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संकट में खेती-किसानी

Author: 
रविशंकर
Source: 
जनसत्ता (रविवारी), 16 मार्च 2014
सरकार की गलत नीतियों के कारण सिंचाई, घरेलू उद्योग, दस्तकारी और ग्रामीण जीवन प्रभावित हो रहा है। इसके चलते देश का किसान बदहाल है। कृषि के आधुनिकीकरण की जरूरत है और इसके लिए पूंजीनिवेश आवश्यक है। सिंचाई के साधन विकसित करने पर जोर देना होगा। आज हालत यह है कि किसानों को उनकी लागत ही नहीं मिलती। किसान खेती के लिए कर्ज लेता है। कभी अतिवृष्टि तो कभी अकाल की वजह से फसल चौपट हो जाती है। मौसम साथ दे और अच्छी फसल हो तो किसानों को उपज का उचित मूल्य नहीं मिलता। ऐसे में किसान कर्जदार तो होंगे ही। आज भारतीय कृषि बहुत अच्छी स्थिति में नहीं है। फिर भी लगभग दो-तिहाई आबादी अपने जीविकोपार्जन के लिए कृषि और उससे जुड़ी गतिविधियों पर निर्भर हैं। इतना ही नहीं, भारत में आवश्यक खाद्यान्न की लगभग सभी पूर्ति कृषि के माध्यम से की जाती है। इस तथ्य के मद्देनजर कृषि क्षेत्र की बदहाली आपराधिक लापरवाही लगती है।

आजादी के बाद जिस कृषि क्षेत्र को कुल बजट का 12.5 प्रतिशत तक आबंटित किया जाता था वह अब घटकर 3.7 प्रतिशत रह गया है, जबकि बढ़ती चनौतियों के मद्देनजर होना इसके उलट चाहिए था। चौबीस फसलों में से मुख्य रूप से दो गेहूं और धान, का न्यूनतम समर्थन मूल्य तय करने पर सरकार का ध्यान रहता है। पर न्यूनतम समर्थन मूल्य तय करने का तरीका भी विवादस्पद है। जाने-माने कृषि वैज्ञानिक स्वामीनाथन की अध्यक्षता वाले आयोग ने लागत में पचास प्रतिशत मुनाफा जोड़ कर न्यूनतम समर्थन मूल्य तय करने की सिफारिश की थी, लेकिन सरकार आज तक उस पर अमल करने को तैयार नहीं है।

सच है कि कृषि क्षेत्र भारत में सबसे बड़ा नियोक्ता है। लेकिन खेती को घाटे का सौदा बना कर हम बेरोजगारी और असंतोष ही बढ़ा रहे हैं। वहीं आज अधिकतर किसान कर्ज के बोझ से दबे हैं। जबकि कृषि ऐसा क्षेत्र है, जहां देश की सबसे अधिक आबादी सबसे कम आमदनी के साथ रहती है। देश की जीडीपी में कृषि का योगदान बराबर गिरता जा रहा है। फिलहाल यह आंकड़ा तेरह-चौदह प्रतिशत पर पहुंच गया है। मतलब साफ है कि किसान अस्तित्व के संकट से जूझ रहे हैं। कृषि दिन-प्रतिदिन घाटे का सौदा होती जा रही है, इसलिए साठ प्रतिशत से अधिक किसान दो जून की रोटी के लिए मनरेगा पर निर्भर हैं। यानी देश के लिए खाद्यान्न पैदा करने वाले खुद भूखे पेट सोने को मजबूर हैं।

कृषि क्षेत्र की बदहाली का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि पिछले सत्रह वर्षों में लगभग तीन लाख किसान आत्महत्या कर चुके हैं। अधिकतर आत्महत्याओं का कारण कर्ज है, जिसे चुकाने में किसान असमर्थ हैं। जबकि 2007 से 2012 के बीच करीब 3.2 करोड़ किसान अपनी जमीन और घर-बार बेच कर शहरों में आ गए। कोई हुनर न होने के कारण उनमें से ज्यादातर को निर्माण क्षेत्र में मजदूरी या दिहाड़ी करनी पड़ी। 2011 की जनगणना के अनुसार हर रोज ढाई हजार किसान खेती छोड़ रहे हैं। कुछ अन्य अध्ययनों से पता चलता है कि हर दिन करीब पचास हजार लोग गांवों से शहरों की ओर कूच कर जाते हैं। इनमें मुख्यतौर पर किसान शामिल हैं।

राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण संगठन के अनुसार अगर विकल्प मिले तो बयालीस प्रतिशत किसान खेती-बाड़ी को हमेशा के लिए छोड़ देना चाहते हैं, लेकिन विकल्प न होने के कारण वे जमीन जोतने को मजबूर हैं।

अर्थशास्त्री और नीति निर्माता इसे आर्थिक विकास का प्रतीक बताते हैं। बहरहाल, देश में आय के बढ़ते अंतर को समझने के लिए गांवों और खेती की दुर्दशा को जानना जरूरी है। गौरतलब है कि वर्ष 2005-2009 के दौरान जब देश की आर्थिक विकास दर आठ-नौ फीसद की दर से कुलांचे भर रही थी तब भी 1.4 करोड़ किसानों ने खेती छोड़ी इसका अर्थ यही हुआ कि आर्थिक विकास का फायदा किसानों को नहीं मिला और न ही वहां रहने वाली आबादी की आमदनी में उल्लेखनीय इजाफा हुआ। अगर आर्थिक विकास का लाभ गांवों तक पहुंचता तो किसान अपना घर-बार छोड़ कर शहरों की तरफ पलायन नहीं करते।

खेती के प्रति बढ़ते मोहभंग की कुछ वजहें साफ हैं। सरकारी नीतियां कृषि और किसान-विरोधी हैं। खाद, बीज, डीजल और महंगे मजदूरों के चलते खेती आज घाटे का धंधा बन गई है। खेती में लागत बढ़ी है, जबकि कृषि उत्पादों की खरीद में सारा लाभ बिचौलिए हड़प लेते हैं। दूसरी ओर सबसे बड़ी परेशानी सरकार द्वारा दी गई सुविधाएं किसानों तक नहीं पहुंच पाती है। अगर पहुंचती भी है तो संपन्न किसानों के पास। वहीं दूसरी ओर देश के ज्यादातर किसानों की आय राष्ट्रीय औसत से कम है। उन्हें न तो अपनी उपज का सही मूल्य मिल पाता है और न ही कृषि को लेकर मौजूदा सरकारी नीति से उन्हें लाभ पहुंचता है। वे कम उत्पादन करने पर भी मरते हैं और अधिक उत्पादन करने पर भी दरअसल, हमने कृषि और किसानों को उतनी तरजीह नहीं दी, जितनी देनी चाहिए थी। अक्सर मानसून को दोष देकर हम अपनी कमियां छिपाते रहे। इसका परिणाम यह हुआ कि किसान और गरीब होते जा रहे हैं।

आज भले हम दावा करें कि भारत विकसित देशों की श्रेणी में आने वाला है, लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि ग्रामीण क्षेत्रों में लोग खेती-किसानी का काम कर्ज की मदद से ही कर पा रहे हैं। जबकि कृषि की हालत में सुधार के बिना न तो देश की हालत में सुधार संभव और न ही किसानों की। किसानों के लिए खेती जीवन-मरण का प्रश्न है। इसके बावजूद सरकार को जितना कृषि पर ध्यान देना चाहिए, उतना नहीं दिया।

सरकार की गलत नीतियों के कारण सिंचाई, घरेलू उद्योग, दस्तकारी और ग्रामीण जीवन प्रभावित हो रहा है। इसके चलते देश का किसान बदहाल है। कृषि के आधुनिकीकरण की जरूरत है और इसके लिए पूंजीनिवेश आवश्यक है। सिंचाई के साधन विकसित करने पर जोर देना होगा। आज हालत यह है कि किसानों को उनकी लागत ही नहीं मिलती। किसान खेती के लिए कर्ज लेता है। कभी अतिवृष्टि तो कभी अकाल की वजह से फसल चौपट हो जाती है। मौसम साथ दे और अच्छी फसल हो तो किसानों को उपज का उचित मूल्य नहीं मिलता। ऐसे में किसान कर्जदार तो होंगे ही।

वहीं, प्राकृतिक संसाधनों और सार्वजनिक तथा निजी निवेश में लगातार हो रही कमी और वैज्ञानिक तरीकों के कम इस्तेमाल से कृषि उत्पादकता पर असर पड़ रहा है। देश के ज्यादातर इलाकों में खेती आज भी पारंपरिक तरीकों और संसाधनों पर निर्भर है। रासायनिक उर्वरकों और कीटनाशकों के अधिक इस्तेमाल से मिट्टी पर पड़ने वाले प्रतिकूल असर की बात साबित हो जाने के बाद भी सरकारों ने बजाए नए संसाधन जुटाने पर खर्च करने के, उर्वरकों पर सब्सिडी जारी रखी है।

पिछले डेढ़-दो दशकों में जो भी सरकार बनी, उसने कृषि क्षेत्र की उपेक्षा की। बेशक कृषि क्षेत्र के लिए कई परियोजनाएं शुरू की गई, लेकिन उनका क्रियान्वयन ठीक ढंग से नहीं किया गया। राष्ट्रीय कृषि विकास योजना, राष्ट्रीय खाद्यन्न सुरक्षा मिशन, राष्ट्रीय बागवानी मिशन जैसी कई योजनाएं चल रही हैं। इसके अलावा भारत निर्माण, त्वरित सिंचाई लाभ कार्यक्रम, वर्षा आधारित क्षेत्र विकास कार्यक्रम के तहत काफी क्षेत्रों को सिंचित करने का प्रस्ताव भी है, लेकिन सही तरीके से क्रियान्वयन न होने की वजह से इसका अपेक्षित लाभ नहीं मिल पा रहा है।

अगर किसानों और कृषि के प्रति यही बेरुखी रही, तो वह दिन दूर नहीं जब हम खाद्य असुरक्षा की तरफ जी से बढ़ जाएंगे। खाद्य पदार्थों की लगातार बढ़ती कीमत हमारे लिए खतरे की घंटी है। आयातित अनाज के भरोसे खाद्य सुरक्षा की गारंटी नहीं दी जा सकती। विभिन्न आर्थिक सुधारों में कृषि सुधारों की चिंताजनक स्थिति को गति देना इसीलिए जरूरी है।

साथ ही सरकार को अब कृषि में निवेश के रास्ते खोलने चाहिए, जिससे देश के साथ किसानों का भी भला हो सेक। इस देश के किसानों को आर्थिक उदारवाद के समर्थकों की सहानुभूति की जरूरत नहीं है। अगर देश की हालत सुधारनी और गरीबी मिटानी है तो कृषि क्षेत्र की हालत सुधारना सबसे जरूरी है। देश की पैंसठ फीसदी आबादी की स्थिति सुधारे बिना देश का विकास नहीं हो सकता।

ईमेल : ravishankar.5107@gmail.com

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