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नियंत्रित उत्पादन

Author: 
विमल भाई
ऐसी अनेक सच्चाईयां सामने आई हैं, जो किसी सुदूर आदिवासी क्षेत्र की कहानी नहीं है। यह समृद्ध केरल के त्रिशूर जिले के कत्तीखुलम गांव की कहानी है। जहां केरल पुलिस के शर्मनाक-बर्बरतापूर्ण कार्य था। 1976 में त्रिशूर जिले के खत्तीकुडंम गांव में जापान की कंपनी के साथ जुड़ी हुई ‘नीत्ता गैलेटिन इंडिया लिमिटेड‘ कंपनी जब से चालू हुई तब से क्षेत्र का पानी, हवा, मिट्टी खराब हो रहा हैं। कैंसर से कई लोग मारे गए। सरकार की एक समिति को एनजीएल ने स्वयं बताया कि पास के कुओं का पानी पीने लायक नहीं है।5 दिसंबर को केरल उच्च न्यायालय ने अपने आदेश में कहा की एनजीएल कंपनी ‘नियंत्रित उत्पादन’ कर सकती है चूंकि अभी तक की तमाम समितियों ने कहा है कि प्रदूषण है इसलिए नेशनल एंवायरनमेंटल इंजीनियरिंग रिसर्च इंस्टीट्यूट (नीरी संस्थान) से जांच कराई जाए। नीरी की रिर्पोट दो महिने के आ जानी चाहिए। कंपनी के गेट के बाहर धरना जारी है। एक नंवबर से 2 सत्याग्रही अनिश्चितकालीन भूख हड़ताल पर बैठे हैं। 7 नवंबर को पुलिस ने स्वास्थ्य बिगड़ने पर उन्हें उठाया तो 2 अन्य लोग बैठे। 11 नवंबर को केरल के उद्योगमंत्री ने कहा हम कंपनी को इस तरह नहीं चलने देंगे। वो मशीनें बदले और प्रदूषण रोकें।

केरल उच्च न्यायालय के आदेश बहुत मजेदार है। पहले जब कंपनी को लोगों के आंदोलन से खतरा लगा तो वो उच्च न्यायालय गई और वहां से उन्हें राज्य द्वारा पुलिस सुरक्षा प्राप्त करने का आदेश मिल गया। कंपनी की तथाकथित सुरक्षा में लगी इस पुलिस ने क्या-क्या कहर ढाया ये अस्पतालों के चक्कर काटते लोग बता सकते हैं।

ऐसी अनेक सच्चाईयां सामने आई हैं, जो किसी सुदूर आदिवासी क्षेत्र की कहानी नहीं है। यह समृद्ध केरल के त्रिशूर जिले के कत्तीखुलम गांव की कहानी है। जहां केरल पुलिस के शर्मनाक-बर्बरतापूर्ण कार्य था। 1976 में त्रिशूर जिले के खत्तीकुडंम गांव में जापान की कंपनी के साथ जुड़ी हुई ‘नीत्ता गैलेटिन इंडिया लिमिटेड‘ कंपनी जब से चालू हुई तब से क्षेत्र का पानी, हवा, मिट्टी खराब हो रहा हैं। कैंसर से कई लोग मारे गए। सरकार की एक समिति को एनजीएल ने स्वयं बताया कि पास के कुओं का पानी पीने लायक नहीं है। गांव में गैस रिसाव से सांस की बीमारी फैली, स्थानीय पुलिस ने एनजीएल के खिलाफ याचिका दायर किया है। वो केस चालू है।

एनजीएल कंपनी के खिलाफ लोगों का विरोध21 जुलाई, 2013 को एनजीएल कंपनी के इशारे पर प्रर्दशनकारियों को पुलिस ने पीछा करके पीटा और सिर पर चोट मारी है। जानसन के 50 चोटे हैं 6 टांके आए हैं। वे बताते हैं कि 20 जुलाई की रात को हमने घोषणा किया हम शांतिपूर्ण रहेंगे। लोग दूर से आए थे। वे पीछे रहे हमारे हाथ खड़े थे अहिंसक थे हम, सफेद झंड़ों के साथ। पुलिस ने रोका बैरीकेट पर हम रुके। भाषण हुए। फिर गेट के पास पहुंचे 2000 से 2500 लोग थे। 3-30 पर घोषणा हुई फिर पुलिस ने 15 मिनट में महिलाओं को गिरफ्तार किया। फिर बिना किसी अधिकारी की अनुमति और घोषणा किए, पानी की बौछार की गई। कंपनी का गेट खुला 400 के लगभग पुलिस वाले अंदर से आए। उन्हें सारी रात जगाया गया था। फिर शराब दिया गया था। पुलिस ने लैपटॉप, कैमरा आदि लूटा। लोगों को कई किलोमीटर तक दौड़ाया। सब पूर्व नियोजित लगता था। हर आदमी को 50 लाठी मारी होगी। मैं 40 दिनों से एनजीएल के दरवाज़े पर चल रहे सत्याग्रह में शामिल था। मुझे मारा और कहा भागो यहां से। कन्नूर जिले से आंदोलन की सर्पोटर 22 वर्षीय र्शिनी को बुरी तरह मारा है। वो दो महिने से फोटो ले रही थी। 40-50 मोटर बाईक, कारें पुलिस ने उठा ली।

अनिल कुमार पर 40 केस है वो संघर्ष समिति के समन्वयक हैं। बताते हैं, दवाई के कैप्सूल के खोल बनाने के लिए एनजीएल कंपनी प्रतिदिन 96 टन जानवरों की हड्डी इस्तेमाल करती थी अब 140 टन करती है। 90 टन कचरा प्रतिदिन निकलता है जिसे चालकुडी नदी में डाला जाता है। 140,000 लीटर एसिड को सुधार करके यानि न्यूराईस्ट किया जाता है। इससे प्रतिदिन पानी में ऑक्सीजन घटती जा रही है तथा मछली खत्म हो रही हैं। हमें कर्जा नहीं मिल रहा है। गांव में ज़मीन का मूल्य गिरा है। शादियाँ रुकी हैं, गर्भपात हो रहे हैं। 30 प्रतिशत लोगो को कैंसर 60 प्रतिशत लोगों को दूसरी बीमारियाँ और 10 प्रतिशत लोगों को मानसिक आद्यात है।

एनजीएल कंपनी के खिलाफ लोगों का विरोधलोगों ने बताया कि चावल भी प्रदूषित होता है और गाय का दूध भी बदबू देता है। एक तालाब बनाया है जिसमें बेस अपशिष्ट डालते हैं दिखाने को बांस लगाया है। कंपनी अपनी कोच्चि की फ़ैक्टरी का ठोस अपशिष्ठ भी यही लाकर डालती हैं। एनजीएल कंपनी केरल आर्युवैदिक का ठोस अपशिष्ट मिलाते हैं कम्पोस्ट बनाने को किंतु वास्तव में वो खतरनाक अपशिष्ट बनता है। केरल पुलिस भी बोतल का पानी खरीदती है जबकी कंपनी का कहना है कि गांव का पानी साफ है।

21 जुलाई 2013 को शासन-प्रशासन-कंपनी के गठबंधन द्वारा लोगों पर जुल्म की खबर के बाद देश के आंदोलनों ने एक जन आयोग बनाया जिसमें मेरे अलावा कर्नाटक उच्च न्यायालय के वकील क्लीफ्टन रोजारियों, पर्यावरण कार्यकर्ता और गंदगी की विशेषज्ञ सुश्री श्वेता नारायण, केरल वन अध्ययन संस्थान के डा. टी. वी. सजीव, समाजविज्ञानी डा. देविका, पीयूसीएल केरल के अध्यक्ष वकील पी. ए. पौरिन, लेखिका व महिला डा. सुश्री खतीज़ा मुमताज़ तथा डा. डी सुरेन्द्रनाथ थे। 30 जुलाई को हम प्रभावितों से मिले और कंपनी के क्षेत्र को देखा। मजे की बात थी हम जब कंपनी के आसपास थे तो वहां बहुत अच्छी खुशबू आ रही थी पर दोपहर होते-होते कंपनी की असली बदबू ने वहां रहना मुश्किल कर दिया। लोग महीनों से वहां धरना दे रहे हैं।

31 जुलाई को हम ज़िलाधीश सुश्री एम. एस. जया व पुलिस कमिश्नर श्री पी. प्रकाश व पुलिस सुपरीटेन्डेट सुश्री अजीता बेगम से मिले। इनके साथ तहसीलदार थे। किसी में भी घटना पर कही कोई शर्म नहीं नज़र आई। तहसीलदार का कहना था कि पुलिस के वाहनों पर हमला हुआ तब हमने लाठी चार्ज की इजाज़त दी थी। घटना 4 बजे हुई। हमारे 20 पुलिस घायल हुए व 3 को ज्यादा चोटें आईं और ग्रामीणों में 37 लोग घायल हुए। महिला पुलिस प्रधान का कहना था कि पत्थर आए तो हमें भी कुछ करना था वरना लोग पुलिस को हल्के में लेंगे। तर्क तो बड़ा शानदार दिया गया। वैसे उनके ही मुताबिक आंसू गैस पार्टी थी, वाटर कैनन का इंतज़ाम था। किंतु इस्तेमाल क्यों नहीं किया? इसका उत्तर उनके पास नहीं था। पुलिस की मर्यादा रक्षा के लिए लोगों पर 40 आपराधिक केस दायर किए गए हैं।

एनजीएल कंपनी के खिलाफ लोगों का विरोधमेरे को तो दिल्ली दूरर्शन पर आया अनेक छोटी प्यारी सी कहानियों वाला धारावाहिक ‘‘चालकुडी डेज़‘‘ याद था। और कहां ये भयानक कहानियां सुनने को मिली। तो मेरा दृष्टिकोण केरल के लिए बदल जाता पर ग्रामप्रधान का मजबूत चेहरा सामने आता है। महिला प्रधान डेज़ीफ्रांसिस लोगों के अधिकारों की रक्षा के लिए मजबूती से खड़ी हैं। उसने अपनी पार्टी के विधायक से साफ कहा आप मेरे नेता है पर मैं अपने लोगों को नही छोड़ सकती। 21 जुलाई की घटना के सारे समय प्रधान डेज़ीफ्रांसिस लोगों के पास ही रहीं। उसने 3 साल से एनजीएल को अनापत्ति पत्र नहीं दिया है। देखा जाए तो एनजीएल असंवैधानिक तरह से चल रही है।

लड़ाई जारी है, धरना जारी है, भूखहड़ताल जारी है, प्रदूषण रुकने तक, पानी साफ होने तक, हवा में खुशबू आने तक, जीतने तक।

In this matter of qualities

In this matter of qualities of management there are no golden rules

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