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पर्यावरण प्रदूषण कानून : उनका क्रियान्वयन

Author: 
डॉ. शीला दानी
Source: 
पर्यावरण विमर्श
1980 का दशक पर्यावरणीय विषयों पर समस्त राज्यों के मध्य उल्लेखनीय वार्ताओं का साक्षी रहा। इनमें ‘ओजोन परत’ को सुरक्षित रखने एवं विषैले उत्सर्जन की गति को नियंत्रित करने वाली संधियों का समावेश था। सन् 1983 में महासभा द्वारा स्थापित पर्यावरण एवं विकास पर विश्व आयोग ने एक नए प्रकार की समझ-बूझ और एक नए प्रकार के विकास की जरूरत के प्रति तात्कालिकता की भावना की वृद्धि की। साथ ही, आर्थिक कल्याण को सुनिश्चित करने के साथ-साथ पर्यावरणीय संसाधनों को, जिन पर सारा विकास अवलंबित है, को संरक्षित रखने की पहल भी सम्मिलित की गई। पर्यावरण का क्षय या ह्रास एक अंतरराष्ट्रीय समस्या है। जनसंख्या विस्फोट, नगरीकरण, जल-प्रदूषण, धुआं, शोर-गुल, रासायनिक प्रवाह, विज्ञान और तकनीक का अप्रत्याशित प्रसार आदि ऐसे कारण हैं, जिनकी वजह से पर्यावरण का दिन-प्रतिदिन होता जा रहा है। विश्व के अधिकांश भागों में पर्यावरण की समस्याएं अब भी निर्धनता और अज्ञान से संबंधित हैं। परंपरागत अंतरराष्ट्रीय कानून में प्रदूषण और पर्यावरण ह्रास की समस्याओं पर बहुत ज्यादा चिंतन-मनन नहीं किया गया है बावजूद इसके यह माना जाता है कि किसी राज्य के कार्यकलापों की एक सीमा यह है कि उससे अन्य राज्यों के क्षेत्र पर किसी प्रकार की क्षति नहीं पहुंचनी चाहिए। तात्पर्य यह है कि अंतरराष्ट्रीय कानून के अंतर्गत प्रत्येक राज्य का यह कर्तव्य है कि वह अपने राज्य क्षेत्र में ऐसा कोई कार्य न करे, जिससे उस क्षेत्र के बाहर पर्यावरण संबंधी नुकसान या हानि की समस्या उत्पन्न हो।

इस संदर्भ में संयुक्त राष्ट्र के आरंभिक दशकों में पर्यावरणीय चिंताएं यदा-कदा ही अंतरराष्ट्रीय एजेंडा सूची पर आती थीं। सन् 1960 के दशक में समुद्री-प्रदूषण, विशेषकर तेल के बहाव-बिखराव से संबंधित कुछ समझौते हुए थे, लेकिन वैश्विक स्तर पर पर्यावरण के क्षय के बढ़ते प्रमाण के कारण सन् 1970 के दशक से अंतरराष्ट्रीय समुदाय ने इसकी पारिस्थितिकी एवं मनुष्य समाज पर विकास के प्रभाव पर उत्तरोत्तर चिंता व्यक्त की। संयुक्त राष्ट्र पर्यावरणीय चिंताओं का एक प्रमुख पैरोकार और ‘टिकाऊ विकास’ का मुख्य प्रतिपादक रहा है।

आर्थिक विकास एवं पर्यावरणीय क्षय के बीच संबंध को सर्वप्रथम सन् 1972 में स्टॉकहोम में आयोजित मानव पर्यावरण पर संयुक्त राष्ट्र सम्मेलन के एजेंडा में रखा गया था। सम्मेलन के पश्चात् सरकारों ने संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम (यू.एन.ई.पी.-यूनाइटेड नेशन्स एनवायरमेंट प्रोग्रेस) स्थापित किया, जो एक प्रमुख वैश्विक पर्यावरणीय एजेंसी के रूप में कार्य कर रहा है।

सन् 1973 में संयुक्त राष्ट्र ने पश्चिमी अफ्रीका में मरुस्थलीकरण विस्तार को घटाने के प्रयासों को बढ़ाने के लिए ‘सूडानो-सहेलियन ऑफिस’ (यू.एन.एस.ओ.) की स्थापना की, तथापि राष्ट्रीय आर्थिक नियोजन एवं निर्णय प्रक्रिया में पर्यावरणीय चिंताओं को सम्मिलित करने का कार्य भी धीमी गति से चलता रहा।

1980 का दशक पर्यावरणीय विषयों पर समस्त राज्यों के मध्य उल्लेखनीय वार्ताओं का साक्षी रहा। इनमें ‘ओजोन परत’ को सुरक्षित रखने एवं विषैले उत्सर्जन की गति को नियंत्रित करने वाली संधियों का समावेश था। सन् 1983 में महासभा द्वारा स्थापित पर्यावरण एवं विकास पर विश्व आयोग ने एक नए प्रकार की समझ-बूझ और एक नए प्रकार के विकास की जरूरत के प्रति तात्कालिकता की भावना की वृद्धि की। साथ ही, आर्थिक कल्याण को सुनिश्चित करने के साथ-साथ पर्यावरणीय संसाधनों को, जिन पर सारा विकास अवलंबित है, को संरक्षित रखने की पहल भी सम्मिलित की गई। महासभा को प्रस्तुत आयोग की सन् 1987 की रिपोर्ट में टिकाऊ विकास की अवधारणा सम्मुख रखी गई।

पृथ्वी शिखर सम्मेलन में यह सहमति हुई कि एजेंडा 21 के लिए अधिकांश धन प्रत्येक देश के सार्वजनिक एवं निजी क्षेत्र से आएगा। सन् 1991 में प्रारंभ एवं 1994 में पुनर्गठित वैश्विक पर्यावरण सुविधा (ग्लोबल एनवायरमेंट फेसिलिटी ‘जी.ई.एफ.’ जेफ) को इन विधियों को व्यवस्थित ढंग देने का कार्य दो बार सौंपा गया। यू.एन.ई.पी. द्वारा प्रायोजित वार्ताओं के फलस्वरूप सन् 1993 में 110 सरकारों द्वारा एक वैश्विक कार्यक्रम की स्वीकृति संभव हुई। यह है ‘धरती आधारित गतिविधियों से समुद्री पर्यावरण को बचाने के लिए वैश्विक कार्य योजना’।

पर्यावरण संरक्षण हेतु अंतरराष्ट्रीय कानून की व्यवस्था की गई है, जिसके अंतर्गत लेकसेक्स सम्मेलन (1949) के अंतर्गत इस बात पर बल दिया गया है कि प्रकृति के उपकरण एक नैसर्गिक बपौती के रूप में हैं, जिन्हें शीघ्रता से नष्ट नहीं करना चाहिए। इसी तारतम्य में मानवीय पर्यावरण पर स्टॉकहोम सम्मेलन सन् (1968-1972) आयोजित हुआ, जिसमें मानव पर्यावरण की क्षति को सीमित करने तथा मानव की प्राकृतिक परिस्थितियों के संरक्षण और सुधार के लिए योजनाएं बनाई गईं। जीव रक्षण मानव निर्मित प्रदूषकों से प्रदूषण नियंत्रण और नगरों तथा मानव बस्तियों के लिए सरकारों तथा अंतरराष्ट्रीय संगठनों द्वारा किए जाने वाले उपायों की 100 से अधिक सिफारिशों वाली कार्यवाही योजना की भी इसमें स्वीकृति प्रदान की गई। पर्यावरण संबंधी अंतरराष्ट्रीय कानून के विकास की आवश्यकता आज सबसे अधिक अनुभव की जा रही है। स्टॉकहोम सम्मेलन ने पर्यावरण संबंधी अंतरराष्ट्रीय विधि के विकास की नींव डाली और रिओ पृथ्वी सम्मेलन के निर्णयों के आधार पर पर्यावरण और विकास के साथ सामान्य जीवन भी प्रभावित होने की संभावना है।

भारत में पर्यावरणीय प्रश्नों के समाधान के लिए समाजवादी मार्ग अपनाया है। इस कार्य के लिए जनता की भागीदारी, उसकी दिलचस्पी तथा उसकी सजग चेतना को अधिक प्राथमिकता दी गई है। भारत में पर्यावरण की ओर गंभीरता से ध्यान आकर्षित करने का श्रेय संजय गांधी को जाता है। युवक कांग्रेस के पांच सूत्रों में से एक सूत्र ‘पेड़ लगाओ’ था। पहले पहल इस बात को सतही तौर पर लिया गया, लेकिन सरकार के हस्तक्षेप तथा जन-जागृति स्कूल तथा महाविद्यालयों की कार्य कुशलता से इसे गति दी गई। भारत में प्रकृति की रक्षा का दायित्व जनश्रुतियों में दीर्घकाल से चला आ रहा है। उदाहरणार्थ ‘याज्ञवल्क्य स्मृति’ में स्पष्ट कहा गया है कि मानव को पौधों और जानवरों की रक्षा करनी चाहिए।

स्वतंत्रता पूर्व भी भारत में पर्यावरण संरक्षण हेतु अनेक कानून बनाए गए। आजादी से पूर्व पहली बार वन अधिनियम, 1927 द्वारा पर्यावरण संरक्षण की बात कही गई थी। इसके पश्चात् क्रमशः इंडियन फिशरीज एक्ट, 1897, विषय अधिनियम 1919, इंडियन बॉयलर्स एक्ट 1923, मैसूर डेस्ट्रक्टिव एंड पोस्ट एक्ट 1917 तथा बिहार वेस्ट लैंड्स एक्ट 1946 पारित किए गए।

स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद भारतीय संविधान में पर्यावरण संरक्षण के विभिन्न उपबंधों को संविधान में स्थान दिया गया। इसे प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप में संविधान की प्रस्तावना, मूलाधिकारों, राज्य के नीति-निर्देशक तत्वों तथा मूल कर्तव्यों में देखा जा सकता है।

संविधान का अनुच्छेद 51 A(G) कहता है, प्रत्येक नागरिक का यह कर्तव्य है कि वह प्राकृतिक पर्यावरण की रक्षा करे, प्राकृतिक पर्यावरण का संवर्द्धन करे, जीव व प्राणियों के प्रति दया भाव रखे।

उपरोक्त में प्राकृतिक तथा कृत्रिम दोनों को सम्मिलित किया गया है। इस अनुच्छेद में जिस कर्तव्य का उल्लेख किया गया है, उसकी पूर्ति तभी संभव है, जब पर्यावरण सुरक्षित रहे। उसमें किसी प्रकार का प्रदूषण न रहे। संसद इस कर्तव्य का पालन करने के लिए उपयुक्त विधान की व्यवस्था कर सकती है। संसद ने इसी भावना से प्रेरित होकर अनुच्छेद 253 की शक्ति से वायु प्रदूषण अधिनियम 1981, पर्यावरण संरक्षण अधिनियम 1986 अधिनियमित किए।

भारतीय दंड संहिता 1860 के अध्याय 14 लोकस्वास्थ्य क्षेत्र की सुविधा, शिष्टता और सदाचार पर प्रभाव डालने वाले अपराधों के विषय में उपलब्ध किया या है। इसके अंतर्गत छह मास का कारावास एवं जुर्माना तथा दोनों की व्यवस्था की गई है।

दंड प्रक्रिया संहिता 1973 का अध्याय 10 लोक व्यवस्था और शांति बनाए रखने के लिए उपबंध करता है। इसमें धारा 133 से 144 तक लोक न्यूसेंस का उल्लेख है, जो पर्यावरण से संबंधित है।

सन् 1980 में स्थापित ‘भारतीय वानस्पति सर्वेक्षण’ देश के वानस्पतिक संसाधनों का सर्वेक्षण और उनकी पहचान करता है। इसका मुख्यालय कोलकाता में स्थित है।

सन् 1916 में ‘भारतीय प्राणी विज्ञान सर्वेक्षण’ का गठन किया गया, जिसमें देश के जीव-जंतुओं से संबंधित सर्वेक्षण एवं सूचीकरण संबद्ध है। इसका मुख्यालय भी कोलकाता में स्थापित है।

सन् 1981 में ‘भारतीय वन सर्वेक्षण’ स्थापित किया गया। यह संगठन देश के लिए विषय-केंद्रित नक्शे पर हर दस वर्ष बाद तथा पेड़-पौधों पर केंद्रित नक्शे दो वर्ष में बना है। इसका मुख्यालय देहरादून में स्थित है तथा बेंगलुरु, कोलकाता, नागपुर एवं शिमला में क्षेत्रीय कार्यालय बनाए गए हैं। वन रिपोर्ट के अनुसार सन् 2003 में देश के कुल भौगोलिक क्षेत्रफल का 23 प्रतिशत वनाच्छादित था।

भारत की वन नीति एवं अन्य कानून को प्रथम बार सन् 1894 में संशोधित किया गया। साथ ही, संशोधित वन नीति 1988 ही वनों की सुरक्षा, संरक्षण और विकास का आधार है। इसे पुनः सन् 1990 तथा 1998 में संशोधित किया गया।

राष्ट्रीय ‘वन जीवन कार्य योजना’ : यह वन्य जीव संरक्षण के लिए कार्यनीति एवं कार्यक्रम की रूप रेखा प्रस्तुत करती है।

‘भारतीय वन्य जीवन बोर्ड’ : वन्य जीवन संरक्षण की अनेक योजनाओं के क्रियान्वयन, निगरानी एवं निर्देश करने वाला शीर्ष सलाहकारी निकाय है। प्रधानमंत्री भारतीय वन्य जीवन बोर्ड के पदेन अध्यक्ष होते हैं।

‘ईको मार्क’ : ऐसे उपभोक्ता उपाय, जो पर्यावरण के अनुकूल होते हैं, उन्हें सन् 1992 से ‘ईको मार्क’ से चिन्हित किया जा रहा है।

यदि पर्यावरणीय कानून की बात की जाए तो हम निम्न निष्कर्ष पर पहुंचते हैं-

1. सन् 1972 में देश में वन्य जीवन (संरक्षण) अधिनियम लागू किया गया।
2. भारत में जल (प्रदूषण निवारण एवं नियंत्रण) अधिनियम सन् 1981 में बनाया गया।
3. वन संरक्षण अधिनियम का आरंभ सन् 1980 में किया गया।
4. वायु प्रदूषण अधिनियम (प्रदूषण निवारण एवं नियंत्रण) सन् 1981 में बनाया गया।
5. पर्यावरण (संरक्षण अधिनियम का गठन सन् 1986 में चार अध्याय तथा 26 धाराओं में विभाजित कर बनाया गया।
6. पर्यावरण (संरक्षण) अधिनियम के अंतर्गत अधिनियम की किसी भी व्यवस्था को प्रथम बार तोड़ने पर पांच वर्ष की कैद अथवा एक लाख रुपया जुर्माना अथवा दोनों का प्रावधान है।
7. उच्चतम न्यायालय व उच्च न्यायालय में भारतीय नागरिक सीधे ही पर्यावरण संबंधी वाद दायर कर सकते हैं।
8. 42वें संविधान संशोधन द्वारा भारतीय संविधान में पर्यावरण संरक्षण संबंधी प्रावधान जोड़े गए।
9. भारतीय संविधान का अनुच्छेद 21 किसी व्यक्ति की उस गतिविधि से सुरक्षा करता है, जिससे उसकी जीव, स्वास्थ्य और शरीर की हानि पहुंचती है।
10. भारतीय संविधान के अनुच्छेद 48A में सरकार पर्यावरण संरक्षण और सुधार करने हेतु बाध्य है।
11. भारतीय संविधान के अनुच्छेद 51 अ(G) के तहत पर्यावरण का संरक्षण हर नागरिक का मूल कर्तव्य माना गया है।
12. अंतरराष्ट्रीय कानून का नाम नहीं है। (CITTES) लुप्त हो रही प्रजातियों से संबंधित है।
13. जल (प्रदूषण निवारण एवं नियंत्रक) उपकर (संशोधन) बिल 1991 द्वारा पिछले बने अधिनियम में उद्योगों द्वारा जल उपयोग पर अधिक उपकर की व्यवस्था की गई है।
14. भारत में जल प्रदूषण संबंधी प्रथम अधिनियम और न्यूसेंस (मुंबई एवं कोलकाता) अधिनियम 1853 में बना।
15. जन हितवाद के अंतर्गत पारिस्थितिकी असंतुलन के दूनधारी खनन केस का भारत के उच्चतम न्यायालय ने जनता के हित में निर्णय दिया था।
16. जल (प्रदूषण निवारण एवं नियंत्रण) अधिनियम, 1974 का संशोधन 1978 में किया गया।
17. लोक दायित्व बीमा अधिनियम, 1991 की परिसंकटमय रसायन उद्योगों के कारण दुर्घटनाओं का शिकार होने वाले लोगों को तत्काल राहत प्रदान करने के लिए पारित किया गया।

उपरोक्त पर्यावरणीय कानूनों का शत-प्रतिशत पालन किया जाए तो देश में पर्यावरण संकट की समस्या को सरलतापूर्वक सुलझाया जा सकता है।

संदर्भ


1. भूगोल, डॉ. चतुर्भुज ममोरिया, डॉ. बी.एल. शर्मा, 2009, साहित्य भवन पब्लिकेशंस।
2. राजनीति विज्ञान, डॉ. बी.एल. कड़िया, 2004, साहित्य भवन पब्लिकेशंस।
3. पर्यावरण प्रदूषण और प्रबंधन, अशोक प्रधान, नीलकंठ प्रकाशन, महरौली, नई दिल्ली।
4. भौतिक भूगोल, डॉ. सविंद्र सिंह, वसुंधरा प्रकाशन, गोरखपुर।

सहायक प्राध्यापक हिंदी
कला एवं वाणिज्य कन्या महाविद्यालय देवेंद्रनगर, रायपुर (छ.ग.)

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