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पर्यावरण संरक्षण हेतु परियोजना

Author: 
इं. एस.एन. तिवारी
Source: 
पर्यावरण विमर्श
विकसित देश यही चाहते हैं कि शेष विश्व उन पर निर्भर रहे और ज्यादा विकास न कर पाए। परंतु शेष विश्व को निरंतर प्रयास करना होगा और सम्मेलनों का आयोजन जारी रखकर सारे विश्व का ध्यान इस बात पर लाना होगा कि जब तक विकसित देश अपनी महत्वाकांक्षा नहीं छोड़ते और तय नहीं करते, तब तक प्रदूषण को कम करना कठिन होगा। कल-कारखानों से निकलने वाले ठोस, द्रव एवं गैस अवशिष्ट को पहले कारखाने में शुद्ध करने का नियम है, तभी उन्हें वातावरण में या नदी-नालों में मिलाया जाना चाहिए। परमात्मा ने मानव को पृथ्वी ग्रह पर हवा, पानी, पेड़-पौधों एवं जीव-जंतुओं के साथ पैदा किया। धीरे-धीरे मानव जाति ने अपनी आवश्यकताओं के अनुरूप अपना विकास किया एवं जीवन जीने में आ रही समस्याओं का उपाय खोजा। मानव ने प्रकृति के प्रकोपों जैसे-तेज हवा, बरसात, आंधी, तूफानों से बचने के लिए गुफाओं में आश्रय बनाए। ठंड से बचाव के लिए पहले जानवरों की खाल के कपड़े पहने।

जंगली जानवरों से बचाव के लिए पत्थर, लकड़ी, धातु आदि के हथियार बनाए। सुरक्षा एवं सामाजिकता के लिए साथ रहना सीखा। कबीला, ग्राम नगर बसाने शुरू किए। पेट भरने के लिए शिकार करने के अलावा खेती-बाड़ी शुरू की। इन सबके लिए जमीन तैयार करना शुरू किया। साथ ही, ईंधन, औजार, साजो-सामान, घरेलू उपकरणों के लिए भी लकड़ी का उपयोग किया, फलस्वरूप जंगलों से पेड़ों की कटाई और ज्यादा होने लगी।

धीरे-धीरे मानव जाति पूरी पृथ्वी के विभिन्न क्षेत्रों में बसने लगी और अपनी गुजर-बसर के लिए जंगलों का सफाया कर लकड़ी का ज्यादा-से-ज्यादा उपयोग करने लगी। आवागमन के साधन लकड़ी से बनाए जाने लगे। इस प्रकार जंगलों का उत्तरोत्तर अधिक उपयोग होने लगा एवं जंगल धीरे-धीरे कम होने लगे। कबीलों से होते हुए मानव सभ्यता राज्यों, सल्तनतों, साम्राज्यों तक पहुंची और विकास की गति बढ़ती गई फिर पृथ्वी पर वैज्ञानिक दौर शुरू हुआ और वैज्ञानिक खोजों एवं आविष्कारों से दुनिया भर गई, परंतु इस दौर में मानव ने अपनी आवश्कता से आगे जाकर, लालच का हाथ थाम लिया। फलस्वरूप जंगलों के उपयोग के स्थान पर जंगलों का दोहन प्रारंभ हो गया और लालची मानव ने जंगलों, वातावरण, भूमि, खनिज, पानी इत्यादि प्रकृति प्रदत्त वरदानों का ऐसा दोहन किया कि आज खुद मानव सभ्यता के अस्तित्व को खतरा पैदा हो गया है। पृथ्वी पर इतना प्रदूषण फैल गया है कि पर्यावरण संरक्षण यदि अभी नहीं किया गया तो प्रलय आने से कोई रोक नहीं पाएगा।

बिना पर्यावरण संरक्षण के आज स्थिति यह है कि जंगलों की कटाई हो जाने के कारण वर्षा की स्थिति अनिश्चित हो गई है। जहां अन्य वर्षा होती थी, वहां बाढ़ आ रही है और जहां बाढ़ आती थी, वहां सूखा पड़ रहा है। वर्ष में कभी भी बरसात होने लगती है। कई जीव-जंतु विलुप्ति की कगार पर हैं। हाथी, बंदर इत्यादि जंगली जानवर अक्सर गांवों, शहरों में चले आते हैं, क्योंकि जंगली जानवरों का बसेरा ‘जंगल’ अब उन्हें कम पड़ने लगा है।

पूरी दुनिया में कल-कारखानों का ऐसा जाल बिछा हुआ है कि उनसे निकलने वाली ग्रीनहाउस गैसों जैसे- कार्बन मोनो ऑक्साइड, कार्बन डाइऑक्साइड, मीथेन इत्यादि ने न केवल गांवों, शहरों के वातावरण को दमघोंटू बना दिया है, वरन् अब तो आसमान में ओजोन परत को भी क्षतिग्रस्त कर दिया है। इसके परिणामस्वरूप एक तरफ तो सूरज की अल्ट्रा वायलेट किरणों का खतरा बढ़ गया है, दूसरी तरफ ग्लोबल वार्मिंग होने से ध्रुवों पर जमी बर्फ पिघलने का अंदेशा हो गया है। हो सकता है किसी दिन ध्रुवों की सारी बर्फ पिघल जाए और समुद्र तल इतना ऊंचा हो जाए कि पूरी धरती समुद्र में समा जाए। वाहनों से निकलने वाले धुएं से शहरों का वातावरण सांस लेने लायक नहीं रह गया है, परंतु कोई दूसरा रास्ता नहीं होने के कारण ऐसे वातावरण में रहने वाले बाशिंदे तरह-तरह की बीमारियों से ग्रस्त हो रहे हैं।

प्राकृतिक जल-धाराओं को मानव जाति ने तरह-तरह के ठोस अपशिष्टों, रसायनों आदि से इतना प्रदूषित कर दिया है कि प्राकृतिक जल किसी उपयोग के लायक नहीं रह गया है। जल प्रदूषण के कारण जलीय वनस्पति एवं जीव-जंतुओं का जीवन खतरे में पड़ गया है। जहां एक ओर प्राकृतिक जलधाराओं (नदियों) ने मानव सभ्यता को उसके किनारे बसने के लिए प्रेरित किया था (इसी कारण ज्यादातर सभ्याताएं नदी किनारे ही विकसित हुई हैं), अब स्थिति यह है कि नदियों के प्रदूषित पानी ने नदियों को गंदे नालों का रूप दे दिया है, जिनमें साल में केवल कुछ महीने पानी रहता है, शेष वर्ष में केवल गंदगी बहती है और गंदगी, बदबू किनारे के निवासियों का जीवन दुष्कर किए हुए हैं। मानवीय क्रियाकलापों ने धरती को भी (शहरों को भी) प्रदूषण मुक्त नहीं छोड़ा है।

आज गावों, शहरों में जहां देखो, वहां गंदगी फैली रहती है, क्योंकि ठोस अवशिष्टों का सही तरीके से निदान नहीं किया जाता है। खासकर पॉलीथिन का अत्यधिक उपयोग हो रहा है और कचरे के रूप में निकलने वाले प्लास्टिक, पॉलीथिन नष्ट नहीं होती और वातावरण को प्रदूषित करती है। कई दफा कल-कारखानों (जैसे-पेपर इंडस्ट्री, शुगर इंडस्ट्री, डिस्टीलरी) से निकलने वाले रसायनों को आस-पास की जमीनपर ही फैला दिया जाता है, जिससे इन कारखानों के आस-पास इतनी बदबू आने लगती है कि कोई प्राणी वहां गुजर-बसर नहीं कर सकता।

आज खेती किसानी में रासायनिक खादों एवं कीटनाशकों का अंधाधुंध उपयोग हो रहा है, जिससे पूरी कृषि भूमि प्रदूषित हो गई है और सिंचाई के पानी द्वारा ये सारे रसायन खेतों से होते हुए नदी-नालों एवं भूमिगत जल स्रोतों में मिल रहे हैं। रसायनों के उपयोग के कारण सारे कृषि उत्पाद, डेयरी उत्पाद प्रदूषित हो चुके हैं। इन प्रदूषित उत्पादों के उपयोग के कारण मानव शरीर में खतरनाक रसायनों की मात्रा खतरे की सीमा तक पहुंच रही है।

इस प्रकार हम देख रहे हैं कि पृथ्वी पर सभी जगह प्रदूषण का प्रभाव पड़ चुका है और अब हमें पर्यावरण संरक्षण एवं प्रदूषण मुक्ति की किसी परियोजना पर कार्य करना ही होगा। चूंकि पर्यावरण को प्रदूषित मानवों ने ही किया है, अतः इस परियोजना की शुरुआत मानवों की सोच एवं क्रियाकलापों में सुधार लाने से करना होगा। इस दिशा में ‘पृथ्वी सम्मेलन’ विश्व स्तर पर आयोजित किए जा रहे हैं, जिनमें यही विचार-विमर्श होता है कि पृथ्वी को कैसे बचाया जाए, परंतु अफसोस की बात है कि इन सम्मेलनों में आम सहमति नहीं बन पाती है।

विश्व के वे 10 प्रतिशत देश (जो विकसित है) और 90 प्रतिशत पर्यावरण प्रदूषण के लिए जिम्मेदार हैं, अपने कल-कारखानों से कार्बन उत्सर्जन की मात्रा प्रभावी रूप से कम करने को तैयार नहीं होते हैं। उनका प्रयास ये होता है कि शेष विश्व, जो अविकसित है या विकासशील है, में कल-कारखाने सीमित किए जाएं ताकि कार्बन उत्सर्जन बढ़े नहीं। परोक्ष रूप से विकसित देश यही चाहते हैं कि शेष विश्व उन पर निर्भर रहे और ज्यादा विकास न कर पाए। परंतु शेष विश्व को निरंतर प्रयास करना होगा और इसी तरह के सम्मेलनों का आयोजन जारी रखकर सारे विश्व का ध्यान इस बात पर लाना होगा कि जब तक विकसित देश अपनी महत्वाकांक्षा नहीं छोड़ते और तय नहीं करते, तब तक प्रदूषण को कम करना कठिन होगा।

कल-कारखानों से निकलने वाले ठोस, द्रव एवं गैस अवशिष्ट (Waste) को पहले कारखाने में शुद्ध करने का नियम है, तभी उन्हें वातावरण में या नदी-नालों में मिलाया जाना चाहिए। हकीकत यह है कि कारखानों के मालिक Waste Treatment पर खर्च नहीं करना चाहते। इससे कारखाने के आस-पास का वातावरण के कचरे से प्रदूषित होता रहा है। इस प्रकार Waste Treatment के लिए बने नियम को निष्प्रभावी होते देखा जा सकता है। उपरोक्त दो उदाहरणों से स्पष्ट होता है कि कैसे प्रदूषण नियंत्रण एवं पर्यावरण संरक्षण के उपाय होते हुए भी उनके परिणाम देखने को नहीं मिलते। इंसानों की लापरवाही और लालच छोड़ना होगा, नहीं तो सर्वनाश सुनिश्चित है।

व्यक्तिगत तौर पर हर व्यक्ति को इस दिशा में ईमानदार प्रयास करना होगा तो ही पर्यावरण संरक्षण हो पाएगा। आज हर व्यक्ति को अपना-अपना वाहन चाहिए, जिनकी वाहन चलाने की उम्र नहीं है, उन्हें भी वाहन चाहिए। स्त्री, पुरुष, बच्चे, वृद्ध सभी को अलग वाहन चाहिए। दस कदम जाना हो तो भी वाहन चाहिए। वाहनों की ऐसी चाहत से पूरा वातावरण वाहनों के धुएं से ऐसा प्रदूषित है कि घर से बाहर निकलने को जी नहीं करता।

इस समस्या का समाधान तभी संभव है, जब हर व्यक्ति कुछ त्याग करने को तैयार हो। हर घर में यथासंभव वाहनों की संख्या सीमित हो। जब तक आवश्यक न हो, वाहन का उपयोग न किया जाए। वाहनों का रख-रखाव ऐसा हो कि कम-से-कम प्रदूषण फैलाएं। कार्य स्थल, चाहे वह मंत्रालय हो, कलेक्ट्रेट हो, न्यायपालिका हो या कोई भी सरकारी/गैर-सरकारी कार्यालय हो पर भी इस बात का ध्यान रखा जाए कि वाहनों की संख्या अनावश्यक न हो।

वाहनों का प्रयोग अनावश्यक न हो वाहनों का रख-रखाव ठीक से हो। हर जगह तक संभव हो, साझेदारी से वाहनों का उपयोग हो। भारी वाहनों जैसे-ट्रकों का रख-रखाव होता रहे, ताकि वे कम प्रदूषण फैलाएं। यदि उपरोक्त सब हो पाए तो ईंधन की खपत में एवं वाहनों द्वारा प्रदूषण में भारी कमी हो सकती है। देखने में आता है कि आजकल ‘लेटेस्ट’ का खूब प्रचलन है। चाहे वे कपड़े हो, पेन, मोबाइल, कम्प्यूटर, टी.वी. फ्रिज हो या अन्य कोई उपयोगी वस्तु हो, यदि उसमें जरा-सा भी तकनीकी सुधार होकर नया मॉडल आता है तो लोग लपककर नए मॉडल को अपनाते हैं, भले ही पुराने मॉडल से आवश्यकता पूर्ति हो रही है।

इस ‘लेटेस्ट’ के चक्कर में आज विश्व में इतना ज्दा इलेक्ट्रॉनिक कचरा जमा होता जा रहा है, जिसका प्रबंधन असंभव-सा लगने लगा है। एक जमाना था, जब लोग अपनी पुरानी वस्तुओं को सहेजकर रखते थे और सगर्व सभी को दिखाते थे और प्रशंसा पाते थे। आज जमाना उलटा है, जहां ‘ओल्ड इज नो गोल्ड एंड लेटेस्ट इज फिटेस्ट’ है। मैं समझता हूं कि यदि लोग नई वस्तुएं खरीदने में उतावली न करें और पुरानी वस्तु जब तक उपयोगी हो उसका उपयोग करें तो काफी कुछ इलेक्ट्रॉनिक कचरे से मुक्ति मिल सकती है।

यदि हर व्यक्ति एक पेड़ प्रतिवर्ष लगाकर उसका रख-रखाव चालू कर दे तो सामाजिक वानिकी सही अर्थों में सफल होगी। हर घर में यदि रेन हार्वेस्टिंग सिस्टम लग जाए, तो पानी की वर्ष भर कमी न हो। हर व्यक्ति को चाहिए कि सोलर एनर्जी का जहां तक संभव हो उपयोग करे, क्योंकि बिजली पैदा करने में भी बहुत पर्यावरण का नुकसान होता है। हर व्यक्ति कम-से-कम बिजली की खपत करे। वो यह तो कर ही सकता है कि काम खत्म होने के बाद जाने से पहले बिजली का स्विच ऑफ कर दे, इससे काफी बिजली की बचत की जा सकती है।

आज आवास एवं व्यवसाय के लिए मल्टी स्टोरी बनाने का चलन है, जो कि बहुत उपयोगी है। मल्टी स्टोरी बिल्डिंग में कम जगह में ज्यादा का काम चलता है, जो कि पर्यावरण के लिए अच्छी बात है। आज जरूरत इस बात की है कि संसाधनों, चाहे वह जमीन हो, पानी हो का उचित तरीके से उपयोग हो। रि-साइक्लिंग की आज महती आवश्यकता है। जिस भी चीज की (पॉलीथिन की, पानी की, इलेक्ट्रॉनिक सामान की इत्यादि) रि-साइक्लिंग संभव हो, की जानी चाहिए, इसमें काफी कुछ प्रदूषण नियंत्रण होगा।

कागज के उपयोग में यदि मितव्यतता बरती जाए तो हम काफी जंगलों को बचा पाएंगे। हर जगह कागज का उपयोग होता है, साथ ही कागज की बहुत बर्बादी भी की जाती है। कागज बनाने में बहुत लकड़ी खर्च होती है। अतः यदि कागज की बर्बादी बंद हो जाए तो पर्यावरण के नुकसान को रोका जा सकता है। कम्प्यूटर का उपयोग हर जगह होता है, इसके कारण कई काम पेपर लैस भी हो गए है, अर्थात् जहां कागज के उपयोग की जरूरत ही नहीं पड़ती। आज ज्यादा आवश्यकता इस बात की है कि ज्यादा-से-ज्यादा कार्य पेपर लैस हो जाएं, यह पर्यावरण संरक्षण में बहुत सहायक होगा।

पर्यावरण संरक्षण की परियोजना के उपरोक्त समस्त उपायों का बड़े पैमाने पर इलेक्ट्रॉनिक एवं पेपर, दोनों मीडिया द्वारा प्रचार-प्रसार किया जाना चाहिए, ताकि जब समाज के सामने बार-बार उपायों की जानकारी दी जाएगी, तब समाज में इन उपायों को अपनाना शुरू किया जाएगा।

जिस प्रकार बच्चों के टीकाकरण, पोलियो ड्रॉप्स, आयकर भरने की सूचना, जागो ग्राहक जागो के अभियान का प्रचार-प्रसार किया जाता है और उसके सुखद परिणाम भी देखने को मिलते हैं, उसी प्रकार पर्यावरण संरक्षण के उपायों का भी खूब प्रचार-प्रसार किया जाना चाहिए ताकि हर नागरिक पर्यावरण संरक्षण के अभियान में जुड़ सके और अपना-अपना सहयोग इस दिशा में दे सकें। फिर वह दिन दूर नहीं होगा कि पर्यावरण संरक्षण की इस योजना से हमारा वातावरण स्वच्छ होगा, स्वास्थ्यप्रद होगा और चूंकि सभी व्यक्ति इस अभियान में शामिल होंगे, सभी अपने आप पर गर्व महसूस करेंगे और बेहतर पर्यावरण का आनंद उठाएंगे।

सहायक अभियांता, कार्यालय मुख्य अभियंता, हसदेव कछार, बिलासपुर

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