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सीरिया का सबक

Author: 
नयन चन्दा
Source: 
गांधी मार्ग, नवंबर-दिसंबर 2013
सचमुच घर की लड़ाई। गृह युद्ध। भाई ने भाई को मारा। दूर बैठे देशों ने दोनों को अपने-अपने हथियार बेचे, एक दूसरे को मारने के लिए। नतीजा है कोई एक लाख लोग मारे जा चुके हैं और करीब 20 लाख लोग अपने घरों से उजड़ कर पड़ोसी देशों में शरणार्थी बन कर भटक रहे हैं। सीरिया की इस भारी विपत्ति के पीछे सिर्फ संप्रदायों के सद्भाव की कमी नहीं है। वहां तो पर्यावरण, प्रकृति के प्रति भी सद्भाव की कमी आई और सबका नतीजा निकला यह रक्तपात। हम कुछ सबक सीखेंगे?

वैज्ञानिक हमें बराबर चेतावनी दे रहे हैं कि आने वाले बीस-तीस बरस में हमारे देश के भूजल भंडार का कोई 60 प्रतिशत भाग इस बुरी हालत में नीचे चला जाएगा कि फिर हमारे पास ऊपर से आने वाली बरसात, मानसून की वर्षा के अलावा कुछ बचेगा नहीं। हमारा समाज ऐसी किसी प्राकृतिक विपदा को सहने के लिए और भी ज्यादा मजबूत हो चला है। लेकिन इससे बेफ्रिक तो नहीं ही हुआ जा सकता। धरती गरम हो रही है। मौसम, बरसात का स्वभाव बदल रहा है। इसलिए बिना सोचे समझे भूजल भंडारों के साथ ऐसा जुआ खेलना हमें भारी पड़ सकता है। अपने ही लोगों पर जहरीले रासायनिक हथियारों से हमला करने वाले सीरिया को सबक सिखाना चाहता है अमेरिका। उस पर हमला कर। पर अमेरिका के ही संगी साथी देश उसे इस हमले से रोकने में लगे हैं। लेकिन बाकी दुनिया अभी भी ठीक से समझ नहीं पा रही कि सीरिया के शासक बशर अल-असद ने आखिर अपने लोगों पर यह क्रूर अत्याचार भला क्यों किया है। तुर्की के पुराने उसमानी साम्राज्य के खंडहरों में से कांट-छांट कर बनाया गया था यह सीरिया देश। इसमें रहने वाले अलाविया और सुन्नियों, दुरूजी और ईसाइयों के बीच पिछले कुछ समय से चला आ रहा वैमनस्य निश्चित ही इस युद्ध का एक कारण गिनाया जा सकता है। यह भी कहा जा सकता है कि अभी कुछ ही समय पहले अरब में बदलाव की जो हवा बही थी और जो छूत के रोग की तरह आसपास के कई देशों में फैल चली थी, उसी हवा ने अब सीरिया को भी अपनी चपेट में ले लिया है। यह सब तो ठीक ही है। पर थोड़ा गहरे उतरें। तब हमें पता चलता है कि कोई पांच बरस पहले सीरिया के खेतों में पर्यावरण का भारी संकट उभरा था और उसी संकट ने आज चल रहे संघर्ष को बढ़ावा दिया है। इस दुखद किस्से को प्रायः अनदेखा ही किया है। इसी दुखद किस्से में हमारे देश के लिए भी एक सबक, पर्यावरण का एक पाठ छिपा हुआ है। पिछले दो सालों से बिना थके, बिना रुके चल रहे आपसी संघर्ष में, गृहयुद्ध में सीरिया के कोई एक लाख नागरिक अपनी जान गवां चुके हैं। कोई 20 लाख पुरुष, स्त्री, बच्चे अपने घरों से उजड़ कर आसपास के देशों में शरण लेने के लिए मजबूर किए गए हैं।

इस गहरी त्रासदी की काली छाया ने वहां के विभिन्न संप्रदायों और धर्मों में चले आ रहे सद्भाव को, मेल-मिलाप को, शांतिपूर्ण सहअस्तित्व को भी छिन्न-भिन्न कर दिया है। सीरिया के बाथ नामक सत्तारूढ़ दल के कठोर शासन ने यों धर्मनिरपेक्ष और उदारवादी ढांचा खड़ा किया था और इस वजह से वहां एक नया विकास हो सका था और एक हद तक नई समृद्धि के दरवाजे भी खुल गए थे। लेकिन पर्यावरण संकट की एक लंबी अवधि ने कट्टरवाद के राक्षस को जिंदा कर दिया था। दुनिया भर में सुरक्षा के विषय को बड़ी बारीकी से देखने-समझने वाले विद्वानों, विशेषज्ञों की जमात में श्री शहरजाद मोहतदी का बहुत नाम है। उन्होंने पिछले दिनों आणविक वैज्ञानिकों की एक पत्रिका ‘बुलेटिन ऑफ एटॉमिक साईंटिस्ट्स’ में लिखे अपने एक लेख में दुनिया के मौसम में हो रहे बदलाव और सीरिया की वर्तमान राजनैतिक उथल-पुथल को बड़ी ही गहराई से जोड़कर देखा है। यों रेगिस्तानी हिस्से में बसे इस छोटे-से देश में हर कभी कम वर्षा के कारण अकाल तो समय-समय पर आते ही रहे हैं, लेकिन सन् 2006 से 2010 के बीच में आई वर्षा में कमी से जो भयानक अकाल पड़ा, उसने इस देश के उत्तरी पूर्वी हिस्से में बने अनाज के कटोरे को एकदम खाली कर दिया था। फिर यहां रेगिस्तान ने भी अपना पैर पसार दिया था।

तब वहां की हालत इतनी खराब हो गई थी कि खेती-बाड़ी से उजड़ चुके कोई 15 लाख किसान अब वहां रह ही नहीं सकते थे। उन सबने पलायन शुरू किया और दमिश्क और उस जैसे अन्य शहरों की सीमा पर जहां भी जगह मिली फटे-पुराने कपड़ों, पन्नियों, टीन-टप्पर से काम चलाऊ तंबू आदि बनाकर रहना शुरू कर दिया था। अनाज उत्पादन में भारी गिरावट आई। जो देश कल तक गेहूं उगा कर बाहर के देशों को बेचता था, अब उसको खाने के लाले पड़ने लग गए। सीरिया ने गेहूं बाहर से खरीदना शुरू किया। पर इस कदम से अनाज के दाम बढ़ चले, सचमुच आसमान छूने लगे। ज्यादातर किसान सुन्नी थे। उन्हीं को इसकी सबसे ज्यादा मार झेलनी पड़ी। पर उनकी इस दुर्दशा को सीरिया के सत्तारूढ़ शिया संप्रदाय का नेतृत्व समझ नहीं पाया। उन किसानों की बराबर उपेक्षा होती रही। फिर सन् 2011 के मार्च महीने में इस बेहद तनाव भरी हालत में जैसे एक बड़ा धमाका हो गया। अपने खेतों, घरों, गाँवों से उखड़ कर दारा शहर में आ बसे लोगों के कुछ बच्चों ने वहां के एक स्कूल की दीवार पर सरकार विरोधी कुछ नारे लिख दिए। रक्षाबल के सैनिकों ने इन बच्चों को गिरफ्तार कर लिया और बताया जाता है कि उन्हें तरह-तरह से यातनाएं भी दी गईं।

दारा में इसके खिलाफ जो आग भड़की, वह देखते ही देखते पूरे देश में फैल गई। देश में सरकार के खिलाफ पहले से ही एक सशस्त्र विरोधी गुट काम कर रहा था। अपने को असहाय पाकर इन सुन्नी किसानों में से कुछ को लगा कि इन विरोधियों के साथ ही जा मिलना चाहिए और सरकार को सबक सिखाना चाहिए।

जिन शहरों के आसपास ये किसान भारी संख्या में डेरा डाले बैठे थे, फिर उन्हीं इलाकों में भयानक हिंसक विरोध फैल गया और उन्हीं जगहों पर सरकार ने पहले शस्त्रों से हमला कर उसे दबाने की असफल कोशिश की, फिर वायुसेना के जहाजों से अपने ही नागरिकों पर बमबारी भी की और अंत में तो इन्हीं ठिकानों पर सरकार ने पिछले दिनों जहरीली रासायानिक गैस से भी आक्रमण किया। यह तो पक्की तौर पर कहा जा सकता है कि सीरिया सरकार को वहां के लंबे अकाल के लिए पूरी तरह से तो जिम्मेदार ठहराया नहीं जा सकता। वैज्ञानिकों का कहना है कि यह तो हमारी अपनी ही करतूतों के कारण आ रहे जलवायु परिवर्तन के कारण सामने आई भयानक घटना है। लेकिन ऐसी हालत में भी वहां की सरकार अपनी गलत कृषि नीति से इस अकाल को बढ़ावा तो दे ही रही थी।

बरसात कम होती थी। पिछले दौर में और भी कम होती गई। पर सरकारी कृषि नीति ने किसानों को कपास बोने की तरफ मोड़ा। कपास का निर्यात सरकार की कमाई का एक बड़ा साधन बन गया था। पर कपास उगाने के लिए किसानों को अपने क्षेत्र का भूजल भंडार खाली करते जाना पड़ा। अमेरिका के अंतरिक्ष कार्यक्रम संभालने वाले ‘नासा’ के एक भूजल विशेषज्ञ श्री जॉय फैमिंगलिट्टी का कहना है कि उन्होंने पिछले सात सालों में उपग्रह की तस्वीरों से सीरिया के इस क्षेत्र का बड़ी बारीकी से अध्ययन कर यह पाया है कि यहां की दो नदियों- टाइग्रिस और यूफ्रेटिस- के क्षेत्र में भूजल भंडार बहुत तेजी से नीचे उतर गया है। दुनिया में तेजी से घटते भूजल भंडार में इस क्षेत्र का स्थान दूसरा है। और पहला देश भला कौन-सा है? हमारा प्यारा भारत! गेहूं और कपास के निर्यात में ठीक सीरिया की ही तरह हमारे देश ने भी धान और कपास के निर्यात से दुनिया के देशों में अपना स्थान ऊपर कर लिया है- और इन दोनों फसलों, जिन्सों को पैदा करने में हमने अपना सबसे कीमती भूजल भंडार खाली करने में कोई कसर नहीं छोड़ी है। आज देश के अनेक जिलों में भूजल इतना ज्यादा नीचे गिर चुका है कि अब उसे दुबारा भरा जाना एक मुश्किल काम बन गया है।

वैज्ञानिक हमें बराबर चेतावनी दे रहे हैं कि आने वाले बीस-तीस बरस में हमारे देश के भूजल भंडार का कोई 60 प्रतिशत भाग इस बुरी हालत में नीचे चला जाएगा कि फिर हमारे पास ऊपर से आने वाली बरसात, मानसून की वर्षा के अलावा कुछ बचेगा नहीं। यहां सीरिया और भारत की तुलना करने का यह अर्थ नहीं है कि यहां भी वहीं जैसे दुखद परिणाम आने वाले हैं। पिछले 66 बरस के हमारे लोकतंत्र ने अपनी एकता पर आने वाले कई बड़े-बड़े संकट झेले हैं। आज तो हमारा समाज ऐसी किसी प्राकृतिक विपदा को सहने के लिए और भी ज्यादा मजबूत हो चला है। लेकिन इससे बेफ्रिक तो नहीं ही हुआ जा सकता। धरती गरम हो रही है। मौसम, बरसात का स्वभाव बदल रहा है। इसलिए बिना सोचे समझे भूजल भंडारों के साथ ऐसा जुआ खेलना हमें भारी पड़ सकता है।

अनुभवी पत्रकार श्री नयन चंदा दुनिया की कई जानी-मानी पत्रिकाओं का संपादन कर चुके हैं। एशिया में राजनीति पर गहन लेखन उनकी विशेषता है। आजकल वे अमेरिका के येल सेंटर फॉर स्टडी ऑफ ग्लोबलाईजेशन के प्रकाशन विभाग के निदेशक हैं।

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