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जौ व जई से पर्यावरण बचाने की मुहिम

Author: 
संतोष सारंग
Source: 
चरखा फीचर्स, दिसंबर 2013
पर्यावरण को स्वच्छ रखना हम सब की ज़िम्मेदारी है। ग्लोबल वार्मिंग का खतरा आज जिस तरह से बढ़ रहा है, उससे कोई अंजान नहीं है। शहर तो शहर, गांव-देहात के लोग भी पर्यावरण संरक्षण की दिशा में थोड़े-बहुत ही सही, पर सोचने लगे हैं। छत्तीसगढ़ में आई विनाशकारी प्राकृतिक आपदा एवं चक्रवाती तूफान फैलिन ने सोए लोगों को जगाया है। सरकारी व गैर सरकारी स्तर पर धरती को बचाने को लेकर चिंता की जा रही है। गत दो-तीन साल से बिहार के समाचार पत्रों ने दीपावली पर केरोसिन व पटाखों का प्रयोग न करने को लेकर स्कूली छात्र-छात्रों व लोगों के बीच अभियान चलाया है। ग्लोबल वार्मिंग के बढ़ते ख़तरों को देखते हुए और लोगों में पर्यावरण के प्रति जागरूकता पैदा करने के मकसद से हर साल पांच जून को पर्यावरण दिवस मनाया जाता है। सवाल यह उठता है कि क्या जलवायु परिवर्तन और ग्लोबल वार्मिंग जैसे मुद्दों से निपटने के लिए क्या वैश्विक स्तर पर गंभीर प्रयास हो रहे हैं। पर्यावरण के बिगाड़ का मामला किसी देश या विदेश से नहीं जुड़ा है बल्कि इसको बिगाड़ने में आज छोटे बड़े सभी देश शामिल हैं। ग्रीन हाउस गैसों का उत्सर्जन और तापमान में वृद्धि का सबसे बुरा असर परिस्थितीय तंत्र और जीवन चक्र पर पड़ा है। ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन ने पर्यावरण को तो दूषित किया ही है, साथ ही साथ इसने फसल चक्र को भी काफी प्रभावित किया है। सवाल यह उठता है कि पर्यावरण को बचाने के लिए क्या वैश्विक स्तर पर कुछ हो रहा है? क्या हम कभी इस समस्या से निपट पाएंगे? क्या हम अपनी आने वाली पीढ़ी को स्वच्छ वातावरण उपलब्ध करा पाएंगे? वर्तमान परिस्थिति को देखकर तो ऐसा नहीं लगता। हां कुछ लोग ज़रूर हैं जो पर्यावरण को बचाने के लिए प्रयासरत हैं। हमें यह समझना होगा कि पर्यावरण को बचाने की ज़िम्मेदारी सिर्फ केद्र सरकार और राज्य सरकारों की ज़िम्मेदारी नहीं है।

पर्यावरण को स्वच्छ रखना हम सब की ज़िम्मेदारी है। ग्लोबल वार्मिंग का खतरा आज जिस तरह से बढ़ रहा है, उससे कोई अंजान नहीं है। शहर तो शहर, गांव-देहात के लोग भी पर्यावरण संरक्षण की दिशा में थोड़े-बहुत ही सही, पर सोचने लगे हैं। छत्तीसगढ़ में आई विनाशकारी प्राकृतिक आपदा एवं चक्रवाती तूफान फैलिन ने सोए लोगों को जगाया है। सरकारी व गैर सरकारी स्तर पर धरती को बचाने को लेकर चिंता की जा रही है। गत दो-तीन साल से बिहार के समाचार पत्रों ने दीपावली पर केरोसिन व पटाखों का प्रयोग न करने को लेकर स्कूली छात्र-छात्रों व लोगों के बीच अभियान चलाया है। इसका असर भी दिख रहा है। बीते दीपावली पर मुज़फ़्फ़रपुर के छात्र-छात्रों ने पटाखों के पैसे बचा कर एक अस्पताल में भर्ती मरीजों के बीच फल व कपड़े बांट कर पर्यावरण बचाने का संदेश दिया। मोतिहारी में एक स्कूल के बच्चों व प्रबंधन ने मिलकर प्रकाश पर्व दीपावली पर पौधे रोप कर अभियान को आगे बढ़ाया।

जौ और जई से पर्यावरण बचाने का मुहिमपॉलीथिन से मिट्टी, पानी दूषित हो रहा है। इसके अंधाधुंध प्रयोग से नाले, नदियां एवं शहर के ड्रेनेज सिस्टम की सेहत बिगड़ रही है। कागज़ और कपड़े के झोले गायब हो गए। एक समय था जब हम बाज़ार जाते थे, घर से कपड़े का थैला ले जाना नहीं भूलते थे। लेकिन आज हम एक माचिस भी खरीदते हैं, तो दुकानदार से पॉलीथिन मांगना नहीं भुलते हैं। पॉलीथीन के बढ़ते इस्तेमाल से आज घर-घर ,गली-गली ,सड़कों पर पॉलीथिन का कचरा बिखरा पड़ा दिख जाता है। जानवर कूड़े के ढेर पर जूठन या अन्य सामान खाते हैं, वे पॉलीथिन भी खा जाते हैं। यह उसके लिए हानिकारक है। पॉलीथिन के खतरे से निपटने के लिए कई प्रदेशों ने इस पर प्रतिबंध लगाया है। मुज़फ़्फ़रपुर नगर निगम ने हाल में पॉलीथिन के प्रयोग पर प्रतिबंध लगाया है। प्रतिबंध के बावजूद पॉलीथिन का प्रयोग करने वाले दुकानदारों पर जुर्माना लगाया जा रहा है। इस तरह की कार्रवाई के ज़रिए ही हम पॉलीथिन के इस्तेमाल को कम कर सकते हैं।

इधर, कृषि क्षेत्र में भी ग्लोबल वार्मिंग के खतरे से निपटने के लिए कवायद चल रही है। बिहार का कृषि विभाग तापमान को नियंत्रित रखने वाली खरीफ व रबी की चार फसलों जौ, जई, मडुवा व बाजरे से पर्यावरण संरक्षण की मुहिम को तेज करने जा रहा है। राज्य सरकार ने राष्ट्रीय कृषि विकास योजना में इन चारों फसलों को शामिल किया है, ताकि किसान इन फसलों को उगा कर पर्यावरण मित्र की अहम भूमिका निभा सके। दरअसल, जौ व जई की खेती में लागत कम होने के साथ रासायनिक खाद व कीटनाशकों का प्रयोग भी नहीं करना पड़ता है। इन फसलों को पानी भी अधिक नहीं चाहिए। लिहाज़ा इसकी खेती से पानी का बचत भी होगा। इन फसलों को लगाने लिए विभाग ने किसानों को प्रोत्साहन देने का मन बनाया है। जौ व जई की खेती के लिए 1600 रुपए प्रति एकड़ प्रोत्साहन राशि दी जाएगी। मुज़फ़्फ़रपुर के जिला कृषि पदाधिकारी के के शर्मा कहते हैं ‘‘राज्य सरकार ने टीडीसी को जौ व एनएससी को जई का बीज उपलब्ध कराने का निर्देश दिया है।

जौ और जई से पर्यावरण बचाने का मुहिममक्का, धान, गेहूं के मुकाबले इन फसलों में रासायनिक खाद व कीटनाशकों का प्रयोग नगण्य होता है। राज्य सरकार की ओर से इन फसलों को प्रोत्साहन देने का मुख्य उदेश्य किसानों में पर्यावरण के प्रति जागरूकता पैदा करना है। केंद्र सरकार के साथ-साथ राज्य सरकारें पर्यावरण को नुकसान से बचाने के लिए तरह तरह के उपाय कर रही है। लेकिन लोगों में जागरूकता की कमी की वजह से सरकार की ओर से चलाई जा रही पर्यावरण बचाओ मुहिम का फायदा बहुत ज़्यादा नहीं हो पा रहा है। पर्यावरण को साफ सुथरा बनाए रखने के लिए सभी को अपना कर्तव्य समझना होगा और साथ मिलकर काम करना होगा। कहने का तात्पर्य यह है कि अगर पर्यावरण के प्रति हमने संजीदगी न दिखाई तो आने वाला समय भयावक हो सकता है। अब वक्त आ गया है कि सभी राष्ट्र विकसित और विकासशील की श्रेणी से उठकर पर्यावरण खतरे का निदान ढूंढे। हमें पुरानी गलतियों से सीख लेकर एक साथ इस समस्या के निदान के लिए काम करना होगा।

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