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छत्तीसगढ़ में विकास और पर्यावरण समस्या और संभावना

Author: 
डॉ. हेमलाल वर्मा
Source: 
पर्यावरण विमर्श
छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर से लगा उरला-सिलतरा औद्योगिक क्षेत्र है। कभी यहां के खेतों में धान की फसल लहलहाती थी, आज बेतरतीब उगे हुए सैंकड़ों चिमनीयों से अनरवत् काला जहर निकल रहा है। इसके कारण रायपुर देश के सबसे प्रदूषित शहरों में तीसरे स्थान पर आ चुका है और यदि इन कारखानों से उगलते धुएं पर अंकुश नहीं लगाया गया तो शीघ्र ही प्रथम स्थान प्राप्त कर छत्तीसगढ़ का नाम बदनाम करेगा।प्रकृति की अनुपम रचना है हमारी पृथ्वी की श्रेष्ठ कृति है मानव। मानव द्वारा किए जा रहे नित नए अनुसंधानों एवं अविष्कारों, उसकी बढ़ती भौतिक सुख सुविधाओं की लालसा एवं स्वार्थ, जनसंख्या का तीव्र विकास, तेजी से बढ़ता औद्योगीकरण एवं नगरीकरण, प्राकृतिक संसाधनों का अति एवं असंतुलित दोहन आदि ने समग्र पर्यावरणीय कारकों यथा-जल, वायु, मृदा,वन, प्राकृतिक संसाधनों, सूक्ष्म जैविक संसधानों आदि को भारी क्षति पहुंचाई है।

विकास किसी भी देश एवं मानव की चाहत होती है। छत्तीसगढ़ एक नया राज्य है जहां सभी क्षेत्रों में तेजी से विकास हो रहा है। विकास की इस अंधी दौड़ ने पर्यावरण को भारी क्षति पहुंचाई है। इस शोध द्वारा विकास और पर्यावरण को समझने का प्रयास करेंगे।

छत्तीसगढ़ में कृषि विकास एवं पर्यावरण


छत्तीसगढ़ की मुख्य आबादी गांव में बसती है, जहां की अपनी जीवनशैली है। यहां का मुख्य व्यवसाय कृषि है। कृषि के लिए गांव के बाहर प्रायः सभी छोटे बड़े किसान का घुरवा होता है, जिसमें गाय और भैंस का गोबर डाला जाता है। भविष्य में यही उत्तम खाद बन जाती है और बरसात के पहले उसे खेतों में डाला जाता है, जिससे खेतों की उर्वरा शक्ति बढ़ जाती है और पैदावार अच्छी होती है। इससे पैदा हुए दुबराज चावल की खुश्बू से पूरा घर महक जाता है।

आज गांवों में ऐसा कुछ भी नहीं होता, क्योंकि आज हल की जगह ट्रैक्टर, गोबर खाद की जगह यूरिया खाद ने ले ली है। पानी नहीं बरसा तो नहर से लिया जाता है, जब नहर से पानी नहीं मीला तो ट्यूबवेल खोदकर पानी खींचकर सिंचाई की जाती है। भले हीं अब दुबराज चावल में खुश्बू नहीं है, लेकिन सरकार द्वारा कम समय में अधिक पैदावार देने वाले धान के बीज उपलब्ध करा दिए जाते हैं, कर्ज के बोझ में घर भले ही डूब जाए, इससे किसी को कुछ लेना देना नहीं होता। लोगों का मानना है कि कर्ज में हम जन्म लेते हैं, कर्ज में जीते हैं और कर्ज के लिए मर जाते हैं।

कहने का आशय है कि अब गांव के सीधे-साधे किसानों की जीवन शैली कथित विकास से अछूती नहीं है, जिसके कारण आज कृषि-भूमि उर्वरता खत्म हो रही है। रासायनिक दवाओं के प्रभाव से मित्रकीट मर रहे हैं। सरकार की विकास योजनाओं जैसे मनरेगा एवं एक रुपया और दो रुपया किलो में चावल मिलने के कारण कृषि के लिए समय पर मजदूर नहीं मिल पाते। इससे धंधा करने वालों की बन आई है, लोग हार्वेस्टर खरीदकर कर किराए पर चलाने लगे हैं।

लाचार किसान पहले तो ठेके पर काम करवाकर किसी तरह अनाज पैदा करता है और फसल काटने के लिए मजदूर नहीं मिलने पर हार्वेस्टर वाले की ओर दौड़ता है। हार्वेस्टर फसल काटता है, तब लगभग एक से सवा फुट तक डंठल खेत में छोड़ जाता है। इसे ही जब किसान हाथ से काटता है, तब चार छह इंच तक की नरई खेत में छुटती है हार्वेस्टर से फसल काटने से किसान के पास पैरा की कमी हो जाती है उसे पैरा खरीदने को बाध्य होना पड़ता है, क्योंकी छत्तीसगढ़ में पैरा ही पशुओं का प्रमुख भोजन है। हार्वेस्टर द्वारा कटाई से प्राप्त पैरा को पशु-प्रेम से नहीं खाते। इससे पशुओं का पोषण प्रभावित होता है। इस कारण किसान आज इन खेतों में खरीफ के बाद रबी की फसल नहीं ले पा रहा है।

जरा विचार कीजिए आज किसान की स्थिति क्या है? कृषि विकास और विपुल उत्पादन के नाम से कहीं हम कृषि भूमि का पर्यावरण ही तो नहीं बिगाड़ रहे?

छत्तीसगढ़ में औद्योगिक विकास एवं पर्यावरण


छत्तीसगढ़ में नदी-नलों के किनारे वाले गांवों में उद्योग लगने जा रहे हैं। इससे लोगों को उम्मीद है कि इन कारखानों में उन्हें रोजगार मिल जाएगा। व्यापारियों का व्यापार बढ़ जाएगा, मकान मालिकों को किराएदार मिल जाएंगे और इससे उसका विकास होगा। छत्तीसगढ़ शासन उद्योगपतियों को प्रतिष्ठान (कारखाना) लगाने के लिए आमंत्रित कर रही है, उन्हें भूमि मुहैया करा रही है। अकेले रायगढ़ जिले के आसपास लगभग डेढ़ सौ आयरन और पावर प्लांट लग चुके हैं। छत्तीसगढ़ का सबसे बड़ा जिंदल स्पंज और स्टील प्लांट यहां लग चुका है और जल्द ही उनका पावर प्लांट केलो नदी में लगने वाला है। इन कारखानों को पानी की पूर्ति नदियों के ऊपर बांधों से की जा रही है। बांध बनने से नदियों में पानी हीं नहीं है और है भी तो इन कारखानों से निकला रसायनयुक्त गंदा पानी है, जिससे नदियां प्रदूषित हो रही हैं।

छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर से लगा उरला-सिलतरा औद्योगिक क्षेत्र है। कभी यहां के खेतों में धान की फसल लहलहाती थी, आज बेतरतीब उगे हुए सैंकड़ों चिमनीयों से अनरवत् काला जहर निकल रहा है। इसके कारण रायपुर देश के सबसे प्रदूषित शहरों में तीसरे स्थान पर आ चुका है और यदि इन कारखानों से उगलते धुएं पर अंकुश नहीं लगाया गया तो शीघ्र ही प्रथम स्थान प्राप्त कर छत्तीसगढ़ का नाम बदनाम करेगा।

रायपुर जब छत्तीसगढ़ की राजधानी बना, तब लोग कल्पना किए हुए थे कि अब सब तरफ उच्चतम सुविधाएं होंगी, सब कुछ उजला, सब कुछ चकाचक होगा। परंतु हकीक़त यह है कि राजधानी के सिलतरा तरफ खेत काले, फसल काली, मकान काले, सड़कें काली, पशु-पक्षी काले, पेड़-पौधे काले, पानी काला, हवा काली, फेफड़ा काला और मरने वाले का कफन काला है, कहने का मतलब सब कुछ काला-ही-काला नज़र आता है।

इस प्रदूषण से छुटकारा पाने में उद्योगपति थोड़ा उदार हो जाएं, नेता ईमानदार और जनता सतर्क हो जाए तो इसका हल निकल जाएगा। सभी कारखानों में नियमतः प्रदूषण नियंत्रण प्रणालियां लगी हुई हैं। बैग फिल्टर एवं ईएसपी लगे हुए हैं, जरूरत है इन्हें निरंतर चालू रखवाने की। उद्योगपति बिजली बिल के चंद रुपए बचाने के लिए इसे घंटों बंद रखते हैं और सारा काला धुआं बेखौफ होकर वातावरण में छोड़ दिया जाता है। यह बहुत सोच-समझकर और षड्यंत्र पूर्वक किया जा रहा है।

एक तरफ रायपुर के सिलतरा को देखें और दूसरी तरफ भिलाई को, जहां का संयंत्र पूरे बारह किलोमीटर के लंबे चौड़े क्षेत्र में फैला हुआ है। वहां भी सैंकड़ों चिमनियां मुंहबाए खड़ी है,लेकिन प्रदूषण का नामोनिशान नहीं है। भिलाई की गिनती भारत के पांच सर्वाधिक स्वच्छ एवं प्रदूषण मुक्त शहरों में होती है।

देश में छत्तीसगढ़ कोयला और सीमेंट कारखाने के क्षेत्र में भी अग्रणी है। बलौदा बाजार क्षेत्र में सीमेंट के छोटे-बड़े बहुत से कारखाने हैं तथा कुछ बन भी रहे हैं। सरकार किसानों की कृषि-भूमि अधिग्रहित कर उद्योगपतियों को दे रही है इससे छत्तीसगढ़ में खेती की जोत का रकबा सिकुड़ता जा रहा है। किसान अपने ही घर में भूमिपति से भूमिहीन होकर मजदूर बनता जा रहा है। सरकार को इस औद्योगिक विकास के नाम पर किसान और उसके परिवारों पर पड़ने वाले दूरगामी दुष्प्रभावों पर भी चिंतन करना चाहिए। साथ ही उत्खनन से जो जमीन गड्ढों में बदल रही है, उसका पर्यावरण पर क्या असर होगा सरकार को सोचना होगा।

छत्तीसगढ़ में वन-विकास एवं पर्यावरण


छत्तीसगढ़ वनाच्छादित राज्य है, यहां के लगभग 40 प्रतिशत भाग में वन हैं। आदिकाल से यहां के निवासी इन वनों एवं वनोपज पर ही आश्रित रहे हैं जनसंख्या की तीव्र वृद्धि, औद्योगीकरण एवं नगरीकरण के कारण राज्य में वनों का प्राकृतिक क्षेत्र सिकुड़ता जा रहा है। मानव स्वार्थ एवं लालच आग में घी का काम कर रहा है। सरकार, ठेकेदार और इन क्षेत्रों के निवासियों के कारण जंगल कटते जा रहे हैं, जिसके कारण वन्य जीव-जंतुओं के लिए खतरा पैदा हो गया है। आखिर जंगल क्यों जरूरी है? पेड़ हमें क्या देता है? क्यों उन्हें बचाना जरूरी है?

वनों से हमें बहुत फायदा है, जंगल किसी भी जीव के जीवन का आधार है। पेड़- पौधे धरती को हरा-भरा बनाते हैं, इनकी जड़ें मिट्टी को बांधे रखती हैं, जिससे मिट्टी का कटाव रुकता है। घने जंगलों से भाप बनाकर उड़ा पानी वर्षा बनकर वापस आता है और धरती को हरा-भरा बनाता है, इस कारण से जंगल को बचाना जरूरी है।

जंगल के कटने से वन्य जीव आबादी की ओर आने लगे हैं। सरगुजा में जंगली हाथियों का कहर जारी है। आज छत्तीसगढ़ में गांव-का-गांव बंदरों के उत्पात से परेशान है। जंगल के कटने से भोजन की तलाश में ये बंदर झुंड-के-झुंड गांवों में वास करने लगे हैं, जिसके कारण गांव का पर्यावरण ही बदलने लगा है। बंदरों के आतंक से घर, बाड़ी एवं खलिहानों में लगाए मौसमी पेड़ यथा-अमरूद, मुनगा, जामुन, इमली, सीतापेड़, बोहार, बेर, बेल आदि को लोग काटने को मजबूर हैं। गांव वालों के अनुसार- इन पेड़ों एवं घर-बाड़ी में जरूरत की सब्जी - भाजी उगाने के कारण ये बंदर गांवों की ओर आकर्षित होते हैं। इनके उनके कच्चे मकान (खपरैल) को भारी नुकसान हो रहा है, इस कारण गरीब गांववालों को आर्थिक हानि का दोहरा भार सहन करना पड़ रहा है। अब गांव के लोग भी पक्के मकान बनाने लगे हैं। आज गांव का नजारा ही बदल गया है। गांव की प्रत्येक गली, मोहल्लों, चौपालों का कांक्रीटीकरण हो गया है। घर का आंगन, दीवार, छत कांक्रीट के बनने लगे हैं। गांवों का पर्यावरण प्रदूषित होने लगा है, फिर भी जंगल बेरहमी से काटे जा रहे हैं।

धरती हमारी मां है। इससे हमें न्यूनतम व अत्यावश्यक ही लेना चाहिए तथा इसकी निरंतर देखभाल करते रहना चाहिए। महात्मा गांधी ने कहा था, “धरती सभी मनुष्यों एवं प्राणियों की सभी आवश्यकताओं की पूर्ति करने में सक्षम है, परंतु किसी की तृष्णा को शांत नहीं कर सकती।” विकास एवं पर्यावरण में एक बात साफ है कि जितने उद्योग लगेंगे, उतनी ही जल, जंगल और जमीन कम होगी। छत्तीसगढ़ में प्रचुर मात्रा में खनिज हैं, पर उनके दोहन और पर्यावरण की सुरक्षा का मापदंड निर्धारित करना होगा। छत्तीसगढ़ में विकास और पर्यावरण का सबसे बड़ा मुद्दा आदिवासियों से जुड़ा है।

बस्तर और अन्य क्षेत्र नक्सलवाद की गिरफ्त में इसलिए आए, क्योंकि यहां अपेक्षा और आवश्यकता के अनुरूप विकास नहीं हो पाया। सरकार को यह भी स्वीकार करना चाहिए कि छत्तीसगढ़ में खेती का रकबा कम हो रहा है। इसके बावजूद देश में सर्वाधिक धान उत्पादन करने वाले राज्य के लिए महामहिम राष्ट्रपति श्रीमती प्रतिभा देवीसिंह पाटिल ने रमन सरकार को सम्मानित किया। जंगल कट रहा है और जल संकट भी कगार पर है। सिंचाई की कोई बड़ी योजना सामने नहीं है।

पर्यावरण की समस्याएं, गरीबी और अज्ञानता से जुड़ी हुई हैं। अत: अधिक-से-अधिक जन-जागरूकता लानी होगी, तभी छत्तीसगढ़ में विकास भी होगा और पर्यावरण सुरक्षित भी रहेगा।

सदंर्भ


1.यूनिफाइड राजनीति विज्ञान लोक प्रशासन, डॉ.जे श्यामसुंदरम्, पर्यावरणविद।
2.दैनिक नवभारत, रायपुर, दिनांक 11 सितंबर, 2011
3.दैनिक हरिभूमि, रायपुर, दिनांक 3 अगस्त, 2008
4.दैनिक नवभारत, रायपुर, दिनांक 22 मई, 2008
सहायक प्राध्यापक (राजनीति विज्ञान)
शासकीय महाविद्यालय, गुंडरदेही,
दुर्ग (छत्तीसगढ़)

छत्तीसगढ़ में घुरवा का

छत्तीसगढ़ के हर गाँव में घुरवा होता है, जिसमें पशुओं के गोबर एवं चारा पैरा, घर का राख इत्यादि को खाद बनाने के लिए इसमें डाला जाता है । परंतु गाँव में इससे बहुत सारी जमीन व्यर्थ हो रही है । साथ ही गांव के बीच में घुरवा होने से संक्रमण का खतरा भी होता है ।

इसलिए इस घुरवे का option क्या है बताने का कष्ट करें तथा इस समस्या से कैसे निपटा जा सकता है । क्योंकि जितने घर बन रहे हैं उतने घुरवा बन रहे हैं ।

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