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सुनामी

Author: 
सुबोध महंती
Source: 
विज्ञान प्रसार
“26 दिसम्बर, 2006 को दक्षिण एशिया के कई देशों में तबाही मचाने वाली सुनामी की घटना ने मानव जाति या होमोसैपियंस को एक बार फिर से याद दिलाया कि उनकी अपनी ताकत के अहंकार के बावजूद प्राकृतिक ताकत के सामने वे कितने असहाय हैं। यदि समुद्र के अंदर की धरती का बहुत छोटा, लगभग 10 मीटर का, हिस्सा भी क्षुब्ध या स्थानांतरित हो जाए तो यह घटना लाखों लोगों की मौत का कारण बन सकती है। खुले समुद्र में आरंभ में लंबी, छोटे आयाम की तरंगदैर्घ्य के रूप में चलने वाली लहरें, जो मुश्किल से दिखाई देती हैं, तट पर पहुंच कर सुनामी के रूप में पानी की तीस मीटर ऊंची दीवार सी विकसित होकर तट पर कोलाहल करती हुई अपने मार्ग में आने वाली प्रत्येक वस्तु को बहा देती है।”
जवंत एच. आरकरी इन रिसोनेंस, फरवरी, 2005।

विज्ञान की भाषा में सुनामी समुद्र में संचरित होने वाली ऐसी तरंगों की एक श्रृंखला है जिनके तरंग-दैर्घ्य अस्वाभाविक रूप से लंबे हैं। वे जैसे-जैसे तट के नज़दीक पहुँचती हैं, इन लहरों की गति घटती जाती है और इनकी ऊंचाई बढ़ती जाती है। जब तट पर पहुंचने वाली सुनामी तरंगों के आरंभिक भाग का गर्त शिखर की बजाए पहले पहुँचता है, तब तटीय रेखा के आसपास का पानी बड़े ही नाटकीय ढंग से पीछे हटता है। पानी सैकड़ों मीटर से अधिक पीछे हट सकता है। इसलिए आमतौर पर पानी से ढके रहने वाले तट के निकटवर्ती समुद्री क्षेत्र सुनामी के दौरान दिखाई दे जाते हैं। सुनामी नाम से परिचित समुद्री तरंगों की श्रृंखला इतनी विध्वंसकारी होती है, कि यह परिघटना अपने नाम से ही तटीय क्षेत्रों में रहने वाले लोगों में दहशत पैदा करती है। विश्व के सभी महासागरों में सुनामी पैदा होने की संभावना रहती है। मगर प्रशांत महासागर में सुनामी का प्रायः आना-जाना लगा रहता है। प्रशांत महासागर में अभी तक 700 से अधिक सुनामी की घटनाएँ दर्ज की जा चुकी हैं।

सुनामी क्या है?


सुनामी शब्द जापानी भाषा के दो शब्द ‘सु’ और ‘नामी’ से बना है। ‘सु’ शब्द का शाब्दिक अर्थ ‘बंदरगाह’ और ‘नामी’ शब्द का ‘तरंग’ है और इस प्रकार सुनामी शब्द का अर्थ ‘बंदरगाह तरंग’ है। इस शब्द की रचना जापान के उन मछुआरों द्वारा की गई है, जिन्होंने कई बार खुले समुद्र में तरंगों का कोई विशिष्ट हलचल न होने पर भी बंदरगाह को उजड़ा देखा था। इसलिए उन्होंने इस परिघटना को ‘सुनामी’ अर्थात ‘बंदरगाह तरंगों’ का नाम दिया। मगर सभी सुनामी बंदरगाहों के आस-पास ही नहीं आतीं, इसलिए ‘सुनामी’ शब्द भ्रामक है। सुनामी को ‘ज्वारीय तरंग’ नाम से भी जाना जाता रहा है लेकिन सुनामी का ज्वारीय तरंगों से कोई संबंध नहीं है। इसलिए सुनामी को ज्वारीय तरंगें कहना भी भ्रामक है। कभी-कभी वैज्ञानिक, सुनामी को ‘भूकंपी समुद्री-तरंगो के रूप में भी परिभाषित करते हैं लेकिन सुनामी की यह परिभाषा भी सटीक नहीं है क्योंकि सुनामी कई अभूकंपी घटनाओं जैसे भूस्खलन और क्षुद्र ग्रहों के पृथ्वी की सतह से टकराने से भी उत्पन्न हो सकती है।

विज्ञान की भाषा में सुनामी समुद्र में संचरित होने वाली ऐसी तरंगों की एक श्रृंखला है जिनके तरंग-दैर्घ्य (वेवलेंथ) अस्वाभाविक रूप से लंबे हैं। वे जैसे-जैसे तट के नज़दीक पहुँचती हैं, इन लहरों की गति घटती जाती है और इनकी ऊंचाई बढ़ती जाती है। जब तट पर पहुंचने वाली सुनामी तरंगों के आरंभिक भाग का गर्त (ट्रफ) शिखर (क्रेस्ट) की बजाए पहले पहुँचता है, तब तटीय रेखा के आसपास का पानी बड़े ही नाटकीय ढंग से पीछे हटता है। पानी सैकड़ों मीटर से अधिक पीछे हट सकता है। इसलिए आमतौर पर पानी से ढके रहने वाले तट के निकटवर्ती समुद्री क्षेत्र सुनामी के दौरान दिखाई दे जाते हैं।

सुनामी तरंगों के तरंग-दैर्घ्य बहुत अधिक लंबे होते हैं (लहर के एक शिखर के दूसरे शिखर के मध्य की दूरी) और सुनामी लंबी अवधि (दो उतरोत्तर लहरों के बीच के समय) की तरंगे होती है। सुनामी तरंगों की तरंग-दैर्घ्य लगभग 500 किलोमीटर और इनकी अवधि दस मिनट से लेकर दो घंटे तक हो सकती है। सुनामी की तुलना में हवा द्वारा उत्पन्न तरंगों की अवधि पांच से दस सेकेंड और तरंग-दैर्घ्य 100 से 200 मीटर होता है। सुनामी अपने तरंग-दैर्घ्य के कारण उथली जल तरंगों जैसा व्यवहार करती है। उथली जल तरंग की पहचान इस बात से की जाती है कि जल की गहराई और तरंग-दैर्घ्य का अनुपात बहुत कम होता है।

सुनामी तरंगों की गति पानी की गहराई और गुरुत्वीय त्वरण (9.8 मीटर प्रति सेकेंड) के गुणनफल के वर्गमूल के बराबर होती है। जहां पानी अधिक गहरा होता है, वहां सुनामी तरंगे उच्च गति से संचरित होती हैं। प्रशांत महासागर में पानी की औसत गहराई लगभग 4000 मीटर है। उसमें सुनामी 200 मीटर प्रति सेंकड या 700 किलोमीटर प्रति घंटे की गति से चलती है।

गहरे समुद्र में सुनामी तरंग का तरंग-दैर्घ्य सैकड़ों किलोमीटर तक हो सकता है लेकिन इनका आयाम (शिखर से गर्त तक की ऊंचाई) एक मीटर से कम होता है। इसलिए किसी हवाई जहाज़ से यह बीच समुद्र में नहीं दिखाई देती है। यही कारण है कि जहाज़ में सवार लोगों को इन तरंगों का अनुभव नहीं होता है।

तरंगे जैसे-जैसे तट के समीप पहुँचती हैं, सुनामी की ऊंचाई बढ़ती जाती है। सुनामी तरंगें अनुक्रमिक शिखर और गर्त के रूप, आमतौर पर 10 से 45 मिनट के अंतराल, पर आती हैं। जब ये लहरें उथले पानी में प्रवेश करती हैं तब इनकी गति 50 से 60 किलोमीटर प्रति घंटे होती है। उदाहरणतः 15 मीटर गहरे पानी में सुनामी तरंगों की गति केवल 45 किलोमीटर प्रति घंटे होती है। मगर 100 किलोमीटर या अधिक दूर गहरे पानी में एक दूसरी सुनामी तरंग इससे कहीं अधिक गति से तट की तरफ आती है और इसी प्रकार इसके पीछे एक तीसरी तरंग और अधिक गति से आती है। तट के नज़दीक तरंगे संकुचित होती है और तरंग-दैर्घ्य कम होती है और इसलिए तरंगों की ऊर्जा ऊपरी मुखी होती है और उनकी ऊंचाई बढ़ती जाती है। सामान्य समुद्री तरंगों की तरह सुनामी तरंगों की ऊर्जा कम से कम पानी में निहित होती है। इसलिए उनकी ऊंचाई अधिक होती है। हालांकि तट के नज़दीक आने से तरंग-दैर्घ्य कम होता है मगर तब भी किनारों पर आते समय सुनामी की तरंग-दैर्घ्य दस किलोमीटर से भी अधिक ही होता है।

किनारों पर पहुंचने वाली सुनामी तरंग की अधिकतम ऊंचाई को रनअप कहते हैं। रनअप तट पर पहुंचने वाले पानी की माध्य समुद्र तल से अधिकतम लम्बवत दूरी है। सुनामी रनअप का एक मीटर से ऊपर होना खतरनाक होता है। एक अकेली तरंग द्वारा बाढ़ का प्रभाव दस मिनट से लेकर आधे घंटे तक रह सकता है। इस प्रकार सुनामी से घंटों तक खतरा बना रहता है। सुनामी रनअप कैसे होगा यह निर्भर करता है सुनामी तरंग की ऊर्जा, किस तरह से केंद्रित है, सुनामी के संचरण पथ, तटीय विन्यास और उस क्षेत्र की भौगोलिक स्थिति पर छोटे द्वीपों में सीधी ढाल पर सामान्यतया छोटे रनअप अर्थात तरंगों की ऊंचाई कम होती है। इन जगहों पर सुनामी तरंगों की ऊंचाई बीच समुद्र से थोड़ी-सी ही अधिक होती है। इस कारण चट्टानी संरचना वाले क्षेत्रों में सुनामी का खतरा कम होगा।

अन्य समुद्री तरंगों की भांति सुनामी तरंगों की ऊर्जा भी तट की तरफ आते-आते कम होने लगती है। ऊर्जा का कुछ भाग अपतट की तरफ परावर्तित हो जाता है। तट की ओर आने वाली तरंगों की ऊर्जा समुद्री तल के घर्षण और प्रक्षोभ के कारण कम होने लगती है। लेकिन, इस प्रकार ऊर्जा की कमी से सुनामी की विध्वंसक शक्ति कम नहीं होती।

सुनामी तरंगे पानी की दीवार की तरह तट पर टकराती हैं या बहुत तेजी से बाढ़ या ज्वार की तरह आगे बढ़ती हैं और रास्ते में आने वाली हर चीज को बहा ले जाती हैं। इन दोनों में से किसी भी सूरत में सुनामी जान-माल के लिए खतरा पैदा करती हैं। यदि किसी क्षेत्र में सुनामी तरंगें उच्च ज्वार या तूफानी तरंगों के साथ आती हैं, तब इनका संयुक्त प्रभाव भारी पैमाने पर तबाही मचाता है। सुनामी तरंगें तट पर भारी ऊर्जा के साथ पहुँचती हैं। सुनामी लहरें बालू-तटों की बालू को पूरी तरह बहा ले जाती हैं। जो कई वर्षों में जमा होता है। ये लहरें पेड़ों एवं अन्य तटीय वनस्पतियों को तहस-नहस कर देती हैं। सुनामी लहरें तटीय क्षेत्रों में बाढ़ ला सकती हैं और समुद्र तट से स्थल की ओर कई सौ मीटर दूर तक घरों एवं अन्य ढांचों को मिटा सकते हैं।

सुनामी पैदा होने का कारण


सुनामी, हवा या चंद्रमा के गुरुत्वीय आकर्षण से उत्पन्न ज्वार नहीं है। इनकी उत्पत्ति समुद्र तल में अचानक आई विकृति एवं उसमें उत्पन्न ऊपरी जल स्तर में विस्थापन के कारण होती है। समुद्र तल में इसी तरह की विकृति भूकंप के कारण पैदा होती है। भूकंप जल स्तंभ को उत्थान या अवतलन द्वारा छेड़ सकता है। सागर तल का बड़ा हिस्सा जब ऊपर उठता या नीचे बैठता है, तब सुनामी उत्पन्न होती है। प्लेट सीमा पर भूपटल में बड़ी विकृति आ सकती है। उदाहरण के लिए प्रशांत महासागर के किनारों पर अधिक घनत्व वाली समुद्री प्लेट, महाद्वीपीय प्लेट के नीचे खिसकती है, जिसको अवरोहण कहते हैं। सुनामी उत्पन्न करने के लिए अवरोहण भूकंप कुख्यात है।

सुनामी विशाल जल राशि के विस्थान के कारण उत्पन्न होती है। यह विस्थापन गुरुत्व के प्रभाव से क्षेत्र में साम्यावस्था लाने के लिए प्रयासरत रहता है। सुनामी लहरों की ऊंचाई समुद्र तल में आई विकृति के परिमाण पर निर्भर करती है। जल राशि का विस्थापन जितना खड़ा होगा सुनामी लहरों की ऊंचाई भी उतनी ही अधिक होती है।

भूकंप से मुक्त हुई ऊर्जा समुद्र के पानी को सामान्य स्तर से ऊपर उठाकर स्थितिज ऊर्जा में बदल कर समुद्र के पानी में ही समाहित हो जाती है। यह स्थितिज ऊर्जा सुनामी तरंगों के उत्पन्न होने से गतिज ऊर्जा में बदल जाती है और ये ही ऊर्जा इन तरंगों को आगे प्रसारित करती हैं एवं भयंकर सुनामी तरंगों में तब्दील करते हैं।

सुनामी की उत्पत्ति के लिए भूकंप ही एकमात्र कारण नहीं है। कोई भी विक्षोभ जो जल की विपुल मात्रा को अपनी साम्यावस्था से विस्थापित करने की क्षमता रखता है, सुनामी का कारण बन सकता है। भूकंप या ज्वालामुखी के दब जाने के कारण अंतःसमुद्री भूस्खलन, ऊपरी जल स्तंभ में हलचल पैदा कर सुनामी का कारण बनते हैं। अंतःसमुद्री ज्वालामुखी विस्फोट की प्रचंड ऊर्जा भी जल स्तंभ को ऊपर उठा कर सुनामी उत्पन्न कर सकती है।

सामान्यतः सुनामी जो प्लेट सीमा में अचानक आई विकृति के कारण पैदा नहीं होती है, वह शीघ्र ही गायब हो जाती है। ऐसी सुनामी उत्पत्ति स्थल से तट तक बिरले ही पहुँचती है। मगर यह बहुत विशाल स्थानीय प्रघाती तरंगों को उत्पन्न कर सकती है। उदाहरण के लिए 10 जुलाई 1958 को लिटूया खाड़ी (अलास्का, अमेरिका) के शीर्ष स्थल किलन इन्लेट पर भूस्खलन होने से बहुत ही विशाल सुनामी उत्पन्न हुई थी, जिसने संपूर्ण घाटी को अपने घेरे में ले लिया था। खुले समुद्र से तट तक पहुंचते-पहुंचते इनकी गति तेजी से कम हो गई थी।

सुनामी पूर्वानुमान


यह कोई नहीं जानता कि सुनामी कब और कहां आएगी। सुनामी के आने का न तो कोई सटीक पूर्वानुमान लगाया जा सकता है और ना ही इसे रोका जा सकता है। आने वाली सुनामी के बारे में कुछ अग्रिम संकेत मिलते हैं। इसके बावजूद सुनामी के बारे में पुर्वानुमान लगाना कोई आसान कार्य नहीं है। यह अभी तक त्रुटिपूर्ण विज्ञान रहा है।

ऐसा देखा गया कि जानवरों को आने वाली सुनामी का आभास हो जाता है और सुनामी के तट पर पहुंचने से पहले जानवर ऊंचे स्थानों पर चले जाते हैं। पहली बार जानवरों के इस व्यवहार को यूरोप में लिस्बन भूकंप के कारण पैदा हुई सुनामी के समय रिकार्ड किया गया था। वर्ष 2004 में हिंद महासागर में आई सुनामी के समय श्रीलंका में जानवरों का ऐसा ही व्यवहार देखा गया। ऐसा अनुमान लगाया गया है कि सुनामी तट से टकराने से पहले भूकंप से आने वाले रैलों-तरंगों को महसूस कर सकते हैं। कई शोधकर्ता जानवरों की सुनामी तथा अन्य प्राकृतिक आपदा को पहले से भांपने की क्षमता का अध्ययन कर रहे हैं। ताकि जानवरों की असाधारण क्षमता का फायदा उठाकर प्राकृतिक आपदा का पूर्वानुमान लगाया जा सके।

क्योंकि सभी भूकंप सुनामी उत्पन्न नहीं करते हैं, इसलिए भूकंप की घटना पर आधारित चेतावनी सुनामी के संदर्भ में सही नहीं हो सकती है। एक रिपोर्ट के अनुसार सन् 1948 से की गई हर चार सुनामी भविष्यवाणियों में से तीन और भविष्यवाणियां गलत साबित हुई। गलत चेतावनी का मतलब है अधिक कीमत चुकाना क्योंकि इससे संसाधनों और समय का अपव्यय होता है। भूकंप के बारे में जानकारी, समुद्र अधस्तल (गांभीर्यमिति विज्ञान या बेथेमिट्री) व तटीय क्षेत्र की आकृतियों के आधार पर तैयार किए गए कंप्यूटर मॉडल से सुनामी आगमन का अपरिष्कृत पूर्वानुमान लगाया जा सकता है। इस तरह की कंप्यूटर मॉडल सुनामी आगमन के पूर्वानुमान को सटीक बनाने में मदद करता है।

सुनामीआने वाली सुनामी संबंधित कोई भी सूचना उस क्षेत्र में रहने और प्रभावित होने वाले लोगों तक पहुंचानी चाहिए। आदर्श रूप में इस तरह की सूचना उन्हीं लोगों तक पहुंचनी चाहिए जो जानते हैं कि आने वाले खतरे से कैसे बचा जा सके। तटीय क्षेत्रों में रहने वाले लोगों को इस संबंध में पता रहे कि उन्हें सुनामी संबंधी सूचना कहां मिल सकती है। और सूचना मिल जाने के बाद क्या करना चाहिए। यदि लोग यह नहीं जानते हैं कि सुनामी क्या कर सकती है और वे आने वाले खतरे से कैसे बच सकते हैं तो केवल सूचनाओं को प्राप्त करने से उनकी कोई विशेष मदद नहीं हो पाएगी।

सुनामी के बारे में कुछ महत्वपूर्ण बिंदु


1. सभी निम्न तटीय क्षेत्र सुनामी से प्रभावित हो सकते हैं।
2. सुनामी लहरों की एक श्रृंखला होती है। हमें याद रखना चाहिए कि लहरें लंबी और ऊंची नहीं भी हो सकती हैं।
3. सुनामी लहरों की गति किसी व्यक्ति के दौड़ने की गति से अधिक होती है।
4. सुनामी तट के निकटवर्ती क्षेत्र के पानी का पिछे हटने का कारण बन सकती है और समुद्र तल पानी के बाहर आ सकती है।
5. सुनामी लहरें समुद्र में गिरने वाली नदियों तथा अन्य जल धाराओं के अंदर तक पहुंच सकती हैं।
6. सुनामी के आने का कोई विशेष समय नहीं है, वे दिन हो या रात कभी भी आ सकती है।
7. लहरदार तरंगों की भांति सुनामी लहरों के साथ बहना संभव नहीं है।

सुनामी चेतावनी प्रणाली


अलास्का में आई विध्वंसक सुनामी की विनाशकारी घटना के बाद अमेरिका के ‘नेशनल ओशेनिक एंड एटमॉस्फेरिक एडमिनिस्ट्रेशन (एनओएए)’ द्वारा सन् 1965 में अंतरराष्ट्रीय सुनामी चेतावनी प्रणाली (टीडब्ल्यूएस) की स्थापना की गई। इसकी स्थापना अमेरिकी सरकारी द्वारा की गई। इस प्रणाली को विकसित करने के लिए उत्तरी तथा दक्षिणी अमेरिकी महाद्वीपों के अलावा चीन, जापान और रूस को भी शामिल किया गया। टीडब्ल्यूएस के सुनामी चेतावनी केंद्र हवाई केंद्र हवाई द्वीप में है। यह केंद्र प्रशांत महासागर के मध्य स्थित है, जहां सुनामी अधिकतर आती रहती है।

प्रशांत महासागर चेतावनी प्रणाली में 150 भूकंप निगरानी एवं गेजों (प्रमापीयों) का जाल सम्मिलित है जो समुद्र तल को मापता है। जब भी किसी भूकंप का पता लगता है, तब इसके घटित होने के स्थान और परिमाण की गणना की जाती है। यदि भूकंप का परिमाण किसी निश्चित स्तर से अधिक होता है, तब असुरक्षित क्षेत्रों में इसकी चेतावनी भेज दी जाती है। समुद्र तल में किसी भी असामान्य परिवर्तन की पता लगाने के लिए समुद्र तल को मापने वाले गेजों की निगरानी की जाती है। यदि इस प्रक्रिया में सुनामी का अनुमान होता है तब कंप्यूटर आधारित गणितीय मॉडल का उपयोग कर, संभावित सुनामी की गति और दिशा की गणना की जाती है। यह गणना विशेषताओं सहति अनेक घटकों के आधार पर की जाती है। इस गणना के आधार पर सुनामी के संभावित पक्ष में पड़ने वाले तटीय क्षेत्रों को सुनामी के बारे में चेतावनी दी जाती है।

शक्तिशाली भूकंप का पता लगते ही सुनामी चेतावनी प्रणाली सुनामी सूचकों, जैसे कि समुद्र तल के ऊपर उठने का पता लगाना शुरू कर देती है। सभी सूचनाओं का विश्लेषण कर सुनामी की चेतावनी को जारी करने में एक घंटे का समय लगता है।

हाल में विकसित डीप ओशेन ऐसेसमेंट एंड रिपोर्टिंग ऑन सुनामी (डी ए आर टी या डार्ट) प्रणाली द्वारा सुनामी चेतावनी प्रक्रिया में काफी सुधार आया है। इस प्रणाली को पहली बार सन् 2000 के अगस्त महीने में शुरू किया गया था। डाट प्रणाली वास्तविक काल संचार के लिए बाटम प्रेशर रिकार्डर (बीपीआर) युक्ति और समुद्री लहरों पर तैरती एक सतही उत्प्लव को रखती है। गहरे जल में स्थित बीपीआर से उत्प्लव तक आंकड़े या सूचनाएं सुनामी द्वारा ध्वनि माध्यम से प्रेषित होते हैं। उत्प्लव से आंकड़े या सूचनाओं को जियोस्टेशनरी ऑपरेशनल इन्वायरमेंटल सैटेलाइट डाटा कलेक्शन सिस्टम तक पहुंचाया जाता है। यहां से आंकड़े भूकेंद्र पर पहुंचते हैं और उन्हें तत्काल एनओएए के सुनामी क्रियाशील केंद्र को भेज दिया जाता है।

बंगाल की खाड़ी और हिंद महासागर में सुनामी बिरले ही आती है। यही कारण है कि जब 26 दिसंबर 2004 को यहां सुनामी आई थी, तब हिंद महासागर में कई सुनामी चेतावनी प्रणाली नहीं थी। अब हिंद महासागर क्षेत्र में सुनामी की चेतावनी देने वाली प्रणाली लग चुकी है। इस प्रणाली की सफलता के लिए आवश्यक है कि सभी देश ईमानदारी से सूचनाओं का आदान-प्रदान करें। दिसंबर 2004 के विध्वंसकारी सुनामी ने भारत को सुनामी चेतावनी प्रणाली विकसित करने के लिए मजबूर कर दिया और आपदा के तुरंत बाद सुनामी चेतावनी प्रणाली स्थापित करने की घोषणा की गई। ‘नेशनल अर्ली वार्निंग सिस्टम फॉर सुनामी एंड स्टॉर्म सर्लस इन इंडियन ओशन’ स्थापित हुआ। हिंद महासागरीय क्षेत्र में भारत पहला देश बन गया है जिसने अपनी प्रणाली तैयार की है। इस चेतावनी प्रणाली से भूकंप आने के बाद समुद्र के स्तर में होने वाले परिवर्तन की समय रहते सूचना मिल जाएगी।

किस प्रकार सुनामी के नुकसान को कम करें


जागरूकता की महत्ता को कभी अधिक नहीं आंका जा सकता। किसी भी सक्रिय व्यवस्था के लिए जागरुकता अभियान आवश्यक हिस्सा है।

एक स्कूली छात्रा टिली स्मिथ ने दस वर्ष की उम्र में स्कूल में पढ़ी हुई जानकारी के आधार पर 26 दिसंबर 2004 को सौ से अधिक लोगों की जान बचाई थी। सुनामी आने के दौरान टिली अपने परिवार के साथ थाईलैंड के फुकेट के समुद्री तट पर छुट्टी मना रही थी। जब टिली ने समुद्र का जल तट से पीछे हटते देखा तब उसे याद आया कि यह सुनामी का अग्रिम संकेत हो सकता है। उसकी चेतावनी के कारण सुनामी तरंगों के आने के कुछ ही मिनट पूर्व वहां का तट खाली कर दिया गया। आमतौर पर समुद्री तट में छुट्टी मनाने वाले पर्यटक तट से पानी पीछे हटने के असली कारण से अनजान रहते हैं। इसी कारण पर्यटक पानी से बाहर आए हुए समुद्र तल को छानबीन करने के लिए प्रलोभित होकर समुद्र के अंदर दूर चले जाते हैं और इसी बीच आने वाली सुनामी तरंगे उन्हें बहा ले जाती हैं। मगर 26 दिसंबर 2004 को फुकेट में मरने वालों की संख्या में काफी कमी इसलिए हुई क्योंकि टिली स्मिथ के पास न केवल जानकारी थी बल्कि जानकारी को सही समय पर इस्तेमाल किया गया।

सुनामी के पूर्व किन बातों का ध्यान रखना चाहिए


निचले तटीय क्षेत्रों में रहने वाले लोगों और पर्यटकों को सुनामी की निम्नांकित संकेत प्रणालियों से परिचित होना चाहिएः

1. तटीय क्षेत्रों को बड़े परिमाण के भूकंप के झटके को संभावित सुनामी की चेतावनी के रूप में लेना चाहिए। यदि भूकंप सीधे समुद्र के अंदर या उसके निकटवर्ती इलाकों में आया है, तब सुनामी के उत्पन्न होने की संभावना बढ़ जाती है।
2. रिक्टर स्केल में 7.2 या अधिक शक्ति का भूकंप आने पर सुनामी पैदा होती है। सभी बड़े भूकंप सुनामी पैदा नहीं करते। केवल भूकंप आना ही सुनामी पैदा करने के लिए पर्याप्त कारण नहीं होता। क्योंकि भूकंप आने से सुनामी का खतरा रहता है, इसलिए भूकंप आने का संकेत मिलने पर तटीय क्षेत्र छोड़ देना ही उचित है।
3. तटीय जल का तीव्र गति से ऊपर या नीचे गिरना सुनामी का संकेत हो सकता है।
4. स्थानीय जनता तक उपर्युक्त सूचनाओं को स्थानीय सार्वजनिक चेतावनी प्रणालियों से पहुंचाने के लिए उचित क्रियाविधि होनी चाहिए। सुनामी के संकेत मिलते ही प्रभावित क्षेत्रों को खाली करने के लिए मार्गों का पहले से ही निर्माण करना चाहिए।
5. लोगों को उन मार्गों से अच्छी तरह परिचित हो जाना चाहिए ताकि सुनामी के दौरान रात में असामान्य मौसम वाली परिस्थितियों में भी वे उस मार्ग का इस्तेमाल कर सकते हैं। इसके लिए सामान्य दिनों में भी नियमित रूप से अभ्यास सत्रों का आयोजन किया जाना चाहिए।
6. सभी प्रमुख जगहों पर सुरक्षित जगहों की तरफ जाने के लिए दिशा निर्देश सहित सूचना पट्ट (साइनबोर्ड) लगे होने चाहिए।
7. संभावित सुनामी क्षेत्रों में भूमि इस्तेमाल की नियमित अंतराल पर समीक्षा की जानी चाहिए। आपातकालीन सुविधाएँ जैसे अस्पताल, पुलिस स्टेशन, ईंधन संग्राहक और विद्युत केंद्र या सभागारों और विद्यालायों जैसी इमारतें सुरक्षित स्थानों पर ही बनाई जानी चाहिए।
पर्यटकों को सुनामी चेतावनी तथा निष्क्रमण के बारे में पहले से सचेत करना चाहिए।

स्थानीय समाचारपत्रों, दूरदर्शन एवं रेडियों केंद्रों को सुनामी के बारे में नियमित रूप से सार्वजनिक सूचना देते रहना चाहिए।

सुनामी के आने का संकेत मिलने के बाद क्या करना चाहिए


1. सुनामी के खतरे से बचने का एकमात्र अच्छा उपाय यह है कि जहां तक यदि संभव हो उस स्थान से दूर चले जाना चाहिए। कोई सुनामी का सामना नहीं कर सकता। इसलिए जैसे ही आने वाली सुनामी के संकेत मिलते हैं, जितनी जल्दी हो सके उस क्षेत्र को खाली कर दिया जाए। हो सकता है आपदा के बाद रास्ता बंद हो जाए या आवागमन के योग्य नहीं रहे।
2. तट छोड़कर ऊंचे स्थानों पर चले जाएं।
3. समुद्र में गिरने वाली नदियों तथा अन्य जल धाराओं से दूर रहें।
4. यदि आप नाव या जहाज़ पर हो तो इन्हें गहरे पानी की ओर ले जाना उचित है। हालांकि समय रहने से नाव या जहाज़ को छोड़कर ज़मीन की ऊंचाई वाली सुरक्षित जगह जाना उचित है।
5. सुनामी कोई देखने वाला खेल नहीं है। आने वाली सुनामी को देखने की कोशिश न करें। यदि आप सुनामी तरंग को देख रहे हों तो इसका मतलब है आप उसके बहुत निकट है। उससे दूर जाना नामुमकिन है क्योंकि सुनामी तरंगों की गति आप के दौड़ने की गति से कहीं अधिक होती है।
6. यह मत सोचिए कि पहली लहर के बाद खतरा टल गया क्योंकि सुनामी लहरें एक के बाद एक श्रृंखला के रूप में आती हैं। आगे आने वाली अन्य लहरें पहली लहर से कहीं अधिक बड़ी हो सकती हैं।

सुनामी के बाद क्या करना चाहिए


1. जानवरों, विशेषकर विषैले सांपों पर नजर रखें। हो सकता है कि वे पानी की तलाश में इमारत में चले आएं। 2. ढीले प्लास्टर, गीली दीवारों और छत से सावधान रहें, क्योंकि वह गिर सकती है। 3. सिर्फ उबला या स्वच्छ जल पीएं, क्योंकि सुनामी के बाद चारों ओर गंदगी और सड़ी-गली लाशें फैलने से हैजा और पेचिश जैसी बीमारियों का प्रकोप बढ़ा जाता है। पेयजल के प्रति विशेष सावधानी बरतें।

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