बहाकर लाते हैं और सड़कों पर ढेर लगा देते हैं और हम नदियों के छोड़े हुए, उनके परित्यक्त पथों में और उनके किनारों की वेदिकाओं पर घर बना रहे हैं, ऊंचे-ऊंचे होटल खड़े कर रहे हैं, दुकानों की कतारें लगा रहे हैं।

दूसरे शब्दों में, हम नदियों के अपने प्राकृतिक मार्गों में अवरोध खड़े कर रहे हैं, उनके प्रवाह में बाधा डाल रहे हैं। जब उफनती-उमड़ती नदी अपने पूरे जोश में होती है तब अपने मार्ग की बाधाओं को हटाती-मिटाती बहती है। यही हुआ है मंदाकिनी, अलकनंदा, पिंडर, गंगा, गोरी और काली की घाटियों में। उनके प्राकृतिक मार्गों में बने गांव, मकान, होटल, पुल सभी बह गए। न केवल श्रीनगर रुद्रप्रयाग, नारायणबगड़, बलुवाकोट-जैसे नगरों ने बल्कि नदी किनारे के सैकड़ों गांवों ने भी भोगी-झेली ऐसी त्रासदी गांव के गांव उजड़ गए। आक्रांत, असहाय, बेसहारा लोगों का सर्वस्व नष्ट हो गया।

केदारनाथ का देवस्थान पुरातन ग्लेशियर द्वारा बनाई चौड़ी घाटी में अवस्थित है। ग्लेशियर द्वारा जमा किए गए मलबे को काटती, इनसे बचती बहती है मंदाकिनी। हाल ही तक दो मुख्य धाराओं में बहती थी यह नदी। सभी नदियों की भांति मंदाकिनी भी अपना पथ बदलती रही है। इस बार अतिवृष्टि के कारण मंदाकिनी अपने पुराने परित्यक्त पथ पर लौटी, छोड़े हुए उस उथले-पतले रास्ते पर भी बही, जहां दुकानें बन गई थीं, धर्मशालाएं और होटल खड़े हो गए थे। मार्ग की बाधाओं को हटाती मंदाकिनी बही तो विनाशलीला घटित हो गई।

मंदिर बच गया, क्योंकि मंदाकिनी की उस धारा को विचलित कर दिया था चट्टानों के उन भारी-भारी खंडों ने जो ग्लेशियरी मलबे से विलग होकर, निकल कर, नीचे आ गए थे। आज मलबे के अंबार के नीचे दबे-छिपे बैठे हैं वे। बारह सौ वर्ष पहले मंदिर निर्माताओं ने इन्हीं चट्टानों की रक्षा का सहारा लेकर उनकी ओट में अपेक्षाकृत सुरक्षित स्थान पर देवस्थान स्थापित किया था। प्रलयंकर बाढ़ की विभीषिका झेलते हुए अटल-अक्षत खड़ा रहा केदारनाथ का गौरवशाली प्राचीन मंदिर।

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