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कूड़े का रोना

Author: 
मनोज कुमार झा
आज हमारे जीवन को सजाने वाली जिन चीजों से जीवन की सजावट होनी थी, शायद उन्होंने प्रकृति की सारी बनावट के आगे एक संकट पैदा कर दिया है। ‘दर्शन’ की जगह ‘दिखावा’ हमें हार्दिक पनाह देता है और जब हम इन सबसे थकते हैं तो अपने आसपास के कूड़ामय होने का रोना रोते हैं। शायद इस रुदन में भी कोई करुणा होती, लेकिन यह तो एक कूड़े का दूसरे कूड़े के लिए रोना है। कूड़ा अव्यवस्था से जन्म लेता है। लेकिन यह भी दिलचस्प है कि कूड़े की व्यवस्था करनी पड़ती है। सरकार का एक पूरा महकमा इसके लिए लगा है। दफ्तरी कामकाज के सारे तामझाम इसके पीछे हैं। कभी-कभी सोचता हूं, कूड़ा तो इन कूड़ा उठाने वाले दफ्तरों में भी होता होगा। पता नहीं उसे कौन उठाता है?

दरअसल कूड़ा हमारे आधुनिक जीवन की एक जरूरी बुराई की तरह है। कूड़े से हम बच नहीं सकते और कूड़े को हम देखना नहीं चाहते। इधर कूड़े की कुछ शक्ल भी बदली है। अब यह जल्दी असह्य हो जाता है। नाक, कान, आंख जैसी हमारी इंद्रियां इससे तुरंत उकता जाती हैं। आज कूड़ा ज्यादा बजबजाता है।

र्यावरण प्रदूषण के सारे सजावटी इश्तिहार इसे देखते ही स्मरण हो आते हैं। सरकार कूड़ा कहां फेंके, अब यह उसके लिए भी समस्या है। प्लास्टिक से क्या नुकसान हो रहा है, यह दोहराने की भी जरूरत नहीं है। जिन देशों से यह अक्लमंदी हमने सीखी है, अब वही हमें इनसे खबरदार होने की तमीज सिखा रहे हैं। बचपन से कुछ ऐसे लोगों के साथ रहने-सीखने का मौका मिला है जिन्हें आप प्रचलित शब्दावली में ‘गांधीवादी’ कह सकते हैं।

वैसे खुद गांधी को भी अपने नाम में कभी इतनी शक्ति का एहसास नहीं हुआ कि उससे कोई ‘वाद’ चले। ऐसे में हम व्यक्तिवाद की भी बुराई नहीं कर पाएंगे। बहरहाल, कई बार कुछ शिविरों और ऐसी ही गांधीवादी संस्थाओं में गया हूं। कई मौकों और कई जगहों पर इस रूप में देखखर जरूर आश्चर्य हुआ कि वहां कूड़े को समस्या की तरह नहीं निपटाया जाता।

एक गांधीवादी युवक (बूढ़े ने नहीं) ने बताया कि सफाई का मतलब समझते हो? मैंने कहा, कूड़े को ठिकाने लगाना सफाई तो यही है। उसने फिर से प्रश्न जड़ दिया- कूड़ा पैदा क्यों होता है? मैंने कहा, जब कोई चीज हमारे काम की नहीं रहती तो वह कूड़ा हो जाती है। वह युवक अब खुश था। शायद उसकी नजर में मैंने अपनी सारी बुद्धिमानी जाहिर कर दी थी। वह मुझे प्रेमभाई के वनवासी सेवा आश्रम मिर्जापुर के कुछ रास्तों पर बड़े भाई की तरह पीठ पर हाथ रखकर घुमाने निकला।

मैंने गोबर से बनती गोबर गैस देखी, फिर गैस दे चुके गोबर से बनती खाद देखी और फिर देखी उस खाद से तैयार सुंदर फसल। मैंने खुद से हर संभव काम को करने की ललक आश्रम के लोगों में महसूस की। मेरे लिए यह जीवन का नया पाठ था। दो-एक दिन बाद युवक से मुझे अपना बकाया जवाब मिला। उसने बताया-सफाई मतलब सभी चीजों का फायदेमंद इस्तेमाल। बाद में तो यह मेरा प्रिय विषय ही बन गया। गांधी जी के जीवन और उनसे जुड़े लोगों के कई प्रसंग मुझे याद आ रहे हैं।

बात आजादी के कुछ साल पहले की है। गांधी उन दिनों बंबई में थे। एक बड़ी सभा होने वाली थी। सभा से पूर्व अपनी आदत के मुताबिक गांधी शहर के विभिन्न तबके के लोगों से मिलते, बात करते। सभी अपनी बातें उनके आगे रखने के लिए लालायित रहते। सूरज भी ऐसे ही एक दिन उनसे मिला।

सूरज अब सिर्फ सफाई कर्मचारी नहीं, उसकी यूनियन का नेता था। बातें तार्किक की जगह सहज ज्यादा थीं। सहजता से ही पूछा- बापू, क्या आप मेरी भी बात सुनेंगे? गांधी ने कहा- क्यों नहीं। सूरज ने शर्त रखी, ऐसे ही चलते-चलते नहीं, बैठकर पूरी तसल्ली से सुननी होगी। गांधी सूरज से भी आगे हों गए। कहा-तो चलो तुम्हारे घर ही चलते हैं। सूरज अवाक था। जिसके पीछे दुनिया पागल है, वह मेरे घर खुद आना चाह रहा है।

सूरज ने कहा- बापू मैं आज भी पेशे से एक सफाई कर्मचारी ही हूं। यूनियन की पगड़ी इन लोगों की दी हुई है। पहले रात भर सफाई का काम करता था। अकेले कई किलोमीटर सड़कें बुहार देता था। आज उसी काम को करने के लिए हम छह लोग हैं। हमारे औजार भी बढ़ गए हैं। झाड़ू के अलावा अब कूड़ा साफ करने की गाड़ी लेकर हम घूमते हैं। लेकिन लगता है कि कूड़े की ही शक्ल बदल गई है।

कमबख्त चुड़ैल के मेकप के लिए ये सारे सामान पूरे नहीं पड़ते। इसकी शक्ल वैसे ही बजबजाती रह जाती है। यह क्या हो गया है? अगले दिन भरी सभा में गांधी ने सूरज को दूर से ही पहचान निकाला। पास आकर उससे मिले। वहां के लोगों के लिए यह सब हैरत भरा था। बाद में सभा में बोलते हुए गांधी ने कहा, मुझे ‘अंग्रेजों’ से नहीं ‘कूड़ों’ से आजादी चाहिए।

दरअसल गांधी का कोई एजेंडा बदला नहीं था, बल्कि वे अपने एजेंडे की तामील के लिए लोगों का सोच बदलना चाहते थे। गांधी ने कहा, कूड़ा सामान ही नहीं, जीवन भी होता है। वैसे ही जैसे हमारे जीवन में कुछ सामान रद्दी और कूड़ा होता है। दरअसल अपनी उपयोगिता और उद्देश्य खो चुका जीवन हो या फिर कोई सामान, वह कूड़ा है।

आज हमारे जीवन को सजाने वाली जिन चीजों से जीवन की सजावट होनी थी, शायद उन्होंने प्रकृति की सारी बनावट के आगे एक संकट पैदा कर दिया है। ‘दर्शन’ की जगह ‘दिखावा’ हमें हार्दिक पनाह देता है और जब हम इन सबसे थकते हैं तो अपने आसपास के कूड़ामय होने का रोना रोते हैं। शायद इस रुदन में भी कोई करुणा होती, लेकिन यह तो एक कूड़े का दूसरे कूड़े के लिए रोना है।

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